स्वतंत्रता : हस्ताक्षर

  • हम जैसे  जीना चाहते हैं, वैसे जीने के अधिकार के अलावा स्वतंत्रता क्या कुछ और भी है? और कुछ भी नहीं। ::: एपिक्टीटस
  • मनुष्य उसी क्षण स्वतंत्र हो जाता है जब वह ऐसा होना चाहता है। ::: वाल्टेयर
  • स्वतंत्रता लोगों को वह कहने का अधिकार है जो वे सुनना नहीं चाहते। :::    जॉर्ज ऑरवेल
  • जो दूसरों को स्वतंत्रता देना नहीं चाहते, वे खुद भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं हैं, और न्यायी परमात्मा के शासन में ज्यादा दिनों तक उसकी रक्षा नहीं कर सकते। ::: अब्राहम लिंकन
  • वह स्वतंत्रता धारण करने योग्य नहीं है जिसमें गलती करने का अधिकार शामिल न हो। ::: महात्मा गाँधी
    स्वतंत्रता बेहतर बनने के अवसर के अलावा कुछ नहीं है।  :::  अलबेयर कामू
  • स्वतंत्रता वहाँ से शुरू होती है, जहाँ वह आज्ञान का अंत करती है। ::: विक्टर ह्यूगो
  • मेरी इच्छा है कि प्रत्येक मानव जीवन शुद्ध पारदर्शी स्वतंत्रता हो। ::: सिमोन द बुआ
  • उनसे ज्यादा आशाहीन गुलाम कोई नहीं है जिन्हें यह भ्रम है कि वे स्वतंत्र हैं। ::: गोएठे
  • स्वतंत्रता वह है जो तुम उसके साथ करते हो जो तुम्हें किया गया है। ::: सार्त्र
  • विश्व का इतिहास स्वतंत्रता की चेतना की प्रगति के अलावा कुछ और नहीं है। ::: हेगेल
  • आवश्यकता जब तक सचेतन नहीं हो जाती, अंधी है। स्वतंत्रता आवश्यकता के प्रति सचेतन होना है। ::: कार्ल मार्क्स \
  • कोई भी आदमी इतना अच्छा नहीं है कि वह दूसरे आदमी का स्वामी हो सके। ::: विलियम मॉरिस
  • जब तक आदमी एकांत में नहीं है और वह एकांत को प्यार नहीं करता, वह स्वतंत्रता से प्रेम नहीं कर सकेगा, क्योंकि मनुष्य जब एकांत में होता है, तभी वह सचमुच स्वतंत्र होता है। ::: आर्थर शॉपेपेऑवर
  • स्वतंत्रता एक ऐसा पौधा है जो जब जड़ पकड़ लेता है तब तेजी से बढ़ने लगता  है। ::: जॉर्ज वाशिंग्टन
  • सिवाय उनके जो अच्छे  हैं कोई भी आदमी  दिल से स्वतंत्रता नहीं चाहता, वे मनमानी  करने का अधिकार चाहते हैं। ::: जॉन मिल्टन
  • मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। ::: ज्याँ पाल सार्त्र
  • आवश्यकता मनुष्य की स्वतंत्रता के प्रत्येक उल्लंघन का बहाना होती है। यह तानाशाहों का तर्क है, गुलामों का धर्म है। ::: विलियम पिट
  • अगर कोई राष्ट्र किसी और चीज को स्वतंत्रता से अधिक मूल्यवान मानता है, तो वह अपनी स्वतंत्रता खो देगा; और विडंबना यह है कि अगर वह आराम या धन को अधिक मूल्यवान मानता है, तो वह इन्हें भी खो देगा। ::: सॉमरसेट मॉम
  • मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है और हर जगह जंजीरों में बँधा पाया जाता है। ::: पीटर केरी
  • अपने को कैसे स्वतंत्र किया जाए, यह जान लेना कुछ भी नहीं है;  मुश्किल चीज यह जानना है कि अपनी स्वतंत्रता के साथ किया क्या जाए। ::: आंद्रे जिद
  • रिजेक्ट करने की  स्वतंत्रता ही वास्तविक स्वतंत्रता  है। ::: सलमान रुश्दी

स्वाधीनता का सिनेमा : सुनीता दुबे

सुनीता दुबे
सिनेमा स्वभाव से ही स्वतंत्रता का माध्यम है। सिनेमा का जन्म जब हुआ, पूँजीवाद का काफी विकास हो चुका था। विज्ञान और टेक्नोलॉजी भी काफी उन्नत हो चुके थे। दरअसल, एक खास स्तर की तकनीकी प्रगति के बिना सिनेमा संभव ही नहीं था। औद्योगिक क्रांति के साथ जिस वैचारिक परिवर्तन की भूमिका बनी, उसे वहन करने और मजबूत बनाने में सिनेमा की भूमिका निर्णायक थी।

सच कहा जाए तो पश्चिम में रूढ़ नैतिकताओं और जर्जर मान्यताओं के खिलाफ साहित्य ने जितनी जन चेतना पैदा की, सिनेमा ने उससे ज्यादा किया। यह जन माध्यम है। इसलिए साहित्य की अपेक्षा यह जनता तक ज्यादा तेजी से और अधिक व्यापक स्तर पर फैलता है। जन माध्यम के रूप में सिनेमा ने एक नई आलोचनात्मक मानसिकता पैदा की और खासकर युवा पीढ़ी को झकझोर दिया। भारत में भी सिनेमा लगातार परिवर्तनवादी होता गया है। शुरू में अवश्य धार्मिक और जादू तथा तंत्र-मंत्र पर आधारित फिल्में ज्यादा बनीं, पर उनमें भी कुछ प्रगतिशील संदेश रहता था। बाद में तो, जब भारतीय सिनेमा अपनी रूढ़ियों से मुक्त हुआ और उसने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व अख्तियार किया, वह वास्तव में ‘जीवन की आलोचना‘ और नए मूल्यों के अन्वेषण का माध्यम हो गया। यह जरूर है कि सिनेमा के इस बोध का विकास क्रमशः हुआ। प्रगतिशीलता आई तो उसके विचलन भी दिखाई पड़े। इधर की कुछ फिल्में इस बोध को तीखे ढंग से व्यक्त कर रही हैं।

सब से सशक्त कला माध्यम सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहता, लेकिन यहाँ भी स्वाधीनता के केवल दो रूपों के इर्द-गिर्द ही बहुलांश सिनेमा घूमता है। पहला अंग्रेजों से देश की आजादी और दूसरा प्रगतिशील (मार्क्सवादी) आन्दोलन के प्रभाव में जमींदारो से किसानों की आजादी। अंग्रेज खलनायक और भारतीय नायक, मुम्बइया सिनेमा का दो दशक पूर्व तक (फिल्म ‘मर्द’ तक) सुपरहिट फार्मूला रहा। मनोज कुमार इसके प्रतीक पुरुष के रूप में उभरे। यहाँ भी ज्यादातर फिल्मों में देश की स्वाधीनता का सतही रूप ही सामने आता था। व्यापक और गहरे अर्थों में देश की स्वाधीनता की चेतना का नामोनिशान भी नहीं दिखता, जब देश के शासकों ने 1990-1991 में यूरोप और अमेरिका (पश्चिम) को गले लगाया तो रातों-रात अंग्रेज विरोध गायब हो गया, अब तो वे अपने हो गए थे, हमारे आदर्श बन गए थे, ज्यादा से ज्यादा उन्हें क्रिकेट में पराजित करने की देशभक्ति का या स्वाधीनता की चेतना ‘लगान’ जैसी फिल्म में आती है। धीरे-धीरे देश की स्वाधीनता को सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान और मुसलमान बन गए। पाकिस्तान और आतंकी मुसलमानों को पराजित करने का फार्मूला सुपर-डूपर हिट का फार्मूला बन गया, सैकड़ों फिल्मों में हमारे बाहुबली फिल्मी नायकों ने पाकिस्तान को रौंद दिया। ‘गदर’ जैसी फिल्मों में तो सन्नी देओल जैसे महानायक सीधे पाकिस्तान में घुस कर अकेले ही सबको पराजित कर देते हैं। पाकिस्तान और मुसलमान को रौंदने-हराने  के भारतीयों के सुख को भुना कर फिल्मकारों ने अरबो –खरबों अपनी झोली में डाल लिए। अभी हाल  में ‘बजरंगी भाईजान’ में सलमान खान भी पाकिस्तान में घुस कर सब को पराजित कर सकुशल वापस आ गए हैं और करोड़ों कमा लिए हैं। देश की स्वाधीनता का प्रश्न फिलहाल हिंदी सिनेमा में पाकिस्तान तथा तथाकथित आतंकी मुसलमान तक ही सीमित है। चीन की तरफ तो नजर ही नहीं जाती, क्योंकि  पराजय को याद करना (1962 की हार) या अपने से ताकतवर से टकराने की सोचना भारतीय मनोविज्ञान के खिलाफ है।

रही बात व्यक्तियों और समुदायों की स्वाधीनता की, तो इस दिशा में हिंदी सिनेमा ने कुछ प्रगति की है। वैसे तो आज भी हिंदी की अधिकांश फिल्मों में स्त्री की पराधीनता या जाति श्रेणी क्रम से पैदा हुई पराधीनता या व्यक्ति के मूल  प्राकृतिक अधिकारों के साथ जीने की स्वाधीनता का प्रश्न कोई खास मायने नहीं रखता। स्त्री वहाँ आज भी पुरुष के साथ अधीनता में ही जीती दिखाई जाती है। मुम्बइया सिनेमा के अधिकांश स्त्री पात्र पतिपरायण स्त्रियाँ हैं या पुरुष की कामुकता को उत्तेजित करने वाली गुड़िया हैं या दोनों का मेल हैं यानी सीता, राधा और सनी लिओन की खिचड़ी।

इस सब के बावजूद पिछले वर्षों (2015-2016) में मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में कुछ ऐसी शानदार फिल्में आई हैं जो बनी-बनाई परिपाटी को तोड़ रही हैं, जाति के प्रश्न को अपने विमर्श का प्रश्न बना रही हैं, सम्पूर्ण स्त्री जाति की स्वाधीनतापूर्वक बेखौफ जीने की आजादी के प्रश्न को पुरजोर तरीके से उठा रही हैं। इस तरह की फिल्मों का प्रतिनिधित्व करती फिल्में एंग्री इंडियन गाडेस, अलीगढ़ तथा मसान हैं।

'मसान' फिल्म का एक दृश्य
भारतीय व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वाधीनता को कुचलने वाला सब से बड़ा विधि-निषेध सेक्स संबंधों की शुचितावादी धारणा है। ये फिल्में भारतीय आदमी के सबसे  केन्द्रीय  मूल्य पर चोट करती हैं। ‘एंग्री इंडियन गाडेस’ की सभी स्त्रियाँ यौन शुचिता के सभी आदर्श को तार-तार कर देती हैं। वे पर पुरुष को देख कर आहें भरती हैं, यहाँ तक कि उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कल्पना में खो जाती हैं। उनमें से दो लड़कियाँ आपस में शादी भी कर लेती हैं क्योंकि वे समलैंगिक हैं। यौन शुचिता के निषेध को तार-तार करने के साथ ही, खान-पान तथा ढंग के कपड़े पहनने की पराधीनता को धता बताती हैं, जम कर शराब पीती हैं, सिगरेट पीती हैं। मनचाहे कपड़े पहनती हैं। वे वह सब करती हैं जिन पर सिर्फ पुरुषों का अधिकार माना जाता रहा है। वे न केवल भारतीय संस्कृति के पराधीनतावादी मूल्यों से बेखौफ आजाद हैं, बल्कि आर्थिक तौर पर भी आत्मनिर्भर हैं। पान नलिन की यह फिल्म आजाद स्त्रियों की दुनिया रचती है, स्त्री स्वाधीनता इस फिल्म का सबसे बड़ा मूल्य है। हर स्वाधीनता की कीमत चुकानी पड़ती है, इस फिल्म की लड़कियाँ भी वह कीमत चुकाती है। फिल्म ‘मसान’ सेक्स, प्रेम तथा जाति के मामले की स्वाधीनता को अपना विषय बनाती है। फिल्म शुरू में ही इस बात को स्थापित कर देती है कि दो बालिग लोगों को इस बात की पूरी स्वाधीनता है कि वे किससे शारीरिक संबंध बनाते हैं, सिर्फ सेक्स सुख के लिए या प्रेम के लिए। इस बात से समाज का कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। यह उनका नैसर्गिक अधिकार है। इस अधिकार पर किसी का, किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाना, उनकी स्वाधीनता को छीनना है। इतना ही नहीं, जो दो जोड़े आपसी सहमति से सेक्स सम्बन्ध बनाते हैं उनमें लड़का (पीयूष अग्रवाल) भले ही सामाजिक भयवश आत्महत्या कर लेता है लेकिन लड़की खुलेआम कहती है कि यह उसका नैसर्गिक अधिकार है और उसने ऐसा करके कुछ भी गलत नहीं किया है। वह सेक्स और प्रेम की अपनी स्वाधीनता के लिए साहस के साथ संघर्ष करती है। इसी फिल्म में डोम जाति के लड़के और गुप्ता परिवार की लड़की  के बीच के प्रेम को भी फिल्मकार ने अपना विषय बनाया। कलात्मक कौशल के साथ फिल्म यह संप्रेषित करने में सफल रही कि जाति और योनि शुचिता की धारणा से मुक्त हुए बिना भारतीय आदमी स्वाधीन हो ही नहीं सकता और न किसी को स्वाधीन रहने दे सकता है।

तीसरी फिल्म ‘अलीगढ़’ तो भारतीयों की सेक्स सम्बन्धी सारे महान आदर्शों और धारणाओं को चुनौती दे कर उसे भीतर तक मर्माहत कर देती है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का मराठी का प्रोफेसर ‘गे’ है, उसका ‘गे होना लोगों पर वज्रपात की तरह टूटता है। पढ़े-लिखे, अनपढ़, सभ्य तथा असभ्य सभी लोग उस पर  टूट पड़ते हैं। उसका जीना हराम कर देते हैं। फिल्मकार पूरी तरह से प्रोफेसर श्रीनिवास रामचन्द्र के साथ है। दर्शकों को भी सेक्स पार्टनर चुनने  तथा अपनी तरह से जीने की उसकी स्वाधीनता के साथ, खड़ा कर देता है। तीनों फिल्में व्यक्तिगत स्वाधीनता के प्रश्न को मुखरता से उठाती हैं और अत्यन्त कलात्मकता के साथ उन्हें प्रस्तुत करती हैं। कलात्मक माध्यम के तौर पर सिनेमा की ताकत का ऐसा इस्तमाल करती हैं कि दर्शक स्त्री की स्वाधीनता, जतिबंधन से मुक्ति और लेस्बियन तथा गे संबंधों के पक्ष में खड़ा हो जाता है। यह भूल ही जाता है कि रोजमर्रा की जिन्दगी में जीवन-मरण का प्रश्न बने हुए उसके मूल्यों की ऐसी की तैसी हो रही है, उसकी तथाकथित महान संस्कृति को ये फिल्में रसातल में ले जा रही हैं।

ये तीन फिल्में हिंदी सिनेमा के लिए कोई अजूबी या अनोखी चीज नहीं रह गई हैं। ऐसी और भी फिल्में बन रही हैं। इसका कारण यह है कि समाजके एक छोटे हिस्से में ही सही, व्यक्तिगत स्वाधीनता की चेतना बढ़ी है, स्त्री और शूद्र पूरी स्वाधीनता और गरिमा के साथ जीने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं। निजी जीवन में भी अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से जीने की धारणा प्रबल हो रही है। हिंदी का मुख्यधारा का सिनेमा व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वाधीनता की चेतना को अपने में समेटने की कोशिश कर रहा है।

पत्थर तोड़ने वाले : अशोक भौमिक

अशोक भौमिक
एक चित्र को देखते हुए कई बार , कुछ कारणों के चलते कुछ ऐसे संदर्भ हमें याद आ जाते हैं , जिसके साथ चित्र के सृजन का सम्बन्ध उभर कर आने लगते हैं । चित्र , अपने विषय , शीर्षक और कभी कभी अपने उद्देश्य के कारण ही ऐसे संदर्भों के साथ अनायास एक सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं।

उन्नीसवीं सदी के स्वछन्दतावाद (रोमेंटिसिस्म) एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन था ,  जिसका प्रभाव साहित्य और दर्शन में व्यापक रूप से पड़ा था । स्वछन्दतावाद का असर हम यूरोप की कविता, कहानी, रंगमंच के साथ साथ चित्रकला में भी देख पाते हैं । इसी सदी में , यथार्थवाद ने भी दर्शन और कलाओं को गहरे प्रभावित किया था । चित्रकला के क्षेत्र में , गुस्ताव कोरबे (Gustave Courbet / 1819 – 1877) सामाजिक-यथार्थवादी चित्रकला के प्रतिनिधि चित्रकार थे । उनका एक चित्र है , 'पत्थर ताड़ने वाले' !

इस चित्र का शीर्षक हमें बीसवीं सदी महान कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' की कविता ' तोड़ती पत्थर ' की याद दिलाती है।  कविता इस प्रकार  है ।

वह तोड़ती पत्‍थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्‍थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्‍वीकार;
श्‍याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार :-
सामने तरू-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्‍यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगी छा गयीं,
प्रात: हुई दुपहर :

वह तोड़ती पत्‍थर।



देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्‍नतार ;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्‍यों कहा -
'मैं तोड़ती पत्‍थर।'


गुस्ताव कोरबे के 1849 में बनाए इस चित्र को देखते हुए जो कविता याद आती हैं , उस कविता और चित्र को याद करते हुए , श्रम-संकल्प में लीन एक आदमी की भी याद आती हैं !
दशरथ माँझी (1934 – 2007) बिहार में गया के करीब गहलौर गाँव में एक दलित मजदूर थे । केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर इन्होंने अकेले ही 22 वर्षों की कड़ी मेहनत से , 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली ।
निराला की कविता , दशरथ मांझी की हिम्मत और गुस्ताव कोरबे के चित्र  के बीच ही कहीं , सर्वहारा के मुक्तिसंग्राम को एक ठोस आधार देने वाला ' द कन्युनिस्ट  मेनिफेस्टो ' की याद इसलिए भी आती है , क्योंकि यह चित्र कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के इस घोषणापत्र के प्रकाशन (1848) के एक वर्ष बाद ही बनाया गया था , और कहना न होगा कि  गुस्ताव कोरबे की कला इस नई विचारधारा से न केवल प्रभावित थी , बल्कि उन्होंने इस चित्र में  ' सर्वहारा की चित्रकला का स्वरूप क्या होगा ? इस प्रश्न के उत्तर की तलाश भी दिखती है !

गुस्ताव कोरबे का चित्र  ' पत्थर ताड़ने वाले ' को गौर से देखने से हमें मेहनतकश श्रमिकों की दुर्दशा के प्रति , चित्रकार की सजगता स्पष्ट दिखती है । चित्र में दो पत्थर तोड़ते श्रमिकों को हम देख सकते हैं जो पत्थर तोड़ कर , उसे वहाँ से हटा कर एक सड़क बना रहे हैं । दोनों बदहाल श्रमिकों के कपड़े फटे हुए हैं । यहाँ इन दोनों मज़दूरों की उम्र भी गौर करने लायक है । पत्थर तोड़ते आदमी की उम्र इतनी है , कि उसके लिए पत्थर तोड़ने का काम निहायत मज़बूरी ही है । उसी प्रकार पत्थर बटोरने वाले लड़के की उम्र भी इतनी नहीं हैं , कि वह सड़क बनाने का काम कर सके । गुस्ताव कोरबे ने अपने चित्र में इन दोनों की मज़बूरी का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है । और यही मज़बूरी ही दोनों श्रमिकों को आपस में जोड़ कर उनके ' वर्ग ' को एक अलग पहचान भी देता हैं , जिसकी उपस्थिति 1848-49 के दौर में यूरोप की चित्रकला में नगण्य थी। 


चित्र में , दोनों मज़दूरों की पृष्ठ भूमि में एक पहाड़ है और चित्र के दाहिने कोने पर नीले आकाश का एक टुकड़ा दिख रहा है । इस प्रकार के संरचना के कारण , दोनों लोग मानो पूरे समाज से कटे , अकेले भी लगते हैं । ' पत्थर तोड़ने वाले ' चित्र में गुस्ताव कोरबे ने इन्हें शारीरिक और आर्थिक रूप से समाज के हाशिये पर दिखाया है साथ ही इस चित्र में गुस्ताव कोरबे तत्कालीन कला के प्रचलित नियमों से बाहर निकलने का भी साहस दिखाते हैं।

तत्कालीन यूरोप की कला में प्रायः मूल विषय को उभारने के लिए , पृष्टभूमि की तुलना में केन्रीय चरित्र पर ज्यादा बारीकी से काम करने का रिवाज़ था  । इससे स्वाभाविक रूप से केंद्रीय चरित्र अलग से नज़र आता हैं । इस चित्र में गुस्ताव कोरबे ने जिस बारीकी से आकाश के टुकड़े को बनाया हैं , उसी बारीकी से लड़के की फटी कमीज़ से झाँकते उसके पीठ के हिस्से को भी दिखाया है । बूढ़े मज़दूर से कुछ दूरी पर जमीन पर रखे उनके भोजन के डब्बे को भी चित्रकार ने समान महत्व का मान कर चित्रण किया हैं , क्योंकि गुस्ताव कोरबे के लिए चित्र में सभी अवयवों की अपनी अहमियत है , जो एक दूसरे के साथ जुड़कर ही पूरे चित्र को सार्थक बनाते हैं।

इस चित्र को बनाने की प्रक्रिया के बारे में गुस्ताव कोरबे ने कहा था कि अपने गाँव में टहलते हुए अचानक ही उन्हें यह दृश्य दिख गया था । पत्थर तोड़ने वालों के साथ साथ पूरा परिवेश उन्हें एक समूचा और सार्थक ' चित्र ' सा  लग रहा था । उन्होंने तुरंत इन दोनों मजदूरों को अगले दिन अपने स्टुडिओ आने को कहा था।

इसमें संदेह नहीं , कि गुस्ताव कोरबे जैसे चित्रकार जब एक दृश्य में एक सार्थक चित्र की सम्भावना देख पाते हैं , तो यह उनकी विचारधारा और विश्वासों के कारण ही संभव होता हैं । चित्रकारों जैसे ही कवियों की कृतियों में इस सरोकार को हम निराला की इस कविता में देख पाते हैं।

गुस्ताव कोरबे का इस  महान चित्र के बारे में बात करते हुए , एक तथ्य हमें विचलित भी करता है । 1945 में यह कालजयी चित्र ,  दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ड्रेस्डेन की बमबारी की चपेट में आकर नष्ट हो गया । चित्रकला के इतिहास की यह निश्चय ही एक अपूरणीय क्षति है ।

जहाँ भारत से गाँधी की मुलाकात हुई : कुमार प्रशांत

कुमार प्रशांत
वैसे तो इतिहास की हर घटना की शताब्दी आती है और उसे सौ साल पुराना बना कर चली जाती है। हम भी इतिहास को बीते समय और गुजरे लोगों का दस्तावेज भर मानते हैं। लेकिन इतिहास बीतता नहीं है, नए रूप और संदर्भ में बार-बार लौटता है और हमें मजबूर करता है कि हम अपनी आँखें खोलें और अपने परिवेश को पहचानें। इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे होते हैं कि वे जब भी आपको या आप उनको छूते-खोलते हैं तो आपको कुछ नया बना कर जाते हैं। इसे पारस-स्पर्श कहते हैं - इतिहास का पारस-स्पर्श।
 
चंपारण का गाँधी-अध्याय ऐसा ही पारस है। इस पारस के स्पर्श से ही गाँधी को वह मिला; और वे वह बने जिसकी खोज थी उन्हें याकि इतिहास ने जिसके लिए उन्हें गढ़ा था।और वह गाँधी का स्पर्श ही था कि जिसने अहिल्या जैसे पाषाणवत् चंपारण को धधकता शोला बना दिया था। यह सब क्या था और कैसे हुआ था? 
 
15 अप्रैल 1917 को राजकुमार शुक्ल जैसे एक अनाम-से आदमी के साथ मोहनदास करमचंद गाँधी नाम का लगभग अनाम-सा आदमी चंपारण आया था। मोहनदास इससे पहले कभी बिहार आए नहीं थे। बिहार तो क्या, देश ही वर्षों बाद लौटे थे। चंपारण का नाम भी नहीं सुना था और नील की खेती के बारे में न के बराबर ही जानते थे। कानूनी पढ़ाई के लिए इंग्लैंड से जो विदेशयात्रा शुरू हुई थी वही उन्हें दक्षिण अफ्रीका ले गई और फिर वहीं अवस्थित भी कर आई थी - सपरिवार। सब कुछ ठीकठाक ही चल रहा था। वकालत भी जम गई थी कि मॉरित्सबर्ग स्टेशन पर उस मूढ़मति टिकटचेकर ने उन्हें डिब्बे से उतार फेंकने का कारनामा कर डाला। कभी-कभी सोचता हूँ कि यदि उस टिकटचेकर को जरा भी इल्म होता कि इस काले को डब्बे से उठा फेंकने से गोरों के साम्राज्य की नींव ही उखड़ जाएगी तो वह ऐसा कभी न करता।  लेकिन उसने बैरिस्टर एमकेगाँधी को भीतर से मोहनदास करमचंद गाँधी कर दिया जो शनैः-शनैः चोले उतारता-उतारता कब महात्मा गाँधीऔर फिर बापू बन गया, इसकी खोज में आज भी इतिहास भटक ही रहा है ।  इसलिए यह याद रखने जैसा तथ्य है कि गाँधीजी जब चंपारण आते हैं तब तक वे एकदम परिपक्व सत्याग्रही बन चुके होते हैं।
 
दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का हथियार उन्हें मिला, जिसे धारदार बना कर उन्होंने रंग व जातीय भेद के खिलाफ इस्तेमाल भी किया, अपने जीवन में भी और जीवन की दिशा में भी कितने फेर-फार किए; परिवार को अपनी तरह से जीने की दिशा में ढाला; अपने आश्रम बनाए; उसके अनुरूप जीने की पद्धतियाँ विकसित कीं; अपनी लड़ाई के पक्ष में जनमत बनाने के लिए इंग्लैंड तक की यात्रा की और विदेशी सरकार से ले कर विदेशी अखबार और विदेशी सामाज के लोगों तक को साथ लेने की कला विकसित की; जेनरल स्मट्स के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत का वह नया रिश्ता बनाया जिसमें नागरिक और उसकी सरकार एक हैसियत पर आ सकती है। चंपारण आने से पहले गाँधी हिंसक युद्धभूमि में उतर चुके हैं। जूलू विद्रोह के दौरान सार्जेंट मेजर एम केगाँधी के नाम की पट्टी लगा कर, भारतीयों की टुकड़ी के कमांडर बन कर, वे युद्ध के मैदान में, गोलियों के बीच भागते-दौड़ते घायल सिपाहियों की तीमारदारी कर चुके हैं।'हिंदस्वराज्य' नाम की कालजयी पुस्तिका लिख चुके हैं। दक्षिण अफ्रीका का अपना संघर्ष जीत कर भारत आए तो रही-सही कसर गुरु गोखले ने पूरी कर दी। वचन-बद्ध गाँधी पूरे साल भर तक 'आँख खुली : मुँह बंद' कर सारा भारत घूमते रहे। देश देखा, लोग देखे, प्रकृति देखी और देखा हर मान-अपमान को सह कर जीने का भारतीय स्वभाव। इसी भारत-दर्शन के क्रम में वे यह पहचान सके कि सैकड़ों साल की गुलामी अब अवस्था नहीं, मन:स्थिति में बदल चुकी है।
 
रामचंद्र शुक्ल उन्हें नील किसानों की दुरवस्था दिखाने के लिए चंपारण लाए थे, गाँधी ने यहाँ आकर वह सब देखा जो गुलामी की बीमारी के विषाणु हैं। यह जानना बड़ा मजेदार भी है औरआँखें खोलने वाला भी कि वे यहाँ आकर अँग्रेजों से निलहों से कोई लड़ाई लड़ते ही नहीं हैं, वे लड़ाई शुरू करते हैं गुलामी की मानसिकता से। वे रात-दिन गुलाम भारतीयों को उनकी गुलामी का एहसास कराते रहते हैं। बिहार के पहले दर्जे के वकीलों की फौज आ जुटी है - बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद, रामनवमी प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद, धरणीधर बाबू आदि सभी गाँधी से सुरक्षित दूरी रख कर, गाँधी के करीब आते हैं। ये तब के वक्त में दस हजार रुपए तक की फीस वसूलने वाले वकील हैं।गाँधी ऐसी वकालत और ऐसी कमाई का संसार छोड़ कर ही आए हैं तो इनकी चमक-दमक से अप्रभावित, इन्हें समझाते हैं कि लड़ाई न अधूरी होती है और न अधूरे मन से लड़ी जाती है। प्रोफेसर कृपलानी भी हैं आसपास, लेकिन वे गाँधी को ताड़ने में ही अधिक लगे हैं।
 
गाँधी अपने मतलब के लोगों को गुजरात, महाराष्ट्र आदि से बुलाते हैं और सफाई से रहना, पढ़ना, खाना बनाना आदि शुरू करवाते हैं। सबसे पहले सबकी रसोई एक साथ, एक ही जगह बने, वे इसका आग्रह करते हैं। हर बड़ा वकील अपने साथ सेवक, रसोइया ले कर आया होता है।गाँधी धीरे से इसे अनावश्यक बताते हैं और समझाते हैं कि सब मिल कर एक-दूसरे की मदद से वे सारे काम कर ले सकते हैं जिनके लिए हम इन पर आश्रित हैं। वे कहते ही नहीं हैं बल्कि खुद ही करने भी लगते हैं। उस दिन तो हद ही हो जाती है जिस दिन दीनबंधु सीएफ एंड्रूज को (जो तब दीनबंधु नहीं कहलाते थे) मोतिहारी से बाहर जाना है और उनके लिए खाना बनाने वाला कोई नहीं है। जैसे-तैसे रोटी और उबले आलू का खाना बनता है और एंड्रूज खाने बैठते हैं तभी गाँधीजी उन्हें देखने आ जाते हैं और यह देख कर पानी-पानी हो जाते हैं कि एंड्रूज वह एकदम कच्ची रोटी खारहे हैं जो उनकी थाली में धर दी गई है।गाँधी लोगों पर नाराज होते हैं और फिर खुद ही रोटियाँ बनाने बैठ जाते हैं।वे रोटियाँ बेलते हैं, करीने से उन्हें सेंकते हैं और कितने की मान-दुलार से एंड्रूज की थाली में डालते हैं । बस, उस दिन से रसोई भी और नौकर भी एक हो गए। इन सबमें कहीं भी न अंग्रेज आते हैं और न उनसे लड़ाई आती है।
 
चम्पारन में महात्मा गांधी
लेकिन गाँधी के चंपारण पहुँचने से पहले ही उनकी कीर्ति वहाँ पहुँच जाती है। जनमानस में बनने वाली छवि अहिंसक लड़ाई का बड़ा प्रभावी हथियार होती है। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी ने क्या किया,इसे न जानने वाले भी यह जान गए हैं कि यह चमत्कारी आदमी है। रास्ते भर किसान ही नहीं, सरकारी अधिकारी भी गाँधी को देखने आते रहते हैं। जितने लोग आते जाते हैं, बातें उतने ही रंग की फैलती जाती हैँ। अंग्रेज अधिकारी व प्रशासन हैरान है कि यह आदमी करना क्या चाहता है; और यह जो करना चाहता है वह इसे करने दिया जाए तो पता नहीं यह क्या-क्या करने लग जाएगा । दक्षिण अफ्रीका में इनके आका इस आदमी के जाल में इसी तरह जा फँसे थे, वह कहानी गाँधी के लोगों से ज्यादा अच्छी तरह सरकारी लोगों को पता है।
 
15 अप्रैल को गाँधी मोतिहारी पहुँचते हैं और बाबू गोरख प्रसाद के घर पर उन्हें ठहराया गया है। अंग्रेजों के बात-व्यवहार का गाँधी को दक्षिण अफ्रीका से अनुभव है। इसलिए वे अभी-के-अभी गिरफ्तारी की संभावना मान कर तैयार हैं। उसी आधार पर सामान की गठरी बनी हुई है। सब जानना चाहते हैं कि गाँधी कल से सत्याग्रह कैसे शुरू करेंगे।गाँधी एकदम ठंडे स्वर में कहते हैं : कल मैं जसवलपट्टी गाँव जाऊँगा । सब एक-दूसरे से पूछते हैं : क्यों, वहाँ क्यों ? पता चलता है कि वहाँ के एक प्रतिष्ठित गृहस्थ पर अत्याचार की ताजा खबर आई है । सब बड़े लोग कुछ परेशान हो जाते हैं- अत्याचार कहाँ नहीं है कि आप जसवलपट्टी जा रहे हैं। मोतिहारी मुख्य शहर है। यहाँ से आपको प्रचार मिलेगा न कि जसवलपट्टी से।
 
रात बीतती है। सुबह गाँधी जसवलपट्टी जाने के लिए तैयार हैं। धरणीधर बाबू और रामनवमी बाबू साथ निकलते हैं। सवारी है हाथी। जलता हुआ सूरज सिर पर है और गर्म हवा साँस खींच रही है।गाँधी ने कभी हाथी की सवारी की नहीं है और वह भी तीन आदमी एक साथ। लगभग टँगी हुई हालत में सफर शुरू। औरगाँधी की बात भी शुरू हुई। वे जब से बिहार आए थे और मोतिहारी आए थे, यहाँ की महिलाओं की दशा उन्हें मथ रही थी। इसलिए इसकी ही चर्चा उन्होंने निकाली और कहा यह कि यह तो हमारी महिलाओं को मार ही देगा।अंग्रेज अधिकारी भी यही समझ रहे थे कि यह आदमी पता नहीं कब, कहाँऔर कैसे हमें मार ही देगा और इसलिए बगैर कोई वक्त खोए वे ही आगे बढ़ कर गाँधी से लड़ाई मोल लेते हैं। रास्ते में हाथी से उतर कर बैलगाड़ी,बैलगाड़ी से उतर कर इक्का और इक्के से उतर कर टमटम की यात्रा करवाता है प्रशासन और फिर जिला छोड़ कर चले जाने का फरमान थमा देता है। 'मुझे इसका अंदेशा तो था ही। ' कह कर गाँधी चंपारण के जिलाधिकारी का आदेशपत्र लेते हैं। लिखा है,'आपसे अशांति का खतरा है। 'गाँधी यह आदेश मानने से सीधे ही इंकार कर देते हैं। वे अपने साथियों में पहले से बना कर लाया वह हिदायतनामा बाँट देते हैं जिसमें लिखा है कि यदि उनकी गिरफ्तारी होती है तो किसे क्या करना है। यह सब तो अश्रुतपूर्व था।
 
अगले दिन, अगला नजारा कचहरी में खुला। बेतार से बात सारे चंपारण में फैल गई थी कि अब गाँधीजी का चमत्कार होगा। कचहरी में किसानों का रेला उमड़ पड़ा था। सरकारी वकील पूरी तैयारी से आया था कि इस विदेशपलट वकील को धूल चटा देगा। जज ने पूछा कि गाँधी साहब, आपका वकील कौन है, तो गाँधीजी ने जवाब दिया - कोई भी नहीं । फिर? गाँधी बोले - मैंने जिलाधिकारी के नोटिस का जवाब भेज दिया है । अदालत में सन्नाटा खिंच गया । जज बोला : वह जवाब अदालत में पहुँचा नहीं है । गाँधीजी ने अपने जवाब का कागज निकाला और पढ़ना शुरू कर दिया। कचहरी में इतना सन्नाटा था कि गाँधीजी के हाथ की सरसरहाट तक सुनाई दे रही थी।
 
और उन्होंने कहा कि अपने देश में कहीं भी आने-जाने और काम करने की आजादी पर वे किसी की, कैसी भी बंदिश कबूल नहीं करेंगे। हाँ, जिलाधिकारी के ऐसे आदेश को न मानने का अपराध मैं स्वीकार करता हूँऔर उसके लिए सजा की माँग भी करता हूं। गाँधीजी का लिखा जवाब पूरा होता है और इस खेमे में और उस खेमे में सारा कुछ उलट-पुलट जाता है। न्यायालय ने ऐसा अपराधी नहीं देखा था जो बचने की कोशिश ही नहीं करता है। देशी-विदेशी सारे वकीलसाहबान के लिए यह हैरतअंगेज बात बन जाती है कि यह आदमी अपने लिए सजा की माँग कर रहा है जबकि कानूनी आधार पर सजा का कोई मामला बनता ही नहीं है। सरकार, प्रशासन सभी अपने ही बुने जाल में उलझते जाते हैं। जज कहता है कि जमानत ले लो, तो जवाब मिलता है : मेरे पास जमानत भरने के पैसे नहीं हैं । जज कहता है कि बस इतना कहो कि तुम जिला छोड़ दोगे और फिर यहाँ नहीं आओगे तो हम मुकदमा बंद करते हैं; गाँधीजी कहते हैं : यह कैसे हो सकता है।आपने जेल दी तो उससे छूटने के बाद मैं स्थायी रूप से यही चंपारण में अपना घर बना लूँगा। यह सब चला और फिर कहीं दिल्ली से निर्देश आता है कि इस  आदमी से उलझो मत, मामले को आगे मत बढ़ाओऔरगाँधी को अपना काम करने दो। बस, यही सरकारी आदेश वह कुंजी बन जाता है जिससे सत्याग्रह का ताला खुलता है। ताला क्या खुलता है, सारे वकीलान, प्रोफेसर साहबान, युवाजन, किसान-मजदूर सब खिंचते चले आते हैं और जितने करीब आते हैं, उतने ही बदलते जाते हैं।गाँधी सबसे वादा भी ले लेते हैं कि जेल जाने की घड़ी आएगी तो कोई पीछे नहीं हटेगा। इन नामी वकीलों ने अब तक दूसरों को जेल भिजवाने का या जेल जाने से बचाने का ही काम किया था, खुद जेल जाने की तो कल्पना भी नहीं की थी। जेल जाना बदनामी की बात भी थी। यह आदमी कह रहा था कि सच की लड़ाई में जेल जाना सम्मान की ही बात नहीं है बल्कि जरूरी बात भी है, और जब वह यह कह रहा है तो सभी जानते हैं कि यह खुद दक्षिण अफ्रीका की जेलों में रह कर  और जीत कर आया है।
 
किसानों से बयान दर्ज करवाने का काम किसी युद्ध की तैयारी जैसा चलता है। देश भर से आए विभिन्न भाषाओं के लोगबिहार के लोगों की मदद से बयान दर्ज करने का काम करते हैं।गाँधी जैसे एक वकालतखाना ही चला रहे होते हैं। तथ्यों का सच्चा और संपूर्ण आकलन कैसे एक अकाट्य हथियार बन जाता है, 'डेटा कलेक्शन' की आज की पेशेवर दुनिया में चंपारण इसका पदार्थ-पाठ बन सकता है।गाँधी यह भी पहचान जाते हैं कि नील की खेती के पीछे अंग्रेजों की दमनकारी नीतियाँ तो हैं ही, नकदी फसल का किसानों का आकर्षण भी है। इस लोभ में वे अपनी कृषि-प्रकृति के खिलाफ जा कर काम करने को तैयार होते हैं।आज खेती का सबसे बड़ा संकट यह है कि हमने इसे प्रकृति के साथ रासायनिक युद्ध में बदल दिया है जबकि खेती है तो शरीर-विज्ञान। चंपारण सत्याग्रह का यह पहलू बहुत उभरा नहीं, क्योंकि मैदान में लड़ाई कुछ और ही चल रही थी। लेकिन चंपारण के काम की दिशा का जब विस्तार होता है औरगाँधी का सत्याग्रह पूरी तरह खिलता है तब गाँधी इन सारे सवालों को छूते हैं। आज हमारी खेती-किसानी जब लाचारी औरआत्महत्या का दूसरा नाम बन गई है, हमें चंपारण सत्याग्रह की इस दिशा का ध्यान करना चाहिए। गाँधीऔर चंपारण दोनों ही आज के हिंदुस्तान की दशा सुधारने और दिशा दिखाने का काम एक साथ कर सकते हैं। शर्त इतनी ही है कि हम दशा सुधारने और दिशा खोजने के बारे में ईमानदार तो हों।

अँग्रेज भारत में कैसे आए : संगम पांडेय

संगम पांडेय
भारत में सबसे पहला अँग्रेज थॉमस स्टीवन एक पुर्तगाली कर्मचारी था, जो 24 अक्टूबर 1579 को समुद्र के रास्ते गोवा पहुँचा था। वह एक समर्पित कैथोलिक था जिसे गोवा के एक उपनगर का अफसर नियुक्त किया गया। यहाँ रहते हुए उसने मराठी और कोंकणी भाषाएँ सीखीं और यहीं की भाषा में ‘क्राइस्ट पुराण’ लिखी। लेकिन व्यापाराना उद्देश्यों से बिल्कुल शुरू में आए अँग्रेज पहली बार गुजरात के नजदीक दीव में 5 नवंबर 1583 को पहुँचे थे। यह व्यापारियों का एक ग्रुप था जो जमीन के रास्ते भारत और चीन से व्यापार की संभावनाएँ तलाश करने के लिए उसी साल फरवरी में लंदन से ‘टाइगर’ नाम के जहाज पर निकला था। उनका सबसे पहला पड़ाव सीरिया का एलेप्पो शहर था (‘मैकबेथ’ की पहली चुड़ैल कहती है ‘हर हसबैंड टु एलेप्पो गॉन, मास्टर ऑफ द टाइगर’)। वहाँ से वे इराक के बसरा, बगदाद, और फिर ईरान के ओरजस बंदरगाह, जो पुर्तगालियों के कब्जे में था, तक कभी समुद्र, कभी नदी, कभी जमीन के रास्ते होते हुए पहुँचे थे। यहाँ उन्हें जासूस होने के शक में गिरफ्तार कर जहाज पर लाद कर गोवा लाया गया और जेल में डाल दिया गया। जेल से जमानत पर बाहर आने में उनकी मदद ऊपर जिक्र किए गए पहले अँग्रेज थॉमस स्टीवन ने की। लंदन से चले दल में से दो पहले ही बसरा में अलग हो चुके थे। बचे तीन में से एक पेंटर था, जिसे गोवा में चर्च को सँवारने का काम मिल गया, और बाकी दोनों जमानत में ही भाग निकल कर भारत और आसपास के देशों में अगले कई सालों तक घूमते रहे। इनमें से एक राल्फ फिच ने भारत के बारे में जो यात्रावृत्त लिखा वह बाद के अँग्रेजों के लिए भारत के बारे में जानकारियों का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज साबित हुआ।

अँग्रेज व्यापारियों के भारत आने की खबर पुर्तगालियों के लिए कान खड़े करने वाली थी। यह एशिया के व्यापार पर उनके एकाधिकार के लिए खतरे की घंटी थी। दरअसल अटलांटिक महासागर में स्पेन और पुर्तगाल के वर्चस्व पर इंग्लैंड के नाविक कई दशकों से परेशानी खड़ी कर रहे थे। 1562 में अँग्रेज व्यापारियों ने अफ्रीका से गुलामों को ले जा रहे पुर्तगाली जहाज को हाईजैक कर तीन सौ गुलामों की बिक्री से मुलाफा कमाया था। पुर्तगाल छोटा देश था लेकिन 1580 में वहाँ की राजशाही का कोई वारिस न होने से स्पेन का फिलिप द्वितीय दोनों देशों का संयुक्त सम्राट बन गया। और अंततः 1585 में इंग्लैंड से स्पेन-पुर्तगाल का युद्ध शुरू हो गया, जो लगभग दो दशक तक चला। 1585 के इसी साल में सम्राट फिलिप को जब अँग्रेज व्यापारियों के गोवा में होने की खबर मिली तो उसने पुर्तगाली क्षेत्र में उनके विचरण को निषिद्ध करने का निर्देश भिजवाया। दरअसल एशियाई व्यापार पर पुर्तगाल के एकाधिकार की वजह थी -- उनका समुद्री रास्तों का ज्ञान। उक्त निर्देश का मकसद निश्चित ही उस ज्ञान को लीक हो जाने से बचाना ही होगा। लेकिन अंततः अगले कुछ सालों में यह ज्ञान लीक हो ही गया, और वह भी एक धोखे से।

1583 से 1588 के दौरान गोवा में पुर्तगाल के वायसराय का सचिव जान हुएन वान नाम का एक डच व्यक्ति था। उसने अपने पद का लाभ उठा कर पुर्तगालियों के समुद्री रास्तों से संबंधित सारे ब्योरों को गुपचुप तरीके से हासिल कर लिया। उसने नक्शों की प्रतिलिपियाँ बनाईं और बेहद गोपनीय चार्टों को पृष्ठ-दर-पृष्ठ उतार लिया। इस तरह वे सारे दस्तावेज, जिनमें रास्ते में पड़ने वाले द्वीपों, रेतीले तटों, पानी की गहराई, लहरों की तीव्रता आदि के विवरण थे, हासिल करके पदमुक्त होने के चार साल बाद वह अपने देश हॉलैंड लौट गया। वहाँ उसने 1596 में इन दस्तावेजों की एक किताब छपवाई, जो बाद में अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई। हालाँकि अँग्रेज व्यापारी इससे पहले भारत पहुँचने के अन्य संभावित रास्तों की खँगाल करते हुए पूरे ग्लोब का चक्कर लगा चुके थे, और भारत पहुँचने की कवायद में केप ऑफ गुड होप के रास्ते अरब सागर और मलेशिया तक जाकर लौट चुके थे। लेकिन तथ्य यही है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया कंपनी पुर्तगालियों के इस सामुद्रिक ज्ञान के सार्वजनिक होने के बाद ही भारत और आसपास के देशों में अपने अभियान शुरू कर सकीं।

यह सन 1600 का दिसंबर महीना था जब ब्रिटिश महारानी ने नवगठित ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में व्यापार करने की आज्ञा जारी की। पाँच जहाजों का पहला बेड़ा इसके चार महीने बाद अप्रैल 1601 में उसी कैप्टेन जेम्स लैंकास्टर के नेतृत्व में रवाना हुआ जो सन 1591 में मलेशिया के नजदीक तक का चक्कर लगा चुका था। उसके पास महारानी की ओर से जारी छह पत्र थे जिनमें संबंधित राजाओं के संबोधन वाली जगह खाली छोड़ी हुई थी। पुर्तगालियों के डर से बेड़ा अंडमान से होता हुआ इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पहुँचा, जहाँ के बेंटन में पहली ब्रिटिश फैक्ट्री लगाई गई।

ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज इसके बाद नियमित रूप से हिंद महासागर में आने लगे, लेकिन पुर्तगालियों के कारण भारत के समुद्र तट तक उनकी पहुँच अभी नहीं बनी थी। 1604 में स्पेन-पुर्तगाल के साथ इंग्लैंड का युद्ध समाप्त होने से ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों को उम्मीद बँधी कि शायद पुर्तगाली अब उनके प्रति पहले की तुलना में विनम्र होंगे। इसी उम्मीद से कैप्टेन विलियम हॉकिन्स 24 अगस्त 1608 को जहाज ‘हेक्टर’ में डेढ़ साल की यात्रा के बाद गुजरात में सूरत के समुद्र तट पर पहुँचा, और इस तरह पहली बार हिंदुस्तानी लोगों ने एक ब्रिटिश झंडा भारतीय समुद्र तट पर देखा। हॉकिन्स के पास बादशाह जहाँगीर के नाम इंग्लैंड के सम्राट की चिट्ठी थी, और बहुत सारे उपहार थे। लेकिन उसके साथ यहाँ अच्छा बर्ताव नहीं हुआ। पुर्तगालियों ने उसके लोगों को बंधक बना कर साथ लाए सामान पर कब्जा कर लिया; और ऐसा ही कुछ मुगलों के स्थानीय प्रशासक मुकर्रब खाँ ने किया। खुद को ब्रिटिश राजदूत बताने से उसे थोड़ी रियायत हासिल हुई, जिसके कारण वह खाली हाथ ही सही 9 अगस्त 1608 को जहाँगीर के दरबार में आगरा जा पहुँचा। दरबार में उसका अच्छा स्वागत हुआ। हॉकिन्स को तुर्की भाषा आती थी (जो कि उसे इस यात्रा का कैप्टन नियुक्त किए जाने की एक वजह भी थी), जिसकी मदद से जल्द ही वह बादशाह के खास लोगों में शुमार हो गया। उसे चार सौ सवारों का कप्तान बना कर स्थानीय राजदूत का ओहदा दे दिया गया। उसने यहाँ रहने वाली एक ईसाई अर्मीनियाई लड़की से शादी भी कर ली। लेकिन यह सब होने के बावजूद हॉकिन्स को व्यापार करने और फैक्टरी लगाने की इजाजत हासिल करने में सफलता नहीं मिल पाई, क्योंकि बादशाह से नजदीकी ने दरबार में उसके बहुत-से शत्रु पैदा कर दिए थे। लेकिन हॉकिन्स के आने का यह नतीजा जरूर हुआ कि अंग्रेजों के जहाज भारतीय समुद्रतट पर दिखने लगे। हालाँकि ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम ने सन 1609 में कंपनी के व्यापार-अधिकार को इस चेतावनी के साथ तीन साल के लिए बढ़ाया था कि अगर वह इस दौरान मुनाफा नहीं कमा सकी तो भारत के आसपास उसके व्यापार के अधिकार समाप्त कर दिए जाएँगे।

ऐसे हालात में कंपनी को भारत में पैर टिकाने के लिहाज से पहली बड़ी सफलता सन 1612 में मिली। इस वर्ष 5 सितंबर को कंपनी के जहाजों का दसवाँ बेड़ा कप्तान थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में सूरत बंदरगाह पहुँचा। उनके पहुँचने के कुछ ही दिनों बाद पुर्तगाली चार बड़े जहाजों और तीस नौकाओं के साथ वहाँ नमूदार हुए। छोटी-मोटी लड़ाइयों के बाद अंग्रेजों के जहाज में आग लगाने की कोशिश की गई, लेकिन कप्तान बेस्ट की सतर्कता ने इसे नाकाम कर दिया। समुद्र में पुर्तगालियों और अंग्रेजों की इस लड़ाई को तट से मुगल प्रशासकों ने भी देखा। इसका अंग्रेजों के लिए अच्छा असर हुआ। समुद्र में अजेय समझे जाने वाले पुर्तगाली अपने इस्लाम विरोध के कारण मुगलों को अधिक नहीं सुहाते थे। यहाँ यह याद रखने की जरूरत है कि यूरोप में सोलहवीं सदी में ईसाइयत की रूढ़िवादिता के खिलाफ हुए प्रोटेस्टेंट आंदोलन में स्पेन और पुर्तगाल का सम्राट कैथोलिकों और पोप के पक्ष में रहा था, जबकि इंग्लिश चर्च ने सदी के पूर्वार्ध में ही खुद को पोप से स्वतंत्र घोषित करके सम्राट की हैसियत को सर्वोच्च मान लिया था, जो प्रोटेस्टेंट समर्थकों के लिए एक बड़ी बात थी। बहरहाल, कप्तान बेस्ट को सूरत के करीब हुई उस लड़ाई के बाद भारत में व्यापार करने की इजाजत दे दी गई, जिसके बाद अंग्रेजों ने सूरत में अपनी फैक्टरी निर्माण के लिए काम करना शुरू कर दिया।

लेकिन सूरत की फैक्टरी भारत में अंग्रेजों का पहला ठिकाना नहीं थी। इससे एक साल पहले सन 1611 में अँग्रेज कोरोमंडल तट पर डच कंपनी के प्रभुत्व वाले इलाके से थोड़ी दूर आंध्र प्रदेश के मछलीपटनम में अपनी फैक्ट्री स्थापित कर चुके थे। यहाँ पैर टिकाना उनके लिए इसलिए आसान रहा कि यह क्षेत्र मुगलों के नहीं बल्कि गोलकुंडा के मुस्लिम राजा के अधीन था। विजयनगर साम्राज्य की पराजय को अभी पचास साल भी नहीं हुए थे, और यहाँ का प्रशासन मुगलों जैसा स्थिर नहीं था।

सूरत की लड़ाई के तीन साल बाद 1615 में इंग्लैंड का राजदूत थॉमस रो जहाँगीर के दरबार में पहुँचा, जहाँ से उसे भारत में कहीं भी व्यापार करने का फरमान हासिल हुआ। इस शाही संरक्षण के हासिल हो जाने के बाद अँग्रेजों का कारोबार तेजी से भारत में बढ़ने लगा। 1647 तक भारत में अँग्रेजों की 23 फैक्टरियाँ स्थापित हो चुकी थीं। फैक्टरी का ढाँचा कुछ ऐसा था कि एक फैक्टरी में उसके गवर्नर सहित नब्बे लोग काम करते थे, और ये ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरी किलेनुमा होती थीं। सूरत के अलावा मद्रास (1639), मुंबई (1668), और कलकत्ता (1690) की फैक्टरियाँ इनमें सबसे बड़ी थीं। 1664 में जब शिवाजी ने सूरत पर धावा बोला था तब फैक्टरी की ऊँची दीवारों के कारण उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ था।

हैसियत बढ़ने के साथ-साथ अँग्रेजों के उग्र रूप भी दिखाई देने लगे। 1682 में कंपनी के आवेदन पर उसे बंगाल में अपना व्यापार केन्द्र बनाने की इजाजत दे दी गई। लेकिन कुछ अरसे बाद जब उसने चित्तगोंग में किला बनाने की इजाजत भी चाही, तो वह उसे नहीं दी गई। उल्टे बंगाल के शासक शाइस्ता खाँ ने साढ़े तीन फीसद टैक्स कंपनी पर और बढ़ा दिया (जो यकीनन दकन में चल रहे युद्ध के घाटे को पूरा करने के लिए ही बढ़ाया गया होगा)। नतीजे में कंपनी ने 1685 में युद्ध की तैयारी कर ली। इसके लिए बर्मा के सूबे अराकान के राजा से समझौता किया गया। कंपनी का इरादा बंगाल के चित्तगोंग नगर को अपने लिए एक सुरक्षित किले में तब्दील करना था। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने के बाद उनका इरादा ढाका में उत्पात मचाना था, और फिर मुगलों के साथ शांति का समझौता करते हुए ढाका और चित्तगोंग को अपने लिए स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में हासिल कर लेना था। कंपनी की ओर से जॉब चारनाक के नेतृत्व में एडमिरल निकल्सन बारह जहाजों, दो सौ तोपों, दो सौ अतिरिक्त बंदूकों और एक हजार लोगों के साथ चित्तगोंग के लिए निकला लेकिन हवा का रुख जब जहाजों को हुगली के किनारे ले आया तो उसने वहीं डेरा डाल कर गोलीबारी शुरू कर दी जिसमें बहुत-से मकानों के परखच्चे उड़ गए। ऐसे हालात देख कर शाइस्ता खाँ ने कंपनी की सारी फैक्टरियों को जब्त करने के आदेश दिए और बड़ी तादाद में सेना बुला ली। चारनाक को इसकी खबर लग चुकी थी, और इन हालात में उसके लिए कंपनी की पुरानी स्थिति पर समझौता करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। ऐसा होने का एक कारण यह भी था कि उसके जहाज बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त थे, और उनकी मरम्मत होने की आवश्यकता थी। लेकिन तब तक शाइस्ता खाँ की सेनाएँ करीब आ चुकी थीं और ऐसे में उन्हें इन्हीं क्षतिग्रस्त जहाजों पर भाग कर एक ऐसे द्वीप पर शरण लेनी पड़ी जहाँ मच्छरों, साँपों और शेरों की भरमार थी। आधे अँग्रेजों को यहाँ जान से हाथ धोना पड़ा और बाकी की जान माफीनामे के बाद बची।
 
औरंगजेब से माफी मांगते हुए एक अंग्रेज
अँग्रेजों की सीनाजोरी की मिसाल सिर्फ बंगाल की यह घटना ही नहीं थी; सन 1688 में उन्होंने सूरत से मक्का के लिए जा रहे हिंदुस्तानी जहाज को बंधक बना लिया। न सिर्फ इतना बल्कि बंगाल में हार के बाद कैप्टेन हेराथ डेढ़ सौ सैनिकों के साथ उड़ीसा के बालासोर में उत्पात मचाने के लिए जा पहुँचा। वहाँ उसने भयानक तांडव मचाया। इन सबसे खफा हो कर औरंगजेब ने पूरे देश में अंग्रेजों की संपत्तियों को जब्त करने का आदेश जारी किया। आदेश के नतीजे में बड़ी संख्या में कंपनी की संपत्तियाँ जब्त की गईं, अँग्रेजों को जेल में डाला गया और फाँसी पर लटकाया गया। अब सिर्फ मद्रास और बंबई के मजबूत किलों और माफी माँगने के एकमात्र रास्ते के अलावा उनके पास कुछ नहीं बचा था; (और बंबई का किला भी पूरी तरह सिद्दी याकूब की घेरेबंदी में था)। अलबत्ता माफी की एवज में उन्हें औरंगजेब के कदमों में सिर रखना पड़ा और भारी हरजाना चुकाना पड़ा।

इन वाकयों के सिर्फ पंद्रह साल बाद थॉमस पिट नाम के ब्रिटिश अधिकारी ने भारत में हिंदू सिपाहियों को अँग्रेज सैन्य अफसरों के अधीन भर्ती करने की वकालत की और संभवतः ऐसा शुरू भी कर दिया। उसके आधी सदी बाद हुई प्लासी की लड़ाई के वक्त कंपनी के पास कुल चार हजार सैनिकों की सेना थी। माना जाता है कि राबर्ट क्लाइव ने वह लड़ाई धोखे और झूठ से जीती थी। लेकिन यह बात पूरी तरह सच नहीं है। प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के छल-छद्म, दुःसाहस और युद्ध-कुशलता सबको मिला भी दें तब भी वह लड़ाई जीती नहीं जा सकती थी। मीर जाफर की दगाबाजी के बावजूद सिराजुद्दौला के साथ क्लाइव के चार हजार सैनिकों के मुकाबले बारह हजार सैनिक थे, और फ्रांसीसियों के तोपखाने का साथ था। वह दरअसल दो तत्कालीन राष्ट्रीय किरदारों की एक प्रतीकात्मक लड़ाई थी, जिसमें 24 साल का अनुभवहीन सिराजुद्दौला गद्दारी, आत्मविश्वासहीनता और चूकों (युद्ध के दौरान बारिश हो जाने से उसकी सेना का बारूद गीला हो कर बेकार हो गया था) का शिकार हुआ। यह युद्ध अंग्रेजों ने इतने कम साधनों में जीत लिया था कि इससे उन्हें भविष्य में मिलने वाली सफलताओं का अनुमान हो गया। जाति, धर्म, क्षेत्रीय पहचानों में बँटा और सामुदायिकता के मुकाबले अक्सर निजी स्वार्थ को सर्वोपरि रखने की प्रवृत्ति आदि अवयवों से लबालब एक देश को फतह कर लेने के उनके इस आत्मविश्वास पर सात साल बाद बक्सर में हुई लड़ाई ने पूरी तरह मोहर लगा दी, जिसमें अँग्रेज सेना के मुकाबले मुस्लिम राजाओं की विशाल संयुक्त सेना को एक बार फिर हार का मुँह देखना पड़ा। 

ऐसा नहीं था कि अँग्रेजों के अपने झगड़े और स्वार्थ नहीं थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने मसालों, नील, चाय, सूत और गोला-बारूद बनाने में काम आने वाले साल्टपीटर के धंधे से मोटा मुनाफा कमाया था। ऐसे में बहुत-से अफसरों ने और ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर दिया (ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा मक्का जा रहे मुगल जहाज को बंधक बनाने के पीछे मुख्य वजह उनकी यह माँग ही थी कि इन स्वतंत्र व्यापारियों को बेदखल करके उसके एकाधिकार को बहाल किया जाए)। लंदन में इन व्यापारियों की मजबूत लॉबी ने आखिर 1694 में अपने पक्ष में कानून पास करवा कर ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। और अंततः अपनी एक स्वतंत्र कंपनी ‘इंग्लिश कंपनी ट्रेडिंग टु द ईस्ट इंडीज’ बना ली। लेकिन बाद में फायदा न दिखने पर इन दोनों कंपनियों को एक ही में मिला दिया गया।

भारत में अंग्रेजी राज के कारणों की सरसरी शिनाख्त में स्पष्ट दिखाई देता है कि अंग्रेजों को प्राथमिकता के मुताबिक अपने कर्तव्य को निर्धारित करने और अडिग रहने की प्रवृत्ति ने तो उनको फायदा पहुँचाया ही, साथ ही तब तक रहे भारतीय राज्य के उस ढाँचे ने भी ताकत दी, जिसमें आम जनता सिर्फ सत्ता के हितों को पूरा करने का माध्यम रहती आई थी। अकबर के समय में जो राजस्व उपज का 33 फीसदी होता था, शाहजहाँ और औरंगजेब के समय में कई बार उसे 50 फीसदी तक कर दिया गया। यह धन बड़े पैमाने पर दरबारियों की विलासिता और सेना के रखरखाव में खर्च होता था। जनता की प्रवृत्ति ‘कोऊ नृप होय हमैं का हानी’ से निर्धारित थी। यही कारण रहा कि देश की प्राकृतिक संपन्नता हमेशा एक छोटे तबके के हितार्थ ही काम आई। अंग्रेजों ने आर्थिक शोषण को इतना चुस्त बना दिया जो ब्रिटिश राज में कई अकालों की वजह बना। लेकिन इससे पहले जब अकाल नहीं भी पड़ते थे तब भी क्या स्थिति थी, इसे औरंगजेब के शासन के शुरुआती सालों में दिल्ली में रहे फ्रेंच यात्री बर्नियर के शब्दों से जाना जा सकता है - ‘जो लोग भूमि पर अधिकार प्राप्त करते हैं, चाहे वे सूबेदार हों चाहे इजारेदार चाहे तहसीलदार, उनका खेतिहरों पर बड़ा अधिकार रहता है; और खेतिहरों तक ही बात नहीं है वरन अपने प्रांत के गाँवों और कस्बों के व्यापारियों और कारीगरों पर भी उनको वैसा ही विलक्षण अधिकार प्राप्त है। पर जिस ढंग से वे अपने अधिकार का व्यवहार करते हैं उससे अधिक कोई कष्टदायक अत्याचार विचार में नहीं आ सकता। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसके पास ये बेचारे अत्याचार के मारे किसान, कारीगर और व्यापारी जा कर अपना दुखड़ा रोएँ। अर्थात न तो फ्रांस की तरह यहाँ कोई ‘ग्रेट लॉर्ड’ है न पार्लियामेंट और न अदालत के जज, जो इन निर्दयी अत्याचारियों के अत्याचारों को रोकें।‘

एक अभूतपूर्व प्रेम विवाह : प्रज्ञा


प्रज्ञा
हमने यह विवाह करके कोई सामाजिक क्रांति नहीं की, प्रेम किया और प्रेम निभा रहे हैं, क्योंकि हमें लगता है कि प्रेम एक सतत क्रांति है।

साल 2014, यानी हमारी दोस्ती को साल पूरे पच्चीस। हाँ, दोस्त ही तो हैं आज भी हम - सबसे अच्छे दोस्त, जिनमें झगड़े भी खूब हैं और प्यार भी खूब। समाज के बहुत सारे प्रेम विवाहों की तरह हमारा विवाह सिर्फ 'विवाह' में तब्‍दील हो कर नहीं रह गया है, जिनमें कुछ समय बाद प्रेम और दोस्ती कपूर बन कर उड़ जाते हैं और फिर हावी होती चलती हैं तमाम सत्ताएँ। फिर सत्ताओं की भिड़ंत से उभरे अंतर्विरोध और अंततः समाज को दिखाने भर को विवाह की रस्म अदायगी या अंततः दो भिन्न रास्ते। अपने प्रेम को बचाए रखने के सतत और सचेत प्रयास हमने किए हैं, इसीलिए हम पति-पत्नी होते हुए भी दोस्त पहले हैं।

बात 1989 की है। बीए के दिनों की। अपने निर्धारित विषय राजनीति विज्ञान में पहली सूची में दाखिले के समय मैं विषय के चुनाव को ले कर संतुष्ट थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में दाखिले के कुछ ही दिन में रघुवीर सहाय की कविता दिमाग में लगातार हथौड़े बजाने लगी - 'मुझे कुछ और करना था'। सही समय से लिए गए निर्णय और मौके से बची रह गई कुछ सीटों ने मुझे हिंदू कॉलेज में हिंदी साहित्य की क्लास में पहुंचा दिया। जाहिर है, रैगिंग का दौर अभी चल रहा था। पहले ही दिन जिस शख्स ने रैगिंग के नाम पर जबरदस्त खिंचाई की, उसका नाम था - राकेश कुमार। यह मैंने बाद में जाना कि वह मेरे कोई सीनियर नहीं, बल्कि सहपाठी हैं। रैगिंग में पूछे गए सवालों का मैं जितनी दिलेरी से सामना कर रही थी, यह जान कर कि रैगिंग मेरे सहपाठी ने की है, मैं चारों खाने चित थी। मुझे बेहद खराब लग रहा था। अगले कुछ दिन मैंने एक खास दूरी बना कर रखी उन राकेश कुमार से, पर मैंने पाया उस दिन के अलावा किसी भी दिन राकेश के स्वभाव में किसी को भी नीचा दिखाने की फितरत नहीं थी।

धीरे-धीरे क्लासेज के दौरान जाना कि साहित्य के प्रति राकेश की अभिरुचि है। शिक्षक भी उसे पसंद करते हैं। फिर कॉलेज में मेरे नए होने के कारण बहुत-सी बातों को ले कर जब राकेश ने मदद की तो मन ने तर्क तैयार किया, एक सीनियर की तरह मदद कर रहे इंसान ने जब सीनियर की तरह रैगिंग कर ली तो क्या फर्क है। बस इस तर्क ने गुस्से और अपमान के बादलों को छांट दिया। और फिर राकेश ने कहा कि हम दोस्तों के ग्रुप में जुड़ना चाहोगी? मेरे लिए तो जैसे यह सुनहरा मौका था, क्योंकि कॉलेज शुरू हुए दो सप्ताह हो चुके थे और बहुत-से लोग अपने वर्ग और रुचियों के हिसाब से समूहों में बंट चुके थे। इसके बाद साथ रहना जिंदगी की जरूरत जैसा होने लगा। हां, उसे प्रेम तो नहीं कहा जा सकता था, पर दोस्ती बहुत प्यारी थी। पूरे ग्रुप में मौज-मस्ती करते हुए भी हम लोग जल्द ही कक्षा में शिक्षकों के चहेते बने। मेहनती, आजाद खयाल और अपनी क्लास के स्टार होते हुए अपने सीनियर्स के प्रिय जूनियर्स रहे।

प्रज्ञा और राकेश
आज भी राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. उज्ज्वल सिंह, जो हमारी सब्सिडियरी की क्लास लिया करते थे, बाकायदा हम दोनों को हमारे नाम से जानते हैं। यह लोगों को हैरत में डालने वाला तथ्य है कि कोई भला सब्सिडियरी विषय के छात्रों को भी इस तरह याद रखता है। नए तरीके से वे हमें पढ़ाते थे और अंग्रेजीदां माहौल के विपरीत हिंदी वाला हो कर पढ़ाते थे। जहां कहीं हिंदी शब्द नहीं जानते थे, हमारा सहयोग लेते। ये बिलकुल नई किस्म का ट्रीटमेंट था, सो उनके बताए हुए से ज्यादा हम पढ़ कर जाते और किला फतह करने के अंदाज में रहते। कैंटीन, लाइब्रेरी, साहित्य के कार्यक्रमों में शिरकत करते और कविताएं लिखते। राकेश की कविताएं समाज और प्रेम की कविताएं थीं। दलित विमर्श की कविताएं कभी नहीं लिखीं उन्होंने। हमारे पूरे ग्रुप में हम दो ही थे, जिनके उपनाम को लेकर कोई अंदाजा लगाना कठिन था। मैंने दसवीं कक्षा में पिताजी से साफ कहा था कि मैं अपने नाम के बाद जातिसूचक विशेषण- 'उपाध्याय' नहीं लगाना चाहती और पिताजी ने एक पल गंवाए बिना कहा था - 'जैसा तुम्हारा निर्णय'। तो मैं प्रज्ञा ही रही। इसके कारण प्रथम वर्ष में कई सहपाठियों ने मुझे 'अछूत' कहा, पर मैंने उन संकीर्ण मानसिकता के लोगों को जवाब देना उचित नहीं समझा। इधर, राकेश के नाम के बाद कुमार शब्द से भी किसी जातिसूचक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता था। फिर इसकी जरूरत हमें कभी महसूस ही नहीं हुई कि कौन क्या है। वैसे भी दोस्ती में इतनी जगह ही कहां होती है कि जाति और धर्म बेधड़क घुसे चले आएं। प्रथम वर्ष समाप्त हुआ और हम दोनों बहुत अच्छे अंकों से सेकंड ईयर में आए। साथ-साथ रैगिंग की और फिर विश्वविद्यालय मंडल आयोग की रिपोर्ट से उत्तेजित हुआ। आरंभ में मंडल आंदोलन की सिफारिशों को ढंग से न समझ पाने के कारण जो धुंधलका था, वह पढ़-सुन कर साफ हुआ। फिर क्या था, अगले दिन पूरी तैयारी से हम मंडल विरोधी लोगों से लंबी बहस किया करते। सारा विश्वविद्यालय जब आग में जल रहा था। रामजस, लॉ फैकल्टी, स्टीफंस,  हिंदू और डी स्कूल के बीच छात्र मार्ग पर वीपी सिंह के पुतले फूंके जा रहे थे, डीयू के एक छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह कर लिया था और मंडल समर्थकों से बहस करते हुए हमारी दोस्ती का रंग और गहरा हो रहा था। जाति का कोई खुलासा अब भी नहीं था।

इसी वर्ष राकेश ने पिताजी (रमेश उपाध्याय) की 'किसी देश के किसी शहर में' (कहानी-संग्रह की कहानियां पढ़ीं। राकेश को पिताजी के बारे में बताते हुए जब भी मैं उनका प्रगतिशील सोच सामने रखती तो पाती एक हिचक है राकेश को उसे स्वीकार करने में। फिर हिंदी संगोष्ठी के एक कार्यक्रम में पिताजी जब कॉलेज आए और नमस्ते करते मेरे कुछ दोस्तों और सीनियर्स से अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा - 'हाथ मिलाओ यार', आत्मीयता में डूबे सब लोगों के चेहरों से भिन्न राकेश का चेहरा था। हम एक-दूसरे को बहुत पसंद तो करते ही थे। कई मुद्दों पर बहस भी करते थे। राकेश हमेशा तर्क से अपनी बात रखते। एक बार कक्षा प्रतिनिधि का चयन बिना चुनाव के कर लिया गया। किसी ने विरोध भी नहीं किया, पर सब शिक्षकों के सामने राकेश ने चुनाव की जनतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाए जाने की बात रखी और किसी उम्मीदवार के सामने न आ पाने की स्थिति में अपना नाम प्रस्तावित किया। राकेश भले ही हारे, पर इस बात का गहरा संतोष था कि चुनाव तो हुआ। दोस्ती और गाढ़ी हो रही थी, पर प्रेम की अभिव्यक्ति लायक नहीं थी। इसकी खास वजह वह सीमा थी, जिसे राकेश को पार करना था। दलित पृष्ठभूमि का एक लड़का, जिसके पिता की असमय मृत्यु से घर की माली हालत ठीक नहीं थी, भीतर ही भीतर कई सवालों में कैद था। यों कोई कुंठा उसके व्यक्तित्व में नहीं थी, पर जाति का सवाल बहुत बड़ा था। मन से स्वीकार करते हुए भी कैसे कहे एक ब्राह्मण लड़की से कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं। परिवार, समाज की बात तो बाद की है, पहले अपने मन में सदियों के जड़ जमाए उन संस्कारों का क्या करे। हमारे प्रेम विवाह में बाहरी संघर्ष से पहले भीतरी संघर्ष ज्यादा रहे। 

अवचेतन की उलझी गुत्थियों से जूझना था राकेश को। यही वजह रही कि उस लड़के का मन नहीं मानता था कि जो लेखक अपनी रचनाओं में स्वाधीन, लोकतांत्रिक मूल्यों का पक्षधर और समातामूलक खूबसूरत समाज के सपने देखता है, वह क्या वास्तविक जीवन में अपनी लड़की को एक दलित लड़के से प्रेम करते देख सकेगा? मन में प्रेम करते हुए भी सामाजिकता के दबाव, कई संशय और अपने ही परिवार के एक रिश्तेदार की प्रेम विवाह के बाद जघन्य हत्या की घटना ने राकेश को अपने भीतर सवालों के जंगल में उलझा रखा था। फिर आर्थिक रूप से हम दोनों परिवारों में एक बड़ा अंतर भी था। साथ ही शैक्षिक रूप से दोनों परिवारों के बीच चौड़ी खाई। कई मौकों पर घर में शामिल होते हुए राकेश ने हमारे घर के माहौल को जान लिया और पिताजी के जनवादी मूल्यों पर भी उनका विश्वास जमने लगा। इस बीच हम दोनों ने एमए प्रथम श्रेणी में पास कर लिया था। हमारे जीवन की दिशाएं कई बार बदलीं। मैं एमए के साथ 'समय-सूत्रधार' नाम की पत्रिका में साल भर से अधिक की अवधि के लिए चली गई, पर दोस्ती कभी नहीं टूटी। दोस्ती की उन्‍मुक्तता तो देखिए कि हम एक-दूसरे के लिए जीवनसाथी भी खोजते और इस कल्पना के आधार पर छेड़-छाड़ भी किया करते। दोस्त विवाहित हो रहे थे या अपने काम-धंधे से लग रहे थे, पर हमारी पढ़ाई ही खत्म नहीं हो रही थी। इधर, एमए के बाद मैं बीएड के लिए चली गई और राकेश एमफिल में, पर रहे दोनों ही दिल्ली विश्वविद्यालय में। इस बार सच में राकेश मेरे सीनियर हो गए। बीएड के बेहद व्यस्त कार्यक्रम में लगभग साल भर कोई खास मुलाकात नहीं हुई  - कुछ पत्र और फोन के अलावा। मोबाइल का जमाना था नहीं। और इसी बीच राकेश ने यूजीसी की नेट परीक्षा स्कॉलरशिप के साथ निकाल ली। नए सिक्कों के जैसी चमकती-खनकती राकेश की हंसी। जबरदस्त आत्मविश्वास और पैरों में अजाने पंख। बीएड के बाद मुझे एमफिल और नेट परीक्षा पास करने के लिए प्रोत्साहन घर और राकेश से ही मिला।

इसी समय एक दिन राकेश ने मुझसे पहली बार सीधा सवाल किया - 'क्या तुम मेरे साथ जीवन जीना पसंद करोगी?'  जुलाई 1995 की तेज दोपहर में पूछे गए इस सवाल का जवाब मैं तुरंत न दे सकी थी। इंकार तो नहीं था, बस एक मुस्कराहट। मेरी परवरिश जिस घर में हुई थी, वहां जाति, धर्म भाषा, लिंग, क्षेत्र के आधार पर मुझे कभी भेदभाव करना नहीं सिखाया गया था। दूसरे, अपने निर्णयों को जीने की स्वाधीनता भी थी, बशर्ते वे निर्णय उचित हों और उन्हें जीने और निभाने का साहस मेरे भीतर हो। फिर मेरे परिवार में यह पहला अवसर नहीं था प्रेम विवाह का। मेरी मौसी नीलिमा शर्मा ने स्वेच्छा से शमसुल इस्लाम जी से विवाह किया था, जिसे मेरे नाना-नानी ने तो नहीं, पर मेरे माता-पिता ने पूरा समर्थन दिया था। एक अन्य मौसेरी बहन ने भी अपनी पसंद से विवाह की बात की थी। उनकी पसंद के सजातीय होने के बावजूद परिवार में कई असहमतियां थीं, पर पिताजी का उन्हें पूरा समर्थन था। वह गंभीर बैठक हमारे घर ही हुई थी। पत्रकार मुकुल शर्मा और प्रो. चारू के विवाह में परिवार द्वारा उठी आपत्ति का हल भी हमारे घर ही खोजा गया था और पिताजी ही उनके विवाह में विटनेस थे। अपने घर का माहौल जानते हुए भी मुझे लगा अभी मैं आर्थिक रूप से निर्भर नहीं हूं और मां ने हमेशा यही सिखाया था, पहले अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, फिर शादी करना। पर उसी रात निर्णय कर लिया कि दो दोस्तों के लिए इससे बेहतर भविष्य क्या हो सकता है। राकेश के फोन और घर आना बदस्तूर जारी था। कई साहित्यिक कार्यक्रमों, नाटकों में राकेश भी पिताजी और मेरी बहन के साथ परिवार के सदस्य के तौर पर शामिल होते, पर अभी हमने अपने निर्णय का खुलासा नहीं किया था।

वह वर्ष (1995) बहुत अच्छा साबित हुआ। राकेश को बतौर प्राध्यापक किरोड़ीमल कॉलेज में पहला मौका मिला। कमाल की बात यह भी थी कि एक जनरल पोस्ट पर एक दलित लड़के की नियुक्ति उसकी अपनी योग्यता के बलबूते हुई। यह नियुक्ति अस्थायी थी, पर हौसलों की उड़ान को नए पंख लग गए थे। 1996 में राकेश रामलाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विवि. में स्थायी हो गए। उस दिन जब पिताजी को बताया कि आज शाम राकेश मिठाई खिलाने आएंगे तो पिताजी ने कहा - 'तो कब कर रहे हो तुम विवाह?' सवाल ने मुझे चौंकाया नहीं, पर मैंने फिर भी कहा - 'आप जानते हैं कि हम प्रेम करते हैं?' वे मुस्कराए। पर अभी राकेश को अपनी बहन के विवाह और अपने विवाह की जिम्मेदारी उठाने के लिए समय और धन चाहिए था और मेरा एमफिल अपने अंतिम चरण में था। अक्टूबर माह में राकेश ने एक दिन घर आ कर पिताजी से हमारे विवाह की बात की तो सामूहिक रूप से सब बैठे और तुरंत निर्णय हो गया। राकेश को विदा करते हुए छोटी बहन संज्ञा ने पहली बार 'राकेश भइया' का सम्बोधन बदलते हुए कहा, 'लाइए जीजाजी, ट्रीट के पैसे।'

अगले वर्ष के लिए विवाह की बात सोच कर हम अपने-अपने काम पूर्ववत करते रहे। इस बीच पीएचडी में मेरा प्रवेश हो गया। नेट पहले ही पास कर लिया था। 1997 के अप्रैल माह में हमारे परिवार पहली बार मिले। हमारे घर, मेरी मौसियां, मामा आदि सब उनके स्वागत में शामिल हुए। सगाई समारोह जैसा कुछ नहीं था। बेहद सादा तरीके से खाना-पीना और चाय हुई। राजनीतिक चर्चाओं के बीच पारंपरिक शादियों जैसा कुछ तय न होते हुए कोई अंगूठी,  भेंट आदि के अभाव में हम दोनों को हमारे भाई-बहनों ने गुलदस्ते भेंट किए। सब बेहद खुश थे और पूरे समय दो परिवारों के बीच जाति, आर्थिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति की कोई दीवार नहीं थी। विश्वविद्यालय में हमारे शिक्षकों और दोस्तों ने भी इस पहल का स्वागत किया। दोस्तों के चेहरे पर आश्चर्य और संतोष दोनों के मिले-जुले भाव थे, क्योंकि हम दोनों हमेशा साथ रहते थे और अन्य प्रेमी-प्रेमिकाओं की तरह कोई एकांत नहीं खोजते थे। तमाम साहित्यिक, राजनीतिक बहसों में साथ रहने, खुल कर हंसने, मजाक करने जैसी स्थितियों ने दोस्तों को हमें ले कर कुछ खास सोचने पर जैसे मजबूर ही नहीं किया था।

शादी हमने खुद अक्टूबर माह में तय की। कोर्ट मैरिज का प्रस्ताव हमारा था। राकेश से असहमत होते हुए पिताजी का अनुरोध था कि इस मौके पर पूरा परिवार और दोस्त इकट्ठा होंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय में अस्थायी रूप से पढ़ाने के बाद मैं भी स्थायी रूप से किरोड़ीमल कॉलेज में नियुक्त हो गई। अब आधार और भी दृढ़ हो गया। अगस्त माह से तीस हजारी कोर्ट के चक्कर काटना हमने शुरू कर दिए थे। कई बार हमें ठगने की साजिशें हुईं, पर अंततः सफल रहे और तमाम कार्यवाहियों के बाद एक दिन जज ने हमें मिलने के लिए अपने चैंबर में बुलाया। 'जब परिवार के लोग सहमत हैं तो फिर कोर्ट मैरिज क्यों? गाजे-बाजे के संग क्यों नहीं?' उनकी बात का हमारा जवाब यही था, ''विवाह की इस सामंती व्यवस्था में हमारी आस्था नहीं।'  लंबी बातचीत के बाद उन्होंने बधाई देते हुए एक अक्टूबर की तिथि निर्धारित की और मां-पिताजी द्वारा वीपी हाउस में रिसेप्शन पांच अक्टूबर को तय हुआ। दोनों परिवार, रिश्तेदार और दोस्त सब सही समय से कोर्ट पहुंचे, पर जज ने तय डेट आगे बढ़ा दी। उन दिनों श्राद्ध चल रहे थे और आम तौर पर इन दिनों किसी भी 'मांगलिक' कार्य की मनाही होती है। ऐसे समाज में जहां श्राद्ध के दिनों में एक नया कपड़ा तक नहीं खरीदा जाता, वहां शादी जैसी बात के बारे में सोचना तक अटपटा और अशुभ माना जाता है। इसी बात को सोच कर राकेश की मां हिचक रही थीं, पर सब की खुशी और दृढ़ता देख कर वे भी निःशंक और दृढ़ हो गईं।  हमारे मौसाजी शमसुल इस्लाम ने डीएम जीतेंद्र नारायण से बात की। दोबारा सर्टिफिकेट बने। राकेश की मां, मेरे पिताजी और भाई विवाह के दस्तखत वाले गवाह थे और कमरे में शीशे की दीवार के बाहर बारह-तेरह लोग। विवाह के बाद हम सब लोगों को साथ लाई मिठाई खिला कर खुशियां मना रहे थे। कैदी,  मुलाजिम, अफसर और हमारे परिवार सब शामिल थे इसमें।

विवाह का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक
एक बात जो हम अकसर किया करते हैं कि हमारा यह अंतरजातीय विवाह इतनी सहजता और सुगमता से कैसे संभव हुआ? दरअसल परिवारों की आपसी समझदारी बहुत बड़ा कारण थी। पिताजी और मां का दृढ़-निश्चियी रुख और जीवन को जीने का सिखाया उनका सलीका। यह अलग बात है कि मां और पिताजी को यह भी सुनाया गया कि 'लड़की को ज्यादा छूट दे दी है' या 'किस जात का है लड़का?' पर परिवार में अधिकांश लोग प्रगतिशील विचारों के ही थे। फिर पिताजी शुरू से जिन मूल्यों के साथ जिए उनका विरोध कोई किस आधार पर करता। राकेश की मां की तो बस एक ही चिंता थी कि कहीं कोई लड़ाई-झगड़ा न हो, पर उनकी चिंता परिवार से मिलते ही खत्म हो गई थी। इस तरह बाहरी संघर्षों से हम सुरक्षित ही रहे। पीठ पीछे चाहे कोई कितनी भर्त्सना करे, पर सामने करने का साहस किसी में नहीं था। दरअसल, इन विवाहों में बड़ा सवाल आजादी का है। हमने जो संस्कार और मूल्य अपने परिवार और शिक्षा से अर्जित किए, वे आजादी के मूल्य थे। दूसरी जरूरी बात यह भी ध्यान देने की है कि हर अंतरजातीय विवाह क्रांतिकारी और हर सजातीय विवाह रूढ़िवादी नहीं होता। यह बात समझने की है कि विवाह के बाद जो परिवार बनता है उसमें मुक्ति, समानता और बेहतर भविष्य का क्या और किस तरह का विजन है। यही महत्वपूर्ण है। कमी वहां रह जाती है, जहां हम आजादी के मूल्यों को भूल जाते हैं। चुनाव की आजादी, सोचने की आजादी, महसूस करने और सपने देखने की आजादी, निर्णय लेने की आजादी। जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद और रूढ़िवादी विचारों से आजादी। विवाह में दो वयस्क यदि दी हुई रूढ़िवादिता का तिरस्कार कर साथ जीने का निर्णय लेते हैं और ताउम्र उन मूल्यों को बचाने का प्रयास करते हैं, यही अंतरजातीय, अंतरधार्मिक विवाहों की सार्थकता और सफलता का पैमाना है। कठिनाई सिर्फ यह है कि आधुनिक शिक्षित परिवारों के लिए आजादी के बड़े सीमित मायने हैं। मसलन, देश की आजादी, वस्त्रों के चुनाव की आजादी, बाजार में खरीदने-बेचने की आजादी और वोट डालने की आजादी, पर विचारों की आजादी यहां एक खतरे की तरह महसूस की जाती है और दमन को उससे मुक्ति के एकमात्र रास्ते के रूप में देखा जाता है। हमारी शिक्षा और शिक्षण संस्थाएं भी रूढ़िवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद का खुल कर विरोध करती नहीं दिखाई देतीं। जब खाप पंचायतें प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सरेआम मौत की सजा देती हैं तो हमारे विचार के केंद्र कहे जाने वाले शिक्षण संस्थान मौन रहते हैं।

बहरहाल, कोर्ट मैरिज के बाद हम दोनों अपने-अपने घर चले गए और पांच तारीख के कार्यक्रम में लग गए। घर में रिश्तेदारों और पिताजी के दोस्तों का आना शुरू हो गया। एक आयोजन की तैयारी। पांच तारीख आई और हम सज-धज कर वीपी हाउस में इकट्ठा हुए। इस तरह के विवाह में कितनी खुशियां थीं, कितनी हार्दिकता। सब आशीर्वादों से नवा रहे थे। कोई झगड़ा नहीं, हत्या का भय नहीं, छुपने और भागने की जरूरत नहीं। सिर्फ इसलिए कि पुरानी पीढ़ी ने जिस तरह पुख्ता नींव तैयार की थी, अब उस पर टिका घर ध्वस्त न हो सकता था न किया जा सकता था। बिना फेरे, बिना ढोल-ढमाके और बिना दहेज के सादे और सुरुचिपूर्ण ढंग से आयोजन सम्पन्न हुआ। दिल्ली और बाहर से आए कितने लोग, कितने साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों और अध्यापकों की चिट्ठियां और संदेश आज भी सुरक्षित हैं मेरे पास। विदा भी दूसरी लड़कियों की ही तरह। मां-पिता, मौसियां-मौसा, चाचा-चाची, मामा-मामियां, भाई-बहन उतने ही प्यार से सीने से लगा कर लाड़ लड़ा रहे थे। यही नहीं, राकेश के घर के लोग भी रो रहे थे - बेटियां सबकी साझी होती हैं न।

फकत यह सच और। हमने यह विवाह करके कोई सामाजिक क्रांति नहीं की, प्रेम किया और प्रेम निभा रहे हैं, क्योंकि हमें लगता है कि प्रेम एक सतत क्रांति है। हमारा यह प्रेम हमारी चौदह बरस की बिटिया अक्षितारा के संग और भी परवान चढ़ रहा है।

हर अंतरजातीय विवाह क्रांतिकारी और हर सजातीय विवाह रूढ़िवादी नहीं होता। यह बात समझने की है कि विवाह के बाद जो परिवार बनता है उसमें मुक्ति, समानता और बेहतर भविष्य का क्या और किस तरह का विजन है। यही महत्वपूर्ण है। कमी वहाँ रह जाती है जहाँ हम आजादी के मूल्यों को भूल जाते हैं। चुनाव की आजादी, सोचने की आजादी, महसूस करने और सपने देखने की आजादी, निर्णय लेने की आजादी।

जब स्त्री की चुप्पी टूटती है : आकांक्षा कुमारी

आकांक्षा कुमारी
स्त्रियों की चुप्पी एक लंबी और ऐतिहासिक चुप्पी है।  स्त्रियों को हमेशा सामाजिक मान्यताओं और पुरुष वर्ग की मान-मर्यादाओं को ध्यान में रख कर ही चलने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसी स्थिति में स्त्रियाँ अपने मन की बात किसी से भी नहीं बोल पाती हैं। उन्हें सब से ज्यादा लोकापवाद का डर होता है। कभी-कभी भय, संकोच, शर्म इत्यादि, जो समाजीकरण की ही देन हैं, की वजह से भी वे नहीं बोल पातीं। इसके अलावा स्त्रियों पर धार्मिक परंपराओं एवं रूढ़ियों के जरिए भी कई तरह के बंधन लगे होते हैं। ऐसी स्थिति में नारी-मन खुद को अकेला पाता है। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह एक ऐसा साथ खोजती है जिससे वह अपने मनोभावों को व्यक्त कर सके और उसका दुख कुछ कम हो। वे अपनी वेदनाओं को गा कर बताती हैं। इस तरह के गीतों को ही लोक गीत का नाम दिया गया है। स्त्रियों के लिए लोक गीत ही वह मुक्त परिसर रहा है जहाँ वे पुरुष सत्ता-संदर्भों से आरोपित या आत्मारोपित रूढ़ियों एवं जकड़बंदियों से परे जा कर आत्मसाक्षात्कार कर सकती थीं। स्त्रियाँ हास-परिहास का उपयोग भी एक रणनीति के रुप में आदि काल से करती आ रही हैं, पर उनकी वाचिक परंपरा का संकलन कभी किया ही नहीं गया।

लोक गीतों की रचयिता प्राय: स्त्रियाँ ही रही हैं। जिन गीतों की रचना वह नहीं भी कर पाई हैं उनको भी धुन में स्त्रियों ने ही पिरोया है। तरह-तरह के भाव, वेदनाएँ, काल्पनिक उड़ानें, सभी कुछ ने मिलकर ‘राग’ का रूप ले लिया। यही वजह है कि लोक गीत में एक अलग तरह का भाव एवं राग देखने को मिलता है। लोक गीत ही एक ऐसा क्षेत्र रहा है जहाँ स्त्रियों ने अपने मनोभावों और अपनी आकांक्षाओं को व्यक्त किया है, पर मुख्यधारा की साहित्यिक रचनाओं में तो सक्रिय स्त्री रचयिता को भी पुरुष सत्तात्मक जगत की व्याख्याओं से संदर्भित किया गया है। वहाँ उनकी उपलब्धियाँ ही नहीं, स्वयं पुरुष सत्ता के विरुद्ध उनका विद्रोह भी पुरुष की व्याख्याओं और समीक्षाओं का मोहताज रहा है। स्त्रियों को अधिकांशत: उपेक्षा का शिकार बना दिया गया है। ऐसी स्थिति में लोक गीत ही एक ऐसा क्षेत्र बच जाता है जहाँ स्त्रियों  ने अपने आप को  सार्थक, स्वायत्त और सच्चे ढंग से पहचानने और उस पहचान को अभिव्यक्त कर पाने का साहस किया है। स्त्रियों की इस अभिव्यक्ति में कोई बनावटीपन नहीं दिखता है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि लोक गीत की उद्भवकर्ता अधिकांशत: निरक्षर स्त्रियाँ थीं, जिन्होंने अपने मनोभावों को उसमें ढाला हैऔर उसे गाया है। असल में औरतों की दुनिया में मर्दवादी मान-मर्यादा व इज्जत, प्रतिष्ठा की जकड़नें इतनी गहरी हैं कि औरतों की इच्छाएँ ज्यादातर अतृप्त ही रह जाती हैं। यह स्थिति उनके लिए काफी कठिनाईपूर्ण होती है। स्त्री मन में कई तरह की भावनाएँ डूबती-उतरती रहती हैं। उसके मन में असीम कामनाएँ और आवाजें कैद हो जाती हैं। इसे वह नहीं निकालेगी तो वह गहरे अवसाद में चली जाएगी। इसी वजह से स्त्रियाँ कई बार उत्साहित हो जाती हैं और गारी व होरी गा लेती हैं जिससे कि उसके मन की भड़ास निकल जाती है। इसी प्रकार कभी-कभी ये काल्पनिक उड़ानें भरने लगती हैं और अपनी एक नई दुनिया बना लेती हैं।

सामूहिक पीड़ा की अभिव्यक्ति

लोक गीतों की दुनिया अर्थात लोक गीत स्त्रियों के लिए एक ऐसा स्पेस हैं जहाँ वह निर्भीक हो कर कुछ भी कह सकती हैं। एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इन लोक गीतों में स्त्रियाँ अधिकांशत: प्रकृति (वृक्ष, पक्षी, आकाश, बादल इत्यादि) से बात करती हैं, क्योंकि उन्हें यह विश्वास होता है कि प्रकृति उसकी वेदना को सुनेगी, उनके भावों को समझेगी, पर किसी से कहेगी नहीं, क्योंकि स्त्री को सबसे अधिक भय किसी से होता है तो वह है लोकोपवाद। उसे लगता है कि लोक गीत के माध्यम से वह मनुष्येतर दुनिया से संवाद स्थापित कर सकेगी और उस दुनिया में चुगलियों का कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रकृति इनके लिए एक ऐसा साधन है जिससे वह निडर होकर अपनी व्यथा बाँट सकती हैं। इस प्रकार स्त्री अपने दर्द को कुछ हलका-भी कर लेती है। यह बात भी काफी महत्वपूर्ण है कि स्त्री जाति और पक्षियों की जिंदगी में काफी समानता है, इसलिए स्त्री कभी-कभी पक्षी के साथ स्वयं की तुलना करती है। भारतीय समाज में स्त्री के जीवन में विवाह के बाद काफी बदलाव आता है। विवाह-पूर्व की सारी स्वतंत्रता छिन जाती है। उसे अपने आप को नई परिस्थिति में ढालना होता है। ऐसी स्थिति में वह अपनी तुलना पिंजड़े में बंद पक्षी से करती है। लोक गीतों के माध्यम से स्त्री अपने श्रमजनित दुखों का परिहार भी करती है। जैसे रोपाई, मँडनी, जाँत, कटनी आदि कार्य करते समय वे कोई न कोई गीत जरूर गाती हैं। ये गाने उसके श्रम या वेदना के परिहार के माध्यम बनते हैं। उसी प्रकार, बेटी की शादी के बाद विदाई और बच्चे के जन्म से संबंधित अनेक ऐसे गीत हैं जिसके माध्यम से स्त्रियाँ अपने अन्तर्मन की व्यथा को व्यक्त करती हैं। उत्तर भारत के संस्कार गीतों में इस तरह के अनगिनत गीत भरे पड़े हैं।

जैसे एक मगही गीत में गर्भवती महिला जचगी के लिए आई दाई से कहती है -

डगरिन जब मोरा होयतो बेटवा
त कान दुनो सोना देवो हे,
डगरिन जब मोरा होयतो लछमिनियाँ
पटोर पहिरायब हे


(आसन्न-प्रसवा स्त्री डगरिन से कहती है – पुत्र के जन्म पर दोनों कान में सोने का आभूषण दूँगी और बेटी  होने  पर साड़ी  पहनाऊँगी)  स्पष्ट है कि खुद गर्भवती माँ  पुत्र और पुत्री में विभेद करती है। लेकिन कोई भी समझ सकता है कि यह उसकी मूल इच्छा नहीं, बल्कि पुरुष सत्ता द्वारा आरोपित इच्छा की आवर्ती अभिव्यक्ति है।

मगही के ही एक और गीत में स्त्री बेटी पैदा होने के बाद के अनुभव को बताती है कि परिवार वालों के अपेक्षा के अनुसार उसने बेटा को जन्म न दे कर एक बेटी को जन्म दिया तो उसके साथ घर के लोगों का, यहाँ तक कि उसके पति का भी, कैसा व्यवहार रहा और वह खुद को कितना अकेला महसूस कर रही थी - 

हमतो जानयती राम जी बेटा देतन
बेटिए जनम देलन हे,
ललना सेहु सुनि सासु रिसिआयल   
मुख नहीं बोलत हे।
ननदो मोर गरिआवे गोतिनी लुलुआवय हे
ललना सेहु सुनि स्वामी रिसिआयल
मुँह पफेरी बइठल हे।
सासु जी तरबो चटइया नहीं दिहलन
पलँग मोर छीनी लेलन हे,
ललना एक डगरिन मोर माय
से कर लागी बइठल हे।


(स्त्री ने सोचा था कि भगवान उसे पुत्र रत्न देंगे, पर जन्म हुआ कन्या रत्न का। पुत्री का जन्म सुनते ही सास ने गुस्से से मुँह फेर कर बोलना बंद कर दिया। ननदें गाली देने लगीं। जेठानी बुरा-भला कहने लगी। पति भी मुँह मोड़ कर चल दिया। प्रसव काल में एक मात्र सहयोगिनी डगरिन (दाई) माँ बन कर उसकी सेवा करती रही।)

भोजपुरी भाषा के एक गीत में एक बेटी अपने साथ होने वाले भेदभाव को ले कर सवाल उठाती है कि एक ही घर, एक ही गर्भ से जनम लेने के बाद भी सिर्फ लड़की होने की वजह से मेरे साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया गया? लड़की अपने पिता से सवाल करती है -  

दू रंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया       

बेटा के खेलाबेला त मोटर मँगइल अरे मोटर मँगइल
हमार बेरिया, काहे सुपली मऊनीया हमार बेरिया

दू रंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

बेटा के पढ़ाबेला स्कूलिया पठइल अरे स्कूलिया पठइल
हमार बेरिया, काहे चूल्हा फुकवईल हमार बेरिया
दू रंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

बेटा के बिआह में त पगड़ी पहिरल अरे पगड़ी पहिरल
हमार बेरिया, काहे पगड़ी उतारल हमार बेरिया
दू रंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया
दू रंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी दू रंग नीतिया


(पिताजी, आप ने दो तरह की नीति क्यों अपनाई? बेटे को खेलने के लिए मोटरगाड़ी खिलौना मँगवाया और मेरी बारी आई तो सूप-मौनी? बेटे को पढ़ने के लिए स्कूल भेजा और मेरी पढ़ने की बारी आई तो चूल्हा फुँकवाया? बेटे की शादी की तो पगड़ी पहनी और जब हमारी शादी की बारी आई तो पगड़ी उतार दी? एक ही गर्भ से बेटे ने भी जन्म लिया और बेटी ने भी, फिर भी आपने दो तरह की नीति क्यों अपनाई?)

अवधी भाषा के एक गीत में लड़की अपनी माता से सवाल करती है कि एक ही गर्भ से पैदा होने के बाद भी हमारे साथ भेदभाव क्यों किया जाता है? 

मोह न छोड़्यो मोर महतारी
एक कोखि के भैया बहिनिया             
एकहि दूध पियायो महतारी                  

भैया के भए बाजै अनद बधैया
हमरे भए काहे रोयो महतारी ?

भैया का दिह्यो मैया लाली चौपरिया
हमका दिह्यो परदेस महतारी

सँकरी गलिय होइके डोला जो निकरा
छूटा आपन देस महतारी

बेटा के जनम में त सोहर गवइल अरे सोहर गवइल
हमार बेरिया, काहे मातम मनइल हमार बेरिया


(मुझे मत छोड़ना, माँ। एक ही गर्भ से हैं हम भाई-बहन, फिर भी तुमने एक को ही दूध पिलाया।  भाई के जन्म पर बहुत बधाई आई और उत्सव मने, पर मेरे जन्म पर क्यों रोई? भाई को बहुत कुछ मिला घर का, मुझे परदेस क्यों मिला ? जब मेरी डोली निकली (बिदाई) तो मुझसे हमारा देश (मायका) तक छूट गया? बेटे के जन्म पर सोहर गाया गया और बेटी के  जन्म पर मातम क्यों मनाया गया?)
 
इन तमाम उदाहरणों के जरिये यह कहा जा सकता है कि उत्तर भारत के विशाल क्षेत्र, मगध से ले कर अवध तक, में जेंडर के आधार पर होनेवाले भेदभाव को ले कर कमोबेश एक जैसा सोच झलकता है और यहाँ बोली जानेवाली लगभग हर भाषा में इस तरह के गीत मिलते हैं, जिनमें स्त्रियाँ अलग-अलग तरह से अपनी अभिव्यक्ति करती हैं, अपने साथ होनेवाले भेदभाव पर सवाल उठाती हैं।

यह  काफी सोचनीय विषय है कि उदारीकरण और बाजारीकरण के मूल्यों ने समाज और राजनीति के स्तर पर संरचनाओं में काफी परिवर्तन किया  है। लोक संस्कृति का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा है। पारंपरिक लोक गीत एक प्रकार से गायब होते जा रहे हैं। अब इस क्षेत्र में भी, जो आदि काल से स्त्रियों के लिए एक स्पेस था, उस पर बाजार की नजर टिकी हुई है, जिसने स्त्री को उसकी पारंपरिक जमीन से विस्थापित कर दिया है। यह स्थिति किसी एक संस्कृति में नहीं है, बल्कि हर संस्कृति में, चाहे वह भोजपुरी हो या मैथिली हो या फिर अवधी, बुंदेली एवं मगधी,  हर लोक संस्कृति में है। यह भी कहा जा सकता है कि लोक गीत और लोक साहित्य किसी भी समाज में दमित आवाजों की अभिव्यक्ति और  समाज के कहाँ देखेंगे? दर्पण की भाँति है। यह दर्पण अब छिन्न-भिन्न हो चुका हैं। लोक की छवियाँ अब हम कहाँ देखेंगे?

भारत की हर भाषा में सास-ननद, देवर पर अनेक लोक गीत प्रचलित हैं। हर त्योहार, हर संस्कार, मौसम और सिपाहियों की पत्नियों के मन का असीम दर्द, पीड़ा और वेदना के अनगिनत लोक गीत हैं। लोक गीत एकल, सामूहिक जन जीवन की अंतरात्मा में प्रवाहित हो कर अभिव्यक्ति के रूप में सामने आता है। जहाँ भी अवसर मिलता है, लोक गीत में माधुर्य और प्रसन्नता दिखाई देती है। हँसी-मजाक का तो कहना  क्या।  लोक गीतों में मानो लोक की सारी जीवंतता उमड़ पड़ी है। यह भी कहा जा सकता है कि लोक गीत समूची सृष्टि के लोक जीवन की अनमोल धरोहर है। यह एक ऐसी अनमोल निधि है जिसे बड़े ही जतन से व सहेज कर भावी पीढ़ी को सौपने की जरूरत है, ताकि भविष्य में भी इसका अस्तित्व बना रहे।

संस्कृत साहित्य में स्वाधीन स्त्रियाँ : राधावल्लभ त्रिपाठी

ये संस्कृत साहित्य की मनस्विनी नारियाँ हैं, भक्तिकाल की वे भक्तिनें नहीं तो बार-बार हाथ जोड़ कर या पैर पड़ कर पति से कहें कि ʻबिनती बहुत करों का स्वामीʼ 

संस्कृत साहित्य की परंपरा पाँच हजार साल से अधिक पुरानी है। कविता और शास्त्र की विविध विधाओं में यह बहुत संपन्न साहित्य है। पर यह प्रायः पुरुषों के द्वारा और पुरुषों के लिए लिखा गया साहित्य है। इसके बावजूद इसमें स्वाधीन मन वाली, स्वाधीनता के लिए संघर्ष करती या पुरुष के वर्चस्व के आगे न झुकने वाली स्त्रियों की अनेक छवियाँ हैं। इसके दो कारण हैं। एक,  जिस वैदिक समाज में इस साहित्य का उपक्रम हुआ उस समाज में मातृसत्ताक आदिम कबीलों का सातत्य बना हुआ था। दो, चिंतन और संवेदना के स्तर पर दार्शनिकों तथा कवियों ने स्त्री की गरिमा को पहचाना और उसकी स्वाधीनता का सम्मान किया।

किसी भी समाज में व्यक्ति की स्वाधीनता की पहचान निम्नलिखित कारकों से हो सकती है – एक, वह व्यक्ति अपनी सर्जनात्मकता, संकल्पों और अभीप्साओं को स्वयं की तथा समाज की बेहतरी के लिए स्वायत्त अभिव्यक्ति दे सके; दो, वह अन्य व्यक्तियों से वाद, विवाद और संवाद कर सके; तथा तीन, वह अपना योगक्षेम स्वयं वहन  कर पाए।

ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में कतिपय स्त्रियों का ऋषि के रूप में उल्लेख है। स्त्री के ऋषि होने का अर्थ है कि वह मंत्रों का साक्षात्कार कर लेती है।  हरिपद चक्रवर्ती (1981: 54) ने लोपामुद्रा, अपाला तथा घोषा को महिला ऋषि माना है। मांधात्री, अगस्त्य की अज्ञातनाम बहिन, वसुक्र की पत्नी, शाश्वती, गोधा विश्ववारा भी ऐसी ही महिला ऋषि हैं। मंत्रों की रचनाकार कवि के रूप में घोषा का उल्लेख ऋग्वेद (1.117.7, 10.40.5, 10.39.3.6) में आता है। घोषा राजा कक्षीवत की बेटी थी। अपाला तथा विश्ववारा आत्रेय वंश की थीं। ऋग्वेद के पंचम मंडल में आत्रेय ऋषियों के मंत्र हैं। अपाला तथा विश्वारा के भी मंत्र इनमें हैं। इन महिला ऋषियों में से कुछ ने तो पूरे पूरे सूक्त (बहुसंख्य मंत्रों का एक अध्याय) भी रचे।
 
मंत्रों का साक्षात्कार कर सकना या काव्य रच लेना – वैदिक काल में ऐसा कर्म है, जो स्वाधीनता की परम स्थिति को प्रकट करता है। जो स्त्री ऋषि के रूप में मंत्रद्रष्टा हो सकती है, वेद उसके लिए जन्मजात अधिकार बन जाता है। कौषीतकि ब्राह्मण में बताया गया है कि वेद में पारंगत स्त्रियों को पथ्यस्वस्ति वाक् की उपाधि से सम्मानित किया जाता था। वैदिक यज्ञों में, जहाँ यजमान के साथ उसकी पत्नी की सहभागिता अनिवार्य थी, सीतायज्ञ तथा रुद्रयज्ञ ये दो यज्ञ ऐसे बताए गए हैं, जिनका अनुष्ठान केवल स्त्रियों के द्वारा  ही किया जा सकता था। स्त्री अपनी पुरोहित स्वयं है, और अपना कर्मकांड वह स्वयं ही करती है – यह स्थिति वैदिक समाज के भीतर भी मातृसत्ताक समाज की मौजूदगी साबित करती है।
अशोक वाटिका में सीता
यह कहना गलत होगा कि  इन स्त्री ऋषियों का प्रेरणा के स्पंदित क्षणों में कुछ मंत्र रच लेना उनकी स्वाधीनता का लक्षण नहीं है। वस्तुतः मंत्रद्रष्टा स्त्री ऋषियों ने अपने कर्तृत्व व रचनाशीलता के द्वारा ऋषि के रूप में मान्यता हासिल की। ऋषि होने का अर्थ अपनी प्रज्ञा की सक्रियता से समाज में सार्थक हस्तक्षेप के लिए स्वाधीन होना भी है। जिन महिला ऋषियों का उल्लेख यहाँ किया गया है, उनमें से कुछ बाद में ब्रह्मवादिनी हो गईं। ब्रह्मवादिनी बुद्धिजीवी महिला है, जो वाद या खुली बहस में शिरकत कर सकती है, शास्त्र रच सकती है या धर्मोपदेश कर सकती है। पूर्ववैदिक काल में घोषा और इला इसी तरह की महिलाएँ थीं। उत्तर-वैदिक काल में जब उपनिषद रचे जा रहे थे, उस समय इनकी संख्या और बढ़ी होगी। काशकृत्स्ना मीमांसा दर्शन की आचार्य थी। उपनिषदों में गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी और सुवर्चला – ये महिलाएँ अपनी जीवनशैली स्वयं चुनती हैं। गार्गी ब्रह्मवादिनी है, वह अकेली याज्ञवल्क्य के सामने उस समय के बुद्धिजीवियों के कदाचित् सब से बड़े जमावड़े बहस में टिकी रहती है। मैत्रेयी घर-बार और अटूट संपदा का त्याग कर याज्ञवल्क्य के साथ जाने का निर्णय लेती है, कात्यायनी अपने पति को छोड़ कर भी इसी घर-बार और ऐश्वर्य में रमने का।

ऋग्वेद में ऐसी अनेक महिलाओं का उल्लेख है, जो पुरुषों के साथ सहज रूप में युद्ध में शरीक होती हैं। स्त्री का हथियार उठाना यहाँ उसका एक स्वैच्छिक कर्म है, इसमें न कोई अनहोनी बात है, न लड़ाई में शामिल होने के लिये उसे मजबूर ही किया गया है।  ऋग्वेद में विश्पला का वर्णन आया है। विश्पला राजा खेल की रानी थी। वह अपने पति के साथ युद्ध में लड़ी, उसकी जंघा (घुटने के नीचे का अंग) कट गई। अश्विनी कुमारों ने, जो वैद्य होने के साथ  सर्जरी में भी माहिर कहे गए हैं, उसके आयसी जंघा (घुटने में लगाने के लिये लोहे का बना पाँव) लगा दी। मुद्गल की पत्नी मुद्गलानी (इन्द्रसेना) तीरंदाजी में माहिर थी। वह भी मुद्गल के साथ गाएँ चुरा कर ले जाते दस्युओं से भिड़ंत में धनुष-बाण ले कर मैदान में उतरी। वेदों के अंतर्गत पंचविंश ब्राह्मण में (25.13.3) रुशमा की कथा आती है। रुशमा कुरुक्षेत्र की रहने वाली थी, उसने इंद्र से युद्ध किया।
शकुंतला

ऋग्वेद में ऐसी अनेक महिलाओं का भी वर्णन है, जो अपनी यौनिकता को सहज उन्मुक्त अभिव्यक्ति देती हैं। स्त्री के खुल कर दैहिक संसर्ग की कामना को पुरुष के आगे प्रकट करना उस समय बुरा भी नहीं माना गया। अगस्त्य ऋषि की महत्ता तो संस्कृत के वेदों और पुराणों में ही नहीं, तमिल साहित्य में वर्णित है। अगस्त्य उत्तर को दक्षिण से जोड़ने के अपने अभियान में या असुरों से संघर्ष में इतने व्यस्त रहते थे कि अपनी पत्नी लोपामुद्रा की ओर ध्यान देने का समय ही उनके पास न था। फिर वे बूढ़े भी हो गये थे। ऋग्वेद के पहले मंडल का 179वाँ सूक्त अगस्त्य और लोपामुद्रा का संवाद है। लोपामुद्रा कहती है कि काया बुढ़ा जाए, फिर भी एक पति को कामना करती हुई पत्नी के पास आना चाहिए। इस सूक्त में लोपामुद्रा देह की जिस भाषा में बोलती है,  वह इतनी बेबाक है कि ऋग्वेद का अँग्रेजी में अनुवाद करने वाले यूरोप के संस्कृत विद्वान ग्रिफिथ साहब को इस सूक्त के कतिपय मंत्रों का अंग्रेजी उल्था करने में शर्म लगी, तो उन्होने इन मंत्रों का लैटिन में अनुवाद कर दिया, और जिन मंत्रों में उन्हें शर्म नहीं लगी, उनका अंग्रेजी में करते गये। अंग्रेजी में क्रिश्चियनिटी की बदौलत जो पापबोध आ मिला है, उसके कारण वहाँ देह को ले कर पाखंड से भरी शर्म और झिझक हो सकती है, संस्कृत और लैटिन की अपनी परंपरा में शर्म का यह पाखंड नहीं है। इस पाखंड से मुक्त होने की वजह से ऋग्वेद के ऋषि वाणी की भव्यता का वर्णन करते हुए यह कह सके – ʻजानकार व्यक्ति के सामने वाणी अपनी काया को ऐसे ही अर्पित कर देती है, जैसे कामना से भरी पत्नी अपनी देह को अपने पुरुष के आगे।ʼ यहाँ पत्नी के लिये विशेषण ʻउशतीʼ है, जिसका उन आधुनिक भाषाओं में अनुवाद थोड़ा मुश्किल है, जिन्हें बोलने वालों ने पाखंडमयी लज्जा का लबादा ओढ़ लिया है। इंद्र की पत्नी इंद्राणी के वर्णन भी वेदों में एक प्रखर अभिव्यक्ति वाली महिला के रूप में हैं। कामसूत्रकार वात्स्यायन तो इंद्राणी का अपने शास्त्र की एक आद्य प्रवक्त्री के रूप में स्मरण करते हैं।

संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त गृहिणी और दंपती जैसे शब्द घर पर स्त्री के स्वामित्व के बोधक रहे हैं। मातृसत्ताक समाजों में स्त्री अपने घर की मालकिन है, घर का प्रबंध वही करती है, कमाई भी वह अपने पास रखती है। अपना पुरुष या पति चुन कर उसे अपने घर ला कर रखने का अधिकार भी वह रखती है। वेदों और उपनिषदों के समय तक किसी लड़की के द्वारा अपना पति स्वयं चुनना एक सहज बात बनी हुई है। इसीलिए उपनिषदों की सुवर्चला जब अपने पिता से कहती है कि वह जाँच-परख कर अपने लिए अपना पति स्वयं चुनेगी, तो पिता उसे इसके लिए बिना ननुनच के छूट देते हैं। सुवर्चला अपने चयन का मानक भी स्वयं बनाती है – जो युवक उसके सामने अपने आप को उसकी बराबरी का ब्रह्मज्ञानी या बुद्धिजीवी साबित कर देगा, वह उससे विवाह करेगी। श्वेतकेतु जैसा तेजस्वी युवा चिंतक उसकी कसौटी पर खरा साबित होता है, सुवर्चला उसे पसंद कर के उसे ब्याह लेती है। सावित्री के पिता अश्वपति अपनी बेटी के गुणों के कुछ ऐसे कायल थे कि उन्हें लगा वे उसके लायक लड़का नहीं ढूँढ सकेगें। उन्होंने सावित्री के लिए यात्रा करने की व्यवस्था कर के उसे रवाना कर दिया कि वह दुनिया भर में घूम कर देख-भाल कर अपने लिये लड़का चुन ले। सावित्री ने अपनी इस वरण की स्वतंत्रता का सही-सही उपयोग किया। पर सारे पिता सुवर्चला और सावित्री के पिताओं जैसे उदार और समझदार नहीं होते। ऐसे हद दर्जे के गँवार पिता भी हमारे समाज में रहे हैं कि लड़की कायदे का लड़का अपने लिए जान-परख कर उससे विवाह कर ले तो वे वरवधू दोनों की बनी-बनाई  दुनिया को नेस्तनाबूद करने के लिए  कमर कस लें।

दूल्हे को वर कहा जाता था। वर का अर्थ ʻचुना गयाʼ भी होता है और ʻचुनने वालाʼ भी। पर मेरी समझ से मूल अर्थ ʻचुना गयाʼ ही होगा, क्योंकि लड़की अपना लड़का चुनती थी। मजे की बात यह है कि वर का स्त्रीलिंग संस्कृत में नहीं बनता, क्योंकि लड़की चुनने वाली है, चुनी जाने वाली नहीं। लड़की के लिये स्वयंवरा (स्वयं वरण करने वाली) या पतिंवरा शब्द हैं। आगे चल कर लड़की के लिए वरण की अपनी स्वतंत्रता को स्वयंवर के रूप में एक औपचारिक जश्न बना दिया गया। स्वयंवर में मूलतः तो चुनने की स्वतंत्रता लड़की के पास ही है, विवाहार्थी पुरुषों को उसके आगे नुमाइश की तरह पेश होना है, और उसके द्वारा खारिज किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने का उन्हें अधिकार नहीं है।  महाभारत में दमयंती या कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में इंदुमती के स्वयंवर इसी तरह के हैं।

स्त्री स्वाधीन मन के साथ ही जन्म लेती है। पुरुष या समाज उसकी स्वाधीनता को अक्षुण्ण रहने दे – यह भी संभव है; और जैसा होता रहा है, यह भी कि अपनी वर्जनाओं, पाबंदियों और जड़ नैतिक मान्यताओं के तहत उसकी स्वाधीनता का वह हनन करता जाए। संस्कृत साहित्य में स्त्री की स्वाधीनता और स्वाधीनता के हनन की सभी स्थितियों के अक्स हैं। इस दृष्टि से तीन तरह की स्त्रियाँ संस्कृत साहित्य में देखी जा सकती हैं – एक तो वे जिन्होंने स्वाधीनता को एक मूल्य की तरह आत्मसात कर के उसे अपने जीवन में चरितार्थ किया; दूसरी वे जिन्हें इस मूल्य को हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ा और उसकी कीमत चुकानी पड़ी; तीसरी वे जिनके लिए स्वाधीनता एक सपना बन कर रह गया। यदि वाल्मीकि की रामायण से तीनों के उदाहरण देना हो, तो पहले का उदाहरण कैकेयी, दूसरे का सीता, तारा, मंदोदरी और  अहल्या; तथा तीसरे का उदाहरण कौसल्या, सुमित्रा आदि बहुसंख्य नारियाँ हैं।

कैकेयी के जैसी स्वाधीन मन वाली तथा स्वाधीनता के मूल्य को सत्यापित करने वाली स्त्री रामायण में तो दूसरी नहीं है। वाल्मीकि ने जितनी रामायण की कथा बताई है, उसी को ध्यान में रखें, तब इस कथन की सचाई समझी जा सकेगी। कैकेयी विश्पला, मुद्गलानी, रुशमा आदि वैदिक काल की नारियों की तरह युद्ध के मैदान में दशरथ के साथ उतरी थी। वाल्मीकि के अनुसार युद्ध में दशरथ घायल हो कर मरणासन्न हो गए, तो कैकेयी उनके प्राण बचाने के लिए उन्हें युद्धभूमि से उठा लाई। दशरथ इस बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कैकेयी से दो वर माँगने के लिये कहा। कैकेयी ने कई साल बाद राम के ऐन राज्याभिषेक की तैयारी के मौके पर ये वर माँगे – इसमें न चालाकी है, न मौकापरस्ती; यह दशरथ को उनकी ऐतिहासिक भूल के लिए दिया गया दंड अवश्य है। वाल्मीकि बताते हैं कि दशरथ ने कैकेयी के साथ विवाह राज्यशुल्क दे कर किया था, अर्थात उन्होंने कैकेयी के पिता को वचन दिया था कि उनकी लड़की से यदि लड़का होगा, तो अयोध्या का राजपद उसी को दिया जाएगा। इस बात को कैकेयी जानती थी, इस बात को राम भी उस समय जानते थे जब उनके राज्याभिषेक के लिए तैयारियाँ की जा रहीं थीं। तभी तो वे कैकेयी के वर की बात पता चलते ही वन जाने के लिए इस तरह तैयार हुए जैसे मन से एक बोझ हट गया हो। दशरथ के मन में राम के लिये मोह था, वे कैकेयराज को दिए वचन पर सुविधा के साथ लीपापोती कर सकते थे, और उन्होंने राम को समझा-बुझा कर राजपद स्वीकार कर लेने की साजिश में शामिल भी कर लिया था।

अहल्या ने इंद्र से प्रेम  किया था। योगवासिष्ठ वेदांत का ग्रंथ होते हुए भी इंद्र और अहल्या के प्रेम के अपार आनंद का रोमांचक वर्णन करता है। एक समय अहल्या और इंद्र के प्रेम की कहानी एक लोककथा बन गई होगी, क्योंकि दक्षिण के मंदिरों में अहल्या और इंद्र के प्रेमनिरत युगल अंकित हैं। अहल्या को गौतम ने छोड़ दिया, और वह वर्षों अकेली रही। राम जब दंडकारण्य जा रहे थे, तो वे अहल्या से मिले, उसे माँ कह कर पुकारा और उसे प्रणाम किया। फिर उन्होंने गौतम ऋषि को भी समझा-बुझा कर अहल्या को फिर से स्वीकार कर लेने का अनुरोध किया। वाल्मीकि की इस कथा में अहल्या सचमुच का पत्थर नहीं बनती, न ʻछुअत सिला भइ नारिʼ की ही कोई बात है।

रामायण की सीता, तारा और मंदोदरी और महाभारत की द्रौपदी अपने पतियों से वाद, विवाद और संवाद करती हैं। सीता राम के साथ वन जाने की जिद करती हुई कहती हैं - ʻमैं तुम्हारे रास्ते के कुशकाँटे रौंदती हुई आगे आगे चलूँगी (अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्)।ʼ अपहरण करते रावण से वह जूझती है। अशोकवाटिका में अकेली उसे चुनौती देते हुए वह कहती है – ʻअरे दुर्मति, तू गीदड़ है, जो मुझ सिंहिनी की कामना कर रहा है (त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्मते)।ʼ रावण उसके सामने सहमता है। रावणवध के बाद राम सीता को सामने देख कर आपे से बाहर हो कर कुछ का कुछ बोलने लगते हैं, सीता तब भी उनसे वाद और संवाद करती है। द्रौपदी का एक पति जुआ खेल कर अपने भाइयों के साथ गुलाम बन चुका है, द्रौपदी अपने बुद्धिवैभव से उन्हें गुलामी से  निजात दिलाती है, पर उनकी मानसिक गुलामी का वह क्या करती?

सीता के तेज से रावण घबराता है, राम उसके आगे निरुत्तर रहते हैं; द्रौपदी के एक सवाल के सामने महावीर भीष्म परेशान और पसीने पसीने हो जाते हैं।  कौन अधिक स्वाधीन है - सीता या राम और रावण? द्रौपदी या भीष्म और युधिष्ठिर?

मंदोदरी रावण को सलाह देती रही है कि वह सीता को राम को लौटा कर उनसे संधि कर ले। पर युद्ध में अपने सारे भाई-बंधुओं के मारे जाने पर पूरी तरह से हताश रावण जब उसके पास सलाह माँगते हुए पूछता है कि क्या अब राम से संधि कर लूँ और सीता को लौटा दूँ, तो वही मंदोदरी हनुमन्नाटक में रावण से कहती है – अब क्या संधि करना? और दशानन, अब यदि तुम लड़ने से डर रहे हो, तो मैं तलवार उठा कर युद्ध में कूदने के लिये तैयार हूँ।ʼ ये संस्कृत साहित्य की मनस्विनी नारियाँ हैं, भक्तिकाल की वे भक्तिनें नहीं तो बार-बार हाथ जोड़ कर या पैर पड़ कर पति से कहें कि ʻबिनती बहुत करों का स्वामीʼ

दुष्यंत शकुंतला
महाभारत की शकुंतला को विवाह कर के भी दुष्यंत ने पहचानने से इंकार किया तो दोनों के बीच जम कर झड़प हुई। शकुंतला अंत में यह कह कर चल दी, मैं अपने बेटे को इतना बड़ा वीर बनाऊँगी कि यह अपने बूते पर तुझसे आर्यावर्त का राज्य ले लेगा।
 
कालिदास की जिस शकुंतला को उन्नीसवीं सदी के फ्रेंच आपेरा में नारी की मुक्ति के प्रतीक के रूप में  उद्धृत किया गया, उसमें महाभारत वाली शकुंतला की आँच नहीं है। बाद के संस्कृत साहित्य में स्त्री का तेज मंदा होता गया है, स्वाधीन स्त्रियाँ कम होती गईं हैं। पर स्त्री की स्वाधीनता का सपना बाण, शीला भट्टारिका और भवभूति जैसे कवियों में जागता दिखता है। बाणभट्ट की महाश्वेता और कांदबरी तो उस जादुई यथार्थ का हिस्सा लगती हैं, जो पुरुषतंत्र के परे है। भवभूति के नाटकों की दुनिया में एक लड़की आत्रेयी है, जो प्रयाग के पास वाल्मीकि के तपोवन से चलती चलती दंडकारण्य में अकेली वेदांत पढ़ने के लिए दूसरे तपोवन में जा रही है। वासंती है, जो सीता पर राम के द्वारा किए गए अत्याचार को ले कर उनसे कड़ी बहस करती है, एक महिला कामंदकी है, जो अपने गुरुकुल में वह शास्त्र (आन्वीक्षिकी) पढ़ाती है, जिस पर पुरुषों का एकाधिकार माना जाता रहा है। मालती है, जो पिता का घर छोड़ कर माधव से विवाह करती है।

वेदों में इंद्र को अहल्याजार (अहल्या का यार) कहा गया। पिछले दो हजार सालों में संस्कृत में रचित काव्यों में स्त्री के जारज संबंधों के रोमांचक वर्णन किये जाते रहे, विज्जिका और शीलाभट्टारिका जैसी महिला कवियों के द्वारा भी और अन्य कवियों के द्वारा भी। ये संबंध पुरुषों के आधिपत्य और वर्जनाओं के संसार को छिन्न-भिन्न करने वाले ओपन सीक्रेट थे।

1975 के आसपास उज्जैन के कालिदास समारोह में महादेवी वर्मा का व्याख्यान सुनने को मिला। महादेवी की कविता जितना कोमल, करुणामय और रहस्यमय लगी, मंच पर उतने ही बेबाक और दबंग स्वर में उन्हें बोलते देखा और सुना। अपनी संस्कृत के अध्ययन को ले कर उन्होने बताया कि उनकी वेद पढ़ने की बड़ी लालसा थी, पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वेद के गुरुजी को यह मान्य नहीं था कि कोई लड़की या महिला वेद का अध्ययन करे, लिहाजा उनका संस्कृत का अध्ययन जारी नहीं रह पाया।

विश्पला और रुशमा जैसी योद्धा नारियों या अपाला और गार्गी जैसी मंत्र रचने वाली या वेदज्ञ स्त्रियों के देश में स्त्री को वेद पढ़ने का निषेध करने की स्थिति क्यों और कैसे आई – यह अलग से विचार का विषय है।

आजाद भारत में उदास मुसलमान : अनिल जैन

जिस समाज का एक बड़ा हिस्सा स्थायी तौर पर निराश और उदास हो,  वह कैसे एक सफल राष्ट्र हो सकता है?

लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखने वाले किसी भी स्वतंत्र देश की कामयाबी की तमाम कसौटियों में एक कसौटी यह भी है कि उस देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति कैसी है, वे किस हाल में जी रहे हैं, शासन-व्यवस्था और सरकारी सेवाओं में उनकी भागीदारी कितनी है, वे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का किस हद उपयोग कर पाते हैं और बहुसंख्यक समुदाय उनके साथ आम तौर पर कैसा सुलूक करता है। अपने देश की आजादी के 70वें वर्ष में प्रवेश करते वक्त हमारे लिए सोचने और चिंता करने की तमाम बातों में एक बात यह भी हो सकती है कि क्या इन सत्तर वर्षों में हम देश में ऐसा माहौल और ऐसी व्यवस्था कायम करने में कामयाब हो पाए हैं जिसमें देश का अल्पसंख्यक तबका भी अपने को वास्तविक अर्थों में आजाद मुल्क का बाशिंदा और बहुसंख्यकों के बराबर का नागरिक महसूस कर सके।

आखिर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और उसके बाद संविधान की मूल भावना तो यही थी कि देश का हर तबका चाहे वह किसी भी इलाके में रहता हो, चाहे जिस जाति का हो, चाहे जिस धर्म को मानता हो और चाहे जो भाषा-बोली बोलता हो, अमीर हो या गरीब हो, कारखानेदार हो या मजदूर हो, किसान हो या खेत मजदूर हो, शासन-व्यवस्था के स्तर पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा। महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में कहा था - 'मैं ऐसे स्वाधीन भारत के लिए प्रयत्न करूँगा जिसमें हर जाति-समुदाय के छोटे से छोटे व्यक्ति को भी यह एहसास हो कि यह देश उसका है, इसके निर्माण में उसकी भूमिका है और उसकी आवाज का यहाँ महत्व है। मैं ऐसे संविधान के लिए प्रयत्न करूँगा जिसमें धर्म, पंथ, जाति और अमीर-गरीब के बीच कोई भेद नहीं होगा और जहाँ स्त्री-पुरुष के बीच समानता होगी।’

हमारे संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत प्रभुतासंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य होगा। इसके अनुसार शासन का लक्ष्य है सभी समुदायों के नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, जातीय स्वतंत्रता के विचार, विश्वास, धार्मिक आस्था, पूजा-इबादत करने की स्वतंत्रता, अवसर और स्तर की समानता और भाईचारा, व्यक्तियों के सम्मान का भरोसा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता। इन सारे प्रावधानों के बावजूद हम पाते हैं कि समृध्दि के चंद छोटे टापुओं को छोड़ दें तो आम तौर पर भारतीय समाज गरीबी, भूख, बीमारी और दूसरी तमाम दुश्वारियों की कैद में जकड़ा हुआ है। दलितों-आदिवासियों की तरह ही अल्पसंख्यक समुदाय भी अभी तक समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाया है।

वैसे भारतीय मुसलमानों की मुख्य और मूल समस्याएँ कमोबेश वही हैं, जो समूचे भारतीय समाज की हैं। ये समस्याएँ हैं - आधी से अधिक आबादी की घोर गरीबी और निरक्षरता, व्यापक कुपोषणग्रस्तता (खासकर औरतों और बच्चों में), चिकित्सा सेवाओं का अभाव, स्वच्छ पेयजल और उचित ढंग के आवासों की कमी तथा बड़े पैमाने पर फैलती बेरोजगारी। कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं जिनका असर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है, जैसे बढ़ती हुई आबादी, विकास की विनाशकारी नीतियों के फलस्वरूप समाज में आर्थिक गैरबराबरी का बढ़ते जाना, शार्टकट से पैसा कमा कर रातोरात अमीर बनने की लालसा, राजनीति का तेजी से होता अपराधीकरण, सांप्रदायिक और अन्य तरह की हिंसा-प्रतिहिंसा का तांडव, सीमावर्ती प्रदेशों में अलगाव की लपटें, कानून के प्रति अवहेलना का भाव और गुंडागर्दी, राजनीतिक धाँधली, प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोटाले, उपभोक्तावाद और स्वार्थीपन, दूसरों की चिंता और लिहाज का लोप, सामूहिक चेतना और संकल्प का ह्रास आदि। ये वे विकट समस्याएँ हैं जो भारत में रहने और भारत को अपना देश मानने वाले प्रत्येक समुदाय को चुनौती दे रही हैं।

इन सारी समस्याओं के साथ भारतीय मुसलमानों की एक खास समस्या है - बहुसंख्यक तबके के मुकाबले उनकी दोयम दर्जे के नागरिक की हैसियत। उन्हें कदम-कदम पर यह जताना पड़ता है कि वे भी देशभक्त हैं। दरअसल, उनकी इस स्थिति के तार हमारे मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास से जुड़े हैं। भारत के मुसलमानों को भारत के बँटवारे का ही नहीं बल्कि अतीत में हुए कुछ अत्याचारी मुस्लिम शासकों के कुकर्मों का भी जिम्मेदार माना जाता है। सवाल है कि महमूद गजनी, मुहम्मद गौरी या अलाउद्दीन खिलजी ने सैकड़ों साल  पहले जो कुछ किया, उसकी  सजा आज के मुसलमानों को क्यों मिलनी चाहिए? वे कोई धर्म प्रचारक नहीं थे, शासक थे और शासक से भी ज्यादा हमलावर लुटेरे थे। जो उन्होंने किया, वही सब कुछ कई हिंदू राजाओं ने भी किया। 11वीं सदी में कश्मीर के शासक हर्षदेव ने भी अपने खजाने को भरने के लिए कई बार कश्मीर के मंदिरों को लूटा और अपवित्र किया। ईसा पूर्व सहस्त्राब्दी के मध्य में उत्तर भारत में मिहिरकुल और शशांक के शासन भी बौध्द विहारों के ध्वंस और भिक्षुओं के कत्लेआम के लिए जाने जाते हैं। कर्नाटक में दूसरी सहस्त्राब्दी से शुरू हो कर सोलहवीं सदी तक शैवों द्वारा बडे पैमाने पर जैन मंदिरों और प्रतिमाओं को ध्वस्त किया गया। कहने की जरूरत नहीं  कि ये सारे हिंदू और मुस्लिम शासक एक जैसे चरित्र और मानसिकता के थे और इनके दुष्कर्मों का मूल्यांकन इस संदर्भ में होना चाहिए कि मध्य युग में सारी दुनिया में क्या होता था।

दुर्भाग्य से ज्यादातर इतिहासकारों (जिन्हें बकवासकार कहना ज्यादा उचित होगा) ने भी प्रस्तावित किया है कि भारत के बँटवारे के लिए  मुसलमान ही जिम्मेदार हैं। जितना सच यह है कि पाकिस्तान का निर्माण मुहम्मद अली  जिन्ना की जिद के चलते हुआ, उतना ही सच यह भी है कि उन्हें इस जिद के लिए कांग्रेस के उस समय के शीर्ष नेताओं ने ही बाध्य किया था, अन्यथा बीस से तीस के दशक तक तो जिन्ना खुद भी व्दिराष्ट्रवाद की खिल्ली उड़ाते थे। उसी दौर में हिंदू राष्ट्र के स्वप्नदर्शी नेता व्दिराष्ट्रवाद के सिध्दांत की पैरवी कर रहे थे। लेकिन भारत के बहुसंख्य मुसलमानों ने जिन्ना को अपना नेता नहीं माना, इसलिए जिन्ना को अपनी कल्पना के काफी विपरीत कटा-छँटा पाकिस्तान ही स्वीकार करना पड़ा। तो भारत के जिस बँटवारे के लिए मुस्लिम लीग और जिन्ना की अदूरदर्शिता के साथ ही कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व की तंगदिली भी जिम्मेदार थी, उसके लिए भारत में रह रहे मुसलमानों को किस तर्क से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? बँटवारे के समय जिन्हें पाकिस्तान जाना था वे चले गए लेकिन जिन मुसलमानों ने स्वेच्छा से भारत में रहना स्वीकार कर अपने मुस्कबिल को भारत के साथ जोड़ा और उस समय के राष्ट्रीय नेतृत्व के इस आश्वासन पर यकीन किया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा जिसमें हर जाति-समुदाय को अपने धार्मिक-सामाजिक विश्वासों के अनुरूप जीवन जीने की आजादी होगी और उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा, उनके जीवन को क्यों मुश्किल में डाला जा रहा है? हिंदू समाज इसके लिए जितनी जल्दी पश्चात्ताप करे, देश के लिए उतना ही अच्छा है। 

दलितों और आदिवासियों को संसद और विधान मंडलों में उनकी आबादी  के अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है, लेकिन मुसलमानों के साथ ऐसा नहीं है। नतीजतन आजादी के बाद से ले कर अब तक लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं में कभी भी मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। मौजूदा लोक सभा को ही देखें तो 545 के सदन में मुसलमानों की संख्या 23 है, जबकि उनकी आबादी लगभग 17 करोड़ के अनुपात में उनके सदस्यों की संख्या लगभग 75 होनी चाहिए। यही हाल राज्य सभा, विधान सभाओं, विधान परिषदों, नगर निकायों, जिला परिषदों और पंचायतों का भी है। हर जगह मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार कम होता जा रहा है।

जब देश का बँटवारा हुआ तब मुसलमानों का जो संपन्न, मध्यवर्गीय और पढ़ा-लिखा तबका था उसका काफी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया। जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान न जा कर भारत में ही रहने का फैसला किया उनमें ज्यादातर वे ही  थे जो खेती, दस्तकारी और कारीगरी जैसे पारंपरिक उद्योग-धंधों से जुड़े थे या मेहनत-मजदूरी  कर जीवन-यापन कर रहे थे। बँटवारे के बाद सरकारों की ओर से भी ऐसे प्रयास नहीं किए गए जिससे  मुसलमानों में भी मध्य वर्ग विकसित होता या उनमें शिक्षा का स्तर सुधर सकता। मुसलमानों का मतलबी और दकियानूस  नेतृत्व वर्ग भी इस ओर से उदासीन रहा। उसने मुसलमान को हमेशा उर्दू, मस्जिद, शरीअत जैसे भावुक मसलों में उलझा कर रखा गया।

आज हालत यह है कि सभी स्तर की सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी नगण्य है। यही हाल सहकारिता और निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का भी है। मीडिया में तो हालत बेहद दयनीय है। मुसलमानों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन कर उसे सुधारने के उपाय सुझाने के लिए कई समितियों का गठन हुआ, पर उनकी सिफारिशों पर अमल होना अभी भी बाकी है। इसके बावजूद मुसलमानों को तुष्टीकरण के आरोप का यह दंश लगातार झेलना पड़ता है कि सरकार उन्हें जरूरत से ज्यादा रियायतें देती है और उनकी हर जायज-नाजायज माँगों के आगे झुक जाती है। जब वे अपने साथ होने वाले भेदभाव या ज्यादती को ले कर शिकायत करते हैं तो उन्हें यहउपदेश सुनने को मिलता रहता है कि वे यहाँ क्यों रह रहे हैं, पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते। उनकी आबादी को ले कर भी मनमाने आँकड़े पेश कर हिंदुओं में यह काल्पनिक भय भरा जाता है कि मुसलमान जल्द ही इस देश में बहुसंख्यक हो जाएँगे। कभी उन्हें लव जिहाद के नाम पर तो कभी गो-हत्या को ले कर लांछित और परेशान किया जाता है। और तो और, अब तो बढ़ते वैश्विक आतंकवाद के चलते उन्हें आतंकवादी कौम करार देने में भी गुरेज नहीं किया जाता।

कुल मिला कर भारत के मुसलमान अपनी तकलीफों और समस्याओं के दलदल में बुरी तरह फँसे हुए हैं। उनके प्रति दुराग्रह रखने वाली राजनीतिक जमात और उसके समर्थक यह समझना और मानना ही नहीं चाहते कि भारत के 17 करोड़ मुसलमान किसी अरब देश से आए हुए शरणार्थी नहीं हैं। उनकी जड़ें  इसी देश में हैं। उन्हें न तो अरब महासागर में धक्का दिया जा सकता है और न  ही वे इस देश को दारुल इस्लाम बना सकते हैं। यह देश उनका भी उतना ही है, जितना कि यहाँ रहने वाले दूसरे फिरकों का। इस देश की आजादी के लिए और उसकी हिफाजत के लिए उन्होंने भी कम कुर्बानियाँ नहीं दी हैं। आजाद भारत की मुकम्मिल कामयाबी की तमाम शर्तों में एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि देश में रहने वाले हर तबके की अस्मिता और संवेदनाओं की कद्र की जाए, ताकि किसी को एहसास न हो कि वह एक पराए मुल्क में रहा है।  आखिर जो तबका तमाम वंचनाओं के बावजूद अपनी नियति को इस देश से जोडे हुए है, उसकी स्वैच्छिक भागीदारी के बगैर क्या कोई गणतंत्र मजबूत और कामयाब हो सकता है? जिस समाज का एक बड़ा हिस्सा स्थायी तौर पर निराश और उदास हो,  वह कैसे एक सफल राष्ट्र हो सकता है?