दिमागों पर पाबंदियां : अमोल पालेकर

सेंसरशिप की समस्याओं पर अमोल पालेकर
अमोल पालेकर


अगस्त 29, 1970 : महाराष्ट्र थिएट्रिकल परफार्मेंस एक्जामिनेशन बोर्ड ने विजय तेंडुलकर के नाटक ‘गिद्ध’ पर यह कह कर प्रतिबंध लगा दिया कि इसमें विकृत सामाजिक-पारिवारिक जटिलताओँ का जो यथार्थवादी चित्रण किया गया है वह सार्वजनिक प्रस्तुति के लायक नहीं है। इस नाटक के निर्माता सत्यदेव दुबे और निर्देशक श्रीराम लागू के नेतृत्व में चले एक लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप नाटक को कुछ एक नाम मात्र की कांट-छांट के बाद प्रस्तुति की अनुमति दे दी गई। प्रदर्शन की अनुमति के बाद नाटक के मंचन की शुरुआत तीक्ष्ण उपहासात्मक टिप्पणी वाली, इस भावहीन उद्घोषणा के साथ होती है कि ‘सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के अनुपालन हेतु, उस खास महिला पात्र की साड़ी के पिछले भाग के लाल रंग को इसके बाद काला कर दिया जाएगा, जो रंगमंच छोड़ कर दर्शकों की ओर वापस आती है।‘ नाटक हंसी के ठहाकों और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ शुरू हुआ। मराठी नाटक के विकास में यह एक ऐतिहासिक क्षण था।

अगस्त 19, 1974 :  महाराष्ट्र सरकार ने इलकुंचवार की एक प्रस्तुति वासनाकन्द (कामुकता की आग) पर प्रतिबंध लगा दिया। इस नाटक का निर्देशन मैंने किया था। प्रतिबंध हटाने के लिए मैने बम्बई उच्च न्यायालय में अपील दायर की। महाराष्ट्र थिएट्रिकल परफार्मेंसेज एक्जामिनेशन बोर्ड ने नाटक पर यह आरोप लगाया था कि ‘इस नाटक में एक भाई और बहन के बीच दिखाया गया कौटुंबिक व्यभिचार अनैतिक है, जिसके चलते इस बात की आशंका है कि दर्शक नाराज हो जाएं और हो सकता है कि तोड़-फोड़ पर उतर आएं, जिसके चलते कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाए।’ अदालत ने सरकार    (अभियोक्ता) को कड़े शब्दों में दो टूक आदेश देते हुए कहा कि ‘यदि ऐसे हालात सामने आते हैं तो सरकार की यह प्रशासकीय जिम्मेदारी बनती है कि वह अराजक तत्वों को नियंत्रित करे और यह सुनिश्चित करे कि बिना किसी बाधा के कलाकार अपनी प्रस्तुति पूरी कर सकें। कलाकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है।’ शाम पांच बजे मुझे यह आदेश मिला। यह वह समय था, जब उच्च न्यायालय से रवीन्द्र भवन, प्रभादेवी (नाट्य स्थल) का रास्ता अत्यन्त व्यस्त होता है। इस रास्ते से हो कर मैं स्टेज पर सांय 7 बजे पहुंचा था।

अगस्त 30, 1996 : द सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी, जिसे केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है) ने मेरी फिल्म ‘दायरा’ के एक दृश्य पर आपत्ति की,  कुछ कथित अश्लील संवादों और वाक्यांशों को हटाने को कहा। इस फिल्म की कथा एक ऐसे आदमी और एक ऐसी  औरत के बीच की है जिसमें पुरुष कई साल तक लोक नाटकों में स्त्री की भूमिका निभाने के चलते ट्रांसवेस्टाइटिट हो गया था (स्त्री की वेशभूषा में रहने लगा था) और स्त्री अपने को यौन आक्रान्ताओं से बचाने के लिए पुरुष का वेश धारण करने को बाध्य हो गई थी। सेंसर बोर्ड के कर्मठ सदस्यों ने एक दृश्य पर आपत्ति की, जिसमें एक मैड़म अपने दो वफादार सेवकों के साथ एक लड़की का अपहरण कर सेक्स रैकेट चलाती है। मैंने शिद्दत से संघर्ष किया। सब से पहले मैं वयस्क फिल्म का प्रमाणपत्र पाना चाहता था। आखिरकार किसी दृश्य को हटाए बिना और कुछ संवादों में मामूली परिवर्तनों के साथ प्रदर्शित हुई और इसने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तथा फ्रांस का ग्रां प्री पुरस्कार जीता।

2006 :  मेरी मराठी और अंग्रेजी की  द्विभाषी फिल्म थांग/ क्वेस्ट के केन्द्र में एक ऐसा पुरुष नायक था, जिसकी समलिंगी कामुकता का दमन किया गया था और और उसकी शादी विपरीत लिंगी से हुई थी। यह एक ऐसी फिल्म थी, जो दर्शकों से आत्मनिरीक्षण की मांग करती थी। उसके अंग्रेजी संस्करण को वयस्क फिल्म का प्रमाणपत्र मिला। कुछ ही क्षणों में एक हैरान और निराश कर देने वाला निर्णय उसी सीबीएफसी ने दिया, जिसने अंग्रेजी संस्करण को वयस्क फिल्म का प्रमाणपत्र दिया था। वह निर्णय यह था कि फिल्म के मराठी संस्करण पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, हालांकि समिति के सदस्यों में इस बात को ले कर मतभेद था। यह चीज निश्चित तौर पर मेरे लिए अस्वीकार्य नहीं थी। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन समिति के नैतिकाता-वाहिनी सदस्यों से बहस के दौरान मैंने सदस्यों का ध्यान फिल्म ‘ब्रोकबैक माउंटेन’ की ओर दिलाया, जो समलिंगी कामुकता पर आधारित हालीबुड की एक महत्वपूर्ण फिल्म है, जिसे कुछ ही दिन पहले प्रदर्शन की मंजूरी मिली थी। मैंने पूछा कि क्या मराठी दर्शक अंग्रेजी भाषी दर्शकों से कम परिपक्व और सहिष्णु हैं कि उन पर मेरी फिल्म का बुरा प्रभाव पडेगा। उनका प्रतियुत्तर था  कि ‘इन चीजों की विदेशी फिल्मों में इजाजत दी जा सकती है लेकिन ये चीजें हमारी मराठी संस्कृति के लायक नहीं हैं।’ फिर तब मैंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि महान मराठी साहित्यकारों  एस एन पेंडसे, सी टी कानोलकर और पुण्डलिक ने समलिंगी कामुकता को अपने कथा साहित्य का विषय बनाया है और उनका आशय जोरदार और स्पष्ट था। इस सब तर्कों के बावजूद समिति के सदस्य तभी पीछे हटे, जब मेरी पत्नी और लेखक तथा फिल्म की सहायक निर्देशक ने एक वकील के तौर पर यह मांग की कि ‘समिति के सदस्य अपनी आपत्तियों को लिखित रुप में दर्ज करें ताकि अदालत में संघर्ष शुरू किया जा सके।’ लिखित रूप में बिना कुछ दिए, फिल्म के दोनों संस्करणों को ‘वयस्क’  फिल्म के प्रमाणपत्र के साथ प्रदर्शन की अनुमति दे दी गई।

2010 : जब मैंने विवेक बेले के नाटक ‘मारुति और शैम्पेन’ की स्क्रिप्ट पढ़ी तो, एक शानदार नाटक की प्रत्याशा से मैं उत्तेजित हो गया था। बहुत जल्दी ही मेरी सारी उम्मीदें निराशा के गर्त में चली गई, जब मुझे पती चला कि मारुती का जिक्र ‘एक समुदाय विशेष की भावनाओँ को चोट पहुचाता है’ और  इसकी कटु आलोचना हुई। उस नाटक के प्रोडक्शन हाउस के एक मुखिया के नाते, मैं मोहन आगाशे के पास पहुंचा और इस तरह की गैर-कानूनी सेंसरशीप के खिलाफ संघर्ष करने में उनका साथ देने को कहा। लेकिन भीड़ के सामने समर्पण कर देने की उनकी कमजोरी उस समय स्पष्ट हो गई, जब मैंने बताया  कि नाटक का नामकरण  ‘बन्दर के हाथ में शैम्पेन’ कर दिया गया है। मैं इससे निराश हो गया था, क्योंकि इस तरह से पीछे हटना भीड़तंत्र को बढ़ावा देता है। इसके अलावा निराशा का एक कारण यह भी था कि वे विजय तेंडुलकर के उस नाटक में अभिनेता थे, जिसे इसी तरह की धमकी दी गई थी, लेकिन उस समय सफलतापूर्वक अदालत में संघर्ष किया गया था।

जनवरी 2012 : पुणे के सिम्बोसिस विश्वविद्यालय ने संजय काक की लघु फिल्म  ‘जश्ने आजादी’ के एक निजी प्रदर्शन की घोषणा की। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने फिल्म के प्रदर्शन को रद्द करने की मांग की, क्योंकि उनके अनुसार यह संभव था कि फिल्म स्थानीय लोगों की भावनाओँ को चोट पहुंचाए। सहज ही यह प्रश्न उठता था कि  ‘जिन लोगों ने इस प्रकार की आपत्तियां उठाईं, उन्होंने क्या यह फिल्म देखी है? या क्या वे किसी निश्चित आपत्तिजनक चीज के बारे में बता सकते हैं?’ फिल्म के प्रदर्शन को रद्द कर दिया गया। रीढ़विहीन तरीके से प्रदर्शन को रद्द करने से पहले कार्यकारी निदेशकों को थोड़ा  रुक कर यह सोचना चाहिए था कि उनके इस कार्य का छात्रों के लिए क्या संदेश जाएगा।

जून 14, 2016 : सीबीएफसी ने ‘उड़ता पंजाब’ पर चौंका देने वाली 89 आपत्तियां कीं, लेकिन इन्हें लिखित देने से इंकार कर दिया। इस खलबली की जड़ यह थी कि फिल्म पंजाब सरकार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है।

राज्य सभा के एक मनोनीत सदस्य के रूप में राज्य सभा को संबोधित करls हुए नरगिस दत्त ने सत्यजीत राय और उनके न्यू बेब सिनेमा के समकालीन व्यक्तियों के नजरिए से भारत की गरीबी के बदतर चित्रण पर आक्रोश प्रकट किया। इस चीज को उन्होंने राष्ट्रीय गौरव के अनादर के रूप में देखा। वह व्यक्तित्व, जिसने ‘मदर इंडिया’ शीर्षक को अमर बना दिया, कैसे मानसिक जड़ता के इस स्तर तक चला गया? लगभग उन्हीं दिनों, उस वक्त के सांस्कृतिक तानाशाह मंत्री वसंत साठे ने मेरी फिल्म ‘आक्रीत’  के अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया। वरिष्ठ कलाकारों, जिनमें शम्भू मित्रा, पी एल देशपाण्डे और दुर्गा भागवत शामिल थे, ने इस अविवेकी फतवे पर फटकार लगाते हुए प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी को संबोधित एक संयुक्त पत्र लिखा। प्रतिबंध जल्दी ही हटा लिया गया। वसंत साठे ने इसी प्रकार का प्रतिबंध 1980 में ‘घासीराम कोतवाल’  की विदेशी प्रस्तुतियों पर लगा दिया था। उस बार भी इन्दिरा गांधी ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर उनके निर्णय को खारिज कर दिया।

कलाकार लंबे समय से अक्सर असहिष्णु भीड़ की हिंसात्मक कार्यवाहियों का शिकार रहे हैं। बलबीर कृशन को दिल्ली में हिसात्मक हमला का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनकी कला में उनकी समलिंगी कामुकता की गूंज सुनाई देती है; एफ एम हुसैन को अपने जीवन की संध्या में हत्या की धमकियों के बाद देश निकाला में रहना पड़ा; तस्लीमा नसरीन अभी तक भारत में स्थायी शरण पाने में असमर्थ हैं;  सलमान रुश्दी को जयपुर साहित्य समारोह में बोलने की अनुमति को अंतिम क्षणों में वापस ले लिया गया था; मुंबई विश्वविद्यालय ने रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास ‘सच ए लांग जर्नी’ को अपने पाठ्यक्रम से वापस ले लिया;  पुणे के लाल महल की महत्वपूर्ण जगह से रातो-रात दादोजी कोंडदेव की प्रतिमा को बिना किसी को कानो- कान खबर लगे हटा दिया गया; जोसेफ लेलिवेल्ड की किताब ‘ग्रेट सोल:  महात्मा गांधी एण्ड हिज स्ट्रगल विथ इंडिया’ के खिलाफ तत्काल गुजरात और केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया। बुद्धिजीवी विरोधी उपद्रवी गुंडों की भीड़ के सामने बुरी तरह से साष्टांग दंडवत करने का हमारा एक लंबा शर्मनाक इतिहास रहा है।  एक बार तो मैंने यह सब देख कर अत्यधिक उत्तेजित महसूस किया, इसके बावजूद कि इसके उदाहरण पांच दशकों तक फैले हुए हैं कि कुछ ज्यादा नहीं बदला है।

राजनीति पर अपने महाकाव्योचित प्रबंध के बाईसवें अध्याय में निकोलो मैकियावेली रेखांकित करता है कि तीन तरह की बुद्धिमत्ता होती है – ‘पहले प्रकार की बुद्धिमत्ता वह होती है जो चीजों को स्वयं समझ लेती है, दूसरे प्रकार की वह होती है जो दूसरों की समझने को समझ सकती  है और तीसरे प्रकार की बुद्धिमत्ता वह होती है जो न तो स्वंय समझती है न तो किसी दूसरे से समझती है।’  वह आगे कहता है कि ‘पहले प्रकार की उत्कृष्ट है, दूसरे प्रकार की अच्छी और तीसरे प्रकार की व्यर्थ।’ यह चिन्तित कर देने वाली बात है कि अन्तिम प्रकार की बुद्धिमत्ता  वाले लोगों की हमारे समाज में सर्वत्र प्रचुरता है। कैथरिन मेयो अमेरिकी इतिहासकार थीं, उनकी विवादग्रस्त कृति ‘मदर इंडिया’ की कटु निंदा हुई, यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी इसकी कटु आलोचना की।  तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि ‘यह एक ड्रेन इंस्पेक्टर की रिपोर्ट है जो सिर्फ देश की गंदी नालियों को खोलने और उनका परीक्षण करने के एकमात्र उद्देश्य से तैयार की गई है और प्रेषित की गई है।’ फिर गांधी जी के खुले दिमाग का प्रमाण बाद के वर्षों में उस समय सामने आया, जब उन्होंने सभी भारतीयों से इस किताब को पढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ‘इस किताब को केवल इस बात को समझने के लिए पढ़ा जाना चाहिए कि हमारे औपनिवेशिक मालिक हमारे देश पर अपने कब्जे को जायज ठहराने के लिए किस तरह के तर्कों की बौछार करते हैं।’ हमारे देश के लिए बहुत ही शर्म की बात है कि महात्मा के वचनों को भुला दिया गया और स्वतन्त्रता के सात दशकों के बाद भी इस किताब पर भारत में प्रतिबंध जारी है।

मैं सेंसरशीप की मानसिकता और तरीकों की मुखालफत की अनथक पैरोकारी करने वाला व्यक्ति हूं और ऐसा ही बना रहूंगा। प्रतिबंध और सेंसरशीप सोच की विविधता और असहमति की आवाजों को खारिज करने की घिनौनी अभिव्यक्तियां हैं। असहमति के प्रति आक्रोश और असहिष्णुता, बौद्धिकता विरोधी निरंकुशता के घातक रूपों की रचना करते हैं। यह डराने-धमकाने वाले एक अल्पमत समूह द्वारा विशाल उदासीन बहुमत पर अपनी कट्टरता और  मानसिक संकार्णता को थोपना है। यह दबाव राज्य अपनी मशीनरी के माध्यम से या अन्य दूसरे तरीकों से करता है। कलात्मक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाना अन्ततोगतत्वा सभी अभिव्यक्तियों पर डरावना प्रभाव डालता है। यहां तक कि सब से निरापद किस्म के उदाहरणों पर भी यह बात लागू होती है। अभिव्यक्तियों को प्रतिबंधित करने के कुछ  विशेष तरीके इसे प्रकार हैं :

  • सेंसरशीप राष्ट्र की संप्रभुता और एकता की रक्षा के एक उपकरण  के रूप में लगाई जाती है। अपने साम्राज्यिक अंहकार के उच्चतम स्तर पर भी ब्रिटिश साम्राज्य को उसकी संप्रभुता को खुल्लमखुल्ला चुनौतियों को प्रतिबंधित करने की कोई जरूरत महसूस नहीं हुई। उस समय की सभी सृजनात्मक विधाओं के बारे में यह बात सत्य है। औपनिवेशिक लूट-खसोट की एक रूपक कथा मराठी नाटक ‘कीचक बध’और  गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिंदुस्तान हमारा है’ को देशद्रोह के आधार पर प्रतिबंधित करने की कोई कोशिश नहीं की गई थी। विभिन्न समूहों के बीच उत्तेजना फैला कर विद्वेष पैदा करने या एक विशेष समूह/ समुदाय/धर्म की संवेदना को गंभीर तरीके से चोट पहुंचाने की संभावना प्रतिबंध के अन्य हथियार हैं। इस मामले में किसी को भी ‘वासनाकन्द’ मामले में मुम्बई उच्च न्यायालय के सुस्पष्ट निर्णय के अलावा किसी और चीज को देखने की जरूरत नहीं है। इस निर्णय में न्यायालय ने अत्यन्त कठोर शब्दों में उपर्युक्त प्रकार के प्रतिबंध के आधारों का खण्डन किया था।
  • सामाजिक विमर्श में कला के बारे में एक विकृत विमर्श चल पडा है। यह इन धूर्ततापूर्ण पंक्तियों के साथ चलता है : ‘सृजनात्मक कलाएं मनबहलाव और मनोरंजन के लिए हैं। समाज की बुराइयों और अन्यायों के विषय में नाक घुसेड़ने की इन्हें कोई जरूरत नहीं है। यह सब दाग और धब्बे हैं।’ अभिव्यक्तियों का इतिहास इस अवधारणा के खोखलेपन और झूठ को प्रकट करता है।  युगों- युगों से कलाकारों ने अपने समकालीन सन्दर्भों को अभिव्यक्ति दी है, उनका उपहास उड़ाया है  और उन पर व्यंग्य किया है। ‘उड़ता पंजाब’ के विवाद ने अचानक इस विमर्श को अकादमिक बहस के भीतरी दायरे से बाहर निकाल कर जनता के सार्वजनिक विमर्श की अदालत में ला खड़ा किया। यह मांग अनौचित्यपूर्ण नहीं है कि वर्तमान सीबीएफसी  को पुनर्गठित करने की आवश्कता है, हलांकि सेंसरशीप की पूरी संरचना पर नए सिरे से कार्य करने की आवश्कता है, कानूनी विधान की जरूरत है। सिनेमेटोग्राफी एक्ट, 1952 को रद्द करने की आवश्कता पड़ेगी। एक नया कानूनी प्रस्ताव तैयार कर संसद में उसे पास करके पुराने कानून को बदल देना चाहिए। कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि पूरी संरचना में इस प्रकार के एक क्रान्तिकारी बदलाव को, एक ऐसी व्यवस्था आसानी से कैसे स्वीकार कर सकती है, जो हम क्या खाएंगे या क्या पिएंगे, या हम क्या कह सकते हैं या देख सकते हैं, इस पर अपनी इच्छा थोपना चाहती हो। कुछ और बुनियादी मुद्दे हैं जो सेंसरशिप की संरचना को रेखांकित करते हैं। सिनेमेटोग्राफी एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने की जरूरत है। जब तक मजबूती के साथ इस चुनौती को पेश किया जाता है तब तक हमारे दिमागों और नैतिकताओं के कुछ एक स्वंयभू अभिभावक अपनी भोंडी कैंचियों से अपने विवेकहीन कर्तव्यों को पूरा करने में लगे रहेंगे। यह वास्तविक हकीकत की बात है कि यह कानून भेदभावकारी है और संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा  अधिपत्रित कानून के समक्ष समानता का उल्लंघन है। तर्क की कानूनी दिशा क्या कुछ ऐसी  हो सकती है?
  • यदि साहित्य, नाटक ( महाराष्ट्र एक अपवाद के रूप में ) नृत्य और सृजनात्मक अभिव्यक्ति के दूसरे रूप सेंसरशिप का विषय नहीं हैं; यदि भाषण, लिखित और मौखिक, यह महत्व नहीं रखते कि वे कितने आपत्तिजनक हैं, इनके लिए न तो किसी पूर्व जांच की जरूरत होती है, न तो किसी प्रकार के सेंसरशिप की; किसी भी प्रकार के टेलीविजन कार्यक्रम, समाचार, समकालीन घटनाक्रम, मनोरंजन या जो कुछ भी सेंसरशिप से आजाद हैं (जिस हद तक ये सिनेमेटिक अंतर्वस्तु रखते हैं उसे छोड़ कर) तब केवल सिनेमेटिक कलाओं को नियंत्रित करने के लिए सेंसरशीप का बोझ डालने का ठीक-ठीक कानूनी औचित्य क्या है? सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के विविध रूपों के बीच इस तरीके से भेदभाव अनुचित और असमर्थनीय है, यह चीज कानून के समक्ष समानता की संवैधानिक गारंटी की कसौटी के खिलाफ है। इसके पीछे का तर्क क्या है और इस प्रकार के भेदभाव का उद्देश्य क्या है?
  • वर्तमान हालात में इस भेदभावकारी नियंत्रण को हमारे उपर थोपने के केवल दो ही वैकल्पिक उपाय हैं : या तो सिनेमेटिक सेंसरशिप की घृणित संरचना को विघटित कर दें या हम सृजनात्मक अभिव्यक्ति के सभी रूपों को सेंसरशिप के दायरे में ले आएं। साफ है कि बाद वाला उपाय भारत के लोकतान्त्रिक प्रगतिशील राजनीति में विश्वास करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यधिक घृणास्पद विकल्प होना चाहिए। एक प्रबुद्ध, सांस्कृतिक तौर पर जागरूक, साहित्यिक और सुरुचिपूर्ण तौर पर विकसित नागरिक समाज को कट्टर  बनाने वाली और सोचने पर नियंत्रण लगाने वाली अनुदार शक्तियों के खिलाफ एक समझौताहीन मुद्रा जरूर अख्तियार करनी चाहिए। हम सभी लोगों को इस प्रकार के ध्येयों के लिए एकजुट होने की जरूरत है। एकजुट हुए बिना यह संघर्ष यदि केवल अलग-अलग व्यक्तियों का एक अकेला संघर्ष बना रहता है तो व्यवस्था को कोई खरोच भी नहीं पड़ेगी।

संध्या गोखले इसका खुलासा अच्छी तरह करती हैं :
 
‘कोई भी राष्ट्र-राज्य विचार या अभिव्यक्ति की बेलगाम और असीम स्वतन्त्रता को स्वीकार नहीं करता। एक व्यक्ति की स्वतन्त्रता का केवल उतना ही अस्तित्व है जितना वह अपने साथी नागरिक की स्वतन्त्रता के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखता है। दूसरे शब्दों में, एक व्यक्ति की स्वतन्त्रता में यह नहीं शामिल है कि वह दूसरों के अधिकारों को कुचले। सभी स्वतन्त्रताएं विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों के भीतर सीमित होती हैं। जैसे ही सोचने की तर्क पद्धति की इस दिशा को स्वीकार करना शुरू करते हैं, हमें एक बेचैनी का अनुभव होने लगता है क्योंकि स्वतन्त्रता के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और बुनियादी कुछ हाथ से छूटने लगता है। यह वह जगह है जहां व्यक्ति या समूह की खास तरह की विवशता के आकारहीन क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। नैतिकताओं, मूल्यों, सम्मान, परस्परता की कमी या अनुपस्थिति में य़ह आसान होता है कि व्यक्तिपरकता के भ्रमजाल में फंस जाएं। संभवतः ठीक इसी प्रकार  ‘हारून एण्ड द सी ऑफ स्टोरीज’  के अपने एक संसार के आगोश में सलमान रुश्दी हमें ले गए थे। चुप का राज्य एक दमनकारी चुप्पी का राज है जहां कभी सूरज नहीं उगता है। उसके बिलकुल सटे उत्तेजक बहसों वाला गुप का राज्य है जहां हमेशा चमकता सूरज निकलता रहता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम चुप या गुप में से किसका नागरिक होना चाहते हैं। स्वतन्त्रता और अधिकार मानवीय कला से जुड़ी सच्चाइयां हैं। क्या वे संरक्षण के लायक हैं? क्या हमें उन्हें बचाने का प्रयास करना चाहिए और किस हद तक करना चाहिए तथा किस कीमत पर करना चाहिए?

‘हमें इसका सामना करने और इसका उत्तर देने की कोशिश करना है। असहिष्णु और बात-बात पर उग्र हो जाने वाली भीड़तंत्रीय गुंड़ावाहिनी की तरफ  नपुंसक तरीके से उंगुली उठाने का परिणाम, अन्त में केवल सभी स्वतंत्रताओं को खो देना होगा और अपनी उदासीनता के चलते हम स्वयं इन अंधकारमय परिणामों को भुगतेंगे। सख्त तरीके से सीमित की जाने वाली स्वतंत्रताओँ को हम कुछ नैतिकताओं के नाम पर हम अपने को संतुष्ट कर लेते हैं, जिन्हें समय-समय पर व्यवस्था हमारे ऊपर उछालती रहती है।

‘जो अतीत को नियंत्रित करता है वही भविष्य को नियंत्रित करता है, जो वर्तमान को नियंत्रित करता है वही अतीत को नियंत्रित करता है।’ -  जॉर्ज ऑरवेल की ऐतिहासिक कृति ‘1984’ की इन अविस्मरणीय पंक्तियों को कौन भूल सकता है? यदि हम चाहते हैं कि सूरज प्रतिदिन उगे, जैसा गुप के राज्य में उगता है,तो यह तय करने का समय आ गया है और इसमें कोई अगर-मगर नहीं है।