बाबा और व्यापार : अतुल कुमार

अतुल कुमार
पिछले दिनों मथुरा के जबाहरबाग में स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह के कथित सत्याग्रहियों और पुलिस के बीच हुई भिड़ंत में दो दर्जन से अधिक लोग मारे गए और एक एएसपी व इंस्पेक्टर की मौत हो गई। य् स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह के अनुयायी पहले जय गुरुदेव के अनुयायी थे। इनका नेता रामवृक्ष यादव ने सरकार बगीचे को कब्जा किया और कई तरह के कानून विरोधी काम किया करता था। अंत में पुलिस कार्रवाई में 27 अन्य लोगों के साथ वह मारा गया। यह घटना देश में चल रहे धर्म के नाम पर पाखंड की घटनाओं में से मात्र एक है। इस तरह के कितने पाखंड देश में चल रहे हैं और वह भी धर्म के नाम पर, इसका आकलन आसान नहीं है।

धर्म मनुष्य की मानसिक और आध्यात्मिक जरूरत है। धर्म का उपयोग व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आध्यात्मिक जरूरतों की पूर्ति करना रहा है। धर्म ने ही मानव को सुपथ पर चलने की सीख दी और उसके कर्मों को नैतिकता से जोड़ा। यूरोप में गहरी आस्था और आध्यात्मिकता के जोड़ ने मनुष्य को बढ़ने में मदद की, उसके कार्य व्यापारों को संतुलित किया। भारत में भी धर्म का यह रूप अधिक गहरा रहा है। इसका दूसरा पक्ष भी रहा। धर्म की आड़ में जनता को भुलाना जितना आसान है उतना और किसी तरकीब में नहीं। इसे दुनिया के हर समुदाय में और हर समय में देखा जा सकता है। भारत जैसे धर्मभीरु देश में यह तरकीब काफी कारगर साबित होती रही है।     इसका फायदा उठा कर बहुत-से चतुर लोग बाबा के वेश में अपने कार्य व्यापार को चमकाते रहे हैं। धर्म के नाम पर व्यापार करना अपने आप में एक अनैतिक कृत्य माना जाता है। उस कोढ़ में खाज यह भी है कि इस चोले की आड़ में देह व्यापार और यौन अपराध तक किए जा रहे हैं। लेकिन यह इसकी स्याह वास्तविकता भी रही है। तुलसीदास के शब्दों में कलियुग में ‘पंडित सोई जो गाल बजावा’ या ‘जाके नख शिख जटा विसाला, सोई तापस प्रसिद्ध कलिकाला’ और ‘नारी मुई गृह संपत्ति नासी, मुड़ मुड़ाए भए संन्यासी’ से भी कई कदम आगे बढ़ कर यौन कुंठाओं की तृप्ति और यौन अपराधों में लिप्तता को छुपाने के लिए भी संन्यासी का चोला धारण करनेवालों की जमात बहुत बड़ी हो चुकी है।

वैसे देखा जाए तो दुनिया भर में बाबा संस्कृति का पनपना कोई नई परिघटना नहीं है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों और विभिन्न धर्मों में धर्म का उपयोग अपनी निजी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए किया जाता रहा है। लेकिन इस दिशा में मोटे तौर पर कम से कम दो मानस रहे हैं। यूरोप समेत पश्चिम की धारा और भारतीय उपमहाद्वीप की धारा। इनमें मौलिक अंतर रहा है। इस अंतर में हम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को देख सकते हैं। पश्चिम के धार्मिक संगठनों में संगठन की प्रमुखता रही और चर्च ने पूरे यूरोप की ईसाइयत को एक समय में निर्देशित व नियंत्रित करने का काम किया। धर्म के इस संगठित रूप में आध्यात्मिकता का अभाव रहा है या यों कहें कि धीरे-धीरे संगठन के प्रबल होने से यह क्षीण होती गई। इसका परिणाम यह हुआ कि पश्चिम के अध्यात्म खोज रहे लोगों  में भारत और खासकर सनातन-बौद्ध धर्मों के प्रति झुकाव बढ़ा। वे अपनी आध्यामिक भूख मिटाने के लिए पूरब की ओर चले आते रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय धर्मों में आडम्बर और कर्मकांड बढ़ने से इसकी दिशा भी दुनिया की ओर हुई। बहुत-से ऐसे संत आधुनिक काल में भी पश्चिम में गए। हालांकि उनका मौलिक उद्देश्य यहां की अति आध्यात्मिकता और निवृत्तिमूलक स्वभाव के कारण वहां शुद्ध रूप से सांसारिक बन कर गया। ये संत-महात्मा वहां अपना धार्मिक- आध्यात्मिक प्रभाव कायम करने और इसका व्यापार करने लगे।

वस्तुत: इन धार्मिक क्रियाकलापों के दो पक्ष रहे हैं। पहला, आध्यात्मिक-धार्मिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार और दूसरा, बाबा की वेषभूषा में अपराधों और अवैध गतिविधियों के लिए जगह की तलाश ताकि अभय होकर अपने नापाक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विचरण किया जा सके। इसमें पहले पक्ष के सबसे प्रखर उदाहरण के तौर पर स्वामी विवेकानंद को रखा जा सकता है, जिन्होंने आज से करीब सवा सौ साल पहले अमेरिका में हिन्दू धर्म और आध्यात्म का झंडा फहराया था। लेकिन यह तो अतीत की बात हो गई। कम से कम भारत में इसका व्यापारिक पक्ष ही हावी है। इसके चलते समाज में अहम सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्या खड़ी हो गई है।

इस दूसरे पक्ष का प्रतिनिधित्व करनेवाले बाबओं की समाज में बहुतायत है। इन बाबाओं के कर्मों और अध्यवसायों का वर्गीकरण कर उनका प्रतिनिधित्व कर रहे बाबाओं का लेखा-जोखा रखा जाए तो मुख्य तौर पर चार प्रकार की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। पहला, योग और आध्यात्म की आड़ में अपना व्यवसाय बढ़ाना और आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर सत्ता और समाज में दखलअंदाजी। बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर इसके प्रमुख प्रतिनिधियों में माने जा सकते हैं।

दूसरा, धर्म और आध्यात्मिकता की आड़ में जमीन हड़पने और यौन व्यभिचार का खेल। आसाराम इच्छाधारी बाबा इसके प्रतीक हैं। जातीय व सामाजिक विषमता को भुना कर अपनी स्थिति मजबूत करना और अवैध गतिविधियों में लिप्त होना तीसरी तरह का वर्ग है जिसमें बाबा रामपाल, निरंकारी बाबा हरदेव आदि को रखा जा सकता है। चौथी श्रेणी में चंद्रास्वामी  जैसे बाबा आ सकते हैं जिनका नाम हथियारों की खरीद-फरोख्त में ऊंचे राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल कर संपत्ति अर्जित करना रहा है। पांचवी श्रेणी में शुद्ध रूप से राजनीति में दखल देनेवाले धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जैसे बाबाओं को लिया जाना चाहिए। विदेशों खासकर पश्चिमी देशों में अपने आध्यात्मिक रूप को भुना कर अपना साम्राज्य कायम करने की कोशिश करनेवालों में ओशो, महेश योगी आदि को रखा जा सकता है।

हम यहां कुछ गिने-चुने उन बाबाओं का लेखा-जोखा रख रहे हैं जो बदनामी और व्यापार की दुनिया में काफी शोहरत पा चुके हैं।

व्यापार की दुनिया में अभी सबसे बड़ा नाम संन्यासी बाबा रामदेव का है। महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के सहारे अपना पूरा व्यवसाय खड़ा कर लेने में जो महारत बाबा रामदेव ने हासिल कर ली है, वह सफलता अब तक किसी अन्य संतों को नहीं मिल पाई। हाल के एक सर्वेक्षण में उन्हें व्यापार क्षेत्र की शीर्ष हस्तियों में गिना गया है। योगगुरु का पतंजलि आयुर्वेद का आटा नेस्ले और यूनीलीवर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनौती दे रही हैं वहीं दवाओं का उनका कारोबार भी योग के आधार पर ही फल-फूल रहा है। वैसे इन धर्म पुरोहितों के लिए भारत में व्यापार करने का सबसे आसान और सटीक साधन योग बना हुआ है। तमाम भारतीय गुरु योग को धंधा बनाते रहे हैं। इस योग की आड़ में दवाओं के विशाल कारोबार का अवसर मिल जाता है। हाल में योग को कारोबार के उच्चतर स्तर तक पहुंचाने में बाबा रामदेव नाम सफलता से लिया जा सकता है। हजारों की फीस ले कर योगासन कराने से ले कर अपनी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद के माध्यम से स्वास्थ्यवर्धक दवाओं के साथ ही खान-पान की समस्त वस्तुओं के उत्पादन और विपणन में बाबा ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मात दे दी है। इस काम में जाहिर है योग और धर्म से उन्हें काफी मदद मिली है।

बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद ने चालू वित्त वर्ष के दौरान अपना कारोबार दोगुने से भी अधिक बढ़ा कर 10,000 करोड़ रुपए के पार पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। कंपनी ने वर्ष के दौरान छह प्रसंस्करण इकाइयों पर 1,150 करोड़ रुपए निवेश की भी योजना बनाई है। रामदेव ने कहा, हम देश के विभिन्न हिस्सों में पांच-छह प्रसंस्करण इकाइयां लगाएंगे जिसमें 1,000 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा। इसके अलावा शोध एवं विकास पर 150 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। हम चालू वित्त वर्ष के दौरान अपना कारोबार दोगुना कर 10,000 करोड़ रुपए पर पहुंचाएंगे। ये इकाइयां असम, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में स्थापित की जाएंगी। इसके लिए कंपनी ने पहल भी कर दी है। हाल में ही बाबा रामदेव ने बुंदेलखंड में अपनी इकाई लगाने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बातचीत की है।

पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण ने कहा, हम ये इकाइयां सूखा प्रभावित इलाकों महाराष्ट्र के विदर्भ, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में लगाएंगे। इनमें से कम से कम चार इकाइयां इस वित्त वर्ष के अंत तक चालू हो जाएंगी। पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के 2015-16 के कामकाज का ब्योरा देते हुए उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2016 को समाप्त वित्त वर्ष के दौरान कंपनी ने 150 प्रतिशत वृद्धि हासिल करते हुए 5,000 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया। रामदेव ने कहा, चालू वित्त वर्ष में भी वृद्धि की यह गति बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि पतंजलि इस साल तीव्र प्रतिस्पर्धा वाले डेयरी उत्पादों के क्षेत्र में भी उतरेगी।

रामदेव कहते हैं, हम अपने वृद्धि लक्ष्य को हासिल करने के लिए डेयरी, पशुचारा और योग के लिए खादी के कपड़े जैसे नए क्षेत्रों में कारोबार शुरू करेंगे। डेयरी उत्पादों का काम इसी साल शुरू हो जाएगा। दूध, मक्खन, छाछ, पनीर आदि उत्पादों के साथ काम शुरू होगा। धन की व्यवस्था के बारे में पूछे जाने पर रामदेव ने कहा, बैंक हमें कर्ज देने के लिए तैयार हैं। हमारे पास कामकाज के विस्तार के लिए धन की तंगी नहीं है। हम कर्ज के बोझ से मुक्त कंपनी हैं। रामदेव ने पतंजलि उत्पादों की बढ़ती बिक्री को देश का आर्थिक स्वाधीनता अभियान बताया। उन्होंने कहा कि मार्च  2012 में बाजार में उतरने के बाद से पतंजलि ने कारोबार में 1100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हासिल कर सफलता का स्वर्णिम इतिहास रच दिया है। कंपनी ने 2011-12 में जहां 446 करोड़ रुपये का कारोबार किया वहीं 2012-13 में 850 करोड़ रुपये, 2013-14 में 1200 करोड़ रुपये और 2014-15 में 2006 करोड़ रुपये का कारोबार किया। पिछले वित्त वर्ष 2015-16 में कंपनी का कारोबार 150 प्रतिशत वृद्धि के साथ 5,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। उन्होंने बताया कि वर्ष के दौरान दंतमंजन दंतकांति, बालों का तेल केशकांति, गाय का देशी घी, बिस्कुट, शहद, च्यवनप्राश, हर्बल नहाने का साबुन और कुछ अन्य उत्पाद कंपनी के अग्रणी प्रदर्शन वाले उत्पाद रहे हैं।

इसी तरह ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर द्वारा 2003 में स्थापित श्री श्री आयुर्वेद ने भी आयुर्वेदिक दवाओं के विशाल क्षेत्र में पैठ बनाई है। इसके ऑनलाइन पोर्टल सत्व स्टोर से भी उत्पादों की बिक्री जारी है। अपने उत्पादों की बढ़ती मांगों को देखते हुए श्री श्री आयुर्वेद ने अब टेली शॉप और ई-कॉमर्स जैसे अत्याधुनिक तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। इसके मुख्य विपणन अधिकारी ने कहा कि वे लोग पूरे देश में 2017 तक 2500 स्टोर खोलने जा रहे हैं।

महर्षि अरविंद के पुड्डुचेरी आश्रम के पास अरविले में 42 उत्पादकों द्वारा 2500 से अधिक उत्पाद ऑनलाइन बेचे जाते हैं। इसमें आध्यात्मिकता का पुट भी बताया जाता है। यद्यपि इस कंपनी का सीधा संबंध अरविंद आश्रम से नहीं है, लेकिन इसके लाभांश का एक हिस्सा आश्रम को दान में जाता है। इस कंपनी के साठ प्रतिशत ग्राहक भारतीय हैं जबकि चालीस प्रतिशत ग्राहक विदेशों में हैं।

सतगुरु जग्गी वासुदेव बाबाओं की सूची में एक प्रमुख नाम है। इनका ईषा फाउंडेशन ईषा बिजनेस प्राइवेट लिमिटेड नाम से उद्यम चलाता है। कपड़े, फल और स्वास्थ्य व सौंदर्य प्रसाधन इसकी बिक्री में प्रमुख हैं। कंपनी ग्रामीण क्षेत्रों तक अपनी पैठ बनाने की रणनीति बनाती रहती है। एक अन्य संत केरल की माता अमृतानंदमई मठ की अमृता लाइफ नामक कंपनी आयुर्वेदिक, इको-फ्रेंडली कॉस्मेटिक उत्पाद और आर्गेनिक खाद्य पदार्थ बेचने में आगे है। वर्तमान में इस कंपनी में साठ लोग काम करते हैं। इनके ब्रांड उत्पाद यूरोप तक में बेचे जाते हैं। केरल का ही एक अन्य आश्रम संतीगिरी अलग से अपना उद्योग प्रभाग चलाता है। इसके उत्पादों में बॉडी बिल्डिंग की दवाएं, कपड़े, आयुर्वेदिक दवाओं के अलावा कई अन्य उत्पाद हैं जिनका केवल बाहर निर्यात किया जाता है। व्यापारी बाबाओं की सूची में सबसे ताजा नाम गुरमीत राम रहीम सिंह का जुड़ा है, जिनका बिजनेस फिल्म उद्योग में चल रहा है। एक समाचार एजेंसी के अनुसार, इनकी मूवी एमएसजी द मैसेंजर और एमएसजी पार्ट-2 ने एक महीने में ही 395 करोड़ की कमाई की थी।

यह तो हुई व्यापारी संतों की बात। इनके अलावा अन्य श्रेणियों में जिन बाबाओं के नाम ऊपर वर्णित हैं उनके घृणित, अवैध, अनैतिक कर्मों से तो धार्मिक लोग भी शर्मसार हो जाएं। बाबा रामपाल ने हरियाणा में आर्य समाज के सामाजिक वर्चस्व के खिलाफ दलितों की भावना उभारी और आर्य समाज की निंदा करते हुए अपनी फौज तैयार कर ली। उनकी यह अनुयायी सेना कानून अपने हाथ में लेकर चलने लगी। हालांकि बाबा रामपाल अपने सतलोक आश्रम के जरिए कुछ दवाएं और कुछ आध्यात्मिक समाधान भी देते थे, लेकिन उनका काम कुल मिलाकर भारत राज्य को ही चुनौती देने वाला हो गया। अंतत: उन्हें गिरफ्तार किया गया। इन पर हत्या और बलात्कार जैसे आरोप भी लगे हैं। पूर्व इंजीनियर और कबीराहा बाबा रामपाल के आश्रम की कुल संपत्ति करीब एक हजार करोड़ की आंकी गई है।

संत आसाराम का नाम इस सूची में सब से ज्यादा कुख्यात है। महाराष्ट्र में सूखे के बीच पानी की घोरे बर्बादी से लोगों की सीधी नजरों में आए आसाराम को उच्च राजनीतिक संरक्षण भी रहा जिसके बूते उन्हें जमीन पर कब्जा करने से ले कर यौन शोषण तक का कारोबार चलाने की हिम्मत मिली। आसाराम के देश भर में 400 से अधिक आश्रम हैं जिनकी कुल संपत्ति दस हजार करोड़ से भी अधिक मानी जा रही है। हालांकि काफी संगीन मामले सामने आने पर वह अपने पुत्र के साथ ही जेल में हैं, लेकिन उनके अनुयायियों की गुंडागर्दी सरेआम चल रही है। कई गवाहों की हत्या और मुद्दइयों को धमकाने की घटनाएं आए दिन सामने आ रही हैं। स्वामी नित्यानंद की योग-ध्यान की आड़ में यौन शोषण की घटनाओं की काफी लंबी सूची है। दक्षिण की एक अभिनेत्री के साथ आपत्तिजनक वीडियो आने के बाद से उन पर शिकंजा कसा। इसी तरह निर्मल बाबा ऊर्फ निर्मलजीत सिंह नरूला ने व्यवसाय में असफल होने के बाद धोखाधड़ी का धंधा शुरू कर दिया। अपने दरबार में भक्तों की समस्याएं निपटाते हुए निर्मल बाबा ने देश-विदेश में काफी ख्याति अर्जित कर ली। तीन दर्जन से अधिक भारतीय और विदेशी चैनलों पर उनके दरबार की कार्यवाही प्रसारित की जाती है। इस दरबार में बाबा भक्तों को अजीबोगरीब समाधान सुझाते हैं जैसे, आर्थिक समस्या निपटाने के लिए चटनी खाना। धोखाधड़ी के मामले इन पर चले और अभी भी चल रहे हैं।

ये तो वर्तमान के संत हैं। अतीत में आचार्य रजनीश, चंद्रास्वामी, धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, महेश योगी, देवराहा बाबा, लोकनाथ बाबा आदि अनेक बाबा रहे जिनका कारोबार विदेशों में भारतीय आध्यात्मिकता बेचना, हथियारों की दलाली करना और अन्य प्रकार के अवैध गतिविधियों में लिप्त रहना रहा है। इन पर समाज को सोचने की जरूरत है कि क्या उनका धर्म और आध्यात्म केवल कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली और व्यवसाय का जरिया बनने के लिए है या उसका समाज के व्यापक हित में उपयोग होना चाहिए। अगर समाजिक सरोकार है तो ऐसे चरित्रों को धर्म से हटाने की जरूरत से कौन इनकार कर सकता है?