क्या यह दलित विद्रोह की भूमिका है : अलख निरंजन

अलख निरंजन
आजादी के सात दशक गुजर जाने के बाद भी दलितों के उत्पीड़न की घटनाओं से अखबारों के पृष्ठ भरे रहते हैं। इनमें से कुछ घटनाएं राष्ट्रीय विमर्श के केन्द्र में अपना स्थान भी बना लेती हैं लेकिन विचार-विमर्श से ज्यादा इन घटनाओं का कोई असर दिखाई नहीं देता है। उना में हुई दलित उत्पीड़न की यह सम्भवतः पहली घटना है, जिसके ताप ने किसी मुख्यमन्त्री को अपने पद से हटने के लिए मजबूर कर दिया।

11 जुलाई 2016 को उना (गुजरात) में दलित युवकों को नंगा कर बर्बरतापूर्वक पीटा गया तथा एसयूबी गाड़ी के पीछे बांध कर कस्बे में घुमाया गया। पीड़ित दलित युवक एक मृत गाय को खाल उतारने के लिए ले जा रहे थे। लगभग 40 की संख्या में सवर्णों ने दलित युवकों को गो-हत्या का आरोप लगा कर न केवल बर्बरतापूर्वक पीटा, बल्कि पिटाई की घटना का वीडियो बना कर पोस्ट भी कर दिया, ताकि उनके ‘शौर्य’ का व्यापक प्रचार हो सके। लेकिन सवर्ण युवकों का यह दांव उल्टा पड़ गया। इस वीडियो को देश भर के दलित संगठनों ने देखा तथा पूरे देश में विरोध दर्ज किया। वीडियो वायरल होने के तुरन्त बाद गुजरात में विभिन्न दलित संगठनों द्वारा प्रदर्शन शुरू हो गया। दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में तीन ट्रक मरे हुए पशुओं को जिला अधिकारी कार्यालय के परिसर में फेंक दिया गया तथा एलान किया गया कि गो रक्षक अपनी मां का अन्तिम संस्कार स्वयं करें। नालियों की सफाई बन्द कर दी गई। गांव-गांव से भी मरे हुए पशुओं को उठाना बन्द कर दिया गया। इसी क्रम में 31 जुलाई को अहमदाबाद में दलित महासम्मेलन बुलाया गया। इस सम्मेलन में लगभग 25 हजार दलितों ने शिरकत की। इसमें बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की शपथ ले कर मृत पशुओं को न उठाने तथा सीवर में घुस कर सफाई न करने का संकल्प लिया गया। 5 अगस्त से अहमदाबाद से दलित अस्मिता यात्रा निकाली गई जो 15 अगस्त को उना में जा कर सम्पन्न हुई, जहां पर दलित स्वतन्त्रता दिवस मनाया गया। इसमें जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार व रोहित वेमुला की मां राधिका देवी भी सम्मिलित हुईं।
 

उना दलित उत्पीड़न की इस घटना का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह घटना यशस्वी प्रधानमंत्री, जो खुद को प्रधान सेवक कहते हैं, के गृह राज्य गुजरात में घटी है। उस गुजरात में जिसे नरेन्द्र मोदी ने विकास के माडल के रूप में प्रस्तुत कर 2014 में लोक सभा का चुनाव लड़ा तथा प्रधानमंत्री बने, जिसे  हिन्दुत्व की प्रयोगशाला कहते हैं। विकास के इसी माडल को पूरे देश में स्थापित करने के लिए संघ परिवार आतुर है। लेकिन उना की घटना के पश्चात पूरे देश में हुए विरोध प्रदर्शनों से स्पष्ट है कि भारत के दलितों ने प्रधानमंत्री के विकास माडल को न केवल नकार दिया है, बल्कि अब वे ऐसे खोखले माडल को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। लगभग 20 से अधिक दलितों द्वारा आत्महत्या का प्रयास, जिनमें से एक की मृत्यु 31 जुलाई को हो गई, सिद्ध करता है कि दलित अब अत्याचार सहन नहीं करेगा; यदि उत्पीड़न से मुक्ति प्राप्त करने का कोई रास्ता उसके सामने नहीं है तो वह मौत को गले लगा लेगा। वास्तव में सवर्णों ने दलित उत्पीड़न के लिए एक नए हथियार का आविष्कार किया है। आम तौर पर दलितों का उत्पीड़न तब किया जाता था जब वे वर्ण व्यवस्था द्वारा निर्धारित कार्यों के इतर कोई कार्य करते थे या वर्ण व्यवस्था द्वारा निर्धारित कार्य करने से इंकार करते थे जैसे मरे हुए पशुओं को उठाना, सफाई का कार्य न करना आदि। मृत मवेशियों का निस्तारण वर्ण व्यवस्था द्वारा निर्धारित कार्य है। ऐसे में दलितों पर गोहत्या का बेबुनियादी आरोप लगा कर उनकी बर्बर पिटाई करना उत्पीड़न करने का बिल्कुल नया बहाना है। उना घटना से पूर्व 2002 में भी झज्जर (हरियाणा) में सवर्णों की भीड़ ने पांच दलितों को गोहत्या के आरोप में थाने के सामने बर्बरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया था। उस समय केन्द्र में संघ के ही सेवक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी।

दलितों की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 16.6 प्रतिशत अर्थात लगभग 21 करोड़ है। लेकिन 70 वर्षों की आजादी ने इनकी आकांक्षाओं को कौन कहे, आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं किया। इन 70 वर्षों में कई रंग की सरकारें आईं और गईं, लेकिन वे दलितों के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाईं। आंकड़े बताते हैं कि देश में 45 प्रतिशत दलित भूमिहीन हैं तथा गरीबी रेखा के नीचे हैं, 55 प्रतिशत दलित खेत मजदूर हैं। 84 प्रतिशत दलित परिवारों (5 व्यक्ति) की मासिक आमदनी 5000 रु. से भी कम है, 75 प्रतिशत से अधिक दलितों की आबादी गांवों में निवास करती है। दलितों के 53.6 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। 34 प्रतिशत दलित अनपढ़ हैं। दलितों के साथ भेदभाव अभी भी जारी है। 2010 में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि दलितों के साथ 98 प्रकार का भेदभाव किया जाता है। जैसे साथ में बैठ कर खाना न खाना, जातिसूचक गाली देना, सार्वजनिक दुकानों पर चाय का कप अलग रखना, स्कूल में दलित बच्चों को अलग बैठाना आदि। दलित उत्पीड़न की घटनाएं भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं।  एनसीआरबी के अनुसार दलितों के उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। 2010 में 32,712, 2011 में 33,719, 2012 में 33,655, 2013 में 39,408 व 2014 में 47,064 मामले पंजीकृत किए गए। 2015 में अभी तक जो आंकड़े प्राप्त हैं उनके अनुसार 54,355 मामले पंजीकृत किए गए हैं। दलित उत्पीड़न के मामले में गुजरात की वृद्धि दर चौंकाने वाली है। गुजरात, जहां 2013 में 1190 एवं 2014 में 1130 मामले दलित उत्पीड़न के दर्ज किए गए थे, वहीं पर 2015 में 6655 मामले दर्ज किए गए हैं जो पिछले वर्ष की तुलना में पांच गुना से भी अधिक है।

आंकड़ों से स्पष्ट है कि दलितों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। देश में 44 प्रतिशत दलित भूमिहीन हैं। भूमिहीन होने का अर्थ हैं दलितों के पास घर बनाने की भी जमीन न होना। इनके घर भी सरकार द्वारा दी गई जमीन पर या किसी सवर्ण की जमीन पर बने होंगे या घर ही नहीं होगा। सड़क या ग्राम सभा की जमीन पर टेन्ट या छप्पर डाल कर रहते होंगे। 83 प्रतिशत परिवार मासिक 5000 रुपए से कम पर गुजारा करते हैं। एक परिवार में व्यक्तियों की संख्या को पांच मानी गई है। अर्थात 83 प्रतिशत दलित भर पेट भोजन भी नहीं कर पाते हैं। दलित उत्पीड़न के आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारतीय समाज, जिसमें सवर्णों का प्रभुत्व स्थापित है, दलितों को मनुष्य के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है। दलितों को पीटना, दलित महिलाओं का बलात्कार, हत्या जैसी बर्बर और अमानवीय घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। दलितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का कोई डर सवर्णों के मन में नहीं है। 1990 तक सरकारी नौकरियों के माध्यम से दलितों के एक बहुत छोटे हिस्से को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर उपलब्ध हो जाता था। लेकिन 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीति के कारण सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की संख्या में भारी गिरावट आई। निजी क्षेत्र दलितों को नौकरियों में आरक्षण देने को तैयार नहीं है। अर्थात स्वतन्त्र भारत में आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा सामाजिक सम्मान के साथ जीवन जीने का एकमात्र मार्ग ‘सरकारी नौकरी भी दलितों के लिए अब उपलब्ध नहीं है। इन परिस्थितियों में दलित किंकर्त्तव्यविमूढ़ की स्थिति में खड़ा है।

उना की घटना के पश्चात दलितों के बीच से उभरा आन्दोलन भारत की वर्तमान समाज व राजव्यवस्था के प्रति दलित आक्रोश की अभिव्यक्ति है। इस आक्रोश को पूरे देश में देखा जा सकता है। भले ही इसका स्वरूप भिन्न-भिन्न हो। उत्तर प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण समाप्त होने के कारण लाखों दलितों को पदावनति का दंश झेलना पड़ा है। इसके विरोध में दलित कर्मचारियों तथा अधिकारियों  ने सड़क से ले कर सर्वोच्च न्यायालय तक संघर्ष किया। राज्य सभा से दो वर्ष पूर्व पारित 117वां संविधान संशोधन बिल लोक सभा में लम्बित है। यदि यह पास नहीं होता है तो पूरे देश के सरकारी कर्मचारी पदोन्नति में आरक्षण के लाभ से वंचित हो जाएंगे तथा पदावनत भी कर दिए जाएंगे। इस सच्चाई से पूरे देश के दलित कर्मचारी भयभीत हैं। शिक्षण संस्थाओं में भेदभाव व उत्पीड़न भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या का दंश दलित समुदाय बहुत ही शिद्दत से महसूस कर रहा है।

दलित उत्पीड़न एवं भेदभाव की घटनाएं और इनकी प्रतिक्रिया एक व्यापक रुझान की तरफ इशारा कर रही है। पूरे देश में दलितों और सवर्णों के बीच सामाजिक संघर्ष की उपस्थिति उत्पन्न हो रही है। उना घटना के पश्चात जिस प्रकार मृत मवेशियों को जिला अधिकारी कार्यालय परिसर में फेंक दिया गया एवं सीवर में घुस कर सफाई न करने का संकल्प लिया गया, स्पष्ट है कि दलित अब उत्पीड़न सहने को तैयार नहीं हैं। दूसरी तरफ, सवर्णों के मन में दलितों के प्रति घृणा व बहिष्कार का भाव कूट-कूट कर भरा है जो अनुकूल अवसर मिलते ही बर्बर और अमानवीय घटनाओं के रूप में सामने आता है। संघ परिवार हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना चाहता है जिसमें सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था वर्ण व्यवस्था के सिद्धान्तों के अनुरूप चलाई जाएगी। वर्ण व्यवस्था में दलित अपवित्र कार्य करने के लिए बाध्य होंगे और काम के बदले पारिश्रमिक मांगने का उन्हें कोई अधिकार नहीं होगा। जूठन उनका भोजन होगा। सवर्ण संघ परिवार के इसी रामराज्य में अपना स्वर्णिम भविष्य देख रहे हैं। संघ परिवार का गुजरात मॉडल और कुछ नहीं, केवल वर्ण व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।

दलित अब वर्ण व्यवस्था के मैले को और ढोने के लिए तैयार नहीं है। वह सदियों के सन्ताप से मुक्ति चाहता है। वह रामराज्य नहीं, सन्त रैदास का बेगमपुरा, डॉ. अम्बेडकर का प्रबुद्ध भारत चाहता है। ऐसा समाज, जो स्वतन्त्रता, समानता, न्याय व बन्धुता के मानवीय मूल्यों में विश्वास करता हो, जिसमें अवसर की समानता हो, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हो। एक ऐसा वैज्ञानिक समाज, जिसमें आस्था के ऊपर तर्क, धर्म के ऊपर विज्ञान, ईश्वर के ऊपर मनुष्य की गरिमा स्थापित हो।

दलित आक्रोश की इस सच्चाई से सम्पूर्ण संघ परिवार अवगत है। मुख्यमन्त्री पद से आनन्दी बेन की छुट्टी करके दलित आक्रोश को राजनीतिक तरीके से कम करने का प्रयास किया गया है। लेकिन दलित उत्पीड़न और भेदभाव का मूल कारण सामाजिक और सांस्कृतिक है। संघ परिवार सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में गाय को छोड़ना नहीं चाहता क्योंकि गाय की ही आड़ में वह मुसलमानों को ठिकाने लगाना चाहता है। इसलिए हिन्दुत्व के पैरोकारों और दलितों का टकराव निश्चित है। अब देखना यह है कि हिन्दुत्व की विरोधी गैर-दलित ताकतें अपनी भूमिका किस रूप में तय करती हैं। भारत के वातावरण में यह सवाल भी मंडरा रहा है कि क्या यह दलित विद्रोह की भूमिका है।