मध्य प्रदेश : विकास के नाम पर अविकास : नीलेश द्विवेदी

यह 2005 की बात है। शिवराज सिंह चौहान उसी साल मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बनाए गए थे। उनके आते ही राज्य में मुख्यमंत्री बदले जाने की सुगबुगाहट भी शुरू हो चुकी थी। तब के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की तुलना में राज्य सरकार का नेतृत्व करने के लिए, पार्टी के भीतर और बाहर शिवराज को ज्यादा सशक्त दावेदार समझा जाने लगा था। राष्ट्रीय स्तर पर उनके राजनीतिक संरक्षक लालकृष्ण आडवाणी का पार्टी पर प्रभुत्व पुरअसर तरीके से कायम था, जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी और तीन चौथाई बहुमत से भाजपा को मध्य प्रदेश की सत्ता में लाने वाली पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का प्रभाव राज्य और पार्टी में कम हो रहा था।

इसी बीच, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के एक लेख ने शिवराज से जुड़ी अटकलबाजी को यकीनी रुख दे दिया था। प्रदेश के प्रमुख अखबारों में छपे इस लेख में पटवा ने अपने राजनीतिक शागिर्द शिवराज सिंह चौहान को राज्य की सत्ता संभालने की दिशा दिखाई थी। ठीक उसी तरह, जैसे पृथ्वीराज चौहान को उनके राजकवि चंद बरदाई ने मुहम्मद गौरी को मारने के लिए दिशा और दूरी का भान कराया था – ‘चार हाथ चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान। ता ऊपर सुल्तान है, चूको मत चौहान।’ दिलचस्प बात है कि पटवा ने भी अपने लेख में शिवराज को प्रेरित करते हुए लिखा था, ‘चूको मत चौहान।’

यकीन मानिए, उसके बाद शिवराज ने कोई चूक नहीं की। उसी साल यानी 2005 के नवंबर में उन्होंने भी लक्ष्य साध लिया और प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी ताजपोशी हो गई। वे इसके बाद भी नहीं चूके। जब, जहां, जिस तरह का भी मौका मिला, जनता को लुभाने वाली घोषणाओं पर घोषणाएं करते गए। इस तरह की तमाम योजनाएं भी शुरू कीं, जिनसे लोकलुभावन और समाज के हितैषी की उनकी छवि दिनों-दिन मजबूत होती चली गई। इसका असर यह हुआ कि 2008 और 2013 में लगातार उनकी सरकार ने सत्ता में वापसी की। मगर उनकी सरकार प्रदेश की जनता को कितना-कुछ वापस कर सकी? यह लाख टके का सवाल है, जिसका जवाब मध्य प्रदेश राज्य की मिलेनियम डेवलपमेंट गोल (सहस्राब्दि विकास लक्ष्य या एमडीजी) रिपोर्ट 2014-15 में मिलता है।

यूनीसेफ (यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड) के साथ मिलकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी ने इस रिपोर्ट को तैयार किया है। इसके मुताबिक, मानव विकास के अधिकांश सूचकांकों पर मध्य प्रदेश का प्रदर्शन बेहद खराब है। जैसे कि गरीबी का अनुपात पूरे देश का 21.92 फीसदी है तो मध्य प्रदेश का 31.65 फीसद। तीन साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों की तादाद पूरे देश में 40.।4 फीसदी है तो मध्य प्रदेश में 57.9 फीसदी। बच्चों को जन्म देते वक्त महिलाओं की मौत के मामले में मधय प्रदेश देश का पांचवां सबसे खराब राज्य है। यहां हर एक लाख गर्भवती महिलाओं में से 221 को प्रसव के वक्त जान से हाथ धोना पड़ता है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 167 है। इसी तरह, मध्य प्रदेश देश का दूसरा ऐसा राज्य है, जहां जन्म के वक्त सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है। प्रति हजार में यहां 54 नवजात दम तोड़ देते हैं, जबकि इस मामले में पूरे देश का औसत 40 है।
सामाजिक ढांचे पर खर्च के मामले में तो छत्तीसगढ़ (46%), राजस्थान (45%), बिहार (45%), ओडिशा (42%) और उत्त रप्रदेश (41%) जैसे राज्यों से भी मध्य प्रदेश पीछे है। मध्य प्रदेश सरकार ने 2012-13 में अपनी आमदनी का महज 39% ही सामाजिक ढांचे पर खर्च किया। यहां सामाजिक ढांचे का आशय शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि पर सरकार की ओर से किए गए खर्च से है। इस मामले में देश के 17 बड़े राज्यों में मध्य प्रदेश से नीचे सिर्फ गोवा (36.30%), पंजाब (35%) और केरल (34.89%) जैसे तीन राज्य ही हैं जिनका सामाजिक ढांचा मध्य प्रदेश की तुलना में पहले से ही बेहतर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश के आठ राज्यों को एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप (ईएजी) के तहत रखा गया है। यानी ऐसे राज्य जहां मानव विकास के सूचकांकों पर काफी करने की जरूरत है। इन राज्यों में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश शामिल हैं।

पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़ दें तो मध्य प्रदेश में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के किसी भी देश से ज्यादा आबादी रहती है। इसी आधार पर इन देशों से भी मध्य प्रदेश की तुलना की गई है और बताया गया है कि मानव विकास के 18 सूचकांकों के औसत के हिसाब से सार्क देशों में श्रीलंका सबसे बेहतर है, जबकि मध्य प्रदेश नीचे से दूसरे पायदान पर। उससे नीचे सिर्फ अफगानिस्तान है। गरीबों की कुल आबादी के मामले में मध्य प्रदेश निचले क्रम पर ही पाकिस्तान की बराबरी पर नजर आता है। यानी मध्य प्रदेश में पाकिस्तान के बराबर (2.28 करोड़) लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं।

सब को प्राथमिक शिक्षा दिलाने के लक्ष्य के हिसाब से मध्य प्रदेश का दर्जा श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान से भी नीचे है। मातृ एवं शिशु मृत्यु दर के मामले में भी ये चारों देश मध्य प्रदेश से बेहतर हैं, जबकि शिक्षा व रोजगार में लैंगिक भेदभाव (महिलाओं और पुरुषों के बीच) पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बाद सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में पाया गया है।

मध्य प्रदेश की यह स्थिति तब है, जब शिवराज सरकार की लाड़ली लक्ष्मी योजना, तीर्थदर्शन योजना, कन्यादान योजना, अन्नपूर्णा योजना, मजदूर सुरक्षा योजना जैसी करीब दर्जन भर सामाजिक योजनाएं खासी सुर्खियां बटोर चुकी हैं। शिवराज सिंह चौहान की दिनों-दिन बढ़ती लोकप्रियता का श्रेय भी उनकी ऐसी ही योजनाओं को दिया जाता है। इस लोकप्रियता का आलम यह है कि शिवराज को प्रदेश के बच्चों का ‘मामा’ तक कहा जाने लगा है। लेकिन एमडीजी रिपोर्ट को देख कर तो लगता है कि ‘मामा’ शिवराज नहीं, असल में प्रदेश की जनता बनी है, क्योंकि राज्य में 11 साल के ‘शिव-राज’ के बाद भी विकास की की सड़क पर गड्‌ढे अब तक बरकरार हैं।