नजरिया

डॉ सुभाष खंडेलवाल
अँग्रेजी सीखें अँग्रेजियत से लड़ें 

15 अगस्त 1947 की आधी रात जब देश आजाद हो रहा था, महात्मा गांधी  बीबीसी पर कह रहे थे कि दुनिया वालों से कह दो, गांधी को अंग्रेजी नही आती। गांधी दूरदृष्टा थे, उन्होंने मुल्क की आजादी के साथ ही हिंदी की गुलामी को समझ लिया था। आजादी के 70 वर्ष बाद आज हकीकत यह है कि देश की हर गली, मोहल्ले, गाँव यहाँ तक कि झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में भी इंग्लिश मीडियम स्कूल के बोर्ड लगे मिल जाएँगे। हिंदी दिवस पर अनेक वक्ताओं ने  हिंदी की दशा पर गर्व और शर्म दोनों ही बातें कहीं। उन्होंने कहा कि हिंदी 60-70 करोड़ लोगों की भाषा बन गई है। लेकिन यह भूलने की बात नहीं है कि इसमें सब से अधिक योगदान फिल्मी गीत-संगीत का है। लेकिन यही फिल्म वाले जब फिल्मफेयर अवॉर्ड होता है तब अँग्रेजी में बोलते है। रोटी हिंदी की खाते हैंऔर बच्चे अंग्रेजी के देते हैं।

मुल्क आजाद हुआ। गांधी चले गए। अँग्रेजी हावी हो गई। ‘अँग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा’ की प्ररेणा से हम कॉलेज में अँग्रेजी / हिंदी में से एक एच्छिक विषय लेने वाले छात्रों के फार्मों में अँग्रेजी काट कर हिंदी कर देते थे। तत्पश्चात विश्वविद्यालय की सीनेट एवं कार्य परिषद में भी हमने किसी को अंग्रेजी बोलने नहीं दिया। लेकिन जब वकालत करने हाई कोर्ट गए, जिसे हमारी भाषा में उच्च न्यायालय कहते हैं, तो ठहर गए। जज की मुस्कराहट पर सब जबरन खिलखिला पड़ते थे। सब काले चोगे में, सब की भाषा अँग्रेजी। गले में कसा हुआ फंदा। इंग्लैण्ड ठंडा मुल्क है, वहाँ के लिए यह उपयुक्त था, लेकिन भारत जैसे देश के लिए यह गलत था। कड़वी सच्चाई यह है कि इस देश के बड़े लोगों की बोली अँग्रेजी है  - वे चाहे न्यायपालिका में हों या विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया में।  दरअसल, हमारे देश में भाषा तीन युगों का षड्यंत्र है  - पहले संस्कृत जब राजा थे, फिर फारसी जब मुगल थे और फिर अँग्रेजी जब अँग्रेज थे।

भाषा क्या है? संप्रेषण है, माध्यम है, जिंदगानी है, विकास की कहानी है।  दुनिया को इसने जिंदा किया है। दुनिया के लिए बोली है, पर हमारे देश के लिए बंदूक की गोली है। इसने देश को कमजोर किया है। पानी और वाटर में क्या फर्क है, माँ और मम्मी में क्या अंतर है? लेकिन वाटर बड़ा और मम्मी ताकतवर नजर आती है। घर में सुबह मालिश वाला आया तो कह रहा था, हेड मसाज कर दूँ? मेरे दो पोते हैं, ढाई वर्ष के। वे प्ले स्कूल जाते है। वहाँ वे हिंदी गाने गाने लगे। बच्चों के स्कूल से संदेशा आया कि इन्हें हिंदी गाने मत सिखाइए, अंग्रेजी साँग सिखाइए, अन्यथा बाद में पछताएँगे।

अगले पच्चीस-पचास बरस में भारतीय भाषाएँ लुप्त हो जाएँगी। मैं अभी-अभी यूरोप से लौटा हूँ। जाने के पहले मौसी को फोन किया - मासी ढोकदू , तू कैसी है? थारी तबियत तो ठीक है नी? उन्होंने कहा - थारो रस्तो देख री हूँ, कब आयेगो। माँ जा चुकी है, और कोई बड़े बचे नहीं हैं। तकलीफ की बात यह है कि अब इस बोली में किससे बात करूँगा। 8×8= 64, 7×7=49 गायब है। इसी तरह हिंदी भी अपना स्वरूप खो देगी। हम अपनी मातृभाषा का, देशज भाषाओं का सम्मान नहीं कर सके है। इनके लुप्त होने का जवाबदेह कौन होगा?

भाषा के जातीय एवं सांप्रदायिक आग्रहों ने भी हिंदी का नुकसान किया है। अभी तीन दिन पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनंतकमार, जो कर्नाटक से हैं, एक कार्यक्रम में इंदौर आए थे। एक वक्ता ने उनसे हिंदी में बोलने की माँग कर दी। उन्होंने कहा कि मैं कर्नाटक से हूँ, मेरी मातृभाषा कन्नड़ है। यहाँ जैसी भी है, हिंदी बोल रहा हूँ। हम तो कर्नाटक में और देश के अन्य प्रान्तों में हिन्दी दिवस मना रहे हैं। आप आइए और वहाँ पर आधा घंटा कन्नड़ में बोल कर दिखाइए। यह कन्नड़ की (छोटी बहन) की हिंदी (बड़ी बहन) से बहुत बड़ी शिकायत थी, जो अनंतकुमार बहुत धीरे से कह गए। उन्होंने दक्षिण में हिंदी दिवस की जो बात कही, उसके लिए यही कहा जा सकता है कि दिल के   बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है। वहाँ पर अपने स्तर पर कार्यक्रम कर सकते हैं, लेकिन वहाँ की जनता इसे पसंद नहीं करेगी। आज दक्षिण भारत हिंदी का नाम सुनते ही जलने लगता है। इसकी बानगी देखनी हो तो लोकसभा-विधानसभा में देख सकते हैं। हिंदी वालों को समझना होगा, जिस तरह अँग्रेजी उन पर भारी है वैसे ही हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं पर भारी न पड़े। देश आजाद होते ही यदि सभी भारतीय स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा के साथ दो भारतीय भाषाएँ और एक विदेशी भाषा  डिग्री के साथ जरूरी  कर दी जाती, तो हमारा देश मजबूत होता।

इसे ठीक करने के दो तरीके हैं। एक, दिल्ली में जो बैठे हैं वे  दृढ़ संकल्प शक्ति दिखाते हुए अँग्रेजी हटा दे। यह मुल्क कबूल कर लेगा। पिछले दो हजार साल से जो आया, उसे हम कबूल करते रहे हैं। आने वाले पँच सौ या हजार से ज्यादा नहीं थे। शक, हूण, अरब, गजनी, मंगोल, खिलजी, तुर्क, तैमूर, मुगल, पुर्तगाली और अंग्रेजों को छोड़ कर सब चले गए। हम सब उनका मिला-जुला संगम है। अँग्रेज जब गए, तब हम छत्तीस करोड़ थे और वे एक लाख थेा आज दिल्ली में बैठे दस लोग और उनके साथ पच्चीस-पचास लोग देश चलाते हैं - नरेन्द्र मोदी, मोहन भागवत, अमित शाह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, शरद यादव, नीतीश कुमार, लालू यादव, मुलायम सिंह, ममता बनर्जी, जयललिता, सिताराम यचूरी, अंबानी, अडानी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्यायाधीश, फिर इनसे जुड़े लोग और फिर लोकसभा, विधानसभा में बैठे लोग जिन्हें ये ही बैठाते हैं और पूरा देश उनका अनुसरण करता है। दूसरा तरीका है, अपने बच्चों को सिखाएँ कि अँग्रेजी सीखें, लेकिन अँग्रेजियत से लडे़। काले अँग्रेज अँग्रेजियत का लबादा ओढ़ कर बैठ गये हैं। हाउ टू मीट, हाउ टू सिट एंड हाउ टू ईट बट दे डोंट नो हाउ टू ट्रीट। हमारे देश के हर मामले में, व्यवहार में घोर असमानता है, वही भाषा में भी आ गई है। व्यवहार में निरंतरता, एकरूपता लाना जरूरी है।

(16 सितंबर 2016)
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सगुण विरोध - निर्गुण विरोध

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप के दौर जारी हैं। यह सब इस कदर हावी हो चुके हैं कि आज शब्द अपने अर्थ खोते जा रहे हैं।  यदि नरेन्द्र मोदी को उनके पुराने भाषण पढ़वाए जाएँ तो उन्हें चक्कर आ जाएँगे। डॉ. लोहिया ने इसीलिए सगुण और निर्गुण विरोध की अवधारणा रखी थी। नेहरू के मामले में शायद वे भी निर्गुण विरोध पर आ गए थे। लेकिन यह उनकी हताशा नहीं वरन अकेले संघर्ष करने की स्थिति से उत्पन्न शैली थी। आजादी के बाद देश नेहरू के आभामंडल में कैद था। सन 1952 के आम चुनाव में बुरी हार के बाद जयप्रकाश नारायण आदि उनका साथ छोड़ सर्वोदय में चले गए थे। वे अकेले ही संघर्ष कर रहे थे। तब उन्होंने पुस्तक लिखी थी – ‘सरकारी, मठी, कुजात गांधीवादी’। सरकारी मतलब नेहरू आदि, जो सरकार में थे। मठी मतलब जयप्रकाश नारायण आदि, जो सर्वोदय में चले गए थे, और कुजात मतलब डॉ. लोहिया जैसे लोग, जो गांधीवादी तो थे लेकिन लोकतंत्र में अपने विचार के लिए संघर्ष कर अपमान और पीड़ा झेल रहे थे। तब उनका कहना था कि लगातार विरोध राजनीति को कलही और लगातार तारीफ लोकतंत्र को कमजोर कर देता है।

हमारे देश का दुर्भाग्य कि सत्ता और प्रतिपक्ष की भाषा कुर्सी बदलने के साथ सदैव ही बदलती रहती है। इसने देश की राजनीति को और उसके नेताओं की गरिमा को गिराया है। अटलबिहारी वाजपेयी और जॉर्ज फर्नांडिस ने कांग्रेस और इंदिरा गांधी का विरोध किया। जॉर्ज ने तो इंदिरा गांधी पर अंतहीन अरोपों की झड़ी लगा दी थी। जब ये लोग सत्ता में आए तो अटलबिहारी नए नेहरू बन गए और जॉर्ज ताबूत कांड होने पर और पार्टी पदाधिकारियों द्वारा सरे आम घूस लेते पकड़े जाने पर पलट कर इंदिरा गांधी की तरह व्यवहार करने लगे थे। केजरीवाल और उनके साथियों ने भी सत्ता में आने के पूर्व अनगिनत आरोपों की झड़ी लगा दी थी, जो वे आज भी जारी रखे हुए हैं। प्रत्युत्तर में सत्ता में आने पर उन्हें वही सब झेलना पड़ रहा है। अमेरिका में तो बहुत मुश्किल से ट्रंप सामने आए हैं,  हमारे यहाँ तो एक से बढ़ कर एक ट्रंप मौजूद हैं।

दिल्ली में आप पार्टी के मंत्रियों, विधायकों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज होने का सिलसिला लगातार जारी है। आजाद भारत में तो क्या, दुनिया भर में किसी एक सरकार और उसके इतने अधिक प्रतिनिधियों पर कारवाई की ऐसी मिसाल देखने को नहीं मिलती है। इसे ‘आधी हकीकत आधा फसाना’ भी नहीं कह सकते हैं।  हाँ, ‘थोड़ी हकीकत बाकी फसाना’ जरूर कह सकते हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग हैं। उन पर मोदी सरकार का वरदहस्त है। वे गवर्नर कम, अंग्रेजों के जमाने के जेलर ज्यादा नजर आते हैं। इंदिरा गांधी ने जब 1975 में देश में आपातकाल लगाया था तब जंग इंदौर में डिप्टी कलेक्टर थे। उस वक्त भी इनके काम की शैली यही थी। इनसे इंदौर जेल के राजनीतिक बंदियों ने, खास तौर पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र सकलेचा एवं इंदौर के पूर्व सांसद कल्याण जैन ने, अपर्याप्त भोजन एवं पानी मिले दूध की शिकायत की थी तो इन्होंने सुनने के बजाय उन पर कायवाई कर उनका ट्रांसफर बेगमगंज जेल में करवा दिया था। नजीब जंग जैसे लोग भारत जैसे विकासशील देश में सदैव ही सत्ता में काबिज रह कर उसकी अंधभक्ति कर जनता को जंग लगाते रहते हैं। सन 1975 में उन्होंने सकलेचा पर कारवाई की थी। आज देश में सकलेचा की पार्टी की सरकार है। वे आज भी सरकार के साथ हैं। सन 2016 सन 1975 को दोहरा रहा है।

(13 सितंबर 2016)