विचार से छुट्टी : रवींद्र गोयल

रवींद्र गोयल
राष्ट्रीय शिक्षा नीति किसी भी  देश की शिक्षा प्रणाली का मूल दस्तावेज होता है। आवश्यक है कि समय समय पर पिछले तजुर्बे, कमियों और उपलब्धियों के आलोक में तथा नई सामाजिक जरूरतों के अनुरूप उसकी व्याख्या की जाए और उसे एक नई दिशा दी जाए। इस पर सार्वभौमिक सहमति है कि शिक्षा प्रणाली में मौजूद कमियों  को दूर करना और देश में जारी आर्थिक और तकनीकी विकास से हो रही उपलब्धियों का फायदा उठाते हुए देश को विकास पथ पर आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा में सुधार एक जरूरी प्रक्रिया है। पिछली शिक्षा नीति यूँ तो 1986 में घोषित की गई थी जिसे 1992  में संशोधित किया गया, पर सारतः हिंदुस्तान में वर्तमान समय में जारी शिक्षा प्रणाली कोठारी आयोग पर आधारित 1968  की शिक्षा नीति ही है।

मोदी  सरकार भी शिक्षा नीति में आवश्यक परिवर्तन के लिए पिछले दो सालों से प्रयासरत हैं। प्रारंभ में प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के लिए पंचायत, ब्लॉक / क्लस्टर, जिला और राज्य स्तर पर विचार विमर्श आयोजित किया गया। लेकिन इन चर्चाओं से  शिक्षा के क्षेत्र में  प्रणालीगत मुद्दों पर कोई दिशा नहीं उभर पाई। उसके बाद नई शिक्षा नीति तैयार करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अवकाश-प्राप्त कैबिनेट सचिव टी एस आर सुब्रमण्यन की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति 31 अक्टूबर 2015 को गठित की गई। समिति ने 30 अप्रैल 2016 को एक रपट मंत्रालय को सौंपी। न जाने क्यों सरकार ने उस रपट को सार्वजनिक नहीं किया। आखिर जब समिति के अध्यक्ष ने कुछ समय बाद रपट खुद ही सार्वजनिक कर दी, तब सरकार ने औपचारिक रूप से उसे नजरअंदाज करते हुए, लेकिन लगभग उसी तर्ज पर, तैंतालीस पृष्ठों का एक दस्तावेज ‘सम इनपुट्स फॉर ड्राफ्ट नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2016’  जारी किया जो वर्तमान चर्चा का आधार है।

वर्तमान शिक्षा नीति निर्माण के कार्यभार को समझने के लिए आवश्यक है कि हम एक तो शिक्षा को कैसे समझें, यह स्पष्ट किया जाए और दूसरे, वर्तमान समय में जारी शि

शिक्षा का उद्देश्य मात्र लोगों को उनके जीवनकाल में आय बढ़ाने के लिए सक्षम करना नहीं है। यह उन्हें दुनिया को समझने, कल्पनशीलता को बढ़ाने और सभी क्षेत्रों में रचनात्मकता को प्रेरित करने में मदद करने के लिए भी है।  एक अच्छा समाज हर किसी के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करता है। यह लोकहितकारी है। और समाज को अपने सदस्यों को शिक्षित करने के लिए भुगतान करने को तैयार रहना चाहिए। यह सोच अपने असली सार में शिक्षा को समझने और संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित एक समतावादी समाज के गठन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा प्रणाली का निर्माण करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित 1968 की शिक्षा नीति की नींव दो महत्वपूर्ण मान्यताओं पर आधारित थी। एक तो शिक्षा का विशेष जोर कृषि और उद्योग के लिए शिक्षा के विकास पर होना चाहिए (देखें पर 4(8) 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का दस्तावेज़)। और दूसरे कोठारी आयोग ने  वर्ष 1961-1986 के लिए सात प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर की धारणा पर उच्च शिक्षा के लिए सुविधाओं की आवश्यकता के बारे में अपनी गणना आधारित की। इसीलिए 1990 तक शिक्षा के समतामूलक स्वरूप पर तो प्रश्न छात्र आंदोलन, शिक्षक आंदोलन  द्वारा तो उठाए गए, लेकिन व्यापक सामाजिक तौर पर शिक्षा से कोई शिकायत ज्यादातर नीति निर्धारक निकायों को न थी। यदि कोई चिंता थी तो मात्र यह कि जरूरत से ज्यादा पढ़े-लिखे लोग उपलब्ध हैं, क्योंकि अर्थव्यस्था की विकास दर पढ़े-लिखे नौजवानों को खपा नहीं पा रही है।

शिक्षा पर व्यापक सवाल 1990 के बाद उठने लगे जब एक तो हमारी विकास गति तीव्र हुई (3 प्रतिशत के हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ से छलांग लगा कर  7- 8 प्रतिशत पर जा पहुंची) और दूसरे हमारे राष्ट्रीय उत्पाद की संरचना में एक मौलिक परिवर्तन आया। आज भारतीय अर्थव्यवस्था मूलतः एक सेवा आधारित अर्थव्यवस्था बन चुकी है और यह मुख्यत: 1990  के बाद हुआ है जैसा कि निम्न तालिका से स्पष्ट हो जाएगा

राष्ट्रीय आय का ढांचा (प्रतिशत में)
साल     खेती  उद्योग सेवाएं
1950        58    15    27
1980        38    24    38
1990        33    27    40
2000        25    25    50
2014        18    25    57
क्षा प्रणाली की कमियों/खामियों का भी सार संकलन  किया जाये।

एक सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था की अपनी कुछ शैक्षणिक अनिवार्यताएं हैं जो कृषि और उद्योग आधारित अर्थ व्यवस्थाओं से भिन्न हैं। कृषि-आधारित अर्थ व्यवस्था जहाँ अपने परिवार से पाए ज्ञान के आधार पर चल  सकती है वहीँ औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए सेकेंडरी स्कूल तक की शिक्षा अनिवार्य है। परंतु एक सेवा आधारित अर्थव्यवस्था में कार्यरत इंसानों को  उच्च स्तर की शिक्षा और कौशल की आवश्यकता है। भारत का आईटी क्षेत्र में विकास नेहरूवादी दृष्टि से उपजे कुशल मानव पूंजी के पूल, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, और अनुसंधान संस्थानों का ही नतीजा है।

दूसरे अर्थों में आज के समय में नई अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप यदि शिक्षा को ढालना है तो हमें अपने शिक्षा के आदर्श को सब को माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत 2017 तक माध्यमिक स्तर की शिक्षा उपलब्ध करने से आगे ले जाना होगा। उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या में एक गुणात्मक छलांग लगानी होगी।

और इसके साथ-साथ मात्र कौशल विकास ही नहीं, नौजवानों को चिंतन के स्तर पर भी परिपक्व बनाना होगा। इसके लिए उनके बीच शुद्ध विज्ञान और मानविकी  के विषयों के अध्ययन को भी बढ़ावा  देना होगा। अभी बाजार के दबाव और सरकार की उचित नीतियों के आभाव में शुद्ध विज्ञान और मानविकी विषयों और शोध की तरफ आम छात्रों का झुकाव कम हो रहा है। यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं। नारायण मूर्ति और बिल गेट्स सरीखे लोग यूँ ही परेशान नहीं हैं कि पढ़े-लिखे लोग शोध कार्यों की तरफ आकर्षित नहीं हो रहे।

उपर्युक्त समझ से देश के शिक्षा संबंधी नीति निर्धारकों के समक्ष दो कार्य भार निकलते हैं। एक, सरकारी वित्त पोषित शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता सुधार के काम को गति दे। और दूसरे, उच्च शिक्षा के लिए भारी पैमाने पर सरकारी निवेश करके शिक्षा की सुविधाओं में गुणात्मक छलांग की जमीन को तैयार करे।

उपर्युक्त सोच के विपरीत जो सरकारी दस्तावेज जारी हुआ है उसे शिक्षा को ‘वोकेशनल’ व कौशल-विकास के प्रशिक्षण के रूप में ढालने के तथा शिक्षा में संस्थागत गैरबराबरी को और गहरा करने के घोषणापत्र की तरह देखा जाना चाहिए। ‘वोकेशनल’ व कौशल-विकास के प्रशिक्षण को शिक्षा के केंद्र में रख कर सरकार ने शिक्षा के अकादमिक, बौद्धिक व आलोचनात्मक चिंतन के उद्देश्यों को दरकिनार करने का इरादा जताया है। लगता है कि शिक्षा के दूसरे महत्वपूर्ण उद्देश्य - छात्रों की  दुनिया को समझने, कल्पनशीलता को बढ़ाने और सभी क्षेत्रों में रचनात्मकता को प्रेरित करने में मदद करना - उसकी चिंता का विषय नहीं हैं। इसी तरह समता के सवाल को किनारे करने के लिए पिछले साल आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले का जिक्र भी सरकारी दस्तावेज़ में नहीं किया है जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार को यह आदेश दिया गया था कि न्यायाधीश व मंत्री से ले कर अधिकारी व कर्मचारी तक सरकार से किसी भी तरह का वेतन/मानदेय प्राप्त करने वाले सभी लोगों के बच्चे प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढें।

यह दुखद ही है कि जिस समय  जर्मनी, चिली जैसे देश सम्पूर्ण निःशुल्क शिक्षा की राह पर आगे बढ़ रहे हैं,  दस्तावेज में शिक्षा के व्यवसायीकरण को और तेज करने के लिए कम-से-कम चार रणनीतियां सुझाई गई हैं। दस्तावेज की पहली रणनीति यह है कि ‘अलाभकारी’ स्कूलों को पहचान कर स्कूलों का विलय किया जाएगा।  स्कूलों का विलय कर दिए जाने की स्थिति में जब किसी बच्चे या बच्ची को शिक्षा अधिकार कानून में निर्धारित दूरी से ज्यादा दूर जाना पड़ेगा तब सरकार कानून में बदलाव करके यह कहेगी कि वह अब सभी बच्चों को उनके पड़ोस में शिक्षा उपलब्ध कराने के अपने संवैधानिक दायित्व से मुक्त हो गई है?

व्यवसायीकरण को बढ़ाने की दूसरी रणनीति के तहत निजी क्षेत्र की शिक्षा दुकानों को करों में छूट दी जाएगी तथा शिक्षा को ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ की परिभाषा में शामिल किया जाएगा। तीसरी रणनीति होगी कि सरकार उच्च शिक्षा के संस्थानों को उनके द्वारा किए जा रहे ‘प्रदर्शन’ के अनुसार अनुदान देगी। चौथी रणनीति यह है कि नए उच्च शैक्षिक संस्थान नहीं खोले जाएंगे। दस्तावेज कहता है कि क्योंकि नए संस्थानों को खोलने में सरकार को भारी मात्रा में निवेश करना पड़ता है, इसलिए सरकार की प्राथमिकता होगी कि वह वर्तमान में चल रहे संस्थानों की क्षमता को बढ़ाए, न कि नए संस्थान खोलने में संसाधन लगाए। यदि सरकार नए संस्थान नहीं खोलेगी तो शिक्षा के लिए उठ रही मांग किस तरह पूरी होगी? स्पष्ट है कि इस मांग को पूरा करने के लिए शिक्षा को बाजार के हवाले किया जाएगा। इस चिंतन के साथ दस्तावेज का यह दावा झूठा ही है कि वह राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने को प्रतिबद्ध है। लगता तो यह है कि फिलहाल राष्ट्रीय आय का 3.।5 प्रतिशत जो शिक्षा पर खर्च हो रहा है, सरकार उसे भी कम करने की दिशा में कदम उठा रही है। इस दस्तावेज के पीछे एक घातक सोच यह भी है कि इसमें समानता के बजाय समरसता पर बल दिया गया है। सवाल यह है कि संविधान में समानता पर बल है तो फिर दस्तावेज समरसता पर बल क्यों दे रहा है। यह सोचना होगा कि  सरकार समरसता पर जोर दे कर विद्यार्थियों को किस तरह के कल के लिए तैयार कर रही है?

इस प्रकार यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्माण के दस्तावेज के बजाय उस पूंजी के उद्देश्यों  की पूर्ति का दस्तावेज है जिसे मशीनी स्तर पर प्रशिक्षित, अर्ध-प्रशिक्षित, सस्ते श्रमिक चाहिए। इस पूरी कवायद में ‘गौरवमयी संस्कृति’ की दुहाई एक सहायक विचार की तरह काम करती है, क्योंकि इनसे देश के इतिहास से उपजे व वर्तमान में हावी वर्ण-आधारित, वर्गीय व लैंगिक असमानता और शोषण को बनाए रखने में मदद मिलेगी। और इस प्रकार के शोषण के खिलाफ जो प्रश्न उठ रहे है उन्हें दबाने का भी काम करेगी। लगता है कि यह सरकार चाहती है कि ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता की कीमत गरीब,  दलित, मुस्लिम और आदिवासी तथा बच्चे अदा करें।
(लेख सुधारने में सहयोग के लिए मित्र अनिल गोस्वामी तथा किशोर झा का शुक्रिया)