मेरा समय : विजातीय से भय : शंभुनाथ

शंभुनाथ
दूसरी जातीयताओं, नस्लों, मजहबों या दूसरे देश के लोगों को अपने बीच देख कर बहुसंख्यक समुदाय के लोग कई बार असहज हो उठते हैं। उनमें पूर्वाग्रहयुक्त आत्मगर्व के साथ एक भय भी जागता है। भिन्नता का बोध इतना तीव्र होता है कि सिर्फ भय नहीं पैदा होता, असुरक्षाबोध भी होने लगता है। इससे विजातीय के प्रति घृणा और हिंसा का विस्फोट होते भी देखा गया है। आर्थिक सुधारों के कारण बढ़ी बेरोजगारी और हाल के आतंकवादी हमलों ने भारत ही नहीं, अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों में विजातीय-भय बढ़ाया है।

श्रीलंका में सिंहली-तमिल तनाव देखा जा सकता है। असम में बांग्लादेशियों से विजातीय-भय है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंदी भाषियों की बढ़ती संख्या देख कर घृणा और हिंसा के दृश्य मिलते रहे हैं। बंगलुरु में अफ्रीकी विद्यार्थियों के प्रति हिंसा देखी गई। दिल्ली में उत्तर-पूर्व के लोगों को देख कर नौजवान ‘चीनी आला रे’ गाते देखे गए हैं। कटूक्तियां सत्ता-प्रदर्शन होती हैं।

भारत में आम तौर पर मुसलमान हिंदुओं के इलाके में बसना नहीं चाहते, हिंदू मुसलमानों के इलाके में फ्लैट नहीं लेते। ये विजातीय-भय के ही रूप हैं। ‘भिन्न’ से भय और असुरक्षाबोध में उसी तरह वृद्धि हुई है जैसे लोभ में और भोग में। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, इराक और अन्य एशियाई देशों में सदियों से साथ-साथ रहती आई विविध जातियों में इधर अचानक विजातीय-भय बढ़ा है, जैसे कुछ लोग विजातीय सफायाकरण के बाद अब अपने लिए एक शुद्ध इलाका चाहते हों। जैसे कौवा कौवों और तोता तोते के साथ ही रहना चाहे।

अमेरिका में नस्लवादी हिंसा बढ़ी है। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद वहां विजातीय-भय का पहला शिकार कोई मुसलमान नहीं हुआ, एक सिख हुआ जो पगड़ी पहने हुआ था। इंग्लैंड में कई पीढ़ियों से रहते आए 35 लाख से अधिक भारतीय आज विजातीय-भय के शिकार हैं। वहां दूसरे देशों के यूरोपियनों को भी बर्दाश्त नहीं किया जा रहा है। डैनिश डेनमार्क में बसे जर्मनों को इसी निगाह से देखते हैं। यूरोपीय संघ के देशों -- हंगरी, आस्ट्रिया, जर्मनी, स्वीडेन - की सीमाएं बंद होने लगी हैं। कांटे की दीवारें खड़ी की जा रही हैं, शरणार्थी न घुस जाएं।

सोलहवीं सदी से यूरोपीय देश के लोग दुनिया के दूसरे देशों में जा कर अपना साम्राज्य कायम करते और बसते रहे हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय देशों में एशियाई देशों के डॉक्टरों, हुनरमंदों और आम श्रमजीवियों का जा कर बसना शुरू  हुआ। कइयों ने यूरोपीय देशों की ही नहीं, अमेरिका और आस्ट्रेलिया तक जा कर वहां की नागरिकता हासिल कर ली। पंजाब और केरल से ज्यादा लोग गए। अब आर्थिक संकट जैसे-जैसे गहरा रहा है, वे विजातीय के रूप में देखे जा रहे हैं।

दुनिया का बाजार जरूर मुक्त हुआ है, पर लोगों का मन अंध-राष्ट्रवादी पूर्वाग्रहों से जकड़ता गया है। 2005 में ‘यूरोपीयन कमीशन अगेंस्ट रेसिज्म एंड इनटालरेंस’ ने सांस्कृतिक नस्लवाद के खतरे से आगाह करते हुए कहा है कि नस्ल तेज गति से संस्कृति की जगह लेती जा रही है।

एशियाई और पश्चिमी देशों में इधर जो फासीवादी गुंडागर्दी फैली है उसके मूल में विजातीय से भय है जो हिंसक स्तर तक बढ़ गया है। वैश्वीकरण ने व्यापारिक और शैक्षिक स्तर पर सामाजिक गतिशीलता बढ़ा दी हो, सांस्कृतिक सहिष्णुता का ग्राफ तेजी से नीचे की ओर गिरा है। वित्तीय पूंजीवाद सार्वभौम हुआ हो, श्रम का भूमंडलीकरण संकट में है। समस्या अब इस रूप में पेश की जा रही है-- सुयोग बनाम वंचना। ‘बाहर’ के श्रमजीवियों को मिला सुयोग स्थानीय के लिए ‘वंचना’ है। अब सुअवसर देने के मामले में जातीयता और जाति पहले देखी जाती है। लंबे समय तक सुधार आंदोलनों से गुजरे, राष्ट्रीय सम्मिश्रण के उन्नत स्तर पर पहुंचे और उदारवादी माने जाने वाले राज्यों और देशों में भी जब विजातीय-भय की दीवारें उठती हैं और साथ उठने-बैठने वाले अचानक विजातीय की तरह देखे जाने लगते हैं, लग सकता है कि वैश्वीकरण ने यह कैसा उपहार दिया है।

विजातीय से भय कितना वीभत्स रूप लेता है, इस पर भीष्म साहनी की एक अच्छी कहानी "वाङ्चू" है। इसमें राजनीति से बेखबर एक सरल चीनी बौद्ध भिक्षु को भारत-चीन युद्ध (1962) के समय वाराणसी पुलिस स्टेशन में हर हफ्ते हाजिरी देनी पड़ती थी। उस पर यात्राओं में लोगों द्वारा दबाव बनाया जाता था, ‘कहो कि तुम्हारे देश के लोगों ने विश्वासघात किया है, नहीं तो हमारे देश से निकल जाओ...।‘ अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि देशों में मुसलमानों के संदर्भ में विजातीय-भय कुछ इसी तरह व्यक्त हुआ है और इस तरह भी,  ‘तुम बिल्कुल हमलोगों जैसे हो जाओ।‘ पश्चिमी लोग कोकोनाट जेनरेशन चाहते हैं -- लोग बाहर से भले भूरे दिखें, चमड़ी के भीतर गोरे हो जाएं।

कुछ पश्चिमी विचारकों, जैसे हांस मैग्नुस इन्जेंसबर्जर की धारणा है, ‘जेनोफोबिया नृवैज्ञानिक तत्वों के रूप में सभी प्राचीन समाजों में रहा है।‘ क्या भारत के बारे में कहा जा सकता है कि एलियन, अजनबी या विजातीय लोगों के प्रति कभी भय और अस्वीकार किसी युग में था? आर्य-द्रविड़ अंतर्मिश्रण ही नहीं घटित हुआ, यवन, हूण, शक, पठान, मुगल, अंग्रेज भी भारतीय समाज का सहज अंग बने। दक्षिण के शंकर और रामानंद उत्तर भारत में अजनबी या विजातीय न थे। सूफी कभी विजातीय नहीं दिखे। जहांगीर 1615 में अंग्रेजों को व्यापार की अनुमति नहीं देता, यदि विजातीय से भय होता।

भारतीय समाज में अंतर्द्वंद्वों के बावजूद सैकड़ों साल से खुलापन रहा है, साझा जीवन रहा है, विश्वात्मबोध रहा है। सांस्कृतिक अंतर्उवरण एक महान वास्तविकता रही है। फिर भी अब दूध-सा सब कुछ फटता दिख रहा है, क्योंकि सच्ची राजनीतिक गरमाहट नहीं है। क्या विजातीय से भय एक राजनीतिक निर्मिति है, राजनीतिक खाद है और क्या यह वैश्वीकरण का झुलसा हुआ चेहरा है? विगत कुछ दशकों से काल्पनिक भिन्नता के आधार पर फैलाया जा रहा यह भय एक ऐसा सत्ता विमर्श है जो जनता की ताकत और उसकी संस्कृति को कमजोर करता है। यह भय विश्व मन बनाने की जगह हरेक तरफ सिर्फ खून की दीवारें खड़ी करता है।