इरोम शर्मिला की मुक्ति का क्षण : सुभाष गाताडे

सुभाष गाताडे

क्या बारह साल के बच्चे को, जो अभी  किशोरावस्था की दहलीज पर पहुँचा ही है, पेशेवर आतंकवादी घोषित कर मार दिया जा सकता है? आज से सात साल पहले मणिपुर में सुरक्षा बलों द्वारा आजाद खान नामक बच्चे की इस फर्जी मुठभेड़ की चर्चा लम्बे समय तक चलती रहेगी। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यू यू ललित के द्विसदस्यीय पीठ के 85 पेज के फैसले ने इस बच्चे की मुठभेड़ में की गई हत्या - जो अपने पड़ोसी के बरामदे में अपने दोस्त के स्कूल जाने के  इन्तजार में अखबार पढ़ रहा था - और इलाके में सुरक्षा बलों को मिले असीमित अधिकारों के तहत अंजाम दी  गई  अन्य तमाम फर्जी मुठभेड़ों के सवाल को नए सिरे से सुर्खियों में ला दिया है। न्यायाधीश महोदय यह देख कर हैरान थे कि किस तरह तमाम जनतांत्रिक अधिकारों को धता बताते हुए एक बच्चे का अपहरण किया जाता है और सुरक्षा बल बेधड़क उसके माता-पिता के सामने उसे ढेर कर देते हैं, लाश के हाथ में बन्दूक रख देते हैं और बड़ी  निर्लज्जता के साथ अगले दिन अखबारों में बयान जारी करते हैं कि ‘मुस्लिम आतंकियों से सुरक्षा बलों की झड़प, एक आतंकी मारा गया।’

सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत याचिका उन परिवारजनों  द्वारा दाखिल की गई  थी  जिनके आत्मीय ऐसी ही  फर्जी मुठभेड़ों में मार दिए गए हैं। इन्होंने अपने आप को ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल एक्जिक्युशन विक्टिम फैमिलीज एसोसिएशन’ के नाम से संगठित किया है। इस संस्था की तरफ से जिन 1528 हत्याओं की सूची अदालत को सौंपी गई है उन ‘आरोपों की सच्चाई को स्वीकार करते हुए’ अदालत ने इन सभी मुठभेड़ों की नए सिरे से जाँच करने का आदेश दिया। शुरुआती चरण में उसने इनमें से 62 हत्याओं पर फोकस करने को कहा है, ताकि यह तय किया जा सके कि जाँच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की आवश्यकता है क्या? न्यायालय का यह कहना मायने रखता है कि इन हत्याओं के बाद मैजिस्ट्रेट स्तर की जो जाँच चली थी, वह महज एक खानापूरी थी और उसे देखने की भी आवश्यकता नहीं है।

मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों की जाँच को ले कर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने  लगभग साठ साल से इस राज्य में लागू सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम और उसके तहत सुरक्षा बलों को मिले असीमित अधिकारों को प्रश्नांकित किया है। सरकार की इस दलील को अदालत ने खारिज कर दिया  कि अगर सुरक्षा बलों को दंडमुक्ति प्रदान नहीं की गई, तो उन पर विपरीत असर पड़ेगा और उनका ‘मोराल डाउन’ हो सकता है। उलटे उसने केन्द्र सरकार को आत्ममंथन करने की सलाह दी है कि जनतंत्र में साधारण नागरिक को बन्दूक के साए में जीना पड़े तो उस पर इसका कितना विपरीत असर पड़ सकता है।

अदालत के शब्द हैं, ‘इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता कि पीड़ित आम व्यक्ति था या मिलिटेण्ट था या आतंकवादी था, और न ही इस बात से फरक पड़ता है कि आक्रांता आम व्यक्ति था या राज्य था। कानून दोनों ही मामलों में समान रूप से चलना चाहिए, यही जनतंत्र की जरूरत है और कानून का राज तथा व्यक्तिगत आजादियों की रक्षा की आवश्यकता है।’ अदालत ने साफ कहा है कि हथियारबन्द मिलिटेण्ट भी देश के अपने ही नागरिक हैं और उन्हें मार देने का सुरक्षा बलों को कोई अधिकार नहीं है।

फैसले में कहा गया है : ‘आप गौर कर सकते हैं कि विगत कुछ समय से सुरक्षा बलों के हाथों अंजाम दी जा रही फर्जी मुठभेड़ों के सवाल पर बार-बार सरकार को बगलें झाँकना पड़ रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब मणिपुर पुलिस के ही एक रिटायर्ड कमांडो टी हरजोत ने अदालत में तथा रिपोर्टरों के सामने इकबालिया बयान दिया था कि किस तरह उसने अपने वरिष्ठों के आदेश पर राजधानी इम्फाल में एक निहत्थे व्यक्ति संजित को मार डाला था, जो पहले कभी मिलिटेण्ट गतिविधियों में संलिप्त रहा था। उसने उस पुलिस अधिकारी का नाम भी लिया जिसके आदेश पर उसने यह काम किया और जो इस वक्त पुलिस अधीक्षक के तौर पर तैनात है। इम्फाल में हुई इस फर्जी मुठभेड़ की ‘सजीव तस्वीरें’ भी किसी व्यक्ति ने ली थीं, जिन्हें अंग्रेजी पत्रिका ‘तहलका’ तथा अन्य पत्रिकाओं और प्रकाशनों ने अपने पन्नों पर जगह दी थी। इधर राज्य के कुछ हिस्सों से मानव ढाँचे भी बरामद हुए हैं जिनके बारे में कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे उन गायब लोगों के हो सकते हैं जिन्हें सुरक्षा बलों द्वारा मार दिया गया हो और जिनकी उनके परिवारजनों को आज भी तलाश है।’

मणिपुर सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम 1958 में भारत की संसद ने पारित किया था। इसी तरह का कानून जम्मू और कश्मीर, छत्तीसगढ़ तथा अन्य ‘अशांत’ क्षेत्रों के लिए भी बनाया गया है। ‘अशांत’ क्षेत्र की परिभाषा यह है कि जहाँ सरकार के खिलाफ हथियारबन्द संघर्ष हो रहे हैं। इन क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार प्रदान किए गए हैं। ये अधिकार ऐसे हैं जिनके सामने टाडा और पोटा भी फीके लगते हैं। उदाहरण के लिए, अधिनियम की धारा चार किसी कमिशण्ड अफसर, वारण्ट अफसर या नॉन-कमिशण्ड अधिकारी को यह अधिकार देती है कि वह ‘सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गोली भी चला सकता है जिसमें किसी की मौत भी हो सकती है।’ यहाँ तक कि हथियार ले जा रहे व्यक्तियों के खिलाफ और पाँच व्यक्तियों के इकट्ठा होने पर प्रतिबन्ध का उल्लंघन करने पर भी वह गोली चला सकता है। अगर उसकी राय में कोई घर या टीला आतंकवादियों की शरणस्थली हो या इस रूप में उसका इस्तेमाल होने की गुंजाइश हो तो वह उसे ढाँचे को गिरा सकता है। वह बिना किसी वारण्ट के किसी भी व्यक्ति को गिरफतार कर सकता है जिसने उसके मुताबिक कोई संज्ञेय अपराध किया हो या पर्याप्त सन्देह हो कि वह ऐसा करने जा रहा है। अधिनियम की धारा छह बताती है कि इस अधिनियम के तहत काम कर रहे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई केन्द्र सरकार की अनुमति से ही मुमकीन है। स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में सशस्त्र बलों मनमानी या ज्यादती की स्थिति में भी न्याय मिलना लगभग असंभव है।

‘अशांत’ क्षेत्रों की स्थितियाँ लगातार बता रही हैं कि यह कानून अपनी उपयोगिता खो चुका है। इसे लागू करने का तत्कालीन संदर्भ नगा लोगों का आत्मनिर्णय के अधिकार का हथियारबन्द संघर्ष था, मगर विगत आधी सदी में इस तरह के हथियारबन्द संघर्ष का दायरा पूरे उत्तर-पूर्व में फैलता ही गया है। क्या इसे साठ साल से चले आ रहे इस दमनकारी कानून की असफलता नहीं माना जाना चाहिए? हम इस सचाई का सामना क्यों नहीं नहीं करना चाहते कि  जिन मसलों का राजनीतिक समाधान ढूँढ़ा जाना चाहिए, उन्हें हथियारों के बल पर हल नहीं  किया जा सकता?

दिलचस्प है कि 1958 में तत्कालीन लोक सभा में महज तीन घण्टे और राज्य सभा में महज चार घण्टे की चर्चा के बाद इतना कठोर कानून पास कर दिया गया था। विगत 58 सालों से मणिपुर, असम तथा उत्तर-पूर्व के तमाम इलाकों में जारी इस अधिनियम ने अवाम से प्रतिरोध करने, अपने हकों की बहाली के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने या किसी भी किस्म की जनतांत्रिक गतिविधि करने का अधिकार छीन- सा लिया है। उत्तर-पूर्व के लगभग चार करोड़ लोग अघोषित आपातकाल की स्थिति में रहने को मजबूर हैं।

मणिपुर में इस दमनकारी कानून के खिलाफ चल रहे संघर्ष का शानदारर प्रतीक हैं मणिपुरी की कवयित्री इरोम शर्मिला, जिन्होंने विगत 16 साल से अपनी भूख हड़ताल जारी रखी है, और अपने मुँह से पानी का एक घूँट भी नहीं पिया है। उनकी एक ही माँग है, उनके राज्य में लम्बे समय से लागू सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम को हटा दिया जाए। उनके सत्याग्रह को ‘आत्महत्या की कोशिश’ बता कर उन्हें लगातार पुलिस हिरासत में रखा गया है और नाक में डाली गई नलियों से तरल खाद्य पदार्थ जबरन दिया जाता रहा है। इरोम द्वारा इम्फाल से 15-16 किलोमीटर दूर मालोम नामक स्थान पर भूख हड़ताल शुरू करने का कारण यह था कि 2 नवम्बर 2000 को सुरक्षा बलों ने वहाँ  के बस स्टैण्ड पर अंधाधुंध गोलियाँ चला कर दस मासूमों को मार डाला था।

सूचना जगत की स्थिति पर यह एक तीखी टिप्पणी है कि शेष दुनिया को इरोम के इस  अनोखे संघर्ष के बारे में खबर यह भूख हड़ताल शुरू होने के चार साल बाद हुई - थांगजाम मनोरमा नामक मणिपुरी महिला की सुरक्षा बलों के हाथों बलात्कार और हत्या (11 जुलाई 2004) के बाद उठे प्रचण्ड जनाक्रोश के बाद। यह भी संघर्ष का एक अनोखा नमूना था कि सुरक्षा बलों द्वारा किए गए अत्याचारों के खिलाफ लगभग एक दर्जन बुजुर्ग महिलाओं ने असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने बिल्कुल निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किया और बैनर लहराया - ‘भारतीय सेना आओ हम पर अत्याचार करो’, ‘भारतीय सेना हमारे मांस के चिछड़े नोचो’।

‘सैन्यीकरण की मुखालफत और सशस्त्र बल अधिनियम कको हटाने के लिए बनी एक राष्ट्रीय अभियान कमेटी’ ने चन्द साल पहले ठीक ही लिखा था : ‘हथियारबन्द उग्रवादी, एक दूसरे समुदाय के आपस के झगड़े, सुरक्षा बलों के साथ होने वाली मुठभेड़ और दूसरी तरफ पारम्पारिक परिधान में नाचते हुए सुन्दर युवक एवं युवतियाँ। हकीकत यही रही है कि उत्तर-पूर्व हम सभी के लिए परस्परविरोधी प्रतिमाओं का कोलाज रहा है, जो यही बताता है कि उसके पीछे छिपे यथार्थ के बारे में हम कितना कम जानते हैं !’

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त फैसले के बाद भी अगर विशेष अधिकार कानून को वापस नहीं लिया जाता और इरोम शर्मिला को अपना अनशन जारी रखना पड़ता है, तो हमारे जनतंत्र को लानत है।

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सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा बलों  पर तीखी टिप्पणी की
  • अशांत कहे गए इलाकों में हुई हर मौत, जिसमें आम आदमी शामिल हो  या मिलिटेण्ट, की पूरी जाँच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर सीआईडी द्वारा की जानी चाहिए।
  • अशांत कहे गए इलाकों में लगाई गई पाबंदियों का उल्लंघन करनेवाले हर व्यक्ति को दुश्मन करार नहीं दिया जा सकता।
  • अगर जाँच में पता चले कि मारा गया व्यक्ति दुश्मन था, तब भी जाँच चलनी चाहिए कि क्या अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया।
  • सेना का व्यक्ति अपराध करे तो वह पूरी तरह दंडमुक्त रहे, यह अवधारणा सही नहीं है।
  • इस बात में गुणात्मक फरक है कि आप किसी ऑपरेशन या कार्रवाई में बल का प्रयोग करते हैं और मक्खी मारने के लिए मशीनी हथौड़े का प्रयोग करते हैं।