आधुनिक समय की गुलामियाँ : रवींद्र गोयल

"इनके लिए हर सपना बेमानी है। खुली हवा में साँस ले पाना असम्भव। आजादी एक अर्थहीन शब्द।"

ऐतिहासिक तौर पर गुलामी उस स्थिति का परिचायक है जहाँ एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की संपत्ति के रूप में उसके नियंत्रण  में है तथा जहाँ वह दूसरा पहले के जीवन, स्वतंत्रता, और भाग्य को नियंत्रित करता है। इस स्थिति के खिलाफ मानवता के  एक लम्बे संघर्ष के नतीजे के तौर पर करीब 150 साल पहले दुनिया के अधिकांश देशों ने गुलामी पर प्रतिबंध लगा दिया था। गुलामों के व्यापर पर 1888 में रोक लगने वाला अंतिम देश ब्राजील था।

लेकिन यह सोचना कि आज गुलामी दुनिया से खत्म हो गई है, एक भूल होगी। अभी भी करोड़ों लोग गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं। उनकी पहचान के लिए आज दुनिया में दो नजरिए मौजूद हैं। कुछ लोगों का मानना है कि जब भी कोई आदमी ऐसी स्थिति में हो जहाँ वह दूसरे को अपने परिश्रम का लाभ देने के लिए मजबूर है तो उसे गुलाम ही माना जाना चाहिए। इससे कोई महत्वपूर्ण फर्क नहीं पड़ता कि वह दूसरे का गुलाम किन हालात में है। वह चाहे मालिक की संपत्ति है या मजदूरी के बंधन में है, सारतः गुलाम ही है। इस अर्थ में दुनिया की बहुसंख्यक आबादी आज भी गुलाम है और तब तक गुलाम रहने को अभिशप्त है जब तक उत्पादन के साधनों पर, जो उनकी मेहनत का माध्यम हैं, उनका स्वामित्व नहीं हो जाता,  वे स्वयं अपनी मेहनत का उपयोग अपने फायदे के लिए नहीं करने लगते। 'मजदूर' फिल्म में दिलीप कुमार द्वारा गाया हुआ वह गीत याद आता है जिसमें वे कहते हैं – ‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा  माँगेंगे, एक बाग नहीं एक खेत नहीं, हम सारी दुनिया माँगेंगे।’ लेकिन यह चिंतन वामपंथी कार्यकर्ताओं और विचारकों का है।

दूसरे अर्थ में गुलामी की बात यूनाइटेड नेशन्स द्वारा 2007 में पारित  ग्लोबल इनीशिएटिव टू फाइट ह्यूमन ट्रैफिकिंग के बाद से शुरू हुई है। यह सोच विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं या गैरसरकारी संगठनों  में प्रचलित है और आजकल  आम प्रयोग में या पत्रकारिता की भाषा में भी इसी सोच का इस्तेमाल होता है। यह अवधारणा सीमित अर्थों में गुलामी की बात करती है। यह धारणा मुख्य रूप से 1956 में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन द्वारा आयोजित सप्लीमेंटरी कनवेंशन ऑन द एबोल्यूशन ऑफ स्लेवरी, द स्लेव ट्रेड, एंड इंस्टीट्यूशंस एंड प्रेक्टिसेज सिमिलर टू स्लेवरी में स्वीकृत गुलामी की परिभाषा को अपना मार्गदर्शक मानती है। इस परिभाषा के अनुसार, ‘ऋण बंधन, दासत्व, जबरन शादी और शोषण के लिए किसी बच्चे की डिलीवरी’ ये सभी गुलामी की तरह के व्यवहार हैं और इन्हें अपराध करार दे कर समाप्त करना चाहिए।’ समय के साथ मानव तस्करी और बच्चों की गुलामी को भी इसके दायरे में शामिल कर लिया गया। 

वर्तमान समय में ग़ुलामी के कुछ महत्वपूर्ण रूप निम्न हैं :
  • बँधुआ मजदूर :  जो कर्ज वापस न कर पाने की स्थिति में कर्ज अदायगी की एवज में मुफ्त में काम करने को अभिशप्त हैं। कई बार कोई आदमी कर्ज का भुगतान करने के पहले ही मर जाता है, तब उसकी अगली पीढ़ी भी बँधुआ हो जाती है और कर्ज अदायगी के नाम पर मुफ्त में काम करती है।  
  • बेगार : जहाँ लोगों को काम करने के लिए आम तौर पर कोई भुगतान नहीं दिया जाता और वे हिंसा या धमकी की वजह से काम करने को मजबूर हो जाते हैं। कई लोग स्वयं को विदेशी देश में बिना जरूरी कागजात के अपने को फँसा पाते हैं और देश छोड़ सकने की असमर्थता के चलते बेगार करने को मजबूर हैं।
  • मानव तस्करी : किसी को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बरगला कर ले जाना और उसे गुलामी के हालात में काम करने को मजबूर करना या औरों को सौंप देना। उदहारण के लिए वेश्यावृत्ति  के लिए नेपाल, बंगाल आदि क्षेत्रों से बहुत-सी स्त्रियों की तस्करी होती है। फिलीपींस, थाईलैंड, श्रीलंका आदि देशों में बाल वेश्यावृत्ति की गिनती इसी में करनी चाहिए।
  • बाल गुलामी : बच्चों का इस्तेमाल गुलाम के रूप में घरेलू काम या यौन शोषण या कोको, कपास और मत्स्य पालन उद्योगों में या बाल सैनिकों की तरह  किया जाता है। जो अखबारों में बार-बार घर के पड़ोस में खेलते हुए बच्चों के गायब होने की खबरें आती हैं उनमें से ज्यादातर बच्चों का यही हश्र होता है।
  • महिलाओं की जबरन शादी : महिलाओं की सहमति के बिना कम उम्र में  जबरन शादी कर दी जाती है और वे यौन शोषण और घरेलू दासता की हालत में जीवन बिताने को अभीशप्त हो जाती हैं। इनके लिए हर सपना बेमानी है। खुली हवा में साँस ले पाना असम्भव। आजादी एक अर्थहीन शब्द। भारत में बाल गुलामी और बाल श्रम के खात्मे के लिए लड़ने वाले नोबेल प्राइज विजेता कैलाश सत्यार्थी ने पत्थर खदान में कार्यरत बँधुआ मजदूरों के बारे में बताते हुए सही ही कहा है कि इनके लिए स्वतंत्रता का एहसास या अर्थ समझ पाना मुश्किल है क्योंकि ये इन्हीं हालात में पले-बढ़े हैं।
  • कितने ग़ुलाम : गैरकानूनी होने के वजह से आज के समय में ग़ुलाम आबादी का आकलन मुश्किल है। 2012 के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक आकलन के अनुसार दुनिया में दो करोड़ दस लाख के करीब गुलाम थे। यानी हर हजार आदमियों पर तीन आदमी ग़ुलामी का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
हालिया समय में ऑस्ट्रेलिया आधारित संस्था वॉक फ्री फाइंडेशन ने  आकलन किया है कि 2016 में दुनिया में गुलामों-सा जीवन जी रहे व्यक्तियों की संख्या चार करोड़ अठावन लाख है। यह भी ज्ञात रहे कि इस संगठन के अनुसार यह संख्या बढ़ोतरी पर है। 2014 में इस संस्था ने गुलामों-सा जीवन जी रहे व्यक्तियों की संख्या तीन करोड़ अठावन लाख आँकी थी। रिपोर्ट के अनुसार गुलाम आबादी कई देशों में पाई जाती है, लेकिन  इस गुलाम आबादी  के सबसे ज्यादा लोग भारत देश में रहते हैं (एक करोड़ अस्सी लाख)। आधुनिक गुलामी के सभी रूप भारत में मौजूद हैं - बँधुआ मजदूरी, जबरन बाल श्रम, वाणिज्यिक यौन शोषण, जबरन भीख मँगवाना, गैर-राज्य सशस्त्र समूहों में जबरदस्ती भर्ती, जबरन शादी आदि। रिपोर्ट कहती है कि भारत में ग़ुलाम श्रम का उपयोग निर्माण, वेश्यावृत्ति, मछली पकड़ने और विनिर्माण उद्योगों के साथ-साथ घरेलू नौकर और जबरन भीख  मँगवाने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट ने पाया कि भारत में देश के ईंट बनाने के कारोबार में (भट्टा उद्योग में)  सबसे ज्यादा गुलाम आबादी है। देश की  जनसंख्या वृद्धि और बुनियादी ढाँचे के सुधार तथा आवासों के लिए बढ़ती माँग के चलते इन 'खून से लिपटी  ईंटों'  की माँग में कोई कमी नहीं आ रही है।

इस मानव-द्रोही गुलामी की प्रथा के खात्मे की लड़ाई के लिए अतीत में प्रचलित और आज की गुलामी के फर्क को रेखांकित करना होगा। अतीत में कृषि और पशुपालन आधारित व्यवस्था के काम कराने के लिए लड़ाई में जीते हुए सैनिकों या विरोधी कबीले के लोगों को जीत कर गुलाम बनाया जाता था। कभी-कभी मनोरंजन के लिए ग्लैडिएटर्स के रूप में लड़ने के लिए भी इन्हें प्रशिक्षित किया जाता था। इस अमानवीय प्रथा को उचित ठहराने के लिए तत्कालीन समाज ने तर्क भी पर्याप्त गढ़ लिए थे। यूनानी दार्शनिक अरस्तू कहता था कि गुलाम वह है जिसमें स्वतंत्रता के लिए आवश्यक आत्मा के उच्च गुणों का अभाव है। ईसाई दुनिया में, गुलामी के लिए सबसे महत्वपूर्ण तर्क था ‘हाम का अभिशाप’। इस सिद्धांत के अनुसार, बाइबिल में हजरात नूह ने अपने बेटे हाम को शैतानी स्याह रंग और गुलामी का शाप दिया था और तभी से गुलाम उसी शाप को ढो  रहे हैं। यानी गुलामी बाइबिल के द्वारा मान्य है। और, अठारहवीं सदी तक आते-आते गुलामी के लिए छद्म वैज्ञानिक तर्क भी विकसित कर लिए गए। कहा जाता था कि गुलामों का दिमाग नहीं होता, वे किसी काम के लायक नहीं होते और गुलामी गुलामों के फायदे के लिए ही है।

लेकिन आज की गुलामी पूँजी के पहिए से बँधी है। गुलाम सस्ते श्रम और मुनाफे का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। आईएलओ के 2012 के आकलन के अनुसार गुलामी के चलते पूँजीपतियों को हर साल 126000 करोड़ रुपए (21बिलियन डॉलर) का मुनाफा होता है। आज तो यह राशि और भी ज्यादा होगी।

लेकिन वर्तमान समय में, अतीत की तरह, किसी भी तरह की गुलामी के पक्ष में कोई तर्क नहीं है। अधिकांश देशों में गुलामी प्रतिबंधित है। गुलाम श्रम से फायदा उठने वाले लोग भी चोरी से ही ऐसा करते हैं। यदि गुलामी चल रही है तो इसलिए कि लोगों में चेतना कम है और संगठित आंदोलन/आवाज के आभाव में सरकारों को अपने ही कानूनों को लागू करने के लिए बाध्य करना कठिन है। और न ही इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही कोई दबाव बनाया जा सकता है। वरना आज  सार्वभौमिक सहमति है कि गुलामी को समाप्त होना चाहिए। जाहिर है, गुलामी से फायदा उठने वाली शक्तियाँ घोषित रूप से अपराधी हैं, लेकिन वे इतनी मजबूत हैं कि उन्हें आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता।

अली सरदार जाफरी की एक मशहूर नज्म का मुखड़ा याद आता  है :
कौन आजाद  हुआ
किसके माथे से सियाही छूटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
मादरे-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही


बेशक यह सवाल उन्होंने 1948 में उठाया था। पर  हालात इस नई सदी में भी नहीं बदले है। आजादी के 70 साल बाद भी। शायर खखलीलुर्रहमान आजमी दुरुस्त फरमाते हैं :

अभी वही है निजामे-कोहना अभी तो जुल्मो-सितम वही है
अभी मैं किस तरह मुस्कुराऊँ अभी तो रंजो-अलम वही है