स्वतंत्रता का अर्थ : राजकिशोर

स्वतंत्रता होती नहीं है, महसूस की जाती है। अँग्रेज भारत से गए, इसके पहले से ही भारत के बहुत-से लोगों ने  अपने को स्वतंत्र अनुभव करना शुरू कर दिया था। गाँधी जी को भारत की पराधीनता का पूरा एहसास था, पर जब वे बोलते थे, एक स्वाधीन व्यक्ति की तरह बोलते थे। तिलक की भाषा ऐसी ही थी और सुभाष की भी। वास्तव में, जो  भीतर से स्वतंत्र है, वही स्वतंत्रतापूर्वक जी सकता है। अगर किसी की आत्मा में स्वतंत्रता का भाव नहीं है, तो वह अनुकूल से अनुकूल परिस्थिति में भी दास की तरह आचरण करता है। कह सकते हैं कि वह किसी और का नहीं, अपना ही गुलाम है। ऐसे लोग सर्वत्र पाए जाते हैं। इनकी एक बहुत बड़ी सामाजिक भूमिका होती है – उनकी राह मुश्किल बनाना जो इतर कारणों से सहमत होने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन इतिहास की गति बताती है कि जब परिवर्तन की जमीन तैयार हो जाती है, तब बड़े से बड़ा शक्तिशाली पुरुष असहाय हो जाता है। विक्टर ह्यूगो का कहना है, जिस विचार का समय आ गया है, उसे दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत रोक नहीं सकती। स्वतंत्रता एक ऐसा ही विचार है।

लेकिन किसी विचार का समय आता कैसे है? क्या इतिहास एक के बाद एक तहा कर रखे हुए विचारों का ढेर है, जिसमें एक विचार अप्रासंगिक हो जाता है, तो उसका स्थान लेने के लिए दूसरा विचार सामने आ जाता है? क्या फ्रेंच क्रांति इतिहास के किसी पन्ने पर लिखी हुई थी जो ठीक उसी समय घटित होती जो उसकेलिए तय कर दिया गया था?  इतिहास की गति किसी न किसी तर्क पर आधारित होती है – क्योंकि उसका विषय मानवकार्य कलाप है जो तर्क से ही परिचालित होता है, भले ही वह भावना का ही तर्क हो।  परंतु इतिहास का देवता हमारे चित्रगुप्त जितना कुशल नहीं है कि वह विस्तार में जा कर एक-एक व्यक्ति या एक-एक स्थान की नियति तय कर दें। फ्रेंच क्रांति जैसी घटना कहीं न कहीं होती जरूर – वह यूरोप में न हो कर एशिया में भी हो सकती थी,  क्योंकि वह  वह जनता के लिए कठिन समय में सामंतवाद की ज्यादती के प्रति जन गुस्से की अभिव्यक्ति थी और ऐसी ज्यादती कहीं भी हो सकती थी। लेकिन यह यों ही नहीं होता – इसके पीछे विचारकों, लेखकों और कलाकारों की प्रेरणा और संगठनकर्ताओं का उद्यम होता।  विचार और कर्म दोनों आगे-पीछे या साथ-साथ चलते हैं। लेकिन यह भी सच है कि दास प्रथा दुनिया में सभी जगह थी, पर स्पार्टाकस एक ही जगह पैदा हुआ।

यह एक भ्रम है कि जो जितना गरीब है, वह उतना ही स्वतंत्र है। गरीबी का स्वतंत्रता से कोई संबंध नहीं है। बल्कि वह आदमी को परतंत्र बनाती है। या यों कहें कि गरीब वे होते हैं जिनकी स्वतंत्रता छीन ली गई होती है। भूमिहीन किसान गरीब होता है, क्योंकि खेत वही जोतता है, पर भूमि उसकी नहीं होती। बेरोजगार आदमी गरीब होता है, क्योंकि उसे उन जगहों पर प्रवेश से वंचित कर दिया गया होता है, जहाँ उसके श्रम का उपयोग हो सकता है। अंततः सब से गरीब भिखारी होता है, क्योंकि उसके हाथ में भीख के कटोरे के सिवा कुछ भी नहीं होता। मध्य युग के साहित्य में गरीबी का महिमान्वयन इसलिए किया गया है कि वह सामूहिक गरीबी का युग था और संतोष को एक मूल्य के रूप में स्थापित करने के अलावा कोई चारा नहीं था। जो अपनी निर्धनता से असंतुष्ट था और उसे दूर करने के लिए प्रयास करना चाहता था, उसकी नैतिकता को शक की निगाह से देखा जाता था। यही कारण है कि उन दिनों के साधु-संत भी प्रायः गरीब हुआ करते थे, जबकि आज ठीक इसका उलटा है।

एक स्थिति जरूर है, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि जिसके पास कुछ नहीं है, वास्तव में वही स्वतंत्र है। चाह गई चिंता मिटी, मनुवा बेपरवाह। जिनको कछू न चाहिए सोई शाहंशाह। लेकिन इस अर्थ में शहंशाह नहीं कि वह अपनी हर इच्छा को पूरा कर सकता है, बल्कि इस अर्थ में कि  उसकी कोई ऐसी इच्छा ही नहीं है जो  उसे पूरा करने के लिए उकसाती हो और उस जंजाल की ओर ले जाती हो जिसका नाम दुनिया है। निस्पृह हो जाने की शिक्षा भारतीय दर्शन में लंबे समय से दी जाती रही है, हालाँकि वेदों में निस्पृहता नहीं, सक्रिया का वातावरण है। बाद में पता नहीं कैसे यह विचार मजबूत होता गया कि  इच्छा ही बंधन है। इच्छा पाप है। जिसने कामना की, वह मिट गया। जिसने कुछ नहीं चाहा, वह बच गया। लेकिन यह स्वतंत्रता नहीं है, मुक्ति है। भारत में मुक्ति की उपासना होती आई है। इसीलिए यहाँ स्वतंत्रता को यथावश्यक महत्व नहीं दिया गया। मुक्ति संसार  से तट-स्थता है, संसार में रहते हुए भी संसार से आउट हो जाना है, जबकि स्वतंत्रता संसार में रहते हुए समस्स्त कठिनाइयों और बाधाओं से संघर्ष करते हुए जीने का आनंद है। मनुष्य को इस आनंद से वंचित रखना अध्यात्म नहीं, आध्यात्मिक षड्यंत्र है, जो दुनिया के हर देश में देखा जाता है, क्योंकि सामूहिक गरीबी के समय में, जब जीवन कठिन हो और इच्छाएँ कठिन, इच्छाओं से मुक्ति का दर्शनही सब से ज्यादा प्रभावी हो सकता था। अकारण नहीं कि आज का दर्शन यह है – लालच सुंदर है (ग्रीड इज गुड)।

धर्म ने मनुष्य की स्वतंत्रता को सब से ज्यादा क्षति पहुँचाई है और मनुष्य को सब से ज्यादा स्वतंत्र किया है वैज्ञानिक चिंतन ने। इसने न केवल हमारे मानसिक जगत में उथल-पुथल मचाई है, बल्कि हमारे भौतिक जीवन को भी समृद्ध किया है। प्रत्येक उत्पाद, किसी न किसी स्तर पर, हमें मुक्त करता है। साइकिल हमें मुक्त करती है, मोटरकार हमें मुक्त करती है, रेलगाड़ी और हवाई जहाज भी हमें मुक्त करते हैं। जो प्रकृति की परवशताओं यानी मानव  की प्राकृतिक सीमाओं से जितना ज्यादा मुक्त है, वह उतना ही ज्यादा स्वतंत्र है। अमेरिका के वह धनिक जिसके पास अपना हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर है, बाँग्लादेश के उस किसान से ज्यादा स्वतंत्र है जिसके पास यात्रा करने के लिए सिर्फ उसके दो पाँव, साइकिल या बैलगाड़ी है। यह जरूर है कि उस धनिक को अपनी यह हैसियत बनाए रखने के लिए पचास तरह के पापड़ बेलने पड़ते है। यह संपन्न वर्ग की पराधीनता है। पैसा पेड़ पर नहीं उगता।

लेकिन क्या हमें वास्तव में इतनी रेलगाड़ियों और हवाई जहाजों की जरूरत है? क्या इनसे की गई अधिकांश यात्राएँ वास्तव में जरूरी हैं? अगर नौकरशाही और उद्योग-धंधों का जाल इतना विस्तृत और फैला न होता, तो कितने लोग इन वाहनों से लंबी यात्राएँ करते?

मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो  गाज़ियाबाद से गुड़गॉव (लगभग 60 किमी)  काम करने जाते हैं। मैं ऐसे कुछ लोगों को भी जानता हूँ, जो गुड़गॉव से नोएडा काम करने आते हैं। दफ्तर बंद होने पर एक जत्था नोएडा से गुड़गॉव की गाड़ी पर बैठता है और दूसरा गुड़गॉव से गाज़ियाबाद की गाड़ी पर। क्या लोगों को उनके घर के निकट ही रोजगार दे कर इस तरह के अपार श्रम, समय और पैसे की बरबादी रोकी नहीं जा सकती? अगर ऐसा होता है, तब अनेक गाड़ियों का चलना बंद भी किया जा सकता है। जाहिर है, जो चीज स्वतंत्र बनाती है, वह परतंत्र भी बना सकती है –अगर  बुद्धमानी से उसका प्रयोग न किया जाए। जिस तरह अभाव की समस्याएँ हैं, उसी तरह अधिकता की भी समस्याएँ हैं। प्रकृति का दोहन करते हुए हम एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गए हैं जहाँ प्रकृति में परिवर्तन से हमारे अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है। इसका अधिकार किसे था?

अभी  तक किस चीज से स्वतंत्रता, इस पर ज्यादा विचार किया गया है, इस पर कम कि किस चीज के लिए स्वतंत्रता। मसलन अभाव से स्वतंत्रता, बीमारी से स्वतंत्रता, आतंक से स्वतंत्रता आदि। अमेरिका के राष्ट्र्पति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने 1941 में दुनिया भर में चार स्वतंत्रताओं की पेशकश की थी – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उपासना की स्वतंत्रता,अभाव से स्वतंत्रता और भय से स्वतंत्रता। आश्चर्य की बात है कि तब पहला विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था और दूसरे विश्वयुद्ध की भूमिका बन रही थी, फिर भी रूजवेल्ट ने ‘युद्ध से स्वतंत्रता’ की बात नहीं की। आज हम इतने जागरूक हो चुके हैं कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के अस्तित्व की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं। यह स्वतंत्रता की भावना का विस्तार है, जो किसी भी स्वतंत्र व्यक्तित्व का पहला गुण है। जो स्वतंत्रता के साथ  जीने के महत्व को समझता है, वह दूसरों को भी स्वतंत्र करना चाहेगा। लेकिन किस चीज के लिए? कैसा जीवन वरण करने के योग्य है?

यह प्रश्न तब ज्यादा पूछा जाता था, जब दुनिया भर में वस्तुओं और विकल्पों की कमी थी। तब धर्मोपदेशकों, विचारकों और मनीषियों का प्रमुख काम यह बताना था कि कैसे जिया जाए। सत्यं वद। धर्मं चर। किसी को दुख न दो। किसी का उपहास न करो। पैसा मत जमा करो, क्योंकि सूई की नोक से ऊँट निकल जा सकता है, पर अमीर आदमी स्वर्ग नहीं जा सकता। तब स्वर्ग जाने के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार थे। आज स्वर्ग-नरक की बात ही समाप्त हो गई है। लोग कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं। विद्वान जीने की कला नहीं, सफलता की कला सिखाते हैं। सुखी होने के फार्मूले लोकप्रिय हो रहे हैं, मानो यह भी कोई गुणा-भाग की वस्तु हो। दास्तोव्यस्की ने ठीक ही सवाल किया था कि ईश्वर नहीं है, तो क्या हम कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं? जब तक हमें यह नहीं मालूम होगा कि स्वतंत्रता किसलिए, तब तक इसका दुरुपयोग होने की संभावना बनी रहेगी। निःसंदेह मानव अधिकारों की धारणा में मानव कर्तव्य भी शामिल हैं, पर  यहाँ भी वही सवाल सिर उठाता है : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर क्या अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता?  इसके अलावा, जिन्हें कुछ कहना ही नहीं है, उनके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है, यद्यपि इस वजह से यह स्वतंत्रता उनसे छीन लेने का कोई तुक नहीं है, क्योंकि जरूरी नहीं कि जो  आज नहीं बोल रहा है, वह कल भी न बोले। स्त्रियों और बच्चों के अधिकारों पर यह बात ज्यादा लागू होती है।

स्वतंत्रता ईश्वर या प्रकृति का उपहार नहीं है। यह मनुष्य की रचना है और इसकी बनावट में मनुष्य की अपूर्णताएँ भी शामिल हैं। स्वतंत्रता की कोई भी अंतिम परिभाषा नहीं की जा सकती, क्योंकि इसके विविध आयामों को समझने का प्रयास अभी भी जारी है। जैसे जॉन राल्स कहते हैं कि स्वतंत्रता को न्याय से अलग नहीं किया जा सकता। अर्थात वह स्वतंत्रता नहीं है, जिससे समाज में अन्याय फैलता हो या न्याय की क्षति होती हो। भारत में आरक्षण एक ऐसा ही मामला है। पूछने लायक सवाल यह है कि आरक्षण समाज को ज्यादा स्वतंत्र बनाता है या उसकी स्वतंत्रता में सेंध लगाता है। अमर्त्य सेन स्वतंत्रता को विकास के अधिकार से जोड़ते हैं। हर आदमी को आधुनिक सुविधाओं का उपभोग करने का अधिकार है – क्योंकि स्वतंत्रता में यह बात अंतर्निहित है कि सभी मनुष्यों को  एक जैसी स्वतंत्रता है, लेकिन उन तक पहुँच दुनिया की बीस-तीस प्रतिशत आबादी को है। क्या यह बाकी लोगों की स्वतंत्रता का हनन नहीं है?  स्वतंत्रता के साथ समानता के प्रश्न अनिवार्य रूप से गुँथे हुए हैं, क्योंकि एक असमान दुनिया में स्वतंत्रता का उपभोग कुछ ही लोग कर सकते हैं।

कठिनाई यह है कि मानव स्वभाव में परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं।आदमी अपने को स्वतंत्र देखना चाहता है, पर दूसरों को गुलाम बना कर उसे खुशी होती है। यही वजह है कि स्वतंत्रता के लिए किए जाने वाले संघर्ष गुलामी की व्यवस्था भी पैदा कर सकते हैं। साम्यवाद के इस दोष के कारण एक महान दर्शन होते हुए भी उसकी ग्राह्यता कम है। अब तो यह प्रश्न भी उठने लगा है कि क्या लोकतांत्रिक समाजों में भी मानव स्वतंत्रता के लिए खतरा नहीं है। सत्य का सम्मान किए बिना स्वतंत्रता को समझा नहीं जा सकता। तानाशाही हमेशा झूठ के पैरों से ही चलती है। आज स्वार्थ-प्रेरित सूचनाओं की बहुलता के कारण यह पता लगाना कठिन हो गया है कि सत्य क्या है। हम राज्य की तानाशाही से ज्यादा उद्योग की तानाशाही से आक्रांत हैं। यह तानाशाही हमारे विकल्पों को सीमित करती जा रही है। स्वतंत्रता तभी है जब कई विकल्पों में चयन करने की आजादी हो। आखिर, स्वतंत्रता का अनुभव मन से होता है, पर उसकी परिस्थितियाँ हम से बाहर होती हैं। इसलिए स्वतंत्रता की चाह रखने वाले व्यक्तियों की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि वे ऐसी परिस्थितियों के निर्माण में भागीदारी करें जिनमें हर किसी को एक जैसा स्वतंत्र होने की सुविधा हो। जब तक एक की स्वतंत्रता संकट में है, तब तक सभी की स्वतंत्रता खतरे में है।