स्वाधीनता का सिनेमा : सुनीता दुबे

सुनीता दुबे
सिनेमा स्वभाव से ही स्वतंत्रता का माध्यम है। सिनेमा का जन्म जब हुआ, पूँजीवाद का काफी विकास हो चुका था। विज्ञान और टेक्नोलॉजी भी काफी उन्नत हो चुके थे। दरअसल, एक खास स्तर की तकनीकी प्रगति के बिना सिनेमा संभव ही नहीं था। औद्योगिक क्रांति के साथ जिस वैचारिक परिवर्तन की भूमिका बनी, उसे वहन करने और मजबूत बनाने में सिनेमा की भूमिका निर्णायक थी।

सच कहा जाए तो पश्चिम में रूढ़ नैतिकताओं और जर्जर मान्यताओं के खिलाफ साहित्य ने जितनी जन चेतना पैदा की, सिनेमा ने उससे ज्यादा किया। यह जन माध्यम है। इसलिए साहित्य की अपेक्षा यह जनता तक ज्यादा तेजी से और अधिक व्यापक स्तर पर फैलता है। जन माध्यम के रूप में सिनेमा ने एक नई आलोचनात्मक मानसिकता पैदा की और खासकर युवा पीढ़ी को झकझोर दिया। भारत में भी सिनेमा लगातार परिवर्तनवादी होता गया है। शुरू में अवश्य धार्मिक और जादू तथा तंत्र-मंत्र पर आधारित फिल्में ज्यादा बनीं, पर उनमें भी कुछ प्रगतिशील संदेश रहता था। बाद में तो, जब भारतीय सिनेमा अपनी रूढ़ियों से मुक्त हुआ और उसने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व अख्तियार किया, वह वास्तव में ‘जीवन की आलोचना‘ और नए मूल्यों के अन्वेषण का माध्यम हो गया। यह जरूर है कि सिनेमा के इस बोध का विकास क्रमशः हुआ। प्रगतिशीलता आई तो उसके विचलन भी दिखाई पड़े। इधर की कुछ फिल्में इस बोध को तीखे ढंग से व्यक्त कर रही हैं।

सब से सशक्त कला माध्यम सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहता, लेकिन यहाँ भी स्वाधीनता के केवल दो रूपों के इर्द-गिर्द ही बहुलांश सिनेमा घूमता है। पहला अंग्रेजों से देश की आजादी और दूसरा प्रगतिशील (मार्क्सवादी) आन्दोलन के प्रभाव में जमींदारो से किसानों की आजादी। अंग्रेज खलनायक और भारतीय नायक, मुम्बइया सिनेमा का दो दशक पूर्व तक (फिल्म ‘मर्द’ तक) सुपरहिट फार्मूला रहा। मनोज कुमार इसके प्रतीक पुरुष के रूप में उभरे। यहाँ भी ज्यादातर फिल्मों में देश की स्वाधीनता का सतही रूप ही सामने आता था। व्यापक और गहरे अर्थों में देश की स्वाधीनता की चेतना का नामोनिशान भी नहीं दिखता, जब देश के शासकों ने 1990-1991 में यूरोप और अमेरिका (पश्चिम) को गले लगाया तो रातों-रात अंग्रेज विरोध गायब हो गया, अब तो वे अपने हो गए थे, हमारे आदर्श बन गए थे, ज्यादा से ज्यादा उन्हें क्रिकेट में पराजित करने की देशभक्ति का या स्वाधीनता की चेतना ‘लगान’ जैसी फिल्म में आती है। धीरे-धीरे देश की स्वाधीनता को सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान और मुसलमान बन गए। पाकिस्तान और आतंकी मुसलमानों को पराजित करने का फार्मूला सुपर-डूपर हिट का फार्मूला बन गया, सैकड़ों फिल्मों में हमारे बाहुबली फिल्मी नायकों ने पाकिस्तान को रौंद दिया। ‘गदर’ जैसी फिल्मों में तो सन्नी देओल जैसे महानायक सीधे पाकिस्तान में घुस कर अकेले ही सबको पराजित कर देते हैं। पाकिस्तान और मुसलमान को रौंदने-हराने  के भारतीयों के सुख को भुना कर फिल्मकारों ने अरबो –खरबों अपनी झोली में डाल लिए। अभी हाल  में ‘बजरंगी भाईजान’ में सलमान खान भी पाकिस्तान में घुस कर सब को पराजित कर सकुशल वापस आ गए हैं और करोड़ों कमा लिए हैं। देश की स्वाधीनता का प्रश्न फिलहाल हिंदी सिनेमा में पाकिस्तान तथा तथाकथित आतंकी मुसलमान तक ही सीमित है। चीन की तरफ तो नजर ही नहीं जाती, क्योंकि  पराजय को याद करना (1962 की हार) या अपने से ताकतवर से टकराने की सोचना भारतीय मनोविज्ञान के खिलाफ है।

रही बात व्यक्तियों और समुदायों की स्वाधीनता की, तो इस दिशा में हिंदी सिनेमा ने कुछ प्रगति की है। वैसे तो आज भी हिंदी की अधिकांश फिल्मों में स्त्री की पराधीनता या जाति श्रेणी क्रम से पैदा हुई पराधीनता या व्यक्ति के मूल  प्राकृतिक अधिकारों के साथ जीने की स्वाधीनता का प्रश्न कोई खास मायने नहीं रखता। स्त्री वहाँ आज भी पुरुष के साथ अधीनता में ही जीती दिखाई जाती है। मुम्बइया सिनेमा के अधिकांश स्त्री पात्र पतिपरायण स्त्रियाँ हैं या पुरुष की कामुकता को उत्तेजित करने वाली गुड़िया हैं या दोनों का मेल हैं यानी सीता, राधा और सनी लिओन की खिचड़ी।

इस सब के बावजूद पिछले वर्षों (2015-2016) में मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में कुछ ऐसी शानदार फिल्में आई हैं जो बनी-बनाई परिपाटी को तोड़ रही हैं, जाति के प्रश्न को अपने विमर्श का प्रश्न बना रही हैं, सम्पूर्ण स्त्री जाति की स्वाधीनतापूर्वक बेखौफ जीने की आजादी के प्रश्न को पुरजोर तरीके से उठा रही हैं। इस तरह की फिल्मों का प्रतिनिधित्व करती फिल्में एंग्री इंडियन गाडेस, अलीगढ़ तथा मसान हैं।

'मसान' फिल्म का एक दृश्य
भारतीय व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वाधीनता को कुचलने वाला सब से बड़ा विधि-निषेध सेक्स संबंधों की शुचितावादी धारणा है। ये फिल्में भारतीय आदमी के सबसे  केन्द्रीय  मूल्य पर चोट करती हैं। ‘एंग्री इंडियन गाडेस’ की सभी स्त्रियाँ यौन शुचिता के सभी आदर्श को तार-तार कर देती हैं। वे पर पुरुष को देख कर आहें भरती हैं, यहाँ तक कि उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कल्पना में खो जाती हैं। उनमें से दो लड़कियाँ आपस में शादी भी कर लेती हैं क्योंकि वे समलैंगिक हैं। यौन शुचिता के निषेध को तार-तार करने के साथ ही, खान-पान तथा ढंग के कपड़े पहनने की पराधीनता को धता बताती हैं, जम कर शराब पीती हैं, सिगरेट पीती हैं। मनचाहे कपड़े पहनती हैं। वे वह सब करती हैं जिन पर सिर्फ पुरुषों का अधिकार माना जाता रहा है। वे न केवल भारतीय संस्कृति के पराधीनतावादी मूल्यों से बेखौफ आजाद हैं, बल्कि आर्थिक तौर पर भी आत्मनिर्भर हैं। पान नलिन की यह फिल्म आजाद स्त्रियों की दुनिया रचती है, स्त्री स्वाधीनता इस फिल्म का सबसे बड़ा मूल्य है। हर स्वाधीनता की कीमत चुकानी पड़ती है, इस फिल्म की लड़कियाँ भी वह कीमत चुकाती है। फिल्म ‘मसान’ सेक्स, प्रेम तथा जाति के मामले की स्वाधीनता को अपना विषय बनाती है। फिल्म शुरू में ही इस बात को स्थापित कर देती है कि दो बालिग लोगों को इस बात की पूरी स्वाधीनता है कि वे किससे शारीरिक संबंध बनाते हैं, सिर्फ सेक्स सुख के लिए या प्रेम के लिए। इस बात से समाज का कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। यह उनका नैसर्गिक अधिकार है। इस अधिकार पर किसी का, किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाना, उनकी स्वाधीनता को छीनना है। इतना ही नहीं, जो दो जोड़े आपसी सहमति से सेक्स सम्बन्ध बनाते हैं उनमें लड़का (पीयूष अग्रवाल) भले ही सामाजिक भयवश आत्महत्या कर लेता है लेकिन लड़की खुलेआम कहती है कि यह उसका नैसर्गिक अधिकार है और उसने ऐसा करके कुछ भी गलत नहीं किया है। वह सेक्स और प्रेम की अपनी स्वाधीनता के लिए साहस के साथ संघर्ष करती है। इसी फिल्म में डोम जाति के लड़के और गुप्ता परिवार की लड़की  के बीच के प्रेम को भी फिल्मकार ने अपना विषय बनाया। कलात्मक कौशल के साथ फिल्म यह संप्रेषित करने में सफल रही कि जाति और योनि शुचिता की धारणा से मुक्त हुए बिना भारतीय आदमी स्वाधीन हो ही नहीं सकता और न किसी को स्वाधीन रहने दे सकता है।

तीसरी फिल्म ‘अलीगढ़’ तो भारतीयों की सेक्स सम्बन्धी सारे महान आदर्शों और धारणाओं को चुनौती दे कर उसे भीतर तक मर्माहत कर देती है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का मराठी का प्रोफेसर ‘गे’ है, उसका ‘गे होना लोगों पर वज्रपात की तरह टूटता है। पढ़े-लिखे, अनपढ़, सभ्य तथा असभ्य सभी लोग उस पर  टूट पड़ते हैं। उसका जीना हराम कर देते हैं। फिल्मकार पूरी तरह से प्रोफेसर श्रीनिवास रामचन्द्र के साथ है। दर्शकों को भी सेक्स पार्टनर चुनने  तथा अपनी तरह से जीने की उसकी स्वाधीनता के साथ, खड़ा कर देता है। तीनों फिल्में व्यक्तिगत स्वाधीनता के प्रश्न को मुखरता से उठाती हैं और अत्यन्त कलात्मकता के साथ उन्हें प्रस्तुत करती हैं। कलात्मक माध्यम के तौर पर सिनेमा की ताकत का ऐसा इस्तमाल करती हैं कि दर्शक स्त्री की स्वाधीनता, जतिबंधन से मुक्ति और लेस्बियन तथा गे संबंधों के पक्ष में खड़ा हो जाता है। यह भूल ही जाता है कि रोजमर्रा की जिन्दगी में जीवन-मरण का प्रश्न बने हुए उसके मूल्यों की ऐसी की तैसी हो रही है, उसकी तथाकथित महान संस्कृति को ये फिल्में रसातल में ले जा रही हैं।

ये तीन फिल्में हिंदी सिनेमा के लिए कोई अजूबी या अनोखी चीज नहीं रह गई हैं। ऐसी और भी फिल्में बन रही हैं। इसका कारण यह है कि समाजके एक छोटे हिस्से में ही सही, व्यक्तिगत स्वाधीनता की चेतना बढ़ी है, स्त्री और शूद्र पूरी स्वाधीनता और गरिमा के साथ जीने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं। निजी जीवन में भी अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से जीने की धारणा प्रबल हो रही है। हिंदी का मुख्यधारा का सिनेमा व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वाधीनता की चेतना को अपने में समेटने की कोशिश कर रहा है।