आजादी का जुनून : कबीर संजय

आजादी क्या है? क्या वह कोई ऐसी चीज है जो कहीं छिपी हुई है और हमें उसकी जगह-जगह जा कर तलाश करनी पड़ती है? या फिर आजादी हमारे चारों तरफ बिखरी होती है, सूरज की धूप की तरह। ताजी हवा की तरह। हर किसी के लिए बराबर की नियामत बरसाते हुए। बिना किसी भेदभाव के। आजाद होने की इच्छा क्या है? जाहिर है हर किसी के लिए इसके मायने अलग-अलग हैं। किसी के लिए सिर्फ विदेशी सत्ता से मुक्ति ही आजादी है। उनके लिए आजादी की माँग 1947 में अँग्रेजों के जाने के साथ ही समाप्त हो गई। जबकि, कुछ लोग इसके आगे जा कर आजादी के विस्तार की माँग करते हैं। कुछ सामाजिक आजादी की बात करते हैं तो कुछ आर्थिक आजादी की। महिलाओं को आजादी को एक और पड़ाव चाहिए। दलितों की नजर में भी सामाजिक बराबरी के बिना आजादी अधूरी है।

अगर मानवता के इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो आजादी की एक पूरी यात्रा है। आजादी के इस पथ पर मानवता लगातार चल रही है। यह यात्रा अशुभ से शुभ की ओर है। तमसो मा ज्योतिर्गमय। असतो मा सदगमय। हर दिन आजादी का विस्तार होता है। संपूर्ण मानवता ही अपनी आजादी की इस जद्दोजहद में लगी हुई है। यहाँ पर आजादी सिर्फ अपने बारे में निर्णय लेने के अधिकार तक सीमित नहीं रह जाती। आजादी की इस यात्रा में आजादी का भी विस्तार होता रहता है। आजादी के लिए शुरू हुए तमाम आंदोलनों और युद्धों के झंडों पर स्वतंत्रता के साथ ही समानता का नारा भी लिखा हुआ था। यानी गैरबराबरी का खात्मा आजादी का ही दूसरा पहलू है। 

हर किसी के पाँव में अलग-अलग बेड़ियाँ हैं। इसी के अनुसार आजादी और गुलामी की परिभाषा भी हर किसी के लिए अलग-अलग है। अपने बच्चे को छाँव के किसी छोटे-से टुकड़े के सहारे सड़क के किनारे लिटा कर काम करने वाली मजदूर औरत के लिए आजादी के मायने वही नहीं हैं जो अपनी कार खुद चला कर आफिस जाने और वहाँ पर नौ से पाँच की नौकरी करने वाली महिला के लिए है। दोनों के पाँव की बेड़ियाँ अलग हो सकती हैं। लेकिन इन्हें तोड़ने की कसक दोनों की एक-सी है। तो उसी पुराने सवाल पर लौटे कि आखिर यह आजादी है क्या।

मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है और हर जगह पर बंधनों में जकड़ा हुआ है। कुछ इन्हीं शब्दों में महान दार्शनिक रूसो ने आदमी के बंधनों का जिक्र किया है। इतिहास के हर युग में मनुष्य को बंधनों को जकड़ने की तमाम कोशिशें होती रही हैं और आदमी उन बंधनों को, बेड़ियों को काट देने की जुगत भिड़ाता रहा है। गुलाम बनाने की साजिशों और गुलामी की बेड़ियों को काट कर फेंक देने की इन्हीं इच्छाओं की भिड़ंत से इतिहास को गति और दिशा दोनों ही मिलती रही है।

आजादी से आजादी तक
कहा जाता सकता है कि यह आजादी से आजादी तक का सफर है। मानवता का इतिहास जहाँ से शुरू होता है वहाँ पर आजादी और बराबरी मौजूद थी। यानी आदिम समाज। वहाँ पर कोई किसी की इच्छाओं का गुलाम नहीं था और न ही कोई छोटा और बड़ा था। वहाँ संसाधनों पर किसी एक की कब्जेदारी भी नहीं थी और दूसरे को उससे दूर रखने की साजिशें भी नहीं थीं। आदमी-आदमी के बीच किसी तरह का विभाजन स्वीकार्य नहीं था। अपनी किताब ‘वोल्गा से गंगा’ में इसी समाज का जिक्र राहुल सांस्कृत्यायन करते हैं। या फिर फ्रेडरिक एंगेल्स अपनी किताब ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में इसी समाज के आधारों और उसके ऐतिहासिक विकास का ज्यादा वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण करते हैं। यह एक ऐसा समाज था जहाँ पर अभी संपत्ति का उदय नहीं हुआ था। खाने, रहने और पहनने की समस्याओं में ही आदमी की सारी बुद्धि और बल लगा हुआ था। इंसान की जरूरतें भी मुश्किल से पूरी हो पाती थीं। इसलिए कुछ बचा कर रखने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। 

आजीविका के दो प्रमुख साधन थे। खाद्य संग्रहण यानी जो भी खाने योग्य फल, बीज, पत्ते, तने और जड़ें मिलें उन्हें इकट्ठा कर लिया जाए। और दूसरा साधन था शिकार। जाहिर है कि अकेले रहने में खुद के ही शिकार हो जाने की संभावना थी। इसलिए मनुष्य एक समाज में रहता था। इसे आदिम कबीला कहा जाता रहा। जीवन की आवश्यक शर्तों में तादाद शामिल थी, इसलिए लोग अपने कबीले की सुरक्षा में भी लगे रहते थे और उसकी तादाद को बढ़ाने में भी। लेकिन, धीरे-धीरे खाद्य संग्रहण से खेती और शिकार से पशुपालन का उदय हुआ।

निश्चित तौर पर यह बेहद सरल प्रक्रिया के जरिए हुआ होगा। आदमी ने देखा होगा कि अन्न के कुछ बीजों को जमीन में बिखेर देने से वहीं बीज पेड़ बन जाते हैं और बाद में कई गुना ज्यादा अन्न मिल जाता है। इसी तरह पेट भरा होने पर हाथ आए शिकार को मारने की बजाय उसे आगे के लिए बचा कर रखना ज्यादा अच्छा तरीका माना जाएगा। इसी राह पर चलते हुए बाद में पशुपालन का तरीका भी आदमी ने खोज लिया। लेकिन, इन्हीं तरीकों से आगे चल कर समाज में वह संपत्ति भी पैदा हुई जिस पर कब्जे की कोशिशों ने पुरानी आदिम एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया। अब तत्काल की जरूरत से ज्यादा मौजूद था। तो उस पर कब्जा किसका हो, यह सवाल उठना लाजिमी ही था। इतिहास के इस पूरे दौर में एक कबीले की दूसरे कबीले से होने वाली खूनी लड़ाइयों के कई-कई जिक्र मिलते हैं। लड़ाई में विजयी कबीला या तो पराजित कबीले के सभी लोगों को मौत के घाट उतार देता था या फिर उन्हें गुलाम बना लिया जाता था। गुलाम यानी उनकी आजादी छीन लेना। अब वे अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकते। अब उन्हें दूसरों की इच्छा से और दूसरों के लिए काम करना होगा। गुलामी का सबसे पहला रूप शायद यही रहा होगा। आदमी अपनी जरूरतों की गुलामी से तो मुक्त हुआ लेकिन गैरबराबरी की गुलामी में फँस गया। इस गुलाम मनुष्य ने भी अपनी बेड़ियों को काटने की बहुत कोशिशें की होंगी। उनमें से कुछ ने अपनी जान की कीमत दे कर भी इसे पाने के प्रयास किए होंगे।

यानी अपनी खुद की इच्छा से काम करना, अपने खुद के लिए, अपने परिवार के लिए, अपने समाज के लिए काम करना, यह इच्छा, यह मूल्य इतना बड़ा था कि इसके एवज में लोग अपनी जान की बाजी लगाने से भी नहीं चूकते थे। मौका मिलते ही वे अपनी बेड़ियाँ काट देते थे। अपने मालिकों को मार देते थे और जंगलों में भागकर फिर से अपनी एक अलग दुनिया बसाने की कोशिशों में जुट जाते थे।

स्पार्टकस : पहला विद्रोही
अगर हमारे आज के दौर का कोई आदमी अचानक रोम साम्राज्य  में पहुँच जाता तो वह वहाँ की अमानवीय हालत देखकर सदमें में आ जाता। किसी चौराहे से गुजरते हुए उसे शायद गुलामों की किसी मंडी के दर्शन हो जाते जहाँ किसी गुलाम के लिए खरीददारों की बोलियाँ लग रही होती। कोई किसी गुलाम को उसके कंधों और पुट्ठों को छू-छू कर देखता कि उसमें काम करने की कितनी ताकत है। ठीक वैसे ही जैसे आज कोई भैंसा खरीदने जाता है तो पहले उसके पुट्ठों पर हाथ मार कर देख लेता है कि कितनी जान है उसमें। जैसे कोई गाय-भैंस खरीदने जाता है तो पहले ही देख लेता है कि वह कितना दूध देनेवाली है। उससे मालिक के पशुधन में कितनी बढ़ोतरी होने वाली है। यानी वह कितनी बार और बच्चा देने वाली है। कुछ ऐसी ही हालत में उसे आदमियों की मंडी लगी हुई दिखती।

एक तरफ कुछ लोग अपने गुलामों को ले जाते हुए भी दिखते। गुलामों के गले में पट्टे और उनसे बँधी हुई जंजीरें होतीं। वह पूरा समाज दो भागों में पूरी तरह से विभाजित था। एक तरफ स्वतंत्र और कुलीन लोग थे तो दूसरी तरफ गुलाम। यानी जिन्होंने अपनी आजादी खो दी थी। युद्धों में पराजित होने के बाद, जंगलों से पकड़ कर या फिर दूसरे शहरों से अपहरण कर उनके मालिकों ने उन्हें गुलाम बना दिया था। अब वे अपने मालिक की इच्छाओं के गुलाम थे। मालिक जो कहता उसका पालन उसे करना पड़ता था। समाज में उत्पादन का मुख्य साधन खेती था। मालिक लोग यह मान कर चलते कि इस खेत में काम करने वाले तीन तरह के औजार हैं। एक तो न बोलने वाले यानी गूँगे औजार, जैसे हल, बेलचे और फावड़े आदि। दूसरा, रँभाने-हिनहिनाने वाले यानी घोड़ा, बैल, भैंस आदि। और तीसरा, बोलने वाले यानी गुलाम। इन्हें मनुष्य नहीं समझा जाता था। वे जानवरों जैसे और अपने मालिक की संपत्ति माने जाते थे। मालिक उनके साथ मनचाहा बरताव कर सकते थे। रोमन राज्य में इस तरह की सैकड़ों दास मंडियाँ थीं। उनमें सब से बड़ी ईजियन सागर के डेलोस द्वीप पर थी। यहाँ पर हर रोज कोई दस हजार दास खरीदे और बेचे जाते थे। स्वतंत्र लोग भी अलग-अलग वर्गों में बँटे हुए थे। लेकिन, गुलाम और स्वतंत्र लोगों के बीच एक महत्वपूर्ण फर्क यह था कि गुलाम लोगों को मनुष्य ही नहीं समझा जाता था। स्वतंत्र लोगों की अलग-अलग श्रेणियों में सैनिक और प्रहरी थे, किसान और शिल्पी थे। दार्शनिक और कलाकार थे। प्रशासक और राजनीतिक थे। इस समाज ने राग-रंग में, कला और दर्शन में, स्थापत्य और मनोरंजन में अभूतपूर्व तरक्की की। लेकिन, यह सारी तरक्की उन गुलामों के खून-पसीने पर पल रही थी, जिनसे पशुओं से भी ज्यादा बुरी तरह तरीके से काम कराया जाता था। जी हाँ, मिस्र के पिरामिड और स्फिंक्स, जिनकी विशालता और बनावट की तारीफ में आज भी कसीदे पढ़े जाते हैं, भी इन्हीं गुलामों के दमन और शोषण का ही एक प्रतीक हैं। दास भाग न जाएँ, इसलिए उन्हें रात में कोठरियों में बंद कर दिया जाता था जिनमें हवा और रोशनी के लिए छोटे-छोटे कोटर बने होते थे। दासों के गले में पट्टे पड़े रहते थे जिन पर लिखा होता था कि मुझे पकड़े रहो, नहीं तो मैं भाग जाउँगा। प्रायः दासों के चेहरे पर उनके मालिक के नाम का ठप्पा दाग दिया जाता था।

बेबिलोन साम्राज्य और उसके शासक हम्मूराबी की विधि संहिता इतिहास के कई विद्यार्थियों ने पढ़ी होगी। समाज में गुलामों की स्थिति के बारे में इस विधि संहिता से भी समझा जा सकता है। हम्मूराबी ने अपने दंड विधान में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जो दास या दासी चुराएगा, उसे प्राणदंड मिलेगा। जो भागे दास को शरण देगा, उसे प्राणदंड मिलेगा। जो दास का निशान मिटाएगा, उसकी उँगुलियाँ काट दी जाएँगी। जो पराये दास की हत्या करेगा, उसे बदले में दास देना होगा।

वहीं, खेत में फसल कम हो या ज्यादा, इससे गुलाम की जीवन परिस्थिति पर खास फर्क पड़ने वाला नहीं था। इसलिए खेती करने में भी उनकी खास रुचि नहीं थी। वे बेमन से खेतों में बीज डालते और अपनी अबूझ भाषाओं में पक्षियों को बुलाने वाले गीत गाते। पक्षी आओ, और ये दाना चुग जाओ। कुलीन वर्ग के लिए गुलाम केवल काम करने वाली मशीनें नहीं थीं, वे उनके मनोरंजन का साधन भी थे। रोम साम्राज्य में जगह-जगह ऐसे एंपीथियेटर बनाए गए थे, जहाँ पर ग्लेडियेटरों की लड़ाई होती थी। ग्लेडियेटर उन गुलामों के बीच से चुने जाते थे, जिनका डील-डौल ठीक-ठाक होता था और उन्हें लड़ने का भी कुछ हुनर आता था। अक्सर ही युद्धों के दौरान बंदी बनाए गए सैनिकों को ग्लेडियेटर बना लिया जाता था। दो ग्लेडियेटरों को एंफीथियेटर मे उतार दिया जाता था और उन्हें एक-दूसरे से लड़ने का आदेश दिया जाता था। उनके बीच खूनी लड़ाइयाँ होती थी। हारने वाले को मौत के घाट उतार दिया जाता था। जबकि, जीतने वाले ग्लेडियेटर को फिर से उसके बाड़े में बंद कर दिया जाता था ताकि अगली बार उसका इस्तेमाल हो सके।  ग्लेडियेटरों को भूखे शेरों व अन्य हिंस्र पशुओं से लड़ने के लिए भी बाध्य किया जाता था।

इस लड़ाई से एक-दूसरे का खून बहाने वाले दोनों ग्लेडियेटरों को कुछ नहीं मिलना था। लेकिन, उन्हें अपने कुलीन मालिकों के मनोरंजन के लिए एक-दूसरे की जान लेनी पड़ती थी। स्पार्टकस भी ऐसा ही एक ग्लेडियेटर था। माना जाता था कि गुलाम बनने से पहले वह एक सैनिक था। सेना को हराने के बाद उसे गुलाम बना लिया गया। उसके डील-डौल और लड़ने के हुनर के चलते उसे ग्लेडियेटर बना दिया गया। लेकिन, अपने मालिकों की इच्छा के लिए लड़ते-लड़ते उसने उनके खिलाफ हथियार उठा लिए। बहुत सारे गुलाम स्पार्टकस के साथ हो गए। उन्होंने मालिकों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। मानव जीवन के अब के इतिहास का शायद यह सबसे बड़ा विद्रोह था। गुलामों के विद्रोह को सशस्त्र सेनाओं के जरिए कुचल दिया गया। हजारों गुलाम मारे गए। माना जाता है कि छह हजार गुलामों को रोम से कापुआ शहर जाने वाली सड़कों पर सलीबों पर टाँग दिया गया। सलीब पर लटके-लटके गुलाम एक-दूसरे से बार-बार यही पूछते रहे कि हम हार क्यों गए। आजादी का जुनून गुलामों को बार-बार इस हार के सार-संकलन की तरफ बढ़ा रहा है। इतिहास के इस सब से पहले विद्रोही के जीवन और संघर्ष का बहुत ही सजीव वर्णन अमेरिकी लेखक हावर्ड फास्ट अपने उपन्यास ‘आदि विद्रोही’ में करते हैं। इस उपन्यास में इतिहास का वह दौर पूरी तरह से जाग कर सामने खड़ा हो जाता है और लगता है कि जैसे यह सबकुछ आपके सामने ही चल रहा है।

कहा गया कि विद्रोह असफल हो गया। उसे बलपूर्वक दबा दिया गया। लेकिन, हजारों गुलामों की यह कुरबानी व्यर्थ नहीं गई। गुलामों ने अपने इन नायकों से प्रेरणा ली। अलग-अलग जगहों पर विद्रोह के शोले फूटते रहे। ऐसा मानने वालों की संख्या कम नहीं है जिनका कहना है कि ईसा मसीह को सलीब पर लटकाए जाने की जो छवि है वह गुलामों को सलीब पर लटकाए जाने से ही ली गई है।

गुलामों के बार-बार के विद्रोह से उनकी आजादी का विस्तार हुआ। उन्हें एक तरह से बोलने वाले पशु की श्रेणी से काफी हद तक मुक्ति मिल गई। रोम साम्राज्य के पतन के साथ ही ऐतिहासिक रूप से गुलामी प्रथा समाप्त हो गई। हालाँकि, यह एक नए दौर में, मध्ययुग में खासतौर पर अमेरिका में दोबारा लौटती है। लेकिन, तब तक इसका रूप काफी बदल चुका होता है। गुलाम और मालिक व्यवस्था से अब उत्पादन के साधनों का कहीं ज्यादा विस्तार हो चुका था। मालिकों ने देखा कि गुलाम खेतों पर मन लगाकर काम नहीं करते हैं। लेकिन, अगर उन्हें खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा खुद की खेती के लिए दे दिया जाए तो वे ज्यादा मन लगा कर काम करते हैं। एक तरह की भू-दास प्रथा का धीरे-धीरे उदय होना शुरू हुआ। इस सिस्टम में जमीन जोतने और बोने के लिए या तो भूदासों को दे दी गई और उसके बदले में उनसे लगान लिया जाने लगा। या फिर मालिक अपने खेत पर भूदास से जी-तोड़ मेहनत कराता था और उसके बदले में उसे खेत का एक छोटा टुकड़ा दे देता था, जहाँ वह अपने लिए खेती कर सकता था।

गुलाम और भूदास की हालत में यों तो आप कुछ बहुत ज्यादा अंतर नहीं पाएंगे। लेकिन, अगर आप उस दौर की कसौटी पर इसे कसेंगे तो यह बदलाव आप को किसी बड़ी क्रांति से कम नहीं लगेगा। भूदास अब पशु नहीं थे। उनके पास अपना परिवार था। उस परिवार के साथ वे मर और जी सकते थे। उनके पास खेत का एक टुकड़ा था जिस पर वे अपने लिए उत्पादन कर सकते थे। आजादी ने अपनी यात्रा में एक बड़ा पड़ाव पार कर लिया था।   

पुनर्जागरण और राष्ट्रों का उदय
गुलामी की अवस्था से हालाँकि इंसानियत का पीछा छूट गया था। लेकिन, हालात इतने अच्छे भी नहीं थे। भूदास या अर्धदास की हालत गुलामों की तुलना में तो अच्छी थी। पर अभी आजादी की प्यास बुझी नहीं थी। बल्कि, यह कहना ज्यादा उचित होगा कि अभी लोगों को आजादी की इस प्यास का एहसास होना शुरू हुआ था। भूदास के पास कहने को जमीन का एक टुकड़ा और परिवार तो हो गया था। लेकिन, अभी भी जमींदार अपने भूदासों को दहेज और उपहारों में दिया-लिया करते थे। भूदासों को कर्ज भी दिया जाता था और वक्त-जरूरत जमींदार उन्हें गिरवी भी रख दिया करते थे।  

ऐसा कहा जाता है कि रोम के पतन के बाद पूरा यूरोप अंधकार में डूब गया और दोबारा से इसका जागरण तब हुआ जब रोम साम्राज्य के समय पैदा हुए ज्ञान को एक बार फिर से माँजने का प्रयास किया गया। मानवता की उत्सुकता को एक बार फिर से उड़ान मिली। राफेल और लियोनार्दो दा विंची की पेंटिंगों में वह समय आकार लेने लगा। मनुष्य की गरिमा फिर से स्थापित होने लगी। 

मानवता पहले तो सौ साल तक चलने वाले धर्म युद्ध में उलझी रही। फिर, यूरोप कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच होने वाले झगड़ों और दंगों में उलझ गया।  उत्पादन के साधनों के विकास के साथ दुनिया में नए-नए देशों की खोज का एक युग शुरू हुआ। इसी क्रम में भारत को खोजता हुआ कोलंबस अमेरिका पहुँच गया तो भारत तक पहुँचने के नए रास्ते की खोज करने में वास्को द गामा को सफलता मिली। इसके साथ ही गुलामी एक नए रूप में इतिहास के सामने प्रगट हुई। यूरोपीय शक्तियों ने एक ओर तो कच्चे माल और बाजार पर कब्जा करने के लिए एशिया और अफ्रीका के देशों को अपना गुलाम बनाना शुरू किया तो दूसरी तरफ अमेरिकी महाद्वीप जैसे बड़े भू-भाग में काम करने के लिए अफ्रीका से लोगों को गुलाम बना कर काम करने के लिए वहाँ पहुँचाना का जघन्यता शुरू हुई। प्राचीन इतिहास में दफन हो गई गुलामी प्रथा मध्ययुग में एक बार फिर से जीवित हो गई। बड़े पैमाने पर अफ्रीकी लोगों को पकड़-पकड़ कर अमेरिका ले जाया गया। वहाँ उनसे कई-कई किलोमीटर तक फैले खेतों में काम कराया जाता। लेकिन, दुनिया ने जो रूप धरा था उससे नए-नए अंतरविरोध सामने आए। कहा जा सकता है कि आजादी की इच्छा अब एक नए रूप में सामने आने लगी।

हितों के टकराव के चलते अमेरिका 1775 से 1783 तक चले युद्ध के बाद इंग्लैंड से अलग हो कर स्वतंत्र देश हो गया। फ्रांस में 1789 से 1799 के बीच पूँजीवादी क्रांति हुई। इस क्रांति के झंडे पर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का नारा लिखा हुआ था। यह एक नई तरह का समाज बनाने का उद्घोष कर रही थी। अमेरिका और फ्रांस दोनों ही जगहों पर लगभग सौ-सौ साल बाद दूसरी तरह के युद्ध भी हुए। अमेरिकी राज्यों के बीच गृहयुद्ध हुआ। एक तरफ वे खेतिहर राज्य थे जो गुलामी प्रथा को बनाए रखने के पक्ष में थे, दूसरी तरफ वे औद्योगिक राज्य जो स्वतंत्र मजदूर चाहते थे और गुलामी प्रथा का खात्मा चाहते थे। अपनी आजादी की इच्छा से गुलाम भी उनकी तरफ से लड़े और इस पक्ष को विजय मिली। हालाँकि, गुलामों को अपनी आजादी पाने में अभी भी कई साल तक इंतजार करना पड़ा। दूसरी ओर, फ्रांस में 1871 में पहली बार पेरिस कम्यून में मजदूरों की सत्ता स्थापित हुई।

इतिहास की नई दिशा
यहीं से इतिहास एक नई दिशा में जाता हुआ दिखाई देने लगता है। 1917 में रूस में हुई बोल्शेविक क्रांति जहाँ इंसानियत को आजादी की एक नई राह दिखाती है। वहीं, लंबे समय से गुलामी में डूबे देशों में भी राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई तेज हो जाती हैं। सत्रहवीं, अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी इन देशों को गुलाम बनाए जाने के नाम रही। खासतौर पर यूरोपीय शक्तियों ने इन देशों को गुलाम बनाने के लिए आपस में बाँट लिया। पर इससे शक्ति की प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं हुई। भारत को गुलाम बनाने के लिए भी शुरुआत में ब्रिटेन, फ्रांस और पुर्तगाल जैसे देश लगे हुए थे और उनमें झड़पें भी होती थीं।

साम्राज्यवादी पूँजी के विस्तार और अपने प्रभुत्व को बढ़ाने में लगे देशों ने दुनिया को विश्वयुद्ध में झोंक दिया। लेकिन, इस के साथ ही तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की बाढ़-सी दिखाई देती है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी समाजवादी क्रांतियों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की ऊर्जा से भरी हुई थी। तमाम देशों में आजादी की लड़ाइयाँ जीती जा रही थीं। रूस और चीन के बाद अन्य देशों में भी समाजवादी क्रांति के प्रयास तेज हो रहे थे। साठ और सत्तर के दशक तक आते-आते ज्यादातर देशों ने अपने ऊपर राज कर रही विदेशी सत्ताओं को झटक दिया।

भारत 1947 में आजाद हुआ। चीन 1949 में आजाद हुआ। इसी तरह से अन्य देशों ने भी विदेशी सत्ता को भाग जाने पर मजबूर कर दिया। आजादी की यात्रा का एक पड़ाव यहाँ पर पूरा हो गया। लेकिन, इसके साथ ही आजादी की यात्रा के दूसरे पड़ावों की बात भी चल पड़ी। क्योंकि, सही मायने में इंसान को अभी भी वह आजादी प्राप्त नहीं थी, जिसकी कीमत वह अपनी जिंदगी से भी चुकाने को तैयार था। अमेरिका में लंबे समय तक चले नागरिक अधिकार आंदोलनों के बाद रंगभेद के मामलों में कमी आई और काले लोगों को भी काफी हद तक अधिकार दिए गए। इसी तरह भारत में डॉ. भीमराव अंबेडकर और जाति जाति प्रथा विरोधी तमाम नेताओं के प्रयास से दलितों और नीची जातियों को कुछ हद तक अधिकार मिले। हालाँकि, अभी इन समुदायों की सामाजिक उम्मीदें अभी पूरी नहीं हो रही है। कोई दिन नहीं जाता जब इन पर अत्याचार की घटना न होती हो।

आजादी की तमाम लड़ाइयाँ अभी अलग-अलग रूपों में चलती हुई दिखती हैं। बड़ी-बड़ी बहुराट्रीय कंपनियों की आर्थिक जकड़बंदी से एक बार फिर राष्ट्र खुद को घिरा महसूस कर रहे हैं तो पर्यावरण को जिस तरह से नष्ट किया जा रहा है उससे पूरी पृथ्वी के ही अस्तित्व पर खतरा दिख रहा है और पर्यावरण को ले कर तमाम आंदोलन उभरते दिख रहे हैं। आदिवासी, महिला, दलित, एलजीबीटी जैसे तमाम समुदायों में अपने अधिकारों को ले कर सजगता लगातार बढ़ी है और ज्यादा से ज्यादा आजादी हासिल करने के लिए उनके अलग-अलग समुदाय प्रयास भी करते दिखते हैं। महिलाओं के लिए आजादी का सवाल कितना व्यापक और सर्वव्यापी है, इसकी एक झलक आप शतरंज की प्रसिद्ध खिलाड़ी अनुराना बेनीवाल की किताब ‘आजादी मेरा ब्रांड’ की इन पंक्तियों में भी देख सकते हैं--

‘जितनी गिरहें जिंदगी की हैं, आजादी की उससे ज्यादा ही होंगी। एक को खोलिए तो दूसरा सामने ऐंठा रहता है। ये सब सामाजिक सभ्यता के निर्माण की गाँठे हैं, जिनसे जीवन को भले स्थायित्व मिला, लेकिन पग-पग पर उसकी चाल को झटका लगा। अब मुझे ही देखिए। एक छोटी-सी आजादी थी जो मुझे नहीं मिल सकी कभी। वह ऐसी कोई बड़ी बात न थी। उसे मेरा समाज मुझे दे सकता था। उसे मेरे आस-पास के लोग मुझे दे सकते थे। परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों से वह मुझे मिलनी चाहिए थी। केवल चल सकने की आजादी। टैम-बेटैम, बेफिक्र-बिंदास, हँसते-सिर उठाए सड़क पर निकल सकने की आजादी। कुछ अनहोनी न हो जाए, इसकी चिंता किए बगैर, अकेले कहीं भी चल पड़ने की आजादी। घूमते-फिरते थक जाएँ तो अकेले पार्क में बैठ कर सुस्ता सकने की आजादी। नदी किनारे भटकते हुए हवा के साथ झूम सकने की आजादी। जो मेरे मनुष्य होने के एहसास को गरिमा भी देती है और ठोस यकीन भी। अपनी मर्जी का संसार हम बना नहीं सकते। लेकिन, क्या इस संसार में अपनी मर्जी से हम कहीं आ-जा भी नहीं सकते?’

आजादी की यह तड़प बताती है कि अभी आजादी को कितना विस्तार दिए जाने की जरूरत है।