एक अभूतपूर्व प्रेम विवाह : प्रज्ञा


प्रज्ञा
हमने यह विवाह करके कोई सामाजिक क्रांति नहीं की, प्रेम किया और प्रेम निभा रहे हैं, क्योंकि हमें लगता है कि प्रेम एक सतत क्रांति है।

साल 2014, यानी हमारी दोस्ती को साल पूरे पच्चीस। हाँ, दोस्त ही तो हैं आज भी हम - सबसे अच्छे दोस्त, जिनमें झगड़े भी खूब हैं और प्यार भी खूब। समाज के बहुत सारे प्रेम विवाहों की तरह हमारा विवाह सिर्फ 'विवाह' में तब्‍दील हो कर नहीं रह गया है, जिनमें कुछ समय बाद प्रेम और दोस्ती कपूर बन कर उड़ जाते हैं और फिर हावी होती चलती हैं तमाम सत्ताएँ। फिर सत्ताओं की भिड़ंत से उभरे अंतर्विरोध और अंततः समाज को दिखाने भर को विवाह की रस्म अदायगी या अंततः दो भिन्न रास्ते। अपने प्रेम को बचाए रखने के सतत और सचेत प्रयास हमने किए हैं, इसीलिए हम पति-पत्नी होते हुए भी दोस्त पहले हैं।

बात 1989 की है। बीए के दिनों की। अपने निर्धारित विषय राजनीति विज्ञान में पहली सूची में दाखिले के समय मैं विषय के चुनाव को ले कर संतुष्ट थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में दाखिले के कुछ ही दिन में रघुवीर सहाय की कविता दिमाग में लगातार हथौड़े बजाने लगी - 'मुझे कुछ और करना था'। सही समय से लिए गए निर्णय और मौके से बची रह गई कुछ सीटों ने मुझे हिंदू कॉलेज में हिंदी साहित्य की क्लास में पहुंचा दिया। जाहिर है, रैगिंग का दौर अभी चल रहा था। पहले ही दिन जिस शख्स ने रैगिंग के नाम पर जबरदस्त खिंचाई की, उसका नाम था - राकेश कुमार। यह मैंने बाद में जाना कि वह मेरे कोई सीनियर नहीं, बल्कि सहपाठी हैं। रैगिंग में पूछे गए सवालों का मैं जितनी दिलेरी से सामना कर रही थी, यह जान कर कि रैगिंग मेरे सहपाठी ने की है, मैं चारों खाने चित थी। मुझे बेहद खराब लग रहा था। अगले कुछ दिन मैंने एक खास दूरी बना कर रखी उन राकेश कुमार से, पर मैंने पाया उस दिन के अलावा किसी भी दिन राकेश के स्वभाव में किसी को भी नीचा दिखाने की फितरत नहीं थी।

धीरे-धीरे क्लासेज के दौरान जाना कि साहित्य के प्रति राकेश की अभिरुचि है। शिक्षक भी उसे पसंद करते हैं। फिर कॉलेज में मेरे नए होने के कारण बहुत-सी बातों को ले कर जब राकेश ने मदद की तो मन ने तर्क तैयार किया, एक सीनियर की तरह मदद कर रहे इंसान ने जब सीनियर की तरह रैगिंग कर ली तो क्या फर्क है। बस इस तर्क ने गुस्से और अपमान के बादलों को छांट दिया। और फिर राकेश ने कहा कि हम दोस्तों के ग्रुप में जुड़ना चाहोगी? मेरे लिए तो जैसे यह सुनहरा मौका था, क्योंकि कॉलेज शुरू हुए दो सप्ताह हो चुके थे और बहुत-से लोग अपने वर्ग और रुचियों के हिसाब से समूहों में बंट चुके थे। इसके बाद साथ रहना जिंदगी की जरूरत जैसा होने लगा। हां, उसे प्रेम तो नहीं कहा जा सकता था, पर दोस्ती बहुत प्यारी थी। पूरे ग्रुप में मौज-मस्ती करते हुए भी हम लोग जल्द ही कक्षा में शिक्षकों के चहेते बने। मेहनती, आजाद खयाल और अपनी क्लास के स्टार होते हुए अपने सीनियर्स के प्रिय जूनियर्स रहे।

प्रज्ञा और राकेश
आज भी राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. उज्ज्वल सिंह, जो हमारी सब्सिडियरी की क्लास लिया करते थे, बाकायदा हम दोनों को हमारे नाम से जानते हैं। यह लोगों को हैरत में डालने वाला तथ्य है कि कोई भला सब्सिडियरी विषय के छात्रों को भी इस तरह याद रखता है। नए तरीके से वे हमें पढ़ाते थे और अंग्रेजीदां माहौल के विपरीत हिंदी वाला हो कर पढ़ाते थे। जहां कहीं हिंदी शब्द नहीं जानते थे, हमारा सहयोग लेते। ये बिलकुल नई किस्म का ट्रीटमेंट था, सो उनके बताए हुए से ज्यादा हम पढ़ कर जाते और किला फतह करने के अंदाज में रहते। कैंटीन, लाइब्रेरी, साहित्य के कार्यक्रमों में शिरकत करते और कविताएं लिखते। राकेश की कविताएं समाज और प्रेम की कविताएं थीं। दलित विमर्श की कविताएं कभी नहीं लिखीं उन्होंने। हमारे पूरे ग्रुप में हम दो ही थे, जिनके उपनाम को लेकर कोई अंदाजा लगाना कठिन था। मैंने दसवीं कक्षा में पिताजी से साफ कहा था कि मैं अपने नाम के बाद जातिसूचक विशेषण- 'उपाध्याय' नहीं लगाना चाहती और पिताजी ने एक पल गंवाए बिना कहा था - 'जैसा तुम्हारा निर्णय'। तो मैं प्रज्ञा ही रही। इसके कारण प्रथम वर्ष में कई सहपाठियों ने मुझे 'अछूत' कहा, पर मैंने उन संकीर्ण मानसिकता के लोगों को जवाब देना उचित नहीं समझा। इधर, राकेश के नाम के बाद कुमार शब्द से भी किसी जातिसूचक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता था। फिर इसकी जरूरत हमें कभी महसूस ही नहीं हुई कि कौन क्या है। वैसे भी दोस्ती में इतनी जगह ही कहां होती है कि जाति और धर्म बेधड़क घुसे चले आएं। प्रथम वर्ष समाप्त हुआ और हम दोनों बहुत अच्छे अंकों से सेकंड ईयर में आए। साथ-साथ रैगिंग की और फिर विश्वविद्यालय मंडल आयोग की रिपोर्ट से उत्तेजित हुआ। आरंभ में मंडल आंदोलन की सिफारिशों को ढंग से न समझ पाने के कारण जो धुंधलका था, वह पढ़-सुन कर साफ हुआ। फिर क्या था, अगले दिन पूरी तैयारी से हम मंडल विरोधी लोगों से लंबी बहस किया करते। सारा विश्वविद्यालय जब आग में जल रहा था। रामजस, लॉ फैकल्टी, स्टीफंस,  हिंदू और डी स्कूल के बीच छात्र मार्ग पर वीपी सिंह के पुतले फूंके जा रहे थे, डीयू के एक छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह कर लिया था और मंडल समर्थकों से बहस करते हुए हमारी दोस्ती का रंग और गहरा हो रहा था। जाति का कोई खुलासा अब भी नहीं था।

इसी वर्ष राकेश ने पिताजी (रमेश उपाध्याय) की 'किसी देश के किसी शहर में' (कहानी-संग्रह की कहानियां पढ़ीं। राकेश को पिताजी के बारे में बताते हुए जब भी मैं उनका प्रगतिशील सोच सामने रखती तो पाती एक हिचक है राकेश को उसे स्वीकार करने में। फिर हिंदी संगोष्ठी के एक कार्यक्रम में पिताजी जब कॉलेज आए और नमस्ते करते मेरे कुछ दोस्तों और सीनियर्स से अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा - 'हाथ मिलाओ यार', आत्मीयता में डूबे सब लोगों के चेहरों से भिन्न राकेश का चेहरा था। हम एक-दूसरे को बहुत पसंद तो करते ही थे। कई मुद्दों पर बहस भी करते थे। राकेश हमेशा तर्क से अपनी बात रखते। एक बार कक्षा प्रतिनिधि का चयन बिना चुनाव के कर लिया गया। किसी ने विरोध भी नहीं किया, पर सब शिक्षकों के सामने राकेश ने चुनाव की जनतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाए जाने की बात रखी और किसी उम्मीदवार के सामने न आ पाने की स्थिति में अपना नाम प्रस्तावित किया। राकेश भले ही हारे, पर इस बात का गहरा संतोष था कि चुनाव तो हुआ। दोस्ती और गाढ़ी हो रही थी, पर प्रेम की अभिव्यक्ति लायक नहीं थी। इसकी खास वजह वह सीमा थी, जिसे राकेश को पार करना था। दलित पृष्ठभूमि का एक लड़का, जिसके पिता की असमय मृत्यु से घर की माली हालत ठीक नहीं थी, भीतर ही भीतर कई सवालों में कैद था। यों कोई कुंठा उसके व्यक्तित्व में नहीं थी, पर जाति का सवाल बहुत बड़ा था। मन से स्वीकार करते हुए भी कैसे कहे एक ब्राह्मण लड़की से कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं। परिवार, समाज की बात तो बाद की है, पहले अपने मन में सदियों के जड़ जमाए उन संस्कारों का क्या करे। हमारे प्रेम विवाह में बाहरी संघर्ष से पहले भीतरी संघर्ष ज्यादा रहे। 

अवचेतन की उलझी गुत्थियों से जूझना था राकेश को। यही वजह रही कि उस लड़के का मन नहीं मानता था कि जो लेखक अपनी रचनाओं में स्वाधीन, लोकतांत्रिक मूल्यों का पक्षधर और समातामूलक खूबसूरत समाज के सपने देखता है, वह क्या वास्तविक जीवन में अपनी लड़की को एक दलित लड़के से प्रेम करते देख सकेगा? मन में प्रेम करते हुए भी सामाजिकता के दबाव, कई संशय और अपने ही परिवार के एक रिश्तेदार की प्रेम विवाह के बाद जघन्य हत्या की घटना ने राकेश को अपने भीतर सवालों के जंगल में उलझा रखा था। फिर आर्थिक रूप से हम दोनों परिवारों में एक बड़ा अंतर भी था। साथ ही शैक्षिक रूप से दोनों परिवारों के बीच चौड़ी खाई। कई मौकों पर घर में शामिल होते हुए राकेश ने हमारे घर के माहौल को जान लिया और पिताजी के जनवादी मूल्यों पर भी उनका विश्वास जमने लगा। इस बीच हम दोनों ने एमए प्रथम श्रेणी में पास कर लिया था। हमारे जीवन की दिशाएं कई बार बदलीं। मैं एमए के साथ 'समय-सूत्रधार' नाम की पत्रिका में साल भर से अधिक की अवधि के लिए चली गई, पर दोस्ती कभी नहीं टूटी। दोस्ती की उन्‍मुक्तता तो देखिए कि हम एक-दूसरे के लिए जीवनसाथी भी खोजते और इस कल्पना के आधार पर छेड़-छाड़ भी किया करते। दोस्त विवाहित हो रहे थे या अपने काम-धंधे से लग रहे थे, पर हमारी पढ़ाई ही खत्म नहीं हो रही थी। इधर, एमए के बाद मैं बीएड के लिए चली गई और राकेश एमफिल में, पर रहे दोनों ही दिल्ली विश्वविद्यालय में। इस बार सच में राकेश मेरे सीनियर हो गए। बीएड के बेहद व्यस्त कार्यक्रम में लगभग साल भर कोई खास मुलाकात नहीं हुई  - कुछ पत्र और फोन के अलावा। मोबाइल का जमाना था नहीं। और इसी बीच राकेश ने यूजीसी की नेट परीक्षा स्कॉलरशिप के साथ निकाल ली। नए सिक्कों के जैसी चमकती-खनकती राकेश की हंसी। जबरदस्त आत्मविश्वास और पैरों में अजाने पंख। बीएड के बाद मुझे एमफिल और नेट परीक्षा पास करने के लिए प्रोत्साहन घर और राकेश से ही मिला।

इसी समय एक दिन राकेश ने मुझसे पहली बार सीधा सवाल किया - 'क्या तुम मेरे साथ जीवन जीना पसंद करोगी?'  जुलाई 1995 की तेज दोपहर में पूछे गए इस सवाल का जवाब मैं तुरंत न दे सकी थी। इंकार तो नहीं था, बस एक मुस्कराहट। मेरी परवरिश जिस घर में हुई थी, वहां जाति, धर्म भाषा, लिंग, क्षेत्र के आधार पर मुझे कभी भेदभाव करना नहीं सिखाया गया था। दूसरे, अपने निर्णयों को जीने की स्वाधीनता भी थी, बशर्ते वे निर्णय उचित हों और उन्हें जीने और निभाने का साहस मेरे भीतर हो। फिर मेरे परिवार में यह पहला अवसर नहीं था प्रेम विवाह का। मेरी मौसी नीलिमा शर्मा ने स्वेच्छा से शमसुल इस्लाम जी से विवाह किया था, जिसे मेरे नाना-नानी ने तो नहीं, पर मेरे माता-पिता ने पूरा समर्थन दिया था। एक अन्य मौसेरी बहन ने भी अपनी पसंद से विवाह की बात की थी। उनकी पसंद के सजातीय होने के बावजूद परिवार में कई असहमतियां थीं, पर पिताजी का उन्हें पूरा समर्थन था। वह गंभीर बैठक हमारे घर ही हुई थी। पत्रकार मुकुल शर्मा और प्रो. चारू के विवाह में परिवार द्वारा उठी आपत्ति का हल भी हमारे घर ही खोजा गया था और पिताजी ही उनके विवाह में विटनेस थे। अपने घर का माहौल जानते हुए भी मुझे लगा अभी मैं आर्थिक रूप से निर्भर नहीं हूं और मां ने हमेशा यही सिखाया था, पहले अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, फिर शादी करना। पर उसी रात निर्णय कर लिया कि दो दोस्तों के लिए इससे बेहतर भविष्य क्या हो सकता है। राकेश के फोन और घर आना बदस्तूर जारी था। कई साहित्यिक कार्यक्रमों, नाटकों में राकेश भी पिताजी और मेरी बहन के साथ परिवार के सदस्य के तौर पर शामिल होते, पर अभी हमने अपने निर्णय का खुलासा नहीं किया था।

वह वर्ष (1995) बहुत अच्छा साबित हुआ। राकेश को बतौर प्राध्यापक किरोड़ीमल कॉलेज में पहला मौका मिला। कमाल की बात यह भी थी कि एक जनरल पोस्ट पर एक दलित लड़के की नियुक्ति उसकी अपनी योग्यता के बलबूते हुई। यह नियुक्ति अस्थायी थी, पर हौसलों की उड़ान को नए पंख लग गए थे। 1996 में राकेश रामलाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विवि. में स्थायी हो गए। उस दिन जब पिताजी को बताया कि आज शाम राकेश मिठाई खिलाने आएंगे तो पिताजी ने कहा - 'तो कब कर रहे हो तुम विवाह?' सवाल ने मुझे चौंकाया नहीं, पर मैंने फिर भी कहा - 'आप जानते हैं कि हम प्रेम करते हैं?' वे मुस्कराए। पर अभी राकेश को अपनी बहन के विवाह और अपने विवाह की जिम्मेदारी उठाने के लिए समय और धन चाहिए था और मेरा एमफिल अपने अंतिम चरण में था। अक्टूबर माह में राकेश ने एक दिन घर आ कर पिताजी से हमारे विवाह की बात की तो सामूहिक रूप से सब बैठे और तुरंत निर्णय हो गया। राकेश को विदा करते हुए छोटी बहन संज्ञा ने पहली बार 'राकेश भइया' का सम्बोधन बदलते हुए कहा, 'लाइए जीजाजी, ट्रीट के पैसे।'

अगले वर्ष के लिए विवाह की बात सोच कर हम अपने-अपने काम पूर्ववत करते रहे। इस बीच पीएचडी में मेरा प्रवेश हो गया। नेट पहले ही पास कर लिया था। 1997 के अप्रैल माह में हमारे परिवार पहली बार मिले। हमारे घर, मेरी मौसियां, मामा आदि सब उनके स्वागत में शामिल हुए। सगाई समारोह जैसा कुछ नहीं था। बेहद सादा तरीके से खाना-पीना और चाय हुई। राजनीतिक चर्चाओं के बीच पारंपरिक शादियों जैसा कुछ तय न होते हुए कोई अंगूठी,  भेंट आदि के अभाव में हम दोनों को हमारे भाई-बहनों ने गुलदस्ते भेंट किए। सब बेहद खुश थे और पूरे समय दो परिवारों के बीच जाति, आर्थिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति की कोई दीवार नहीं थी। विश्वविद्यालय में हमारे शिक्षकों और दोस्तों ने भी इस पहल का स्वागत किया। दोस्तों के चेहरे पर आश्चर्य और संतोष दोनों के मिले-जुले भाव थे, क्योंकि हम दोनों हमेशा साथ रहते थे और अन्य प्रेमी-प्रेमिकाओं की तरह कोई एकांत नहीं खोजते थे। तमाम साहित्यिक, राजनीतिक बहसों में साथ रहने, खुल कर हंसने, मजाक करने जैसी स्थितियों ने दोस्तों को हमें ले कर कुछ खास सोचने पर जैसे मजबूर ही नहीं किया था।

शादी हमने खुद अक्टूबर माह में तय की। कोर्ट मैरिज का प्रस्ताव हमारा था। राकेश से असहमत होते हुए पिताजी का अनुरोध था कि इस मौके पर पूरा परिवार और दोस्त इकट्ठा होंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय में अस्थायी रूप से पढ़ाने के बाद मैं भी स्थायी रूप से किरोड़ीमल कॉलेज में नियुक्त हो गई। अब आधार और भी दृढ़ हो गया। अगस्त माह से तीस हजारी कोर्ट के चक्कर काटना हमने शुरू कर दिए थे। कई बार हमें ठगने की साजिशें हुईं, पर अंततः सफल रहे और तमाम कार्यवाहियों के बाद एक दिन जज ने हमें मिलने के लिए अपने चैंबर में बुलाया। 'जब परिवार के लोग सहमत हैं तो फिर कोर्ट मैरिज क्यों? गाजे-बाजे के संग क्यों नहीं?' उनकी बात का हमारा जवाब यही था, ''विवाह की इस सामंती व्यवस्था में हमारी आस्था नहीं।'  लंबी बातचीत के बाद उन्होंने बधाई देते हुए एक अक्टूबर की तिथि निर्धारित की और मां-पिताजी द्वारा वीपी हाउस में रिसेप्शन पांच अक्टूबर को तय हुआ। दोनों परिवार, रिश्तेदार और दोस्त सब सही समय से कोर्ट पहुंचे, पर जज ने तय डेट आगे बढ़ा दी। उन दिनों श्राद्ध चल रहे थे और आम तौर पर इन दिनों किसी भी 'मांगलिक' कार्य की मनाही होती है। ऐसे समाज में जहां श्राद्ध के दिनों में एक नया कपड़ा तक नहीं खरीदा जाता, वहां शादी जैसी बात के बारे में सोचना तक अटपटा और अशुभ माना जाता है। इसी बात को सोच कर राकेश की मां हिचक रही थीं, पर सब की खुशी और दृढ़ता देख कर वे भी निःशंक और दृढ़ हो गईं।  हमारे मौसाजी शमसुल इस्लाम ने डीएम जीतेंद्र नारायण से बात की। दोबारा सर्टिफिकेट बने। राकेश की मां, मेरे पिताजी और भाई विवाह के दस्तखत वाले गवाह थे और कमरे में शीशे की दीवार के बाहर बारह-तेरह लोग। विवाह के बाद हम सब लोगों को साथ लाई मिठाई खिला कर खुशियां मना रहे थे। कैदी,  मुलाजिम, अफसर और हमारे परिवार सब शामिल थे इसमें।

विवाह का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक
एक बात जो हम अकसर किया करते हैं कि हमारा यह अंतरजातीय विवाह इतनी सहजता और सुगमता से कैसे संभव हुआ? दरअसल परिवारों की आपसी समझदारी बहुत बड़ा कारण थी। पिताजी और मां का दृढ़-निश्चियी रुख और जीवन को जीने का सिखाया उनका सलीका। यह अलग बात है कि मां और पिताजी को यह भी सुनाया गया कि 'लड़की को ज्यादा छूट दे दी है' या 'किस जात का है लड़का?' पर परिवार में अधिकांश लोग प्रगतिशील विचारों के ही थे। फिर पिताजी शुरू से जिन मूल्यों के साथ जिए उनका विरोध कोई किस आधार पर करता। राकेश की मां की तो बस एक ही चिंता थी कि कहीं कोई लड़ाई-झगड़ा न हो, पर उनकी चिंता परिवार से मिलते ही खत्म हो गई थी। इस तरह बाहरी संघर्षों से हम सुरक्षित ही रहे। पीठ पीछे चाहे कोई कितनी भर्त्सना करे, पर सामने करने का साहस किसी में नहीं था। दरअसल, इन विवाहों में बड़ा सवाल आजादी का है। हमने जो संस्कार और मूल्य अपने परिवार और शिक्षा से अर्जित किए, वे आजादी के मूल्य थे। दूसरी जरूरी बात यह भी ध्यान देने की है कि हर अंतरजातीय विवाह क्रांतिकारी और हर सजातीय विवाह रूढ़िवादी नहीं होता। यह बात समझने की है कि विवाह के बाद जो परिवार बनता है उसमें मुक्ति, समानता और बेहतर भविष्य का क्या और किस तरह का विजन है। यही महत्वपूर्ण है। कमी वहां रह जाती है, जहां हम आजादी के मूल्यों को भूल जाते हैं। चुनाव की आजादी, सोचने की आजादी, महसूस करने और सपने देखने की आजादी, निर्णय लेने की आजादी। जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद और रूढ़िवादी विचारों से आजादी। विवाह में दो वयस्क यदि दी हुई रूढ़िवादिता का तिरस्कार कर साथ जीने का निर्णय लेते हैं और ताउम्र उन मूल्यों को बचाने का प्रयास करते हैं, यही अंतरजातीय, अंतरधार्मिक विवाहों की सार्थकता और सफलता का पैमाना है। कठिनाई सिर्फ यह है कि आधुनिक शिक्षित परिवारों के लिए आजादी के बड़े सीमित मायने हैं। मसलन, देश की आजादी, वस्त्रों के चुनाव की आजादी, बाजार में खरीदने-बेचने की आजादी और वोट डालने की आजादी, पर विचारों की आजादी यहां एक खतरे की तरह महसूस की जाती है और दमन को उससे मुक्ति के एकमात्र रास्ते के रूप में देखा जाता है। हमारी शिक्षा और शिक्षण संस्थाएं भी रूढ़िवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद का खुल कर विरोध करती नहीं दिखाई देतीं। जब खाप पंचायतें प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सरेआम मौत की सजा देती हैं तो हमारे विचार के केंद्र कहे जाने वाले शिक्षण संस्थान मौन रहते हैं।

बहरहाल, कोर्ट मैरिज के बाद हम दोनों अपने-अपने घर चले गए और पांच तारीख के कार्यक्रम में लग गए। घर में रिश्तेदारों और पिताजी के दोस्तों का आना शुरू हो गया। एक आयोजन की तैयारी। पांच तारीख आई और हम सज-धज कर वीपी हाउस में इकट्ठा हुए। इस तरह के विवाह में कितनी खुशियां थीं, कितनी हार्दिकता। सब आशीर्वादों से नवा रहे थे। कोई झगड़ा नहीं, हत्या का भय नहीं, छुपने और भागने की जरूरत नहीं। सिर्फ इसलिए कि पुरानी पीढ़ी ने जिस तरह पुख्ता नींव तैयार की थी, अब उस पर टिका घर ध्वस्त न हो सकता था न किया जा सकता था। बिना फेरे, बिना ढोल-ढमाके और बिना दहेज के सादे और सुरुचिपूर्ण ढंग से आयोजन सम्पन्न हुआ। दिल्ली और बाहर से आए कितने लोग, कितने साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों और अध्यापकों की चिट्ठियां और संदेश आज भी सुरक्षित हैं मेरे पास। विदा भी दूसरी लड़कियों की ही तरह। मां-पिता, मौसियां-मौसा, चाचा-चाची, मामा-मामियां, भाई-बहन उतने ही प्यार से सीने से लगा कर लाड़ लड़ा रहे थे। यही नहीं, राकेश के घर के लोग भी रो रहे थे - बेटियां सबकी साझी होती हैं न।

फकत यह सच और। हमने यह विवाह करके कोई सामाजिक क्रांति नहीं की, प्रेम किया और प्रेम निभा रहे हैं, क्योंकि हमें लगता है कि प्रेम एक सतत क्रांति है। हमारा यह प्रेम हमारी चौदह बरस की बिटिया अक्षितारा के संग और भी परवान चढ़ रहा है।

हर अंतरजातीय विवाह क्रांतिकारी और हर सजातीय विवाह रूढ़िवादी नहीं होता। यह बात समझने की है कि विवाह के बाद जो परिवार बनता है उसमें मुक्ति, समानता और बेहतर भविष्य का क्या और किस तरह का विजन है। यही महत्वपूर्ण है। कमी वहाँ रह जाती है जहाँ हम आजादी के मूल्यों को भूल जाते हैं। चुनाव की आजादी, सोचने की आजादी, महसूस करने और सपने देखने की आजादी, निर्णय लेने की आजादी।