स्वतंत्र देश के लिए स्वाधीन मानस : ओमप्रकाश कश्यप

  • सच्ची स्वाधीनता का अभिप्राय है, दूसरों की समान स्वाधीनता का सम्मान करते हुए कार्य करने की संपूर्ण आजादी। मेरा मतलब कानून सम्मत अधिकारों से नहीं है। क्योंकि कभी-कभी कानून भी तानाशाह की मनमर्जी का शिकार हो जाता है। उस समय वह दूसरों की स्वाधीनता  का हनन करने लगता है।     - थॉमस जेफरसन
  • क्या स्वतंत्रता सिवाय इसके कि जैसा जीवन हम अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही जीवन जीने की क्षमता के अलावा कुछ और है? कुछ भी नहीं।  - एपिक्टीटस

शुरुआत एक पहेली से करते हैं। देश स्वतंत्र है। लोग स्वतंत्र हैं। पर क्या वे स्वाधीन भी हैं? सामान्यतः हम ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वाधीनता’ दोनों को एक माने रहते हैं। मान लेते हैं कि इनके बीच महज शब्दों का ऐर-फेर है। दोनों में से किसी भी शब्द का प्रयोग करो, मंतव्य वही रहता है। अर्थात यदि हम स्वतंत्र हैं, तो स्वाधीन भी हैं। या स्वाधीन हैं, इसलिए स्वतंत्र भी है। ‘स्वतंत्रता’ एवं ‘स्वाधीनता’ के अर्थों में घालमेल का एक कारण यह भी है कि स्वतंत्र भारत में हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर शताब्दियों तक सामंती संस्कारों में पले-ढले समाज के लोकतंत्रीकरण की दिशा में अपेक्षित प्रयासों की ओर से मुँह मोड़े रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे कई महानायक तो, जो कदाचित सबसे भरोसेमंद दिखाई पड़ते थे—समानता और स्वाधीनता के अधिकार तथा लोकतंत्र की आलोचना ही करते रहे। गांधी के सर्वाधिक प्रिय शिष्य विनोबा को समान मताधिकार का विचार ही विचित्र लगता था। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि नेहरू और उनके खानसामा दोनों का वोट एक हो। ‘गणतंत्र’ को एक स्थान पर उन्होंने ‘अवगुणतंत्र’ कहा है (गणतंत्र नहीं गुणतंत्र, लोकनीति)। कथित इसलिए कि उनमें से कई गांधी के कहने पर ‘हरिजनोद्धार’ के कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके थे, परंतु जिस मनुस्मृति को दलित अपने गले की फाँस मानते आए थे - ऋषि के राज के बहाने वे उसी का महिमामंडन करते थे (ऋषि अनुशासन, विनोबा, लोकनीति)। लोकतंत्र के प्रति चलताऊ निष्ठा का नुकसान यह हुआ कि हम राज्य और नागरिक के अंतःसंबंधों को पहचानने तथा उनकी मजबूती के लिए उपयुक्त तंत्र खड़ा करने में असफल रहे। हमने लोकतंत्र को आधे-अधूरे बोध के साथ, केवल इतने बोध के साथ अपनाया कि उसके माध्यम से हमारा संविधान हमें सरकार चुनने का अधिकार देता है। संविधान हमें अपनी स्वाधीनता को परिपक्व बनाने, उसके दायरे को विस्तृत करते जाने तथा स्वतंत्रता का सही-सार्थक उपयोग करने के जो अवसर हमें देता है, उस ओर से हम प्रायः अनभिज्ञ बने रहे। भूल गए कि अच्छी नागरिक सरकार अपनी स्वतंत्रता की व्याप्ति नागरिकों में देखती है। चूँकि हम स्वयं अपनी स्वाधीनता की ओर से उदासीन रहे, इसलिए सरकार और अन्य संस्थाएँ कब अपने तंत्र का दायरा लाँघ कर हमारी स्वाधीनता और अधिकारों को अवरुद्ध करने लगीं, हम समझ ही नहीं पाए। इस बीच शासन-प्रशासन की निरंकुशता ने जब-जब हमें आहत किया, उसे लोकतंत्र की स्वाभाविक दुर्बलता मान कर हम प्रायः मौन साधे रहे।

‘स्वतंत्रता’ के अंग्रेजी पर्याय फ्रीडम से किसी भी प्रकार के दासत्व से संपूर्ण मुक्ति का भाव जुड़ा है। तदनुसार स्वतंत्र वह है जो बाहरी बंधनों से सर्वथा मुक्त हो। जिसके सोच पर, कर्म पर किसी भी प्रकार का बाहरी प्रतिबंध न हो। स्वतंत्रता मनुष्य को उसके मनुष्यत्व का एहसास कराती है, इसलिए लोग उससे प्यार करते हैं। आरनेल्डो पेटरसन के अनुसार, ‘स्वतंत्रता ऐसा मूल्य है, जिसके लिए लोग खुशी-खुशी जॉन देने को तैयार रहते हैं... यह नेताओं का चहेता नारा, मुक्त अर्थतंत्र का धर्मनिरपेक्ष अवतार तथा हमारी समस्त सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार है।’ किसी देश के संदर्भ में स्वतंत्रता बाहरी प्रतिबंधों से पूरी तरह मुक्ति तथा संपूर्ण निर्णयाधिकार की क्षमता एवं उसकी स्वयंप्रभुता को दर्शाती है।

स्वतंत्रता का इतिहास राज्य की उत्पत्ति से जुड़ा है। उसकी माँग लगभग 2600 वर्ष पहले तब शुरू हुई जब यह महसूस किया गया कि विवेकशील प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने बारे में निर्णय करने में स्वयं सक्षम है। इस योग्यता का सम्मान करना राज्य के हित में है। इस सोच में कल्याण राज्य की अवधारणा के बीज छिपे थे, हालाँकि उसे भली-भाँति विकसित होने में अनेक शताब्दियाँ गुजर गईं। इस बीच सर्वसत्तावादी निरंतर दावा करते रहे कि सभ्यता के लंबे दौर से गुजरने के बावजूद मानव स्वभाव में जंगली जीवन की प्रवृत्तियाँ शेष हैं। उसके समुचित मार्गदर्शन तथा समाज में शांति एवं अनुशासन बनाए रखने के लिए शक्तिशाली राज्य की उपस्थिति अपरिहार्य है। दूसरी ओर उदारचेता विद्वान लगातार मानव-मात्र की स्वाधीनता पर जोर देते रहे। इससे कल्याणकारी राज्य के विचार ने जोर पकड़ा। यह विचार भी आगे बढ़ा कि स्वतंत्र व्यक्ति न केवल अपना विकास बेहतर कर सकता है, बल्कि समाज को भी अपना श्रेष्ठतम प्रदान करने में सक्षम होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार फ्रीडम शब्द की उत्पत्ति दासों के मुक्ति संघर्ष से जुड़ी है। लगभग ढाई हजार वर्ष पहले एथेंस में सम्राट सोलोन ने नागरिकों को अधिकार दिए जाने के लिए अपेक्षाकृत उदार नियम बनाए थे। बाद की शताब्दियों में एथेंस की प्रगति में सोलोन द्वारा लागू संविधान की बड़ी भूमिका थी। तदनंतर स्वतंत्रता की अवधारणा में अनेक बदलाव हुए हैं। नई मान्यताओं के अनुसार बिना नागरिकों की स्वाधीनता के राज्य की स्वतंत्रता अपर्याप्त मानी जाती है। इसलिए मानवाधिकार, समानता, सामाजिक न्याय आदि के माध्यम से स्वतंत्रता का लाभ जन-जन तक पहुँचाने के लिए जनसमर्थन और सहभागिता पर जोर दिया जॉने लगा है। 

स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक हैं। स्वतंत्रता तभी पूर्ण मानी जाती है, जब शिखर पर बैठे लोग उसके अच्छे-खासे हिस्से को, बगैर किसी पक्षपात के नागरिकों तक अंतरित करने लगते हैं। लोकतंत्र में निर्णयाधिकार जनता के पास होते हैं। तथापि नागरिक उसका वास्तविक लाभ तभी उठा सकते हैं, जब वे अपनी स्वाधीनता का सदुपयोग करने में सक्षम हों। दूसरों के हितों पर आँच आए बिना अपने हितों के अनुरूप उपयुक्त निर्णय लेने का नागरिक अधिकार स्वाधीनता की कोटि में आता है। इसके अंग्रेजी पर्याय के रूप में लिबर्टी का प्रयोग किया जाता है। स्वतंत्रता राज्य से संबंधित, उस पर किसी भी प्रकार के बाहरी नियंत्रण से मुक्ति का नाम है। जबकि स्वाधीनता समाज और शासन की ओर से प्रदान की जाती है, जिसमें सत्ता की आलोचना का अधिकार भी सम्मिलित है। इतिहासकार, राजनीतिविज्ञानी जॉन अक्टन के लिए वह सत्ता के वाजिब विरोध का माध्यम है। स्वाधीनता की कदाचित सबसे अच्छी परिभाषा जे आर ल्यूकस ने अपने ग्रंथ ‘दि प्रिंसिपल्स आफ दि पॉलिटिक्स’ में दी है। उसके अनुसार, ‘स्वाधीनता का तात्विक अर्थ यह है कि विवेकशील कर्ता को जो भी सर्वोत्तम प्रतीत हो, वह वही कुछ करने में समर्थ हो तथा उसके कार्य-कलाप बाहर से प्रतिबंधित न हों।’ राष्ट्र विशेष के संबंध में स्वतंत्रता से भी यही उद्दिष्ट है। कुल मिला कर ‘स्वतंत्रता’ जहाँ राष्ट्र का मसला है, वहीं स्वतंत्रता जब आंतरिक स्तर पर विस्तरित हो कर नागरिकों के सोच और व्यवहार का हिस्सा बन जाती है, तो स्वाधीनता कहलाने लगती है। इस तरह स्वाधीनता नागरिकों का अधिकार, विवेकसम्मत आचरण की संपूर्ण आजादी है। वह राज्य की उदारता का संकेतक है। स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता परस्पर पूरक, सहायक और अन्योन्याश्रित पद हैं। दोनों में इतना सूक्ष्म अंतर है कि समझने में प्रायः गड़बड़ हो ही जाती है।

यह मान लेना कि स्वतंत्रता केवल राष्ट्र का विषय है, सामान्य नागरिक का उससे कोई सरोकार नहीं है, अनुचित होगा। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों के सपनों तथा उनकी कर्तव्यनिष्ठा से बनता है। अरस्तू के शब्दों में कहें तो अच्छी जनता ही अच्छे शासन की जनक होती है। ऐसी जनता को बाहरी नियंत्रण में लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता। अपने अधिकारों के प्रति चैतन्य, सतत जागरूक जनता अपनी स्वतंत्रता का रास्ता खोज ही लेती है। स्वाधीनता स्वतंत्रता की अगली सीढ़ी है। उसे तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब राज्य स्वतंत्र तथा अपने नागरिकों के प्रति उदार हो। शिखर पर आसीन लोग मानते हों कि शासन चलाने का अधिकार उन्हें जनता की ओर से प्राप्त है। वास्तविक स्वाधीनता मनुष्य को दूसरे के स्वाधीनता क्षेत्र में अतिक्रमण को छोड़ वह सब करने की आजादी देती है, जिसे वह अपने लिए आवश्यक मानता है। भले ही उससे समाज, सत्ता, विचारधारा या स्थापित रीति-रिवाजों को चुनौती मिलती हो। स्वाधीनता की सीमा शासन की प्रवृत्ति से भी तय होती है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि दो स्वतंत्र राज्यों की जनता को समान स्वाधीनता भी उपलब्ध हो। यह भी हो सकता है कि राज्य स्वतंत्र हो, परंतु लोग पूरी तरह स्वाधीन न हों। उदाहरण के लिए हिटलर के समय जर्मनी एक स्वतंत्र और शक्तिशाली देश था। मगर वहाँ की जनता नागरिक अधिकारों से वंचित थी। यहाँ तक कि मनुष्य के मौलिक अधिकारों पर भी डाका पड़ चुका था। चीन का उदाहरण भी हम ले सकते हैं। वह स्वतंत्र देश है। लेकिन वहाँ के नागरिकों को उतने निर्णयाधिकार उपलब्ध नहीं हैं, जितने भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में प्राप्त हैं।

निरंकुश शासक ताकत के बल पर शासन करता है। अपनी सर्वोच्चता के प्रदर्शन के लिए वह नागरिकों के सामान्य अधिकारों का भी हरण कर लेता है। ऐसे में स्वाधीनता का आकार सिकुड़ जाता है। नागरिक अधिकार की दृष्टि से ऐसी स्वतंत्रता जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो, नकारात्मक स्वतंत्रता कही जाएगी। उसमें अधिकांश अधिकार केंद्रीय शक्तियों में सिमट जाते हैं। परिणामस्वरूप नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर भी कटौती के बादल मँडराने लगते है। सकारात्मक या वास्तविक स्वतंत्रता वहाँ संभव है, जहाँ जनता के विवेकाधिकार बाधित न हों। लोग अपने हितों के अनुसार निर्णय लेने को स्वतंत्र हों। वहाँ शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है। अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से वह ऐसी सरकार का गठन करती है, जो न्यूनतम शासन करे। इस तरह स्वस्थ नागरिक समाजों में सरकार और नागरिक अपनी-अपनी मर्यादा से आबद्ध रह कर स्वाधीनता का आनंद लेते हैं। सरकार की स्वतंत्रता वहां तक मर्यादित होती है जहाँ तक वह नागरिक जीवन में अनावश्यक दखलअंदाजी प्रतीत न हो। वहीं नागरिक के लिए स्वाधीनता की मर्यादा, दूसरों की स्वाधीनता को अक्षुण्ण रखने तक सीमित रहती है। नागरिकगण दूसरे की स्वाधीनता की सम्मान करके ही अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकते हैं। दूसरे की स्वाधीनता में हस्तक्षेप करने पर व्यक्ति अपनी स्वाधीनता के अधिकार को खो बैठता है। उस अवस्था शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए शासन को उसकी स्वाधीनता की परिसीमा में सायास हस्तक्षेप का अवसर मिल जाता है। कह सकते हैं कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक और सहायक हैं। नागरिकों की स्वाधीनता का स्तर बढ़ाने के लिए चुनी हुई सरकारें जहाँ न्यूनतम शासन करती हैं वहीं एक-दूसरे की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए नागरिक सरकार और शासन को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हैं। फलस्वरूप राज्य की स्वतंत्रता नागरिकों की स्वाधीनता से अनुप्रेत होने लगती है; या यूँ कहें कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता का अंतर लुप्त होने लगता है।

स्वाधीनता और मानवाधिकार पर जोर राज्य की उदारता को दर्शाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कल्याण राज्य में हर अवधारणा के केंद्र में नागरिक होता है। इसलिए वहाँ स्वाधीनता भी नागरिक दृष्टि से परखी जानी चाहिए, जैसे, लोग यदि स्वाधीन हैं तो कितने? परिपक्व लोकतंत्र के लिए जितनी स्वाधीनता चाहिए, क्या उतनी स्वाधीनता नागरिकों को प्राप्त है? स्वाधीनता को समझना, उसे पाने जितना ही महत्त्वपूर्ण होता है। स्वाधीनता को समझा कैसे जाए? इस पर बड़ी अच्छी बात एपिक्टीटस (55 ईस्वी - 135ईस्वी) ने कही है। वह एक दास था। उसका धनवान मालिक एप्फ्रिोडिटो भी किसी जमाने में दास हुआ करता था। बाद में उसने अपने दासत्व से मुक्ति प्राप्त की और बादशाह नीरो का मंत्री बन गया। एपिक्टीटस की पढ़ने की बड़ी ललक थी। वह सुकरात और प्लेटो का प्रशंसक था; और खुद भी दार्शनिक बनना चाहता था। एपिक्टीटस की ललक देख कर उसके स्वामी ने उसे मुक्त कर दिया। बाद में उसने दास बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल की स्थापना की। एपिक्टीटस का मानना था कि दासत्व का कारण संसाधन छीन लेना नहीं है, बल्कि लोगों को ज्ञान के अवसरों से वंचित कर देना है। उसका विश्वास था कि केवल शिक्षा ही व्यक्ति को भय, भ्रांति और उद्धिग्नता से मुक्ति दिला सकती है। अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए उसने कहा था—‘हमें उन अनेक लोगों की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए जो कहते हैं कि केवल मुक्त लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। बजाय इसके हमें यह मानना चाहिए कि केवल शिक्षा ही हमें मुक्ति दिला सकती है।’

स्वतंत्रता की भांति स्वाधीनता भी निःशर्त नहीं होती। प्रकटतः वह बंधन-मुक्ति का पक्ष लेती है, परंतु व्यक्ति को कुछ भी करने की आजादी नहीं देती। स्वाधीनता का संपूर्ण आनंद बिना नैतिक बने असंभव है। जो नैतिक है, आत्मानुशासित है, समाज और राज्य के विधान के प्रति जिसकी निष्ठा विवेक-सम्मत है, जो दूसरे के मूलभूत अधिकारों का सम्मान करता है, वही व्यक्ति स्वाधीनता का सच्चा लाभ उठा सकता है। सरकार नागरिकों की संरक्षक होती है। अतः जब तक वह अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार है, उसकी स्वतंत्रता और अधिकारिता का सम्मान करना नागरिकों का कर्तव्य है। कहा यूँ भी जा सकता है कि अच्छी सरकार और स्वाधीनता को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। क्योंकि जो लक्ष्य अच्छी सरकार का होता है, वही लक्ष्य स्वाधीनता का भी होता है। जैसे अच्छी सरकार स्वयं एक उपलब्धि है, वैसे ही स्वाधीनता अपने आप में परम लक्ष्य है। वह समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के निजत्व को भी उतना ही सम्मान प्राप्त होता है, जितना समाज को। वह नागरिकों को उनकी पसंदगियों पर बने रहने का अधिकार ही नहीं देती। बल्कि वे सभी अधिकार देती है, जिनसे वे उस सभी कार्य कर सके जिन्हें वे अपने लिए आवश्यक मानते हैं। वह मनुष्य को अपने, समाज और देश; फिर दुनिया के हित में अपना अधिकतम योगदान देने के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराती है। स्वाधीनता मनुष्य का दैविक नहीं, जीवन-सिद्ध अधिकार है। इसलिए वह नैतिक लक्ष्य न होकर समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है।

रूसो ने कहा था कि सभी मनुष्य आजाद जनमते हैं, समाज उन्हें बेड़ियाँ पहनाता है। स्वाधीनता इस विकृति का निस्तार है। वह मनुष्य को निर्बंधता का एहसास कराती है। पराधीनता महज राजनीतिक-सामाजिक अवस्था है। वह मनुष्यों के बीच किसी न किसी प्रकार की सत्ता को ले आती है। जबकि स्वाधीनता मनुष्यों को परस्पर निकट लाकर, मनुष्यता में विश्वास करना सिखाती है। बताती है कि सभी मनुष्य श्रेष्ठ हैं। अपने सर्वोत्तम की अभिव्यक्ति, उसके अपने तथा शेष समाज के लाभ के लिए प्रयुक्त करने का अधिकार प्रत्येक को है। अधिकांश लोग अपनी ऊर्जा दूसरों को अनुशासित करने में खपाते रहते हैं। नागरिक धर्म तो खुद को अनुशासित करना है। वह दूसरों को अनुशासित करने से कहीं अधिक आसान होता है। शासन का कार्य दूसरों को अनुशासित करना नहीं, ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जिसमें नागरिक अनुशासित रहने के लिए स्वयं अनुप्रेत हों। उसके लिए अच्छा है कि सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका को, यथासंभव सीमित रखे। ध्यान रखे कि कोई भी प्रजाति, समूह या मनुष्य अनुशासन की दृष्टि से अयोग्य नहीं होता। जबकि शासन करने के लिए सभी अनफिट होते हैं। अक्टन के शब्दों में, ‘बीजगणित की कोई भी प्रमेय इससे ज्यादा स्वयं-सिद्ध नहीं है कि जिन लोगों के हाथों में जितनी ताकत होती है, वे उतने ही अधिक अपराध करते हैं।’ उसके अनुसार, ‘‘शक्ति का अतिरेक आदमी को पत्थर दिल बनाता है, विवेक का हरण करता है और विचारधारा को कलुषित करता है।’’

स्वतंत्रता का इतिहास सामान्यतः राज्यों की स्थापना के बाद आरंभ होता है। जब राज्य नहीं था, तब भी मनुष्य स्वतंत्र था। लेकिन तब उसके नियमों में स्थायित्व नहीं था। यायावर जीवन में हर दिन नई चुनौती से जूझना पड़ता था, जिसके लिए वह हर रोज नई योजना बनाता था। स्वाधीनता का इतिहास मनुष्य की विकास की चाहत से भी जुड़ा है। अपनी पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ लिबर्टी’ में डेविड शेमिड्ज और जेसन ब्रेनन स्वाधीनता के इतिहास को चालीस हजार वर्ष पहले तक ले जाते हैं। उस समय मनुष्य को हिम युग से बाहर आए कुछ ही समय हुआ था। जीवन संघर्ष-भरा था। उसे न केवल विषम प्राकृतिक हालात से चुनौती थी, बल्कि अपने भीतर पैठे भय और दूसरे मानव-समूहों से भी जूझना पड़ता था। उसके पीछे कहीं न कहीं स्वयं को स्वाधीन बनाने की चाहत थी। लेखकद्वय का मानना है कि स्वाधीनता प्रत्येक युग में द्वंद्वात्मकता का शिकार रही है। जनतांत्रिक समझ के अभाव में लोगों के लिए उसके मायने भी अलग-अलग रहे हैं। ताकतवर ज्यादा आजादी इसलिए चाहता है, ताकि वह और ताकत जुटा सके। इसके लिए वह अपनी शक्ति और संसाधनों का दुरुपयोग करता है। गरीब सोचता है कि आजाद होने पर वह अपने श्रम का उपयोग अपने लिए कर, दरिद्रता से मुक्ति पा सकेगा। न्यूनतम स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसके पास सिवाय देह के कुछ नहीं होता। उसका उपयोग वह जीविकोपार्जन से इतर कर ही नहीं पाता। अपनी स्वाधीनता के लिए उसे शक्तिशाली वर्गों तथा सरकार पर आश्रित रहना पड़ता है। बावजूद इसके प्रत्येक युग में कभी समूह की मदद से तो कभी अकेले ही, आत्मनिर्भर बनने की चाहत देर-सवेर मनुष्य के लिए मुक्ति-प्रदाता बनी है। प्रस्तरकालीन मानव प्रजातियां अपनी पूर्वज प्रजातियों के मुकाबले इसलिए जीवित रह सकीं, क्योंकि उन्होंने दूसरे मानव-समूहों से तालमेल तथा वस्तुओं के आदान-प्रदान की योग्यता प्राप्त कर ली थी। एक-दूसरे की जरूरतों का सम्मान करते हुए उन्होंने प्रकृति के अनेक झंझावात पार किए थे।

स्वतंत्रता और स्वाधीनता के सूक्ष्म अंतर को यदि स्वीकार लिया जाए तो 1857 के जनविद्रोह को क्या कहना उचित रहेगा—‘स्वाधीनता संग्राम’ या ‘स्वतंत्रता संग्राम’? फैसला एकदम साफ है। जिन आंदोलनों में जनता की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी हो, वहाँ स्वतंत्रता और स्वाधीनता को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अधिकतम स्वाधीनता के लिए अपना शासनतंत्र जिसपर जनता का नियंत्रण हो, होना आवश्यक है। 1857 की क्रांति के मूल में मुख्यतः सैनिक विद्रोह की भूमिका को रेखांकित किया जाता है, जिसे क्रांति में ढालने की जमीन किसानों, मजदूरों और शिल्पकार वर्ग के असंतोष ने तैयार की थी। उसकी तात्कालिक परिणति के पीछे सैनिकों की धार्मिक भावनाओं का प्रस्फुटन था। कारतूसों में गाय और चर्बी प्रयुक्त किए जाने की खबरों से भारतीय सैनिक नाराज थे। मेरठ की बैरक से निकल कर जैसे ही विद्रोह की सूचना देश के बाकी हिस्सों तक पहुँची, उसमें आम नागरिकों की सहभागिता भी बढ़ती गई। लोग अंग्रेजों को खदेड़ कर अपनों का शासन चाहते थे। बाद में अँग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके चंद राजा और नबाव भी उनके साथ मिल गए। उनका असली मकसद अपनी खोई सत्ता हासिल करना था। दूसरी ओर आम जनता अपना मान-सम्मान वापस पाने तथा स्वाधीनता की चाहत के साथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए उतरी थी। 

लंबे संघर्ष के उपरांत देश को 15 अगस्त 1947 को बाहरी शासन से मुक्ति मिली। तय किया गया कि देश में जनता का अपना शासन होगा। एक तरह से जनता के संघर्ष का समापन सुखद एवं फलदायी था। तब से आज तक, लगभग सात दशक लंबी विकास यात्रा पर गर्व करने के लिए पर्याप्त कारण हमारे पास हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से भारतीय मनुष्य की औसत आयु आजादी के समय के औसत 32 वर्ष से बढ़कर 66 वर्ष हो चुकी है। अनाज, दुग्ध, सीमेंट, लोहा आदि के उत्पादन में यह देश आत्मनिर्भर है। देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है। इन सब उपलब्धियों पर हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं। मगर केवल भौतिक उपलब्धियाँ स्वतंत्रता की जरूरत का मापदंड नहीं होतीं। मानव-मन का स्वाभाविक उल्लास भी उसकी पहचान होता है। समानताधारित समाजों में वह नागरिकों के व्यक्तित्व का हिस्सा होता है। स्वतंत्रता की उनसठवीं वर्षगाँठ पर विचारणीय यह है कि स्वाधीनता के जो लक्षण हमने ऊपर गिनाए हैं, क्या उनका लाभ सभी नागरिकों को समान रूप से पहुंचा है? क्या लोग स्वाधीता और स्वतंत्रता के मूल्य को समझते हैं? समानता, समरसता, न्याय और समानाधिकार का जो सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था, क्या वह पूरा हुआ है? यदि नहीं तो उसके कारण क्या है?

पंद्रह अगस्त का दिन यह याद रखने का भी है कि सत्ता का चरित्र मूलतः एक जैसा होता है। स्वयंभू बनने की चाहत प्रत्येक सत्तासीन के भीतर छिपी होती है। उसपर केवल जागरूक जनता नियंत्रण रख सकती है। जाति, धर्म, सांप्रदायिकता आदि के अनेकानेक खानों में बँटी जनता क्या इस स्थिति में है कि स्वाधीनता पर आसन्न खतरों को समझ सके? इन दिनों आतंकवाद को देश की शांति, एकता और अखंडता के बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाता है। कदाचित वह है भी। लेकिन इस खतरे का शोर मचा कर आर्थिक वैषम्य और जातीय भेदभाव की उत्तरोत्तर चैड़ी होती खाई की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया जाता है। चूँकि सरकार ने शासन के स्तर पर जाति-आधारित भेदभाव को हटाने के लिए कुछ नहीं किया, इसलिए जातीय दंश का शिकार रही जातियाँ मजबूरी में जाति को अपना तारणहार समझने लगती हैं। गत दो दशकों से मतदाताओं का जितना जाति-आधारित ध्रुवीकरण हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ। क्या जनता इस प्रपंच को समझती है? कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है। यदि नागरिक अपनी स्वाधीनता पर मँडराते संकट की ओर से बेखबर हों तो समझ लेना चाहिए कि उतना ही बड़ा खतरा देश की स्वतंत्रता और अखंडता पर भी मँडरा रहा है। 2022 में भारत आजादी की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाएगा। तब तक इन समस्याओं का समाधान न सही, असली कारण भी हम पहचान पाए तो बड़ी उपलब्धि होगी।