लालू के देस में : एक पत्रकार के संस्मरण (13) : अनिल ठाकुर

अनिल ठाकुर
लालू के देस में


"उस समय लालू यादव अपने कैरियर की ऊँचाई पर थे और कई अपराधियों के मुख्यमंत्री थे। पर माफी माँगने का तो सवाल ही नहीं था। किस बात की माफी"

ढाका से जब मैं कलकत्ता लौटा, तो मेरी नोटबुक में कई स्टोरी थी, जिनका उपयोग मैं कई हफ्तों तक कर सकता था। एक रिपोर्टर के लिए इससे बड़े सुकून की बात और क्या हो सकती है कि उसके पास कई तैयार स्टोरी हों। इनमें से कुछ रिपोर्ट कलकत्ता के अंग्रेजी संस्करण में भी छपीं। इनमें वह स्टोरी भी थी, जिसमें मैंने खालिदा जिया के जीतने की संभावना के कारण बताए थे। बाद में जब खालेदा जीतीं और उनकी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आ गई, तो नंदन जी ने  फोन कर मुझे बधाई दी। पाठकों के भी कई पत्र बाद में आए। एक रिपोर्टर के जीवन में ऐसे पल असीम आनंद के होते हैं, जब संपादक, सहकर्मी और पाठक उसके काम को सराहें। संडे मेल की जिन कुछ एक्सक्लूसिव स्टोरी को मालिक के सामने एमआईएस की मीटिंग में उदाहरण के रूप में रखा गया, खासकर प्रसार विभाग का मुँह बंद करने के लिए, उनमें मेरी ये स्टोरी भी थीं। पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो ऐसी कुछ स्टोरी मुझे आज भी याद आती हैं।

रिपोर्टिंग में मुझे आनंद तो आता था, पर कभी-कभार किसी स्टोरी पर काम करने में। पूर्णकालिक संवाददाता के रूप में काम करना मुझे रास नहीं आता था। मेरे लिए इसका जो सब से खराब पक्ष था, वह था अपने कांटेक्ट को जीवित रखने के लिए निरंतर उनसे मिलते-जुलते रहना। इनमें वे नेता भी होते थे, जिनसे मैं घृणा करता था, पर राजनीतिक स्टोरी करने के लिए यह किसी भी रिपोर्टर की बाध्यता होती है कि वह नेताओं का विश्वास हासिल करे। तभी ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ खबरें मिलती हैं। मैंने नंदन जी से आग्रह किया कि दिल्ली में मुझे कुछ और जिम्मेदारी दे दें, जिससे रिपोर्टिंग के काम से छुटकारा मिल सके। पर उनके मन में मेरे लिए कुछ और ही योजना थी। एक दिन मेरे पास नंदन जी का फोन आया। कहने लगे, मेरे पास आप की काफी शिकायतें आ रही हैं। आपने क्या किया है, खुद ही बता दें, नहीं तो मुझे बताना पड़ेगा। यह नंदन जी की शैली थी। वे मुझे पदोन्नति की सूचना देना चाहते थे। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया, तो बोले, एक नई जिम्मेदारी सँभालने के लिए अपने को तैयार रखें।

दरअसल, संडे मेल का अगला संस्करण पटना से निकालने की योजना बनी थी और मुझे उसका प्रभार सौंपना तय हुआ था। नंदन जी ने उस वक्त इसका खुलासा नहीं किया, पर अगले दिन त्रिलोक दीप का फोन आया कि पटना कूच करने की तैयारी करें। पटना जाने की इच्छा तो मेरी भी थी, पर अचानक स्थानांतरण की सूचना पा कर मैं और विभा ऊहापोह की स्थिति में आ गए। बिटिया दसवीं में थी और सत्र के बीच में उसे पटना ले जाना उसकी पढ़ाई के साथ खिलवाड़ होता। पर मैं जानता था कि इस तरह के संस्थानों में हर चीज अचानक तय होती है और फिर उसका क्रियान्वयन भी चुटकी बजाते किए जाने की अपेक्षा होती है। दो-तीन दिनों बाद ही त्रिलोक दीप का फोन आया कि सब तय हो गया है और जल्दी ही ऑफिशियल लेटर आपके पास पहुँच जाएगा। मैंने उन्हें अपनी समस्या बताई, पर मेरी बात नंदन जी तक पहुँचाने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। त्रिलोक दीप नंदन जी से डरते थे। फिर अपनी दिक्कत मैंने खुद ही नंदन जी को बताई और कुछ मोहलत माँगी, पर वे मुझे समय देने को तैयार नहीं थे। उनके सुझाव पर ही प्रबंधन ने यह फैसला लिया था, इसलिए वे यह कहने की स्थिति में नहीं थे कि पटना संस्करण कुछ समय बाद निकाला जाएगा।

कलकत्ता में कुछ और समय बिताने के लिए मैंने एक सुझाव दिया कि दफ्तर और छपाई की व्यवस्था करवा कर मैं पटना शिफ्ट करूं। यह सुझाव नंदन जी को तर्कसंगत लगा। मैं पटना जाता, वहाँ छपाई के लिए अलग-अलग मुद्रक से रेट लेता, कुछ स्टोरी भी करता। इसी दौरान मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का एक  इंटरव्यू किया, जिसमें उन्होंने नवभारत टाइम्स (पटना संस्करण) के स्थानीय संपादक आलोक मेहता को खूब भला-बुरा कहा था। उसी समय नवभारत टाइम्स में आलोक मेहता ने एक स्टोरी लिखी थी, जिसमें लालू जी का झूठ बेनकाब हुआ था। इस इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी से लालू जी तिलमिलाए हुए थे। सच कड़वा होता है और कोई भी राजनेता अपनी आलोचना से सीखने की कोशिश नहीं करता। वह लोकतांत्रिक पद्धति से चुन कर तो आता है, पर ताज पहनते ही लोकतांत्रिक मूल्य उसके नीचे ढँक जाते हैं। तीसरी दुनिया के देशों में तो खासकर अधिकार मिलते ही नेता-अफसर अपने को शहंशाह समझने लगते हैं। यह उनके व्यवहार में भी शिद्दद से दिखाई देता है।
मैंने जैसे ही पूछा कि लालू जी, आप तो कहते हैं कि बिहार में सब ठीक चल रहा है, पर अभी-अभी नवभारत टाइम्स में जो स्टोरी छपी है, उससे तो ऐसा नहीं लगता। लालू को जैसे मौका मिल गया, उनके पास जितने शब्दबाण थे, उन्होंने ताबड़-तोड़ आलोक मेहता पर दाग दिए, लेकिन वह सब उनकी भड़ास थी। अपने ऊपर लगे एक भी आरोप का तथ्यसंगत जवाब उनके पास नहीं था। यह इंटरव्यू जब छपा, तो आलोक मेहता काफी आहत हुए। उन्होंने नंदन जी को फोन कर मेरी शिकायत की। नंदन जी ने तुरंत मुझे फोन किया। उन्होंने इंटरव्यू पढ़ा नहीं था, इसलिए वे कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं थे। उनका ज्यादा जोर इस बात पर था कि मुझे आलोक मेहता की भी प्रतिक्रिया इंटरव्यू के साथ देना चाहिए था। वे यह भी चाहते थे कि मैं आलोक मेहता को फोन करूँ, ताकि उन्हें पता लग जाए कि इस घटना को नंदन जी ने गंभीरता से लिया।

आलोक मेहता से मेरे संबंध भी बहुत अच्छे थे और लालू का इंटरव्यू करने के पहले उनसे नवभारत टाइम्स के दफ्तर में मेरी मुलाकात भी हुई थी और उन्होंने कहा था कि संडे मेल को पटना में आपके होने से काफी ताकत मिलेगी। नंदन जी से बात होने के बाद बिना देर किए मैंने आलोक मेहता को फोन किया। मैंने उनसे सिर्फ इतना कहा कि अगर आपकी जगह मैं होता, तो अपनी ईमानदार पत्रकारिता के लिए लालू के हमले को सर्टिफिकेट मानता। आलोक जी मेरी बात से असहमत नहीं थे, पर उनकी समस्या दूसरी थी। कहने लगे - यहाँ के माहौल को आप अभी ठीक से नहीं जानते। मुलाकात होगी, तो बताऊँगा। कोई भी बात यहाँ जाति की राजनीति का मुद्दा बन जाती है। मुझे बाद में पता लगा कि नवभारत टाइम्स के पटना दफ्तर में जो सहकर्मी उन्हें पसंद नहीं करते थे, उन्होंने संडे मेल में छपे इंटरव्यू को नोटिस बोर्ड पर चिपका दिया था और उन हिस्सों को रेखांकित कर दिया था, जहाँ लालू ने आलोक मेहता पर हमला किया था।

लालू प्रसाद : डराने की कोशिश
यह वह वक्त था, जब लालू मंडल रथ पर सवार हो कर पिछड़ों के मसीहा बन गए थे और लालू की मुखालिफत का मतलब होता था, पिछड़ों का विरोध। अखबार के दफ्तरों तक इसकी आँच को महसूस किया जा सकता था। एक बड़ी आबादी के वे इतने अपने हो गए थे कि उनके दामन पर लगे बड़े-बड़े दाग भी अपनों को दिखाई नहीं देते थे।

बहरहाल, मैंने सोचा था कि कलकत्ता-पटना के बीच आते-जाते कुछ समय निकाल लूँगा। पर यह हो नहीं पाया। पटना में एक मैनेजर, एक विज्ञापन प्रतिनिधि और एक सर्कुलेशन एक्जिक्यूटिव की नियुक्ति हो गई। अब छपाई, विज्ञापन, सर्कुलेशन की जिम्मेदारी मैनेजर और उनके साथ काम कर रहे लोगों की थी। दफ्तर भी किराए पर ले लिया और छपाई के लिए भी एक संस्थान से बात हो गई। यानी अब कलकत्ता में और रुकने की संभावना खत्म हो चुकी थी। आदेश के मुताबिक पटना जा कर मुझे जल्दी से जल्दी संपादकीय टीम बनानी थी। बिहार के कुछ प्रमुख शहरों में संवाददाता और स्ट्रिंगर रखे जाने की भी योजना थी। बोरिया-बिस्तर बाँध कर परिवार के साथ मैं पटना रवाना हो गया। कुछ समय बाद मेरी पत्नी विभा और बिटिया को कलकत्ता लौट जाना था।

पटना में मैंने रिपोर्टिंग के लिए एक छोटी टीम बना ली और इंतजार करने लगा कि दिल्ली से हरी झंडी मिले, तो पूरी टीम तैयार कर ली जाए। लेकिन इंतजार की घड़ी लंबी होती जा रही थी। इस दौरान मैंने पटना तथा राज्य के अन्य हिस्सों से स्टोरी दिल्ली भेजना शुरू कर दिया था। पटना संस्करण कब शुरू होगा, यह पूछने पर एक ही जवाब मिलता था - जल्दी ही। इस बीच नंदन जी पटना आए, तो मुझे लगा कि कुछ अच्छी खबर ले कर आए होंगे। पर वे पर्यटक की तरह आए, कुछ नेताओं से मिले और सब ठीक है? पूछ कर लौट गए। दो दिन मैं उनके साथ  था, पर इसका जवाब नहीं ले पाया कि वहाँ का संस्करण कब से शुरू होगा। होगा भी या नहीं?

कुछ समय बाद पता चला कि जिस महाप्रबंधक के साथ मिल कर पटना यानी बिहार संस्करण की योजना बनाई गई थी, संजय डालमिया ने उसकी छुट्टी कर दी और टाइम्स ऑफ इंडिया से एक व्यक्ति को महाप्रबंधक के रूप में लाया गया। नाम था सिद्धार्थ राय।

संडे मेल के नए महाप्रबंधक हिन्दी के लोगों से दूरी बनाकर रखते थे। नंदन जी को बिलकुल पसंद नहीं करते थे और त्रिलोक दीप से सीधे मुँह बात नहीं करते थे। उनका मानना था कि जब तक इन्हें हटा कर समझदार संपादक नहीं लाया जाता, संडे मेल का कायाकल्प नहीं हो सकता। नंदन जी के जिन सुझावों या निर्णयों को सिद्धार्थ राय ने खारिज कर दिया, उनमें एक था पटना संस्करण। जब बात मालिक तक पहुँची तो सिद्धार्थ राय ने यही तर्क दिया कि पहले दिल्ली और कलकत्ता संस्करण को मजबूत कर लिया जाए, उसके बाद ही किसी नए संस्करण की योजना बनाई जाए। इस सूचना का मेरे लिए अर्थ यही था कि अब पटना में रह कर मुझे रिपोर्टर की तरह ही काम करना था। यह ताड़ से गिर कर खजूर में लटकने जैसा एहसास था।

नौकरी की कुछ सीमाएँ होती हैं, जिन्हें स्वीकार कर लेने से जीवन कुछ आसान हो जाता है। मैंने भी मान लिया कि जब रिपोर्टिंग ही करनी है, तो उसे योजनाबद्ध ढंग से करना चाहिए, ताकि बिहार में संडे मेल की पहचान बन सके। जिन लोगों को मैंने रिपोर्टिंग के लिए रखा था, उन्हें साफ-साफ बता दिया कि अब आप लोगों को नियमित संवाददाता का नियुक्ति पत्र नहीं मिल सकता, इसलिए अगर स्ट्रिंगर की तरह काम करना स्वीकार हो, तो संडे मेल में काफी काम है। जो भी छपेगा, उसके पैसे मिलेंगे। उनके पास रोजगार का कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने संडे मेल की शर्तों पर काम करना स्वीकार  लिया। मेरी योजना थी कि बिहार से कम से कम तीन पेज की सामग्री दिल्ली भेजी जाए और उन पेजों के साथ संडे मेल बिहार संस्करण के रूप में राज्य में बिके। नंदन जी को यह आइडिया इतना पसंद आया कि उन्होंने तुरंत दिल्ली दफ्तर में इसका आदेश जारी कर दिया। इसके दो फायदे थे - बिहार में पत्रिका का सर्कुलेशन बढ़ने की संभावना और पटना दफ्तर में मैनेजर, सर्कुलेशन तथा विज्ञापन प्रतिनिधि के होने का औचित्य। इस योजना के अमल में आते ही संडे मेल की उपस्थिति पूरे बिहार में दिखने लगी और कुछ अन्य प्रीलांसर भी जुड़ने लगे। इस बीच लालू यादव की बेनामी संपत्ति पर मैंने एक स्टोरी की, जिसने संडे मेल को चर्चा में ला दिया। लालू यादव तिलमिला गए। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें संडे मेल तथा मेरे खिलाफ पाँच करोड़ रुपए की मानहानि का दावा पेश करने का एलान कर दिया।

कुछ शुभचिंतकों ने सुझाव दिया कि मैं सँभल कर रहूँ। कुछ समय  के लिए दफ्तर जाना बंद कर दूँ। कुछ दिनों बाद लालू यादव के करीबी और कांग्रेस के पूर्व दबंग मंत्री राजो सिंह ने मुझे अपने घर बुलवाया। सलाह दी कि मैं लालू से माफी माँग लूँ। बोले - आप लालू यादव को शायद ठीक से नहीं जानते। कुछ भी हो सकता है। उनकी सलाह सुन कर मैं वापस आ गया। पत्रकार जीवन में इतना जोखिम तो उठाना ही पड़ता है, खासकर तब, जब कोई पत्रकार किसी राज्य की राजधानी या और छोटी जगह पर काम कर रहा हो। मेरे परिवार के लोग भी थोड़े सहमे-सहमे-से रहने लगे थे। उस समय लालू यादव अपने कैरियर की ऊँचाई पर थे और कई अपराधियों के मुख्यमंत्री थे। पर माफी माँगने का तो सवाल ही नहीं था। किस बात की माफी? लालू ने मानहानि की धमकी तो दी, पर वे कोर्ट नहीं गए।         

(जारी)