बलात्कार का वर्ग चरित्र : कानून : रवींद्र गोयल

रवींद्र गोयल
बलात्कार का वर्ग चरित्र

अगस्त 2016 में दिल्ली की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 'पीपली लाइव' फिल्म के सह-निर्देशक, इतिहासकार और दास्तानगो महमूद फारूकी को बलात्कार के मामले में सात साल की सजा सुनाई (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार बनाम महमूद फारूकी)। फारूकी रोड्स स्कॉलर रहे हैं। उन्होंने दून स्कूल और सेंट स्टीफेंस से पढ़ाई की। उनकी किताब 'बिसीज्डः वायसेज फ्रॉम दिल्ली 1857' काफी चर्चित रही है। एक अमेरिकी स्त्री ने आरोप लगाया था कि जब वह  अपने शोध के सिलसिले में दिल्ली के सुखदेव विहार में महमूद फारूकी  के घर उनसे मिलने गई थी तब फारूकी ने उन्हें मुख मैथुन (ओरल सेक्स) के लिए बाध्य किया था, जो बलात्कार की श्रेणी में आता है। जज संजीव जैन ने फारूकी को धारा 376 के तहत दोषी पाया और उन्हें सात साल जेल की सजा सुनाई, जो इस धारा में न्यूनतम सजा है, और पचास हजार रु. का जुर्माना लगाया।

भारत के कानूनी इतिहास में यह पहला मामला है जब ओरल सेक्स को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है। यह कानून में निर्भया कांड के बाद किए गए संसोधनों का नतीजा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इस केस में महिला की बात को अदालत ने सही माना है। तीसरे, इस फैसले से समाज में संदेश जाता है कि अभियुक्त कोई भी हो, उसे सजा दी जाएगी।

महमूद फारूकी को दी गई सजा ने धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और नारीवादी लेखकों और कार्यकर्ताओं के बीच एक बहुत ही तीखी बहस को जन्म दिया है। बहस के बिंदुओं पर चर्चा से पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि समाज के मुखर तबकों में यह बहस आखिर आई कहाँ से है। इसे समझने के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि प्रबंध विज्ञान में सीमित समझदारी का सिद्धांत पढ़ाया जाता है, जिसके अनुसार व्यक्तियों की समझदारी उनके दिमाग की संज्ञानात्मक सीमाओं तक सीमित है। इस वजह से जब अपनों या अपने जैसों की गलतियों या आचरण के बारे में राय बनानी हो तो हमारा विवेक कुंद हो जाता है। महमूद फारूकी कोई साधारण आदमी नहीं है। वह समाज के संभ्रांत ऊपरी तबके का सदस्य है। उस या तरुन तेजपाल जैसे लोग किसी स्त्री के साथ जबरदस्ती यौन सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर सकते हैं, यह मानना इस तबके को परेशान करता है और उस पर सजा भी हो जाए तो एक नैतिक संकट खड़ा हो जाता है।

महमूद फारूकी
जो मित्र फारूकी केस के फैसले से परेशान हैं, उनकी तीन मुख्य शिकायतें हैं। सब से पहली शिकायत यह है कि यह फैसला दरशाता है कि  महिलाओं के हितों के नाम पर बनाए गए कठोर कानून कैसे पुरुष विरोधी हो जाते हैं। इसलिए बलात्कार विरोधी कानून को थोड़ा कम कठोर होना चाहिए। तर्क दिया जा रहा है कि सभी घटनाओं को बलात्कार कहना उचित नहीं है। एक जाने-माने वकील का कहना है कि अपने ड्राइंग रूम में किसी महिला के साथ जबरन ओरल सेक्स और एक जघन्य सामूहिक बलात्कार में फर्क किया जाना चाहिए। इस तर्क से कि सभी बलात्कार समान होते हैं, सब घटनाओं को बराबर मानना ठीक नहीं है। लेकिन इस चिंता का स्रोत शायद कानून की सख्ती नहीं है। अभी तो इस कानून के अन्तर्गत केवल एक आदमी को सजा हुई है। अतः यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि इस कानून के तहत पुरुषों को प्रताड़ित किया जा रहा है। शायद वाचाल वर्ग में इतनी चिंता तब नहीं होती यदि यही सजा किसी मामूली आदमी को दी गई होती। कानून की चपेट में आए व्यक्ति से उपजी हमदर्दी का कारण यह है कि वह अपने ही संभ्रांत समुदाय का सदस्य है।

इन मित्रों की दूसरी शिकायत यह है कि इस केस में सम्बंधित तथ्यों का उचित अध्ययन नहीं हुआ और फैसला जल्दी में सुनाया गया है। घटना 28 मार्च 2015 की है। जून 2015 में केस दायर किया गया। अगस्त 2015 में सुनवाई शुरू हुई और 30 जुलाई 2016 को फैसला सुनाया गया।   दोनों पक्षों के हितों की देखभाल काबिल वकील कर रहे थे और यह मानने का कोई आधार नहीं है कि उन्होंने अपने काम को जिम्मेवारी से नहीं पूरा किया होगा। ऐसे में यह दलील कि फैसला जल्दी में क्यों सुना दिया गया, एक खोखली दलील है। तार्किक माँग तो यह होनी चाहिए कि और मामलों में भी फैसले जल्दी सुनाए जाएँ।

कई मित्रों ने 'बन्दीवादी नारीवाद' (कारसेरल फेमिनिज्म) के खतरे की ओर संकेत किया है। यह ऐसा नारीवाद है जो आज के नवउदारपंथी दौर में महिलाओं पर पुरुष द्वारा हिंसा संबंधी शिकायतों का हल न्यायिक कठोरता में देखता है। यह एक गंभीर बहस है और यह सवाल वाजिब है कि जेल की सजा से कोई सुधरता नहीं है। लेकिन अजीब बात यह है कि यह तर्क निर्भया केस के आरोपियों को  कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की माँग के समय नहीं उठाया गया था, फिर इसका फारूकी केस से क्या सम्बन्ध हो सकता है? मूल बात यह है कि जब तक देश में कोई कानून है तब तक सभी वर्गों से आए हुए आरोपितों को उस कानून के हिसाब से सजा मिलनी चाहिए। सच तो यह है कि यह फैसला निर्भया हत्याकांड से उपजे आन्दोलन की उपलब्धि है और स्त्री की गरिमा की रक्षा करने में निर्णायक साबित हो सकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि भारतीय मध्य वर्ग की सीमित संवेदना का विस्तार होगा और वह ‘समरथ को नहिं दोष गोसाईं’ के वर्गवादी सोच से आगे बढ़ सकेगा।
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