असहमति का सौंदर्य : व्यक्तिगत : अनामिका

अनामिका
असहमति का सौंदर्य

"जो हमारे जैसा नहीं और जो हमसे अलग विचार रखता है, वर्ग-वर्ण-लिंग-नस्ल- धर्म-सम्प्रदाय आदि के स्तर पर जो भी ‘अलग’ है - उसकी बातें धीरज से सुनने-गुनने की प्रज्ञा विकसित करना ही जनतंत्र की सच्ची स्कूलिंग है जिसके ड्रॉपआउट्स अनेक हैं।"

औपनिवेशिक भारत में शिकायती आवेदन लिखते हुए कुछ अनूठे पदबंधों का प्रयोग होता था, जिनमें एक है – आई बेग टु डिफर।  हम पाँचवीं-छठी में पढ़ते थे। हमारी शिक्षक ‘कॉम्पोजिशन’ की कक्षा में हमें ऐसी ही गिड़गिड़ाती हुई भाषा में आवेदनपत्र लिखना सिखातीं तो कभी-कभी हम मुस्कुरा देते। इस पर वे जो कहतीं, उसका सारांश शायद यह हो कि विनीत होने में हर्ज ही क्या   है - अँगरेजी बातचीत की महीनी सीखनी ही चाहिए - खासकर कागजी लड़ाई लड़ते हुए। इससे वातावरण जरूरत से ज्यादा विषाक्त होने से बच जाता है । विनय बफर है, बफर!

चॉकलेट में जड़ कर कुनैन की गोली खिलाने के अपने व्यावहारिक कारण होते हैं। शिष्ट प्रतिरोध की व्याप्ति गहनतर होती है - यह बात तो धीरे-धीरे हमारे गले उतर गई, पर यह बात आज तक नहीं उतरी कि सारी विनय का ठेका वंचित प्रतिरोधियों को ही क्यों लेना चाहिए! कोई तो सिविल सोसायटी या प्रेशर ग्रुप हो जो उनके विनयीकरण में थोड़ी रुचि ले जो सदा रोडरोलर और हथियार ले कर ही खड़े रहते हैं कि करे कोई प्रतिरोध की हिम्मत और उसे उसकी औकात बता दी जाए। घरेलू स्तर पर इसे देखें तो यह कुछ ऐसा ही है कि धीरता, सहिष्णुता, त्याग, ममता, सहानुभूति, लज्जा आदि सारे सद्गुण स्त्री-धन ही बता दिए जाते हैं। अरे भाई, क्यों हो किसी धन पर किसी एक पक्ष का एकाधिकार, यह सद्गुण-कोष बेचारे पुरुषों में भी तो बँटे।

सत्य किसी एक पक्ष की जेब में तहा कर रखा रूमाल नहीं होता। वह एक बहुमुखी रतन होता है। और जनतंत्र दुनिया की सबसे कारगर व्यवस्था इसीलिए है कि यहाँ कम-से-कम संविधान में यानी कागज पर इस बात का पूरा आश्वासन है कि अपने अनुभवों, अनुभूतियों, अनुचिंतनों के आलोक में आप अपने ढंग से सत्य की व्याख्या करें और यह व्याख्या सामने रखते हुए दूसरों का खण्डन-मण्डन जरूरी हो तो वह भी खुल कर करें, पर ‘अन्यता’ के प्रति पूरे सम्मान के साथ, खुल कर, पर चाकू खोल कर नहीं। भाषा स्वयं एक प्रखर युद्धस्थल है, अभिधा-लक्षणा-व्यंजना के पर्याप्त हथियार यहाँ आपको मिलेंगे जिनके सहारे आप कोई भी मनोवैज्ञानिक युद्ध पीढ़ियों तक लड़ सकते हैं। भाषिक हथियारों के परे जा कर सचमुच के आयुध उठा लेना असंगत तो है ही,  करदण्ड न्याय कमजोर योद्धा की निशानी है।
‘अहो रूपं अहो ध्वनिः’ की मस्कापरक नीति सिर्फ एक कोलाहल रचती है; आत्मा का संगीत तो विवादी-संवादी सुरों के मेल से ही जगता है! इसी अर्थ में कबीर ने यह तर्क दिया था कि -

निंदक  नियरे  राखिए  आँगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करत सुभाय

इस भूमण्डीकरण (भूमण्डलीकरण) के युग में साबुन-पानी का प्रयोग बहुत बढ़ गया है, पर सारे स्वच्छता अभियान, सरकारी हों या गैर-सरकारी, ऊपरी चमड़ी को ही निवेदित हैं। चित्त में व्याप्त अहमन्यता का मैल ढोने के लिए असहमति नानक चंदन-गुटका का प्रयोग बहुधा होना चाहिए, जो नहीं होता! ‘तो, नहाए-धोए का भया जो मन मैल न जाए’ की स्थिति सर्वव्याप्त है। जो हमारे जैसा नहीं और जो हमसे अलग विचार रखता है, वर्ग-वर्ण-लिंग-नस्ल- धर्म-सम्प्रदाय आदि के स्तर पर जो भी ‘अलग’ है - उसकी बातें धीरज से सुनने-गुनने की प्रज्ञा विकसित करना ही जनतंत्र की सच्ची स्कूलिंग है जिसके ड्रॉपआउट्स अनेक हैं। ये सब ड्रॉपआउट्स हिंसक भी हैं - और बहुधा सरकारपोषित, आश्चर्य की बात तो यह है।

अश्वेत-अल्पसंख्यक-स्त्री-दलित, आदिवासी, बेरोजगार और विस्थापित अस्मिता आंदोलन के सहारे इन दबंगों को यह ही समझाने की कोशिश तो किए जा रहे हैं कि अन्यता का गला घोंटना एक तरह का आत्मघात ही है - सत्य का दूसरा पक्ष जाने-समझे बिना तो अपना भी विकास बाधित ही रहेगा। खिड़कियाँ बंद कर लेना ऑक्सीजन का प्रवाह बंद कर देना ही है।

भूख और अपमान दुनिया के दो मूल दुख हैं। अपमान की इन्तेहां है ‘शटअप’ और ‘गेटआउट’ की राजनीति! ‘आउट-आउट’ की व्याप्ति इन दिनों और खतरनाक हो गई है - जीवन के पार फेंक देने की हद तक खतरनाक!

यह मनुष्य-मात्र का अधिकार है कि उसे वे संसाधन और अवसर उपलब्ध कराए जाएँ जिनसे उसकी अंतर्निहित विशिष्टताएँ फलें-फूलें और उसकी अन्यता को उसकी ‘हीनता’ मान कर कोई उससे ‘शटअप’, ‘आउट-आउट’ की राजनीति खेले तो कालमेघ की तरह उसके साथी कलाकार और लेखक चारों दिशा से घुमड़ आएँ उसके खिलाफ।

क्षमा बड़ा भाव है। इस बारे में लगातार सोचते हुए अब मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि अपने दमनकर्ता को तो मैं इस भाव से क्षमा कर सकती हूँ कि इसे और परिपक्व होना है, इसकी अपनी कुंठाएँ हैं जिनका निवारण धीरे-धीरे करूँगी, पर किसी और पर कोई हावी हो रहा है तो मैं प्रतिकार के लिए उठूँगी जरूर और तत्काल , अब लौ नसानी अब न नसैहों।
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