भारत ने कश्मीर का विश्वास खो दिया है : विश्लेषण : शरद यादव

शरद यादव
भारत ने कश्मीर का विश्वास खो दिया है

"केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि बंदूकों का जवाब बंदूकें नहीं हो सकतीं। अगर हो सकतीं तो अमेरिका की बंदूकों ने अफगानिस्तान, इराक, सीरिया समेत पूरी दुनिया को अब तक शांत कर लिया होता।"

कश्मीर पर बल द्वारा नहीं, केवल पुण्य द्वारा ही विजय पाई जा सकती है। यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं, न कि शस्त्रधारियों से।’ - बारहवीं शताब्दी के मध्य में प्रसिध्द कश्मीरी कवि और इतिहासकार कल्हण द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ 'राजतरंगिणी’ में कही गई यह बात आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत की आजादी और भारत संघ में कश्मीर के विलय के बाद से ही कश्मीर लगातार बल और छल का शिकार होता रहा है - कभी कम तो कभी ज्यादा। यही वजह है कि कश्मीरी अवाम भी हमेशा दिल्ली के शासकों को और यहाँ तक कि शेष भारत को भी शक की नजर से देखता रहा है, भले ही हम मौके-बेमौके यह दुहराते रहें कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। आज तो कश्मीरी अवाम इतना क्षुब्ध और बेचैन है कि वह भारत के साथ रहना ही नहीं चाहता।

कश्मीर को ताकत के जरिए वश में करने का प्रलाप करने वाले लोग हमारे देश में कम नहीं हैं। संघ परिवार से जुड़े लोगों के अलावा कुछ अन्य तबकों में भी इस तरह के लोग बड़ी संख्या में मिल जाएँगे। लेकिन यह सिवाय पागलपन के कुछ नहीं है। किसी भी राज्य या राज्य के भाग को बल प्रयोग से काबू में नहीं रखा जा सकता। अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों का वियतनाम और अफगानिस्तान में क्या हश्र हुआ, उसे याद रख कर उससे सीख लेनी चाहिए। किसी को अपना बनाने के दो ही रास्ते दुनिया में अपनाए गए हैं - या तो हिंसा का या प्रेम का रास्ता। हिंसा का रास्ता कभी सफल नहीं हुआ है। अत: प्रेम का रास्ता ही एकमात्र विकल्प है।

इस बात में कोई शक नहीं कि कश्मीर का मसला अपनी विकृति की चरम अवस्था में पहुँच गया है। श्रीनगर और नई दिल्ली की सरकारों और केंद्र में शासक दल के नेताओं के तेवरों को देखते हुए इस स्थिति का कोई तुरत-फुरत हल दिखाई नहीं देता। अलबत्ता केंद्र सरकार ने विपक्षी दलों के लगातार दबाव के चलते वहाँ सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की समझदारी जरूर दिखाई। लेकिन सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान भी सरकारी पक्ष अपनी इस जिद पर कायम रहा कि अलगाववादी नेताओं से कोई बात नहीं की जाएगी। मेरा मानना है कि सरकार का यह रुख उचित और विवेकसम्मत नहीं है। आखिर जिन लोगों से मतभेद है उनसे बात करे बगैर हम मसले का कोई सर्वमान्य हल कैसे निकाल सकते हैं? इससे पहले भी केंद्र में चाहे जिस दल या गठबंधन की सरकार रही हो, सभी ने हुर्रियत कांफ्रेंस के विभिन्न धड़ों से बातचीत की है - भले ही वह बातचीत बेनतीजा रही हो। श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने तो हुर्रियत के नेताओं से ही नहीं, बल्कि हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे उग्रवादी संगठन को भी संघर्ष विराम के लिए राजी कर उसके साथ बातचीत की थी और उस बातचीत में सरकार का प्रतिनिधित्व तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। कश्मीर ही क्यों, हमने मिजोरम में ललडेंगा, नगालैंड में इसहाक-मुइवा गुट और असम में बोडो उग्रवादियों से भी तो आखिर बातचीत के माध्यम से ही मसलों का हल निकाला और उन्हें हथियार त्यागने पर राजी किया।

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर गए सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल हम लोगों यानी जनता दल (यूनाइटेड) और वामपंथी दलों के प्रतिधिनियों ने सरकारी रुख को नजरअंदाज कर हुर्रियत के विभिन्न धड़ों के नेताओं से मुलाकात कर बातचीत करने का प्रयास किया। अधिकांश प्रचार माध्यमों ने हमारे इस प्रयास के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार करते हुए यह प्रचारित किया कि हुर्रियत के किसी भी नेता ने विपक्षी नेताओं से मिलने में दिलचस्पी नहीं दिखाई और एक तरह से उन्हें अपमानित किया। यह सरासर आधारहीन प्रचार किसी खास उद्देश्य से प्रेरित लगता है। हकीकत यह है कि पाँच में चार हुर्रियत नेता अब्दुल गनी बट्ट, यासिन मलिक, मौलवी उमर फारूक और शब्बीर शाह हम लोगों से न सिर्फ गर्मजोशी से मिले, बल्कि उन्होंने बातचीत के लिए भी सहमति जताई। अलबत्ता उन्होंने यह जरूर कहा कि चूँकि सरकार ने उन्हें बातचीत करने का निमंत्रण न दे कर उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की है, इसलिए वे यहाँ श्रीनगर में नहीं बल्कि दिल्ली आ कर बातचीत करना चाहेंगे। यह बात गौरतलब है कि इन चारों नेताओं में एक भी ऐसा नहीं है जो चाहता हो कि कश्मीर भारत से अलग हो कर पाकिस्तान में शामिल हो जाए। इनमें कोई कश्मीर के लिए ज्यादा स्वायत्तता चाहता है तो कोई कश्मीर की 'आजादी’ चाहता है। हुर्रियत नेताओं में सिर्फ पाकिस्तान समर्थक माने जाने वाले सैयद अली शाह गिलानी ही एकमात्र ऐसे रहे जो हमसे नहीं मिले। हालाँकि पहले तो उन्होंने भी हमसे मिलने के लिए सहमति जताई थी और माकपा नेता सीताराम येचुरी से बात कर मुलाकात का वक्त भी मुकर्रर किया था, लेकिन ऐन वक्त पर शायद पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के दबाव के चलते वे मिलने से मुकर गए।

गिलानी : बातचीत का निमंत्रण नहीं
सरकारी और गैरसरकारी प्रचार माध्यम सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर दौरे को असफल और फिजूल की कवायद करार देने में जुटे हुए थे और सरकारी पक्ष के कुछ जिम्मेदार लोग भी परोक्ष रूप से इस प्रचार को हवा दे रहे थे। लेकिन मेरा मानना है कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे से कश्मीरी अवाम में एक सकारात्मक संदेश गया है। हुर्रियत के चार प्रमुख नेताओं से मुलाकात के माध्यम से हम विपक्षी नेता कश्मीर अवाम को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि देश का बहुमत न सिर्फ कश्मीर को बल्कि कश्मीरी तहजीब को और कश्मीर घाटी के बाशिंदों को भी अपना अभिन्न अंग मानता है और उनके साथ संवाद करना चाहता है।

कोई कुछ भी कहे, यह बात निश्चित है कि कश्मीर की समस्या मूल रूप से हिंदू-मुस्लिम समस्या नहीं है। सांप्रदायिक तत्वों ने अपने निहित  स्वार्थों के लिए इसे हिंदू-मुस्लिम समस्या का रंग दे रखा है। कश्मीरी पंडितों का विस्थापन घाटी से तब हुआ जब इस समस्या को पूरी तरह सांप्रदायिक रंग दिया जा चुका था। स्वाधीनता प्राप्ति और भारत में कश्मीर के विलय के बाद चार दशक से अधिक समय तक कश्मीर घाटी में सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा। कश्मीरी पंडित भी कश्मीरी मुसलमान के साथ सुर में सुर मिला कर सूबे की स्वायत्तता और सुशासन के लिए नेशनल कांफ्रेंस के मंच से आवाज उठाते रहे। गैरसांप्रदायिक राजनीति की धारा वहाँ इतनी मजबूत रही कि वहाँ किसी भी किस्म के सांप्रदायिक संगठन को पैर जमाने की जगह नहीं मिली। अत: जरूरी है कि इस समस्या को हिंदू-मुस्लिम समस्या से अलग कर सूबे की राजनीतिक समस्या के रूप में देखा जाए।

जहाँ तक कश्मीर के मौजूदा हालात के कारणों की बात है, मेरा साफ तौर पर मानना है कि कश्मीर के लोगों को सूबे में साझा सरकार चला रही पीडीपी और भाजपा पर कतई भरोसा नहीं है। अलबत्ता मुफ्ती मोहम्मद सईद जरूर कुछ सकारात्मक प्रयास करना चाहते थे। उनके मुख्यमंत्री बनने और उनकी सरकार में भाजपा की साझेदारी से कई राजनीतिक समीक्षकों और केंद्र में सत्ताधारी दल के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि उनके नेतृत्व में यह गठजोड़ सूबे में बडी कामयाबी हासिल करेगा। यह मिथक भी गढ़ा गया कि जम्मू में असर रखने वाली भाजपा और कश्मीर घाटी में मजबूत जनाधार वाली पीडीपी की साझा सरकार बनने से कश्मीर में शांति बहाली और सांप्रदायिक सौहार्द कायम होगा, हालाँकि सत्ता की इस साझेदारी को आम कश्मीरी अवाम ने पसंद नहीं किया था। एक तरह से इस गठजोड़ का बनना और सत्ता सँभालना कश्मीरी अवाम के कटे पर नमक छिड़कने जैसा था।

यह सही है कि मुफ्ती ‘हीलिंग टच’ में यकीन रखते थे यानी आहत कश्मीरियों के जख्मों पर मरहम लगाना और राजनीतिक बंदियों को रिहा करना चाहते थे। वे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के रास्ते दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियाँ शुरू करने का इरादा रखते थे। कश्मीर मसले को हल करने के लिए वे सभी संबंधित पक्षों यहाँ तक कि पाकिस्तान से भी बात करने के पक्षधर थे। उनकी कोशिश थी कि सुरक्षा बल आम लोगों के साथ सह्रदयता से पेश आएँ और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) का दायरा सीमित हो। यह सारी बातें भाजपा और पीडीपी के न्यूनतम साझा कार्यक्रम कॉमन एजेंडा में भी शामिल थीं और आज भी हैं, लेकिन इनमें से किसी भी मुद्दे पर वे कोई पहल नहीं कर सके। इसकी मुख्य वजह यही रही कि उनकी पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन पूरी तरह बेमेल था। यही वजह रही कि नीतिगत मसलों पर उन्हें अपने हाथ ही नहीं बाँधे रखना पड़ा, बल्कि मुँह भी बंद रखना पड़ा। वे महज दस महीने सत्ता में रहे, लेकिन उनका यह कार्यकाल एक तरह से बिल्कुल निस्तेज रहा। दुखद परिस्थिति में मुख्यमंत्री रहते ही उनका निधन हो गया। मुफ्ती साहब की मौत के बाद लंबे समय तक दुविधा में रहने के बाद उनकी बेटी महबूबा साझा सरकार की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन वे भी मुख्यमंत्री के तौर बेअसर ही रहीं। उन्होंने भी पीडीपी-भाजपा के साझा एजेंडा पर आगे बढ़ने की इच्छा नहीं दिखाई। कश्मीरी अवाम को तो पहले से ही इस सरकार पर एतबार नहीं था, लिहाजा उसका असंतोष लगातार बढता गया।

महबूबा : घटती हुई साख
यह मानने वालों की कमी नहीं है कि कश्मीर के मौजूदा संकट के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। पिछले दिनों संसद में हुई बहस के दौरान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने और स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने भी कहा कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसके लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है। केंद्र में सत्ताधारी दल और उसके सहोदर संगठनों की ओर से कहा जा रहा है कि पाकिस्तान को सबक सिखाए बगैर कश्मीर का मसला हल नहीं होगा। सबक से उनका आशय युद्ध से है। ऐसी बातें करने वाले यह भूल जाते हैं कि भारत की तरह पाकिस्तान भी परमाणु शक्ति-संपन्न देश है। इसलिए हवा में चाहे जितनी तलवारें भाँज ली जाएँ, दोनों मुल्कों के बीच औपचारिक युद्ध अब असंभव है। दोनों मुल्कों के हुक्मरान अगर इसके लिए तैयार भी हो जाएँ तो अमेरिका और चीन उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे। दोनों के अपने-अपने हित पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं। इसलिए वे दोनों देशों को न तो युद्ध की इजाजत देंगे और न ही कश्मीर मसले पर भारत के पक्ष में पलड़ा झुकने देंगे।

दरअसल, कश्मीर के मौजूदा संकट में पाकिस्तान की भूमिका उतनी ही है, जितनी हमेशा रहती है। कश्मीर के मौजूदा संकट की चर्चा करते समय हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि महज ढाई साल पहले हुए लोक सभा के चुनाव और डेढ़ साल पहले हुए विधान सभा के चुनाव में जम्मू-कश्मीर के लगभग   65 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। यानी घाटी के बहुमत से कहीं ज्यादा बाशिंदों ने आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों की चुनाव बहिष्कार की धमकी या अपील को सिरे से नजरअंदाज कर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी आस्था जताई थी। इन चुनावों से पहले सूबे में आम तौर पर शांति थी। पर्यटकों की आमद भी खासी हो रही थी। लेकिन  2016 आते-आते हालात एकदम बदल गए, खासकर पिछले दो-ढाई महीनों में पूरी घाटी में असंतोष और हिंसा की लपटें उठने लगीं। जाहिर है कि इसके लिए केंद्र और सूबे की सरकारें जिम्मेदार हैं। उन्होंने कश्मीरी अवाम की जिंदगी को बेहतर बनाने के जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं किए गए। लोगों में नाराजगी 2014 की प्रलयंकारी बाढ़ में हुए नुकसान की देरी से और अपर्याप्त भरपाई के कारण भी थी।

इस पूरी स्थिति का अलगाववादी और पाकिस्तान पोषित आतंकवादी गुटों ने भरपूर फायदा उठाया। कश्मीर में घरेलू आधार वाली आक्रामकता का चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। दिल्ली और श्रीनगर के सत्ता-संचालकों की गलतियों के चलते कश्मीरी अवाम में चरमपंथ को  पहले के मुकाबले ज्यादा समर्थन मिलता नजर आया। इस बदलाव की विश्वसनीय गवाही खुद सेना के शीर्षस्थ अधिकारी लेफ्टिनेंट-जनरल जी एस हूडा ने दी। उन्होंने साफ तौर पर स्वीकार किया कि सेना के प्रति आम जनता की सहानुभूति लगभग खत्म हो गई है, जिसके चलते कश्मीरी उग्रपंथियों के खिलाफ अभियान चलाना बेहद मुश्किल हो गया है। दरअसल, 1990-91 से साल 2014 के बीच उग्रवाद और अलगाववाद को कश्मीरी अवाम के बीच ऐसा व्यापक समर्थन कभी नहीं मिला, जैसा 2015-16 के दौरान दिखा। यह स्थिति भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए बेहद खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है।

इसके कुछ बुनियादी कारण हैं। पहला कारण है राजनीतिक संवाद का पूरी तरह बंद किया जाना। यह जानते हुए भी कि कश्मीर का मसला बुनियादी तौर पर राजनीतिक है (यह बात श्रीनगर स्थित सैन्य कमान के प्रमुख भी कह चुके हैं), केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने अचानक घाटी में राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया को पूरी तरह बंद कर दिया। यह स्थिति दोनों स्तरों, कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के स्तर पर और पड़ोसी पाकिस्तान के स्तर पर भी दिखी।

पाकिस्तान से राजनयिक वार्ताओं की शर्तें बार-बार बदली गईं। केंद्र का यह रणनीतिक सोच न केवल दिशाभ्रम का शिकार था, बल्कि इसमें अतीत की गलतियों से न सीखने की एक जिद भी दिखाई दे रही थी। मोदी सरकार के इस नजरिए को बदलने में मुख्यमंत्री के तौर पर मुफ्ती मोहम्मद सईद बिल्कुल असफल रहे। उनके इंतकाल के बाद मुख्यमंत्री बनी महबूबा मुफ्ती ने भी भाजपा-संघ के सोच से प्रभावित केंद्र सरकार की कश्मीर नीति के आगे आत्मसमर्पण कर दिया।
कश्मीर की वर्तमान 'अशांति’ सुरक्षा बलों के हाथों हिजबुल मुजाहिदीन के कथित कमांडर बुरहान वानी की मौत से उपजी है। बुरहान के मारे जाने से उठे बवंडर को महबूबा सरकार ने शुरू में बहुत कम करके आँका। उन्हें और उनके सलाहकारों को इस बात का अहसास ही नहीं था कि यह बवंडर घाटी में नई तरह के जनाक्रोश का रूप ले सकता है। एक दौर मे 'हीलिंग टच’ की नीति की पैरोकार रही महबूबा मुफ्ती ने इस जनाक्रोश को हिंसक ढंग से दबाने-कुचलने के केंद्र सरकार के सैन्यवादी नजरिए का हर स्तर पर साथ दिया। इससे कश्मीरी अवाम के बीच उनकी बची-खुची राजनीतिक विश्वसनीयता भी खत्म-सी हो गई। सूबे की मुख्यमंत्री के तौर पर वह राजनीतिक जोखिम ले कर कुछ बड़े कदम उठा सकती थीं, पर उन्होंने समय रहते ऐसा कुछ नहीं किया।

केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि बंदूकों का जवाब बंदूकें नहीं हो सकतीं। अगर हो सकतीं तो अमेरिका की बंदूकों ने अफगानिस्तान, इराक, सीरिया समेत पूरी दुनिया को अब तक शांत कर लिया होता। मिलिटेंसी और उग्रवाद से निपटने में सुरक्षात्मक कदम के साथ राजनीतिक पहल की सबसे बड़ी भूमिका होती है। ऐसी पहल कभी आमने-सामने के संवाद के जरिए होती है, तो कभी गोपनीय स्तर पर बंद दरवाजों के अंदर भी। औपचारिक समझौते और अनौपचारिक सहमतियाँ ऐसे संवादों का अहम हिस्सा होते हैं। कश्मीर को ले कर ऐसी राजनीतिक पहलकदमी काफी समय से 'नई दिल्ली’ के एजेंडे से नदारद है।

कुछ राजनीतिक विश्लेषक अभी तक यह मान कर चल रहे थे कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी प्रकार से जीत हासिल करने के लिए केंद्र की भाजपा नीत सरकार पाकिस्तान के साथ एक सीमित युध्द प्रायोजित कर सकती है, लेकिन अब तो कश्मीर में पिछले दो महीने से जो चल रहा है उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने कश्मीरी अवाम से युद्ध करने का इरादा बना लिया है। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पहली बार अर्धसैनिक बलों को सेना की अगुवाई में कश्मीर घाटी में व्यापक तलाशी एवं अन्य दमनकारी कार्यों में लगाया जा सकता है। अवाम के खिलाफ ऐसे युद्ध से भले कोई चुनाव जीत लिया जाए, लेकिन यह कदम कश्मीर को भारत से जुदा करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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