खाली पड़े फ्लैट और बेघर लोग : आवास : सुभाष गाताडे

सुभाष गाताडे
खाली पड़े फ्लैट और बेघर लोग
भारत में आवास क्रांति की जरूरत

नौएडा सिटी सेन्टर से आगे की ऑटो की यात्रा कई मायनों में शिक्षाप्रद रही। नई बनती बहुमंजिला इमारतों, अधबनी बिल्डिगों या बड़ी-बड़ी कम्पनियों के ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए बने बोर्डों के बीच से रास्ता निकालते हुए ऑटो डाइवर ने कहा, ‘छह लाख मकान बन रहे हैं, मगर पता नहीं छह हजार लोग भी रहने आएँगे या नहीं।’ तब इस बात का गुमान मुझे कैसे हो सकता था कि उसका यह सूत्रीकरण रियल इस्टेट विश्लेषकों के निरीक्षणों के साथ बिल्कुल फिट बैठेगा।

ब्रिटेन स्थित रियल इस्टेट विश्लेषक एवं रिसर्चर ‘नाइट फ्रेंक’ कम्पनी ने अपनी हाल की एक रिपोर्ट में दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रियल इस्टेट बाजार की जो तस्वीर खिंची है, वह किसी भी मायने में उत्साहवर्धक नहीं है। ‘इंडिया : रियल इस्टेट’ नामक अपनी रिपोर्ट में वे बताते हैं कि इस इलाके में 2 लाख 398 अपार्टमेंट यूनिट्स बन कर पड़े हैं, जिनमें रहनेवाला कोई नहीं है। उनका अनुमान है, इन्हें बेचने में कम से कम चार साल लगेगा। ध्यान रहे कि कम्पनी ने इन आँकड़ों को बिल्डर्स से बात करके इकट्ठा किया है ।(http://news.myestatepoint.com /news/noida/over-2-lakh-apartments-unsold-in-delhi-ncr-may-take-4-years-to-be-picked-up-knight-frank-2/) अपनी अर्धवार्षिक रिपोर्ट में एजेंसी ने लिखा है कि विगत छह माह से पुराने फलैटों को भी ग्राहक नहीं मिल रहे हैं। उपर्युक्त संस्था के निदेशक के मुताबिक ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का, जो देश का सब से बड़ा आवासीय मार्केट है, यह दौर उसका सब से खराब दौर कहा जा सकता है।’

वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब देश में खाली पड़े नए मकानों की बात चली है। अभी पिछले साल की ही बात है जब समूचे देश को ले कर किए गए एक सर्वेक्षण के हवाले से एक लेख में बताया गया था कि ‘शहरी भारत में लगभग एक करोड़ बीस लाख मकान बन कर खाली पड़े हैं’। (http://www.firstpost.com/business/1-2-crore-vacant-homes-one-number-tells-us-wrong-indian-real-estate-2220612.html) सीबीआरई साउथ एशिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक के हवाले से बताया गया था कि भले ही शहरी भारत में मकानों की कमी हो, इतने मकान खाली पड़े हैं। लेख में विगत साल के आर्थिक सर्वेक्षण का भी जिक्र था, जिसके मुताबिक ‘शहरों में लगभग 1 करोड़ अठासी लाख मकानों की कमी है।’ आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात को भी स्पष्ट किया गया था कि इनमें से 95.6 फीसदी हिस्सा आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों या निम्न आय वर्ग के हिस्सों में से है।

यह विरोधाभास क्यों है कि खरीदार नहीं है, इसके बावजूद मकान बनते जा रहे हैं? दरअसल रियल इस्टेट कम्पनियाँ इतनी तेजी से उन लोगों के लिए मकान बनाती तथा बेचती जा रही हैं जो निवेश करने की स्थिति में हैं और सट्टेबाजी की उम्मीद में अपने निवेश में भारी रिटर्न की ताक में रहते हैं। दूसरे शब्दों में, ये मकान रहने के लिए नहीं, ऊँची कीमतों पर बेचने के लिए बन रहे हैं,  इनमें अच्छा खासा ब्लैक मनी लगी है। अगर हम उद्यमियों के संगठन ‘फिक्की’ के अध्ययन ‘ए स्टडी ऑन वाइडेनिंग ऑफ टैक्स बेस एण्ड टेकलिंग ब्लैक मनी’ देखें ( जो फरवरी  2015 में प्रकाशित हुई थी : संदर्भ वही) तो वह इसी बात की ताईद करते हुए बताती है कि ‘भारत में रियल इस्टेट का क्षेत्रा ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 11 फीसदी लगा है। वर्ष  2012-13 का अध्ययन बताता है कि रियल इस्टेट सेक्टर में ब्लैक मनी का सबसे अधिक हिस्सा लगा हुआ है।’

एक क्षेपक के तौर पर बताया जा सकता है कि आवास के बुलबुले के फूटने का नजारा महज भारत में ही नहीं सामने आ रहा है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के अन्त में मंदी की जो शुरुआत हुई थी, वह भी अमेरिका में इसी बुलबुले के फूटने के साथ सामने आई थी। दुनिया की सब से बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने को आतुर एवं तैयार चीन में इसी किस्म का सिलसिला सामने आया था, जब वहाँ की सरकार ने मंदी से निपटने के नाम पर नए शहरों को बसाने में एव रियल इस्टेट में खूब पैसा लगाया; मगर आज आलम यह है कि तमाम शहरों में अपार्टमेंट खाली पड़े हैं, क्योंकि खरीदार नहीं मिल रहा है। ऐसे शहरों को भुतहा शहर अर्थात घोस्ट सिटी भी कहा जाने लगा है।

एक तरफ खाली पड़े दो करोड़ से ज्यादा फ्लैट और दूसरी तरफ इतने  सारे बेघर या सस्ते मकान की तलाश में लगे लोग। यह पहेली कब और कैसे सुलझाई जा सकेगी?  ब्लैक मनी के खिलाफ आए दिन बयान देनेवाली सरकार उस पर अंकुश लगाने के लिए किस तरह की चेष्टा करेगी या वह खाली पड़े मकानों को किराए पर चढ़ाने के लिए किराएदारी के  बहुत पुराने अधिनियम में किस तरह के समायानुकूल संशोधन करेगी, ताकि मकानों के किराए पर चढ़ाने से हिचकने वाले लोग भी उन्हें किराए पर चढ़ा सकें,  यह बातें भविष्य के गर्भ में छिपी हैं। स्थितियाँ बद से बदतर होने वाली हैं, यह इस बात से भी जाहिर है कि अगर सस्ती दरों पर मकानों को उपलब्ध नहीं कराया गया तो संभावना यही बनती है कि हमारे शहर अधिकाधिक स्लमों में तब्दील होते रहेंगे, जैसा कि हाल का आर्थिक सर्वेक्षण रेखांकित करता है -  ‘मुल्क की आबादी का 30 फीसदी हिस्सा शहरों में रहता है और 2030 तक आते-आते यह आँकड़ा 50 फीसदी तक पहुँचनेवाला है।’ क्या इसका मतलब यह है कि इक्कीसवीं सदी में आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उद्यत भारत शहरों के विशाल स्लमीकरण की परिघटना का मूक दर्शक बना रहेगा?

दिलचस्प है कि अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘पर्याप्त आवास के अधिकार’ के लिए नियुक्त स्पेशल रेर्पोटियर सुश्री लैलानी फरहा ने भारत के अपने दौरे के बाद भारत में आवास की स्थिति में नजर आती गैरबराबरी एवं सरकारी असंपृक्तता की बात पर जोर दिया था, जिसमें उन्होंने बेघरों की वास्तविक स्थिति को कम करके पेश करने की उनकी कोशिशों को रेखांकित किया था। उनका कहना था कि इस मामले में न केन्द्र सरकार आँकड़े दे पाने की स्थिति में होती हैं न राज्य सरकारें। (http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/united-nations-india-right-to-adequate-housing-govt-housing-for-all-scheme2766389/) उन्होंने यह भी जोड़ा कि न केन्द्र सरकार और न ही कोई राज्य सरकार बेघरों की सही गिनती करती है और जो आँकड़े पेश किए जाते हैं, वे स्थिति की गंभीरता को कम करके आँकते हैं। जिस मुल्क में दुनिया के सबसे अधिक शहरी गरीब एवं भूमिहीन लोग रहते हैं, वहाँ जबरन उजाड़े जाने के सिलसिले पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अकसर ऐसी कार्रवाइयों को सरकार के आर्थिक विकास के एजेण्डा को न्यायोचित ठहराने के लिए अंजाम दिया जाता है। गौरतलब है कि बेघरपन को ले कर उनके त्रिआयामीय सुझाव इस बात की भी ताईद कर रहे थे कि उनके लिए भी यह मसला महज आवास तक सीमित नहीं है।

घर और मकान में क्या फरक है? इस सन्दर्भ में फरहा ‘उचित आवास के भौतिक पहलू और परिवार या सामाजिक सम्बन्ध कायम करने के लिए और सामुदायिक जीवन में साझेदारी करने के सुरक्षित स्थान के सामाजिक पहलू’ की बात करती हैं। वे व्यवस्थागत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार की भी बात करती हैं जिसके तहत किसी का बेघर होना उसे एक ऐसी सामाजिक पहचान प्रदान करता है जिसके साथ भेदभाव ‘स्वाभाविक’ लगता है। यह अकारण नहीं कि भारत में ऐसे कानून आज भी मौजूद हैं जो सड़क पर पाए जानेवाले व्यक्ति को रिमाण्ड होम में भेजने - जिसे भिखारियों की जेल भी कहा जाता है - के अधिकार से सरकार को लैस करते हैं। उनके मुताबिक, जब सरकार इस बात को स्वीकार करे कि बेघरों के मानवाधिकार होते हैं तो उस पर यह जिम्मेदारी भी आ जाती  है कि शेल्टर, आवास या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक इन दुर्भाग्यग्रस्त लोगों की पहुँच को सुगम बनाए और उनके साथ भेदभाव रोके।

दिल्ली के एक एनजीओ 'हजार्ड सेंटर' की तरफ से कुछ दिन पहलेएक पुस्तिका ‘दिल्ली किसकी है?’ जारी हुई थी। इसमें दिल्ली शहर के विकास के लिए  बने दो मास्टर प्लानों और उन्हें बनाने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर रौशनी डाली गई थी। पुस्तिका के अनुसार शहर में आवास और उद्योगों के समुचित विकास के लिए बने मास्टर प्लान में आवास के लिए 44,000 हेक्टेअर जमीन तथा उद्योगों के लिए 67 औद्योगिक क्षेत्रों की बात की गई थी। जमीनी यथार्थ यह है कि अभी तक आवास पर महज 11,000 हेक्टेअर जमीन खर्च हुई है, बाकी 33,000 हेक्टेअर जमीन कहाँ गई? दूसरी तरफ अब तक सिर्फ 23 औद्योगिक क्षेत्र चालू हो  सके, जिस वजह से अनधिकृत ढंग से उद्योग फैले।

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर बेघर शहरी गरीब के लिए सन 2022 तक मकान सुनिश्चित करने का वायदा किया था। प्रधानमंत्री आवास योजना  के तहत एलान किया गया था कि इस साल 30 लाख मकान बनाए जाएँगे, ताकि 2022 तक यह लक्ष्य पूरा हो जाए। अखबारों की कतरनों को पलटें तो पता चलता है कि बीते एक साल में महज 1623 मकान बनाए गए, जिनमें से 718 छत्तीसगढ़ में और 823 गुजरात में बनाए गए हैं। (जनसत्ता, 25 जून  2016) ये गिने-चुने मकान - भी जिनकी संख्या महज 1,623 है - अफोर्डेबल हाउसिंग की उपयोजना के तहत बनाए गए हैं। इस आवास योजना में डेढ़ लाख रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से सरकार की ओर से बिल्डर को सब्सिडी दी जाती है। इनमें झुग्गियों के पुनर्विकास की स्कीम का सब से बुरा हाल रहा। इस स्कीम के तहत एक भी मकान नहीं बना है। स्कीम यह हैकि बिल्डर् झुग्गियों के विकास का बेड़ा उठाएँगे और लोगों को बसाएँगे। इसके बाद जो जमीन बच जाएगी उस पर निर्माण कर वे उसे बाजार दर पर बेच सकेंगे।  मोदी सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना काफी हद तक प्राइवेट सेक्टर के उद्यम पर आश्रित है। इससे पहले यूपीए सरकार की राजीव गांधी आवास योजना में प्रोजेक्ट कॉस्ट की 50 से 75 फीसदी राशि सरकार वहन करती थी, बाकी हिस्सा राज्य सरकार और नाम मात्र की राशि लाभार्थी को देना होता था।

यह आलम तब है जब अपने कई फैसलों में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय यह मानता  दिखाई देता है कि लोगों को आवास का अधिकार है। संविधान की धारा  21, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देती है, एक तरह से आवास को भी बुनियादी अधिकार का हिस्सा मानती है। चमेली सिंह और शान्तिस्तर बिल्डर्स मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आवास के अधिकार को बुनियादी अधिकार माना था और यह कहा था कि आवास के अधिकार का अर्थ है रहने की पर्याप्त जगह, साफ वातावरण आदि। वर्ष 1997 में नवाब खान के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ-साफ कहा था कि ‘यह राज्य का कर्तव्य है कि वह उचित लागत पर मकानों का निर्माण करे और उन्हें गरीबों को उपलब्ध कराए।’ 1988 में भारत सरकार ने नेशनल हैबिटाट एण्ड हाउसिंग पॉलिसी बनाई थी, जिसमें चेतावनी दी गयी थी, ‘आजादी के पचास साल बाद हममें से अधिकतर लोग ऐसी परिस्थितियों में रहते हैं जिनमें पशु भी निवास नहीं कर सकते। यह परिस्थिति आवास क्रान्ति की जरूरत बताती है।’
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