पार्क में हँसी : आसपास : मदन कश्यप

मदन कश्यप
पार्क में हँसी

"मध्य वर्ग के बीच से हँसी के गायब होने का कारण अभाव नहीं, हवस है, और-और की तृष्णा है। नई उपभोक्ता संस्कृति ने इस तृष्णा का बहुत विस्तार कर दिया है, जबकि हँसी के लिए जीवन में संतोष का होना बहुत जरूरी है।"

इन दिनों मध्य वर्ग में सुबह की सैर के साथ कुछ व्यायाम करने का प्रचलन बढ़ रहा है और उसमें हँसने को खास तौर पर शामिल किया जा रहा है। सुबह-सुबह पार्कों में दर्जनों लोग ‘हा-हा-हा’ करके हँसने की कोशिश करते हए मिल जाएँगे। यह हँसी बेहद हास्यापद लगती है, सायास और काफी हद तक प्रायोजित। हँसना सेहत के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन तभी जब वह हँसी किसी आंतरिक खुशी से पैदा हो। अगर वह सप्रयत्न होगी तो केवल शरीर के कुछ अंगों का हल्का व्यायाम होगा, जो कपाल भाँति से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से हो सकता है। फिर हँसी पर इतना जोर क्यों है, वह भी मध्य वर्ग के बीच?

जाहिर है, गरीब आदमी के पास सैर-सपाटे या योग-ध्यान के लिए न तो इतना वक्त होता है और न ही उस परिश्रमी समाज को इसकी जरूरत होती है। रही बात उच्च वर्ग की तो इस तरह हँसने-रोने की जरूरत उसे नहीं होती, वह तो हँसाने-रुलाने का काम करता है। वह हँसी को भी बेच और खरीद सकता है। मरने वाले बड़े लोगों के लिए रोना तो खैर पुराने जमाने से खरीदा जाता रहा है और रुलाना तो वे जानते ही हैं। हँसी के व्यापार यानी खरीद-बिक्री पर अभी ठीक से शोध नहीं किया गया है, इसलिए इस बारे में कोई ठोस तथ्य प्रस्तुत करना अभी मुश्किल है। गोया कि निम्न वर्ग के लिए यह असंभव है, तो उच्च वर्ग के लिए अर्थहीन। केवल मध्य वर्ग है, जो हँस सकता है, लेकिन रोजमर्रा के कार्य व्यापार के दौरान गलाकाट प्रतिबंद्विता के इस दौर में हँस नही पा रहा है, जबकि उसकी सेहत के लिए हो न हो, सत्ता और बाजार की सेहत के लिए उसका हँसना जरूरी है। अब इनमें से कोई अपनी आंतरिक जरूरत के कारण हँसे तो भला किसे एतराज होगा।

दरअसल, इस वर्ग के एक बड़े हिस्से के पास जरूरत से ज्यादा पैसा आ गया है और उसके खाने-पीने में चर्बी बढ़ाऊ चीजों की मात्रा बढ़ गई है। दूसरी तरफ, अपने संसाधनों का उपयोग व्यापक समाज की बेहतरी के लिए करने की पुरानी अवधारणा अब समाप्त हो गई है और जो कहीं किसी के पास बची है तो उसके घर वाले ही नहीं, समाज के लोग भी उसे सनकी और अजायबघर में रखे जाने के लायक मानते हैं। जो एक नई अवधारणा आई है - ‘ट्रिकल डाउन’ की, वह केवल नाकाफी ही नहीं, भीतर से क्रूर और वर्गीय खाई को बढ़ाने वाली है और अब तो यह बाहर से भी मनमोहनी नहीं रही।

आपाधापी के इस दौर में अब इस वर्ग की हँसी भी काफूर हो गई है। ऐसे में, जीवन से गायब हो रही हँसी को सहज रूप से कैसे वापस लाया जाए, इसकी चिंता करने की जगह पार्कों में जबरन हँसने का चलन चलाया जा रहा है। यह तो सब को पता है कि मध्य वर्ग के बीच से हँसी के गायब होने का कारण अभाव नहीं, हवस है, और-और की तृष्णा है। नई उपभोक्ता संस्कृति ने इस तृष्णा का बहुत विस्तार कर दिया है, जबकि हँसी के लिए जीवन में संतोष का होना बहुत जरूरी है। संतोष अब से कुछ पहले तक जीवन का एक सहज तत्व था, जो अब बहुत ही दुर्लभ हो गया है। तभी तो नकली हँसी से संतोष करना पड़ रहा है।

सेहत के लिए क्या करना सही है और क्या गलत, यह जानना भी आसान नहीं है। अखबारों में कभी छपता है कि मसाला खाना हानिकारक है, तो कभी यह दावा किया जाता है कि मसाला खाने से हृदय रोग का खतरा कम हो जाता है। सारे प्रचार और विकास के केंद्र में मनुष्य नहीं, वस्तुएँ हैं। वस्तुओं से ही सबकुछ तय होता है। कंपनियाँ तय करती हैं कि हमें क्या खाना है, क्या पहनना है और कैसे घर में रहना है। और उनके तय करने का आधार यह होता है कि उस समय उन्हें क्या बेचना है। लेकिन एक बात उन्होंने स्थायी रूप से तय कर रखी है कि आप एक सम्मानित उभोक्ता हैं, इसलिए यह जरूरी है कि आप हमेशा, हर हाल में खुश रहें और खरीदारियाँ करते रहें। उदासी और नाउम्मीदी को कभी पास फटकने नहीं दें। सोचें नहीं, हँसे! इस तरह हँसने से सेहत की समस्या दूर हो या न हो, चिंतन की समस्या का अवश्य निदान हो जाता है। गंभीरता आपको सकारात्मक उदासी की ओर ले जा सकती हैं, जहाँ से आप दुनिया की बेहतरी और परिवर्तन के बारे में सोचने लग सकते हैं। हँसी कई मामलों में सहजता से उस सहमति तक ले जाती है, बहस-मुबाहिसों के द्वारा जहाँ पहुँचना कठिन है।

यह तो सब को पता है कि पार्क में हँसी जाने वाली हँसी वह नहीं है जिसके लिए रघुवीर सहाय की पंक्ति दुहराई जाए - ‘हँसो कि तुम पर निगाह रखी जा रही है’। निगाह यहाँ भी रखी तो जा रही है, लेकिन उन अर्थों में नहीं। बस इस बात का खयाल रखा जा रहा है कि आप एक नकली हँसी हँसें और असली दुख को भूल जाएँ। एक नकली जीवन जिएँ और असली संघर्ष को भूल जाएँ। एक नकली यात्रा करें और असली गंतव्य को भूल जाएँ।

यह बात तो बार-बार कही जाती है कि समय जटिल होता जा रहा है, जीवन जटिल होता जा रहा है। लेकिन जरा सोचिए जीवन संघर्ष कितना सरल होता जा रहा है। कैसे-कैसे नुस्खे बनाए जा रहे हैं इसके लिए। इन्हीं में से एक यह हँसने का नुस्खा भी है।

कविता में शब्द
कविता में शब्द कई बार वही और वैसे ही नहीं होते, जो और जैसे भाषा की अन्य प्रयुक्तियों में होते हैं। जैसे अन्य सभी प्रयुक्तियों में सुख का विपरीतार्थक शब्द है दुख, लेकिन कविता में ये पयार्यवाची भी हो सकते हैं।
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