वैश्वीकरण के 25 वर्ष : समीक्षा : रामू सिद्धार्थ

रामू सिद्धार्थ
वैश्वीकरण के 25 वर्ष

"इंडिया और भारत तो पहले से ही मौजूद थे। इन 25 वर्षों में हुआ यह है कि इंडिया का भारत से लगभग संपूर्ण सम्बन्ध विच्छेद हो गया है।"

पी वी नरसिंहराव ने नेतृत्व में मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और सी चिदंबरम तथा उनके सहयोगियों की टीम ने रुपए के अवमूल्यन के साथ नई आर्थिक नीति या आर्थिक सुधारों  की शुरुआत की। इसे बाद में जा कर उदारीकरण, प्राइवेटीकरण और वैश्वीकरण कहा गया। इसके मुख्य वास्तुकार विश्व बैंक के सलाहकार अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह थे। हाल के अपने एक साक्षात्कार में चिदंबरम ने कहा कि इन नीतियों की मजबूत नींव रखने वालों के सबसे पुरजोर समर्थक और अगुआ मनमोहन सिंह थे। मनमोहन सिंह, चिदम्बरम और मोंटेकसिंह आहलूवालिया तीनों राजनेता कम, पश्चिम में पढ़े-लिखे अर्थशास्त्री और टेक्नोक्रेट अधिक थे। आजादी के बाद पहली बार देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य वास्तुकार जननेता नहीं, एक अर्थशास्त्री बना, जो बाद में बिना कोई चुनाव जीते, चोर दरवाजे से (राज्यसभा के माध्यम से) संसद में प्रवेश कर, पहले देश का वित्त मंत्री, फिर लगातार दस वर्षों तक देश का प्रधानमंत्री रहा। इसकी अगुआई ने जिन नीतियों को शुरू किया गया, उन्हें ही उसके बाद आने वाली सभी सरकारों ने आगे बढ़ाया। इसमें कांग्रेसियों से लेकर धुर दक्षिणपंथी भाजपाई और जयप्रकाश लोहिया के शिष्य तथा अपने को संसदमार्गी वामपंथी कहने वाले सभी शामिल थे। देश की शायद ही कोई संसदमार्गी पार्टी रही हो, जिसने इन पच्चीस वर्षो में केंद्र में सत्तारूढ़ दलों का हिस्सा बन, इन नीतियों का समर्थन न किया हो। कुछेक बाहर से इन सरकारों का समर्थन करते रहे हैं। इन नीतियों के पुरजोर से पुरजोर समर्थक से ले कर धुर विरोधी तक एक बात पर पूर्ण सहमत थे कि ये नीतियां आजादी के बाद की  आर्थिक नीतियों से मात्रात्मक तौर पर नहीं, बल्कि गुणात्मक तौर पर भिन्न हैं और इन नीतियों के परिणाम के बारे में दो बिलकुल विपरीत संभावनाएं व्यक्त की गई थीं।
इन नीतियों के अगुआ लोगों और इनके समर्थकों ने यह सम्भावना व्यक्त की थी कि इन नीतियों के परिणामस्वरूप भारत एक विकसित देश में तब्दील हो जाएगा। भूख, गरीबी, बेरोजगारी तथा अशिक्षा का नामो-निशान नहीं रहेगा और सभी लोगों को बीमारी में इलाज की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी और यह देश दुनिया के शक्तिशाली देशों में शामिल हो जाएगा। हजारो वर्षों की तंगहाली से छुट्टी मिल जाएगी।

इन नीतियों के विरोधियों ने कहा कि इनके चलते देश अपनी संप्रभुता खो कर पश्चिमी देशों का एक और मातहत बन कर रह जाएगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन का खत्मा हो जाएगा। मेहनतकश लोगों का शोषण बेइंतहा बढ़ेगा, सुरक्षित, सम्मानजनक तथा सुनिश्चित रोजगारों का खत्मा हो जाएगा। सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर खर्च कम होता जाएगा। मुट्ठी भर अमीरों को तो फायदा होगा, लेकिन व्यापक मेहनतकश आबादी को कोई फायदा नहीं होगा। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि वैश्वीकरण के नाम पर देश के प्राकृतिक संसाधनों, मानवीय संसाधनों तथा आजादी के बाद खड़े किए गए सार्वजनिक क्षेत्र (सरकारी उद्यमों तथा संस्थाओं) को कौड़ी के मोल देशी - विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों को सौप दिया जाएगा और न केवल देश की अर्थव्यवस्था, बल्कि राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन भी उनके रहमो-करम पर निर्भर हो जाएगा। आज मुख्यधारा का मीडिया इन दो खेमो को विकास समर्थक और विकास विरोधी के रूप में बाँटने में कमोबेश सफल हो गया है।  दावों-प्रतिदावों के आकलन और  मूल्यांकन के लिए 25 वर्ष पर्याप्त होते हैं। दिलचस्प है कि पहले खेमे का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी पहले की सरकारों के सुधारों की गति को धीमा ठहरा कर जनता से मांग कर रहे हैं कि उन्हें सुधारों के लिए कम से कम बीस वर्ष का और समय दिया जाए, वे इस देश को स्वर्ग और दुनिया का सब से शक्तिशाली देश बना देंगे। इस देश की जनता का धेर्य अपार है। बीस वर्ष क्या होते है, स्वर्ग पाने के लिए वह हजारों वर्षों से 84 लाख योनियों में भटकने को तैयार है।       

आइए, देश के 25 वर्षों के इस सफर पर एक सरसरी निगाह डालें और देखें कि इस अवधि में देश ने क्या पाया क्या खोया, क्या पाया, कौन मालामाल हुआ, कौन कंगाल हुआ, कौन बसा कौन उजड़ा, किसके पास सब कुछ है और कौन दो वक्त की रोटी-दाल के लिए भी मोहताज है, कौन जश्न मना रहा है और किसके यहाँ मातम छाया हुआ है, होरियों-गोबरों का हाल क्या है, धनिया और सिलिया क्यों बिसूर रही हैँ।

इन नीतियों के वास्तुकार और पैरोकार जिन उपलब्धियों को गिना रहे हैं  उनमें यह तथ्यात्मक स्तर पर सही है कि 1991 की तुलना में देश के सकल घरेलू उत्पाद में छह गुना वृद्धि हुई है। 1991 के वित्तीय वर्ष में देश का सकल घरेलू उत्पाद 326.76 खरब डॉलर था, जो 2015-2016 में बढ़ कर 2075.8 खरब डॉलर हो गया है। अर्थात देश की  अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन डॉलर से बड़ी हो गई है और देश सकल घरेलू उत्पाद के मामले में दुनिया की दस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है। इसका मतलब यह है कि देश में बड़े पैमाने पर संपदा का सृजन हुआ है और हो रहा है। इसी से जुड़ी दूसरी उपलब्धि यह है कि क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर भारत दुनिया की तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है। अमेरिका और चीन के बाद, कभी भारत, तो कभी जापान तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था हो जाते हैँ। सकल घरेलू उत्पाद में इतने बड़े पैमाने पर वृद्धि के चलते प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय में भी कई गुना वृद्धि हुई है। प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 93 हजार 231 रु. हो गई है अर्थात भारत  के प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिमाह औसत आय लगभग 8 हजार रुपए के करीब है। यदि समान बँटवारा हो तो प्रत्येक भारतीय व्यक्ति (जन्मजात बच्चा  या जर्जर बूढ़ा) की प्रति माह आय 8 हजार रु. के लगभग है। दूसरी बड़ी उपलब्धि विकास दर का  1991 के बाद निरंतर औसत 6 प्रतिशत से ऊपर बने रहना है। एक और सबसे बड़ा दावा किया जा रहा है, जिस पर तरह-तरह  के विवाद और संदेह हैं, कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में बड़े पैमाने पर गिरावट आई है। 1993-1994 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत 45.3 था जो 2011-2012 में गिर कर 21.9 प्रतिशत हो गया है अर्थात लगभग 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट। इन नीतियों के पैरोकार जिस उपलब्धि को सब से ज्यादा गिनाते हैं वह है विदेशी मुद्रा भण्डार में भारी बढ़ोत्तरी। विदेशी मुद्रा की कमी को 1989-90 के आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह बताया जाता है। 1990-91 में विदेशी मुद्रा भंडार 1.12 बिलियन डॉलर था जो 17 जून 2016 को 339.57 बिलियन डॉलर हो गया है। साथ ही देश का चालू खाता घाटा (सकल आयत निर्यात तथा अन्य चीजों के बीच लेन-देन का अंतर ) 1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद का 2.96 प्रतिशत था, जो 2015-2016 में घट कर 1.06 प्रतिशत हो गया है। राजकोषीय घाटे में गिरावट को भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है जो 1990-91 में 7.61 प्रतिशत था और कम हो कर 2015-2016 में 3.92 प्रतिशत हो गया है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी में कमी को भी परम्परागत तौर पर अर्थव्यवस्था के विकास का सूचक माना जाता है। हमारे देश के संचालक-शासक भी इसे अपने 25 वर्षों की उपलब्धि के रूप में देखते हैं। 1990-91 में जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 29.02 प्रतिशत था जो घट कर 2015-2016 में 17.05 प्रतिशत हो गया है। निर्यात में भारी वृद्धि को भी उपलब्धि के तौर पर गिनाया जा रहा है। साक्षरों की संख्या 1991 की तुलना में 52.21 से बढ़ कर 74.04 हो गई है।

इससे कौन इनकार कर सकता है कि इन 25 वर्षों में सम्पत्ति- संपदा का भारी पैमाने पर सृजन हुआ है। प्रश्न यह उठता है कि इस विशाल सम्पत्ति सृजन में से किसको कितना मिला है और इस विकास की कीमत किसने चुकाई है। इस सिलसिले में सब से पहली बात यह है कि देश की कुल व्यक्तिगत सम्पत्ति के 49 प्रतिशत (2013) के मालिक उपर के 1 प्रतिशत लोग हैं अर्थात 99 प्रतिशत लोगों को आधी संपदा में बंटवारा करना है। अब इस बात को थोड़ा और आगे  बढ़ाते हैं : ऊपर के 10 प्रतिशत लोग कुल 76 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हो गए हैं अर्थात 90 प्रतिशत लोग के बीच बाँटने के लिए 34 प्रतिशत सम्पत्ति है। बात को थोड़ा और  आगे बढ़ाएं तो हम पाते हैं कि ऊपरी के 20 प्रतिशत लोग लगभग 85 से 90 प्रतिशत  सम्पत्ति के मालिक हैँ। दूसरे शब्दों में, 80 प्रतिशत यानी लगबग 95 करोड़ लोग (कुल आबादी 1 अरब 21 करोड़) 10-15 प्रतिशत सम्पत्ति में हिस्सेदारी के लिए विवश हैं। बात को प्रतिशत से व्यक्तियों या परिवारों तक ले जाएं तो पाते हैं कि भारत के 111 व्यक्ति बिलियनायर (डॉलर में) हो गए हैं। इन 111 लोगों की कुल सम्पत्ति 308 बिलियन डॉलर है, जो 1991 में भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद के लगभग बराबर हैं।  इनमें से चार व्यक्ति दुनिया के उन 62 लोगों में शामिल हैं जो विश्व की आधी संपदा के मालिक हैं। सब से शीर्ष पर मुकेश अम्बानी हैं। इनकी कुल व्यक्तिगत सम्पत्ति (बहुराष्ट्रीय निगमों की सम्पत्ति, जिनके वे मालिक हैं, इसमे शामिल नहीं है) 27 अरब डॉलर है अर्थात 1 लाख 56 हजार करोड़ रु. ।  यदि वे प्रतिदिन 1 करोड़ रुपया खर्च करें तो उनकी सम्पत्ति लगभग 427 वर्षों में खर्च होगी।

निरपेक्ष संपदा सृजन और विकास दर के साथ सम्पत्ति के बँटवारे  को जोड़ने पर हम पाते हैं कि इस पूरे विकास के फल का गूदा ऊपर के 10 प्रतिशत लोगो को मिला है, उसके नीचे के 10 प्रतिशत मध्यमवर्गीय लोग, जिनमें से कुछ की तनख्वाहें ढाई लाख तक हो गई हैं और जो कुछ अन्य तरीकों से कमा रहे हैं, छिलका चाट रहे हैं। शेष 80 प्रतिशत लोगों की तरफ गुठली फेंक दी गई है। इस 80 प्रतिशत में कई स्तर के लोग हैं। भारत सरकार केआँकड़ो के अनुसार ये 21.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं जिनके हिस्से खर्च करने के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 40 रुपया भी नहीं आता। अर्जुन सेन कमेटी ने विस्तृत अध्ययन के आधार पर बताया था कि भारत की 76 प्रतिशत आबादी औसत रूप में प्रतिदिन 22 रूपए से भी  कम पर जीवन निर्वाह करती है यानी 85 करोड़ से अधिक लोगों की औसत प्रति व्यक्ति मासिक आय 600 रु. के आस-पास है। इसी 22 रुपए में खाना, पहनना, रहना, पढ़ाई, दवाई, आना-जाना सब शामिल है। हाल की तेंदुलकर कमेटी का कहना है कि अब केवल 21.9 प्रतिशत अर्थात लगभग 30 करोड़ लोग ही ऐसे हैं जो 40 रुपए कम पर (प्रतिदिन) निर्वाह कर रहे हैं यानी शेष लोग 1200 रुपए से अधिक मासिक आय पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। सारे  तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि 90 करोड़ से अधिक आबादी के हिस्से गुठली चाटने के लिए हैं। छनन के सिद्धांत (ट्रिकल डाऊन थियरी) का अर्थ बताते हुए एक अर्थशास्त्री ने कहा है कि छनन का सिद्धांत यह है कि घोड़ा  दाना खाता है, लीद करता है, लीद में  कुछ खड़े, कुछ अधपके दाने चिड़िया चुग लेती है। भारत की जनता को भी दाना खाने वाले ऊपरी घोड़ों की लीद के कुछ अधपके दाने ही इन 25 वर्षों में नसीब हुएहैं। लीद से दाने निकाल कर खाने की विवशता का इतिहास भारत में काफी पुराना है। दवरी करते हुए बैल गेहूं के दाने भी खा लेते थे। फिर वे जो गोबर करते थे, उन्हें पानी में डाल कर दाने निकाल कर मेहनतकश दलित खाते थे। इसे गोबरहा कहा जाता था। जाति प्रथा ने दलितों को हजारों वर्षों तक गोबरहा खिलाया है। 

25 वर्षों के आर्थिक सुधारों के पैरोकार कर रहे हैं कि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी का घटना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब थोड़ा इस बात पर विचार किया जाए।

हमारे देश में 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष रूप में कृषि पर निर्भर है। इसमें 30 प्रतिशत लोग भूमिहीन लोग हैं। कार्यरत श्रमिकों का 55-56 प्रतिशत कृषि या इससे संबंधित रोजगार पर निर्भर है।  80 प्रतिशत लोग छोटे गरीब व सीमांत किसान हैं। सारे दावों के बावजूद कृषि की विकास दर 2 प्रतिशत के आस-पास ही रह रही है। कोई भी सहज ही अनुमान लगा सकता है कि 60 प्रतिशत अर्थात 75 करोड़ के आस-पास कृषि पर निर्भर आबादी का बहुलांश दरिद्रता, अभाव, कंगाली तथा कुपोषण के किन हालात में जीवन बिता रहा है जिसके हिस्से 17 प्रतिशत जीडीपी आती है और जिसमें विकास दर केवल 2 प्रतिशत है। मध्यम किसान की कमर भी 25 वर्षों में टूट गई है, इसका सब से भयावह परिणाम किसानों की आत्महत्या के रूप में आया है। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार केवल 1997 से 2007 यानी दस वर्षों के बीच में 1 लाख 82 हजार 936 किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो गए। हाल के आंकड़े बता रहे हैं कि यह संख्या 3 लाख के करीब पहुंच गई है। इतनी बड़ी संख्या में लोग किसी युद्ध या माहामारी में ही मारे जाते हैं। साफ है कि 3 लाख लोगों ने अपनी जान दे कर इस तथाकथित विकास की कीमत चुकाई है। ताजा स्थिति यह है, कि गाँवों में 5 प्रतिशत से भी कम ऐसे परिवार हैं जिनकी प्रति माह औसत आमदनी 5 हजार रु. या इससे ऊपर है। अब तो गाँवों में रहने वाले 75 करोड़ से ऊपर के लोगों की चर्चा ऐसे की जाती है जैसे ये कुछ बचे-खुचे लोग हों।

भोजन या खाद्यान प्राणी मात्र की आवश्कता है। दुनिया भर में विकास के साथ यह उम्मीद की जाती है कि प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता बढ़ेगी। भारत में इसका उलटा हुआ है 1961 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 468.7 ग्राम (399.7 ग्राम अनाज और 69 ग्राम दाल) खाद्यान्न उपलब्ध था, जो 1991 में बढ़ कर 510.1 ग्राम (463.5 अनाज और 35.5 दाल) हो गया था, 2011 में घट कर 437.1 ग्राम (401.7 अनाज और 35.5 दाल)) हो गया।  इसका निहितार्थ निकाला जाए तो  आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि देश के बहुलांश लोग कुपोषित हैं। 48 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 80 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ (एनीमिक) खून की कमी की शिकार हैं। असंगठित क्षेत्र (94 प्रतिशत) के बहुलांश श्रमिक कुपोषण के शिकार हैं। केवल प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता ही नहीं घटी है बल्कि उसका प्रति व्यक्ति उत्पादन भी घटा है, क्योंकि खाद्यान्न उत्पादन कमोबेश स्थिर बना हुआ है। भारतीयों के पोषण का स्तर यह है कि तपेदिक एक महामारी की तरह फैल रही है। तपेदिक से रोज  1000 लोगों की जान जाती है। अर्थात प्रति  मिनट पर एक व्यक्ति की मौत होती है। तपेदिक ( टीबी) अधिकांश मामलों में कुपोषण जनित बीमारी है।

विश्व भर में यह मान्यता है कि विकास दर बढ़ने के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ेगा। हमारे देश में 25 वर्षों में ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारत स्वास्थ्य पर सब से कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। सकल घरेलू उत्पाद के 1.9 प्रतिशत से भी कम स्वास्थ्य पर खर्च हो रहा है, जबकि दुनिया के अधिकांश देश 3 प्रतिशत से ऊपर खर्च करते हैं। यही हाल शिक्षा पर खर्च का है। आजादी के बाद से ही  शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च करने की बात हो रही है। 25 वर्षों की सारी आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद भी शिक्षा पर खर्च 3 प्रतिशत से भी कम बना हुआ है, जब कि नेपाल 4.6, चीन 4.15, ब्राजील 5.1, केन्या 7 प्रतिशत तथा क्यूबा 16 प्रतिशत खर्च करता है।

यह सच है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में दुनिया की दस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत शामिल है, क्रयशक्ति के आधार पर तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था है, विकास दर के मामले में पहले स्थान पर और कुछ वर्ष पहले चीन के बाद दूसरे स्थान पर था। लेकिन जब मानव विकास सूचकांक का प्रश्न आता है तो भारत 188 देशों में 130वें स्थान पर चला जाता है। भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका का स्थान 73वां  है, चीन का स्थान 90वां  है। यानी जहां तक जीवन जीने की बुनियादी जरूरतो का मामला है, भारत दुनिया के सब से पिछड़े देशो में एक बना हुआ है। इसकी दो स्पष्ट वजहें हैं। पहली तो यह कि जो भी संपदा सृजित हुई है उसका अधिकतम हिस्सा ऊपर के 20 प्रतिशत लोगों के पास गया है। 80 प्रतिशत के पास नहीं के बराबर आया है। दूसरी बात यह है कि भारत सरकार के पास इस विकास के परिणामस्वरूप कर तथा अन्य रूपों में जो धन आ रहा है, उसका न्यूनतम हिस्सा पोषण, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जा रहा है। दरअसल, कुल मिला कर जीडीपी का 10 प्रतिशत भी इन बुनियादी चीजों पर खर्च नहीं हो रहा है। जिस सरकार को निगमों के कारपोरेट  टैक्स में 2 लाख करोड़ रु. की कटौती करने में थोड़ी भी हिचकिचाहट नहीं हुई, उस सरकार को करोड़ों को जीवन निर्वाह का साधन उपलब्ध कराने के लिए लगभग 30 हजार करोड़ (मनरेगा) आवंटित करने में पसीने छूट रहे हैं। जो धन आवंटित किया गया, उसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद भी जारी करने में तमाम आना-कानी की गई। मोदी के वित्त मंत्री महामहिम जेटली ने शिक्षा के बजट आवंटन में 16 प्रतिशत और स्वास्थ्य के बजट आवंटन में 8 प्रतिशत की कटौती कर दी। नेशनल हेल्थ मिशन के बजट में भी कटौती कर दी गई। निष्कर्ष रूप में कहें तो सृजित संपदा का न के बराबर हिस्सा 80 प्रतिशत लोगों के हाथ आया न  सरकारों ने लोगो के कल्याण के लिए अधिक खर्च करने के प्रति संवेदना दिखाई।

निर्यात में वृद्धि को 25 वर्षों की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया जा रहा है। 1990-91 की तुलना में निर्यात 18.48 अरब डॉलर से बढ़ कर 2015-2016 में 266.37 अरब डॉलर हो गया है। लेकिन आज भी निर्यात का एक बड़ा हिस्सा कच्चा माल तथा उपभोग सामग्री (खाने-पीने की वस्तुएँ) हैं। निर्यात को डॉलर की तुलना में रुपए के अवमूल्यन के साथ जोड़ कर देखा जाए तो 1991 में एक डॉलर 21.24 रुपए के बराबर था। इस समय एक डॉलर लगभग 67 रुपए के बराबर है। अर्थात डॉलर की तुलना में रुपए के मूल्य में तीन गुने की गिरावट आई है, जिसका मतलब यह है कि 1990-91 में जितनी वस्तुएं निर्यात करके 1 डॉलर प्राप्त होता था उससे तीन गुना वस्तुओं का आज निर्यात करना पड रहा है।  कुल मिला कर निर्यात  का अर्थ यह रह गया है कि भारत के कच्चे माल तथा उपभोग की वस्तुओं को पश्चिमी देशों में सस्ते से सस्ती दर पर भेज देना। खाने-पीने की सब से अच्छी वस्तुएं पश्चिमी देशों को भेज दी जाती हैं, बचा-खुचा भारत के अमीर लोग खाते हैं और शेष भारत सब से खराब स्तर की चीजों का उपभोग करता है।

रही बात विदेशी मुद्रा भंडार की, जिसे दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रही है, तो उसके बारे में ज्यादातर गंभीर और जनपक्षधर अध्येताओं का कहना है.कि इसका एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो शेयर बाजारों में लगा हुआ है, जिसे विदेशी निवेशक कभी भी ले जा सकते हैं। दूसरे, देश की प्रकृतिक संपदा, सार्वजनिक संस्थाओं तथा श्रम को अत्यंत सस्ती दर पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंप कर यह खजाना भरा गया है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि आर्थिक मामले में देश में एक ऐसे पिरामिड का निर्माण हुआ है जिसकी शीर्षस्थ नोक पर 100 खरबपति हैं, उसके नीचे हजारों  अरबपति हैं, उसके नीचे 6.7 करोड़ रुपए से अधिक की हैसियत वाले 2.36 लाख लोग (2015) हैँ जिनकी कुल सम्पत्ति 1500 अरब डॉलर है।। इसके नीचे अन्य श्रेणी क्रम भी है - पिरामिड के सबसे निचले आधार में 73 प्रतिशत आबादी है जो 20  से 30 रुपए या ज्यादा से ज्यादा 40-42 रु. प्रतिदिन पर गुजारा करती है।

इंडिया और भारत तो पहले से ही मौजूद थे। इन 25 वर्षों में हुआ यह है कि इंडिया का भारत से लगभग संपूर्ण सम्बन्ध विच्छेद हो गया है। इंडिया  के लोगों के खाने-पीने, रहने, पढ़ने-लिखने, इलाज कराने, आने-जाने के साधन, मनोरंजन के साधन, सभी का कोई मेल भारत से नहीं रह गया है सिर्फ एक संबंध है, वह यह कि भारत के लोग इंडिया के लोगों के लिए सस्ते श्रम का स्रोत  हैं। भारत वाले इंडिया के लोगों के लिए उत्पादन करने तथा सेवा करने के लिए प्रस्तुत हैं। हाँ,  यह भी हुआ है कि भारत के लोगों के पास स्वाभिमान और आत्मगौरव से जीने के लिए जो थोड़े-बहुत अपने साधन थे उन्हें भी छीन लिया गया है। इसका सब से ज्यादा शिकार आदिवासी और 80 प्रतिशत छोटे किसान हुए हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर अब तक लगभग 7 करोड़ लोगों को बेदखल होना पड़ा है अर्थात उनसे उनके आर्थिक साधन (जमीन, जंगल, नदियां)  और उनका सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश छीन कर दर-दर भटकने को विवश कर दिया गया है। एक और महत्वपूर्ण बात यह हुई है कि इंडिया वालों के लिए भारत के लोग अदृश्य हो गए हैं। यह कुछ ऐसा ही हुआ है जैसे भारत के गाँवों में लगता था कि सिर्फ द्विज रहते हैं, बहुलांश शूद्रों की आबादी अदृश्य होती थी। 80 प्रतिशत दलितों - अति पिछड़ी जातियों का, लगता था, गाँवो में कोई अस्तित्व ही नहीं है। वे श्रम करने तथा सेवा करने के लिए ब्राह्मणों और ठाकुरों, लालाओं के टोलों में आते थे। फिर अपने टालों में सिमट और सिकुड़ जाते थे। गाँव की पहचान भी द्विजों से ही होती थी।

पचीस वर्षों के आर्थिक सुधारों, उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण ने 20 प्रतिशत (30 करोड़) इंडिया को अत्यंत शक्तिशाली बना दिया है। इंडिया दुनिया के 20 बड़े देशों (जी - 20) के शक्तिशाली समूह में शामिल हो गया है। दुनिया की कोई ताकत इंडिया को ‘इग्नोर’ नहीं कर सकती है।  इंडिया के लिए स्वर्ग का निर्माण हुआ है। दुनिया भर की उपभोग की वस्तुएँ इनके उपयोग के लिए उपलब्ध हैं। ये विलासिता और ऐयाशी में डूबे हुए हैं। कोई भी चीज पाना इनके लिए नामुमकिन नहीं है।

दूसरी ओर अदृश्य भारत है जो इंडिया को भौचक ललचाई नजरों से देख रहा है। शहरों की नारकीय स्लम बस्तियों से तिलचट्टे की तरह निकल कर फैक्ट्रियों-कारखानों में काम करता है, इंडिया वालों के लिए बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनाता है, बड़े-बड़े मॉल बनाता है, हवाई अड्डे बनाता है, फ्लाईओवर बनाता है, उसके घरों में नौकर-नौकरानी बन कर काम करता है, उनका ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड आदि-आदि बनता है, फिर अपने दड़बे में लौट आता है। चौबीस घंटे बरसों-बरस खटते-खटते ही बीत जाते हैं और इसके बदले में किसी तरह अपना तथा अपने बच्चों का पेट पाल पाता  है। कभी कभी इंडिया वालों के छूटन तथा जूठन को भी प्राप्त कर लेता है। इस भारत का एक बड़ा हिस्सा गाँवों में जी तोड़ खटने के बाद जैसे-तैसे जिन्दा है। यहीं से भाग-भाग कर शहरों की स्लम बस्तियों में आ रहा है। इंडिया के लोग अपनी उपलब्धियों से मदमस्त हैं। भारत के लोग उनके लिए कीड़े- मकोड़े से ज्यादा महत्त्व नहीं रखते हैं। 2014 में भारत के नए मसीहा  नरेंद्र मोदी ने इंडिया की ओर से भारत वालों को सपना दिखाया कि अगर वे लोग उन्हें वोट दे कर प्रधानमंत्री बना दें तो वें भारत को भी इंडिया बना देंगे। भारत के भी अच्छे दिन आ जाएंगे। भारत के लोग अपने अच्छे दिनों का फिलहाल  तो इंतजार ही कर रहे हैं. इंडिया के लोगसुख के सागर में गोते लगा रहे हैँ।
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