मोहे श्याम रंग देइ दे : आवरण कथा : सविता पाठक

सविता पाठक
मोहे श्याम रंग देइ दे

रंग, सौंदर्य और स्त्रीत्व के संबंधों पर सविता पाठक

"जिस समाज और जिस पुरुष की ओर स्त्री टकटकी बाँधे देखती है उसकी नजर मर्दवादी तो थी ही, अब बाजारवादी भी हो गई है। उसे औरत का सौन्दर्य कुछ खास किस्म के इंच में, लम्बाई और चौड़ाई में नजर आता है।"

मेरी एक दोस्त के होंठों की बनावट को ले कर एक दूसरी दोस्त अक्सर ही एक कविता कहती थी, ‘ऊँट रे ऊँट तेरा थूथन बड़ा, क्या करूँ बाबा लटका पड़ा।’ पहले तो हम इस मजाक पर देर तक हँसते रहते थे। चिढ़ाने में बहुत मजा आता था।  फिर एक दिन हमने इस पर सोचा कि कैसा होता है जब हमारे शरीर की बनावट या उसके रंग-रूप को ले कर कोई मजाक बनाए।

कुछ बरस पहले एम्स (दिल्ली) में जब एक लड़की ने अपने साँवले रंग के चलते आत्महत्या कर ली थी, मैं सोचने लगी कि वह क्यों नहीं मजाक उड़ा पाई लोगों के सोच का। किसी का रंग-रूप, उसकी बनावट उस जगह के मौसम से यानी उसकी नमी, उसकी शुष्कता, उसके पहाड़ों को छूती हवा, उसकी नदियों का बहता पानी, उस जगह की मिट्टी और अंततः उसके माता-पिता या पुरखों के मेल से मिल कर बनता है। इतनी-सी बात वह नर्स तो जानती ही होगी। विज्ञान की विद्यार्थी होने के नाते वह तो किसी को उसकी शारीरिक बनावट और उसके रूप-रंग का गणित बहुत अच्छे से पढ़ा सकती थी। फिर क्या था कि वह इस कदर अवसाद में चली गई कि उसने आत्महत्या करने के निर्णय कर लिया।  उसने अपने आप को किन लोगों की नजरों से देखा, जिसमें उसकी पढ़ाई-लिखाई, काबिलियत सब बौने हो गए और चेहरे का रंग इतना महत्वपूर्ण हो गया? बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, लिली से लेकर घास पर खिलने वाली सुनकी के फूल तक सब का अपना विशिष्ट सौन्दर्य है। फिर मनुष्य के भीतर की इस विविधता पर हम मुग्ध क्यों नहीं हो पाते? क्या वजह है कि हमारा सौन्दर्यबोध बेहद एकाकी और संकीर्ण हो गया है?

हमारे यहाँ ‘वधू चाहिए’ का हर एक विज्ञापन इन खूबियों की माँग से शुरू होता है - गोरी, छरहरी, कद लंबा, कान्वेंट एडुकेटेड, गृह-कार्य में दक्ष। यह एक ऐसा सम्मिश्रण है जो बमुश्किल मिलता है। मिलता है तो टिकता कम है। वैसे यह डमी इसी रूप में बनी रहे, इसके लिए उसे सच में अच्छे-से काँच के डिब्बे में सँभाल कर रखना पड़ता है, लेकिन दुर्भाग्य से वह साँस भी लेती है। और थोड़े-से हेर-फेर से समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। लेकिन भारतीय समाज की बरसों पुरानी कुंठा। कैसी लड़की चाहिए, इसे अगर हम उलट कर कहें तो छोटे कद की, साँवली और गोल-मटोल लड़की नहीं चाहिए। अपनी बात बताती हूँ। एक घर में हम कई सारी लड़कियाँ थी। एक बहन लम्बी, लेकिन बनावट सामान्य, एक गोरी लेकिन लम्बाई पाँच फुट दो इंच, एक बहन की बनावट सामान्य लेकिन साँवली, ऊपर से लम्बाई कम यानी पाँच फुट तीन इंच। बीच में गढ़न, पक्का पानी जैसे कई सेफ्टी वाल्व थे। लेकिन हम ने इसे विभिन्नता या विविधता का नमूना माना – हमारे बीच कभी बेहतर या बदतर का खयाल नहीं आया। हम जैसे थे, खुश थे।

एक साँवली लड़की को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह फेयर एंड लवली का विज्ञापन बड़े अच्छे से बताता है। आज से कई बरस पहले तो पत्रिकाओं में एक कहानी बना के बताई जाती थी। कैसे रूपा को देखने कई लोग आए, लेकिन सब ने इंकार कर दिया। एक दिन मौसी ने क्रीम थमाई और उसकी दुनिया बदल गई। समय के साथ नौकरी के लिए इंटरव्यू और पिता से अपनी पहचान के लिए बात के बीच साँवला या काला होने की समस्या जुड़ गई और फेयर एंड लवली ने उसका हल निकाल दिया। सांस्कृतिक विविधता का व्याख्यान देने वाले लोगों के सौंन्दर्य का पैमाना भी गोरा होना ही है। समय के साथ एक परिवर्तन और जुड़ा है : अब लड़कियाँ ही काला होने की मुश्किल से नहीं जूझती हैं बल्कि लड़कों की भी फेयरनेस मेन्स क्रीम आने लगी है। मर्दों वाले साबुन-तेल के साथ मर्दों वाली फेयरनेस क्रीम। आज से चालीस साल पहले तक की कोई तस्वीर आप के हाथ लगी हो तो गौर फरमा सकते हैं कि ज्यादातर आम लोग साँवले ही थे। अति कुलीन घरानों, राजा-रानी या जमींदारों के परिवारों को छोड़ दिया जाए तो खेती-किसानी में लगे आम लोग गेहुँए या साँवले होते थे। उस समय की अपनी समस्याएँ थीं लेकिन ऐसी नकली समस्या नहीं थी। अगर ऐसा होता तो महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी के रूप को देख कर जब राजा ने उपहास किया तो वे यह कह कर सब का मुँह बंद कर नहीं पाए होते कि ‘मोहि का हंससि कि कोंहरहिं।’ यानि मुझ पर हँस रहे हो या मुझे बनाने वाले कुम्हार यानी ऊपरवाले पर?

आज विज्ञान और तकनीक जितना आगे हैं कि इससे भी कड़ा जवाब दिया जा सकता है। लेकिन यह जवाब देने के लिए सच और  सौन्दर्य की समझ होनी चाहिए। अगर मैं कहूँ कि ग्लोबल दुनिया ने लोगों की कुंठाओं को ग्लोबल कर दिया है तो गलत नहीं होगा। लोग पहले सौन्दर्य को अपने समाज की सीमाओं के भीतर देखते थे लेकिन अब उनके सौन्दर्य का मापदंड बदल गया है। यह कुंठा इतने गहरे घर कर गई है कि लड़के भी तमाम प्रोटीन प्रोडक्ट आजमाते रहते हैं और लम्बाई बढ़ाने वाली दवाओं का शिकार भी हो जाते है। कुछ ही दिन पहले कद बढ़ाने की गलत दवा का ओवरडोज लेने से एक बच्चे की मौत हो गई थी। विवाह के लिए जिंदा, व्यक्ति-संपन्न लड़की-लड़का नहीं, एक मॉडल चाहिए। वैसा जैसा विज्ञापनों में आता है। चूँकि हमारे यहाँ अभी लड़कियों को चुनाव की आजादी नहीं है, लड़कों को ही वधू पसंद या नापसंद करने की आजादी है, इसलिए लड़के विवाह के विज्ञापनों में अपने लिए एक मॉडल, जिसकी एक निश्चित लम्बाई, वजन और रंग-रूप होता है, ढूँढ़ते रहते हैं। इसी प्रक्रिया में अनगिनत सामान्य लड़कियों के अपमान का लम्बा सिलसिला लिखा जाता है, उनके तमाम गुण बाजार द्वारा नियत मापदंड के आगे फीके साबित होते हैं।


तंदुरुस्त मनुष्य बहुत सुंदर होता है। यकीन न हो तो किसी स्वस्थ लड़के या लड़की को देख लीजिए। हमारे देश की लड़कियों का कैसा स्वास्थ्य है, उस पर क्या कहें। यहाँ तो कुछ जिन्दगी की जद्दोजहद, कुछ घर की तंगी, ऊपर से सुंदरता की बाजारू समझ। सब ने मिल कर स्वास्थ्य का बेड़ा गर्क कर दिया। ज्यादातर लड़कियों को पर्याप्त भोजन नसीब नहीं है और जिन्हें है उनके बीच जीरो फीगर की बीमारी का रोग फैलाया जा रहा है। ज्यादातर लड़कियाँ खून की कमी से पीड़ित हैं। लेकिन कहे कौन। काले-गोरे की बीमारी से दक्षिण भारत भी अछूता नहीं है। मुंबई की मार्केट रिसर्च कंपनी नेल्सन इंडिया के मुताबिक भारत में फेयरनेस क्रीम का उद्योग फिलहाल 43 करोड़ डॉलर का है। यह उद्योग काफी समय से देश में टिका हुआ है।

बहुराष्ट्रीय कंपनी हिंदुस्तान लीवर ने पहली बार फेयर एंड लवली क्रीम 1978 में बाजार में उतारी थी। समय के साथ टारगेट ग्रुप बदल गया। ताजा शोध बताते हैं कि यह क्रीम अब तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के पुरुषों में भी काफी लोकप्रिय है। इस तरह की क्रीम का बाजार बढ़ता ही जा रहा है। यहाँ तक कि जापानी और चीनी समाज में भी यह समस्या खड़ी हो गई है। बाजार ने हमारी आँखों पर एक ऐसा चश्मा लगा दिया है कि हमें सब कुछ उसके हिसाब से ही दिखने लगा है। उससे इतर  कुछ भी स्वीकार नहीं है।

बाजार की एकरसता आँखों के भीतर जा बैठी है। एक रंग, एक साँचा, एक तरह की मुस्कान, एक तरह का पहनावा, एक तरह का खानपान। बेहद उबाऊ। पहाड़ का लड़का या लड़की हो या पंजाब का, हम सब को एक ही तराजू में रख कर तौलने लगते हैं। वह दिन दूर नहीं जब ‘जसोमती मैया से बोले नंदलाला राधा क्यों गोरी मैं क्यूँ काला’ के जवाब में माँ परेशान हो जाएगी और जल्दी से लाड़ले के लिए कहीं से कोई फेयरनेस क्रीम ढूँढने लगेगी।

दक्षिण में, जहाँ साँवला होना सामान्य बात है, भी चंद पीतवर्णी लड़कियों को आदर्श बना दिया गया। वहाँ साँवली लड़कियों को अपने दहेज के लिए ज्यादा पैसा और सोना इकठ्ठा करना पड़ता है। उत्तर भारत के कितने ही निजी अस्पतालों में दक्षिण से लड़कियाँ इसलिए काम करती हैं कि शादी का दहेज जुट जाए। यह दुर्भाग्य है हमारा कि प्रेम पाने, किसी से तारीफ पाने की उम्मीद में हम अपनी ही नजर में गिर जाते हैं। जिस समाज और जिस पुरुष की ओर स्त्री टकटकी बाँधे देखती है उसकी नजर मर्दवादी तो थी ही, अब बाजारवादी भी हो गई है। उसे औरत का सौन्दर्य कुछ खास किस्म के इंच में, लम्बाई और चौड़ाई में नजर आता है। मुझे बहुत पहले किसी की लिखी एक कहानी याद आ रही है ‘त्रिज्या’ जो इस बात को ले कर लिखी गई थी कि एक लड़की अपने कम उन्नत वक्ष को ले कर कितनी परेशान है और उसे किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।  बाजार द्वारा तैयार की गई, पाली-पोसी गई इस कुंठा से निपटने के लिए बाजार में अनगिनत दुकानें  सजी हैं। वे हर चीज बेचते हैं। बाल से ले कर चमड़ी तक। बाजार के पास औरत तो जिग्सा पजल के रूप में उपलब्ध है - कितनी कमर, कितना सीना, कितना होंठ, सब जोड़ लो। इंची टेप लेकर उसकी मुस्कान भी नाप के चिपका सकते हैं।
दुख इस बात का है कि इस सौन्दर्य बोध के बीच इंसान गायब है। औरत अब औरत नहीं रही, वह बाजार का ऐसा उत्पाद है जिसे पैसे और मर्द ने बनाया है। नाओमी वुल्फ ने अपनी किताब ‘ब्यूटी मिथ’ में तमाम बातों के अलावा लिखा है  कि अपने शरीर को ले कर शर्मिंदा स्त्री कभी पूरा प्रेम नहीं कर सकती और इसी तरह सौन्दर्य के अपने संर्कीण नजरिए को ले कर जीने वाला पुरुष अपने सामने खड़े सच्चे प्रेम को कभी पहचान नहीं सकता।

आज भी अँग्रेजों को हमारे देश में उनके रंग के कारण गोरा कहा जाता है। जिन गोरों ने पूरे देश को गुलामी में पीस कर रख दिया, उनके प्रति नफरत या घृणा का भाव हमारे मन में नहीं है। घृणा किस रंग से है? काले से। हमारी संवेदनाएँ, ठीक से देखें तो, नस्लीय, वर्णीय, लैंगिक और जातीय हैं। अफ्रीकी नस्ल के तमाम लोग हमारे लिए हब्शी हैं। इतिहास में झाँकें तो उन्होंने हमारे साथ कुछ भी बुरा नहीं किया है बल्कि दर्द की अगर कोई एकता बनती है तो उन्हीं के साथ बनती है, क्योंकि उन्हें भी सताया गया है। अफ्रीकी लेखक न्गुगी वा थ्योंगो ने अपनी किताब ‘भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता’ में इसी औपनिवेशिक मानसिकता पर चोट की है। औपनिवेशिक ताकतें अपने आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण को ज्यादा से ज्यादा मुक्कमिल रूप देने के लिए सांस्कृतिक परिवेश पर अपना नियंत्रण बनाने की कोशिश करती हैं। शिक्षा, धर्म, भाषा, साहित्य, गीत, नृत्य के विविध रूप, अभिव्यक्ति के प्रत्येक रूप आदि पर नियंत्रण कर वे जनता के समग्र मूल्यों पर नियंत्रण हासिल कर लेती हैं और अंततः जनता के विश्व दृष्टिकोण पर भी उनका नियंत्रण हो जाता है। इसी के अधीन लोग खुद को परिभाषित करने लगते हैं। यह ताकतें ऐसे गुलामों को पसंद करती हैं, जो यह स्वीकार करें कि उनकी किस्मत में गुलामी के सिवा और कुछ लिखा ही नहीं है। इसलिए उन्हें अपने मालिक के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए कि उसने उन्हें गुलाम बनाने की कृपा की और सभ्यता की शर्तों को पूरा किया। कोई भी गुलाम तब तक पूरी तरह गुलाम नहीं होता है जब तक वह इस तथ्य को स्वीकार न कर ले कि वह सचमुच गुलाम है।

अब इस बात की रोशनी में हम खुद को देखें। यूरोप तक गई आर्य शाखा और महान आर्यों का वंशज होने का मान दुत्कारे जाने के बाद भी हमें उनकी तारीफ करने पर मजबूर करता है। एक तरफ हम उनकी तारीफ करतें हैं तो दूसरी ओर खुद कुंठित जीवन जीते हैं या दूसरों में कुंठा भरने का काम करते हैं। कुछ दिनों पहले एक धारावाहिक ‘सलोनी’ शुरू हुआ। साँवली लड़की, जिसे अपने सद्गुणों से साबित करना था कि साँवला होने की उसकी कमी को न देखो, उसके भीतर छिपी को अच्छाई देखो।

विलियम ब्लेक ने एक काले बच्चे पर कविता लिखी - ‘सांग ऑफ इनोसेंस’।  उसकी माँ उसके काले होने पर उसे समझाती है और उसका मनोबल बढ़ाती है। लड़का कहता है :

मेरी माँ ने मुझे दक्षिण के जंगलों में पाला
और मैं काला हूँ लेकिन देखो मेरी आत्मा है कितनी सफेद,
किसी अँग्रेज बच्चे की तरह जो देवदूत जैसा गोरा है 
लेकिन मैं तो काला हूँ गोया रोशनी से ही वंचित कर दिया गया
...
और तब मैं खड़ा हो कर उसके रुपहले बालों को सहलाऊँगा
और उसके जैसा हो जाऊँगा और फिर उसका प्यार पाऊँगा

बिल्कुल ऐसा ही होता है घरों में। अच्छा या बुरा, प्यार से या खराब तरीके से बच्चे को, खास तौर पर लड़कियों को, यह बताया जाता है कि कुदरत या भगवान ने कुछ नाइंसाफी तो कर दी है लेकिन तुम उसे अपने अच्छे गुणों से पाट सकती हो।

कोंकण से ले कर पूरे दक्षिण में काले या साँवले लोगों को गोरे पीतवर्णी कोंकणस्थ ब्राह्मणों से रोज अपमानित होना पड़ा। लेकिन सौन्दर्य बोध वही रहा। विजयी लेकिन शासकों के रंग-रूप के प्रति आकर्षण से यह सौंदर्य बोध बना है। इसलिए सामान्य रंग-रूप वाले लड़कों के परिवार वालों की यही ख्वाहिश होती है कि लड़की ऐसी मिले जिससे वे ‘ऊपर वालों’ में शामिल हो जाएँ। यह सचेत भले न हो लेकिन हमारे अवचेतन में गहरे पैठा है जिसका पूरा बोध बाजार को है। वह धीरे से यह कुंठा हमारे मन में भरता है। फिर एक बड़ा-सा होर्डिंग - कॉलेज में रोज दिखें गोरी-निखरी, पूरे हफ्ते लगाएँ, फलां क्रीम। इस होर्डिंग पर एक गोरे रंग की युवती का चित्र भी लगा हुआ है। इस तरह के विज्ञापन आम भारतीय की कुंठा पर मुहर लगा देते हैं। फिर रहें परेशान, झेलें अपमान।

1998 में जब बेंगलुरु में सौन्दर्य प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, उसके बाद से तेजी से सुंदर स्त्रियों की बाढ़ आ गई। तब से ही यह समानांतर बहस तेज हो गई कि दुनिया की सबसे सुंदर औरत कौन। उसे जिसे बाजार ने गढ़ा, जो मुँह खोलते ही विज्ञापन का एक जुमला उगलेगी या ववह जो हमारे आस-पास है, जो स्वस्थ और साहसी है, जो रोज जीवन और इंसानियत के नए प्रतिमान गढ़ रही है। इसी क्रम में नंदिता दास ने ‘डार्क इज ब्यूटीफुल’ यानी ‘काला खूबसूरत है’ नाम से एक अभियान शुरू किया, जो बेहद ही प्रेरक रहा है। बालीवुड में काम करने वाली तमाम नायिकाएँ भी काले-गोरे के भेद का शिकार होती हैं। सिर्फ चंद ऐसे नाम हैं जिन्हें हम साँवला होने के बाद भी सफल अभिनेत्री के रूप में जानते हैं। उन्होंने खुल कर इस विषय को सामने रखा और सौन्दर्य के मानदंड को चुनौती दी है। यह अभियान नंदिता ने अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शुरू किया था। स्त्री के श्रम और सौन्दर्य के प्रतीक इस दिवस को वैसे भी हथियाने में कास्मेटिक कम्पनियों ने  कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसे में कोई भी विरोध जो नकली और अवैज्ञानिक सौन्दर्यबोध से लड़ता हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
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