अनारकली कौन थी : इतिहास : संगम पांडेय

संगम पांडेय
अनारकली कौन थी

"अनारकली को दीवार में चिनवा देने की बात निरी किंवदंती नहीं मानी जा सकती।"

अनारकली की कहानी सबसे पहले ‘गुजिश्ता लखनऊ’ के लेखक अब्दुल हलीम शरर ने लिखी थी। शरर का जन्म मटियाबुर्ज में हुआ था, जहाँ लखनऊ से बेदखल कर दिए जाने के बाद अवध के नवाब वाजिद अली शाह और उनके साथ गए लोगों को बसाया गया था। वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों से मिलने वाली मोटी पेंशन से इमामबाड़ा और लखनवी शैली की इमारतें बनवा कर मटियाबुर्ज में एक छोटा-मोटा लखनऊ खड़ा कर लिया था। इस नकली लखनऊ में रहते हुए शरर में नवाबी दौर और मुस्लिम तहजीब का ऐसा नॉस्टैल्जिया पैदा हुआ कि बाद में वे असली लखनऊ लौट आए और 1926 में जब उनका इंतकाल हुआ तब तक वे मुगलिया माजी पर 102 किताबें लिख चुके थे। इन्हीं में एक कहानी अनारकली की थी। दिलचस्प यह है कि शरर ने इसे इतिहास के एक वास्तविक दौर के हवाले से कही गई एक काल्पनिक कहानी बताया था। शरर के बाद 1922 में इम्तियाज अली ताज ने, जिन्हें आगा हश्र कश्मीरी के बाद के दौर का उर्दू का सबसे बड़ा नाटककार माना जाता है, अनारकली के किरदार पर एक नाटक लिखा, जो बहुत मशहूर हुआ और खूब खेला गया। इसी नाटक की शोहरत बाद में ‘अनारकली’ और ‘मुगले आजम’ फिल्मों के बनने की वजह बनी।

अब्दुल हलीम शरर ने अनारकली की कहानी को भले ही काल्पनिक बताया हो, पर यह तय है कि इस किरदार के नाम को उन्होंने खुद की ईजाद नहीं बताया होगा; क्योंकि लाहौर में इस नाम का आज तक प्रसिद्ध बाजार तब भी बाकायदा वजूद में था। लाहौर के इस बाजार का नाम अनारकली बाजार इसलिए पड़ा कि यहाँ कथित रूप से किसी असली अनारकली का एक मकबरा हुआ करता था, जिसे सन 1800 में महाराजा रंजीत सिंह की सेना के एक फ्रेंच अफसर के आवास में, फिर अंग्रेजी राज के दौरान चर्च में और उसके बाद पंजाब के रिकॉर्ड ऑफिस में बदल दिया गया।
सवाल है कि वह अनारकली कौन थी जिसके नाम पर यह मकबरा बनाया गया था? अनारकली को काल्पनिक मानने वालों का कहना है कि दरअसल अनारकली किसी मकबरे में दफ्न मरहूम का नहीं बल्कि उस बगीचे का नाम था जिसमें यह मकबरा बना था। और यह मकबरा जहाँगीर की एक बीवी और उसके बेटे सुल्तान परवेज की माँ साहिबे जमाल का था। ऐसा दावा करने वालों ने मकबरे के आसपास बगीचा होने के सबूत तो पेश किए, लेकिन सुल्तान परवेज के ननिहाल से सूत्र जोड़ने पर दूसरा दावा ठीक नहीं पाया गया। जबकि इसीके बरअक्स अनारकली को एक वास्तविक किरदार मानने वाले सबूतों को देखें, तो एक अलग ही कहानी सामने आती है। 

अनारकली को जीता-जागता इंसान मानने के जिक्र उसे बगीचा या काल्पनिक बताने वालों से बहुत पहले के हैं। सब से पहले इसका जिक्र सन 1625 में प्रकाशित पुस्तक ‘परचास : हिज पिलग्रिम्स’ में आया था। सैमुअल परचास नाम के ब्रिटिश संपादक द्वारा प्रकाशित कराई गई यह किताब दुनिया  भर में जाने वाले ब्रिटिश व्यापारियों के यात्रा वृत्तांतों का वृहदाकार संकलन थी। इसमें संकलित ईस्ट इंडिया कंपनी के एक व्यापारी विलियम फिंच के रिपोर्ताज में पहली बार अनारकली के प्रसंग का जिक्र मिलता है। फिंच सन 1608 में ईस्ट इंडिया कंपनी के ‘हेक्टर’ नाम के जहाज से सूरत के बंदरगाह पर उतरा था। अगले कुछ साल हिंदुस्तान में रहने के दौरान वह कई जगह घूमा, जिनमें से एक लाहौर भी था, जहाँ वह सन 1611 में पहुँचा था। वहाँ उसने बाबा शेख फरीद की मस्जिद के परे अकबर की एक बीवी जिसका नाम अनारकली था-- जो उसके बेटे डेनियल की माँ थी, जिसके साथ शाह सलीम का कोई चक्कर था, जिसके बारे में पता चलने पर  कबर ने शीघ्र ही उसे अपने महल की दीवार में चिनवा दिया, जहाँ उसकी मौत हो गई— का एक सुंदर स्मारक होने का जिक्र किया। और ‘(वर्तमान) बादशाह ने अपनी मोहब्बत की याद में ऊँची दीवारों से घिरे वर्गाकार बगीचे के मध्य तरह-तरह के कमरों और गेट से युक्त पत्थर का आलीशान मकबरा तामीर करने का आदेश दिया, जिसका ऊपरी हिस्सा उसकी इच्छा के मुताबिक सोने से मढ़ा हो।’ तथ्यों के मुताबिक, विलियम फिंच के देखे जाने तक यह मकबरा अभी बन ही रहा था (जो अंततः सन 1615 में बनकर तैयार हुआ), और अकबर की मौत  सिर्फ छह साल पहले ही हुई थी।

फिंच के पाँच साल बाद सन 1616 में भारत में ब्रिटिश सम्राट के दूत सर थॉमस रो के पादरी के तौर पर मौजूद एडवर्ड टैरी ने भी अपनी यात्रा के रिपोर्ताज में अनारकली का जिक्र किया। उसके मुताबिक ‘अकबर शाह ने अपनी सबसे प्रिय पत्नी अनारकली को ‘एब्यूज’ करने के लिए वर्तमान बादशाह को उत्तराधिकार से वंचित कर देने की धमकी दी थी, जिसे मृत्युशैया पर उसने वापस ले लिया।
इन दोनों जिक्रों में खास बात अनारकली को अकबर की बीवी बताया जाना है। बाद का काल्पनिक साहित्य अनारकली को सलीम की एक ऐसी प्रेमिका के रूप में चित्रित करता रहा है जिसका कमतर हैसियत की कनीज होना सलीम के बाप अकबर को रास नहीं आया, लिहाजा उसने उसे दीवार में चिनवा दिया। क्या यह एक वास्तविक त्रासदी को रोमांटिक त्रासदी में तब्दील करना था? क्या उक्त वास्तविक त्रासदी को लेखकगण पचा नहीं पा रहे थे, इसलिए उन्होंने उसका एक ऐसा सहनीय संस्करण तैयार कर दिया, जिससे एक सुखवादी समाज के संस्कारों पर बुरा असर न पड़े? इस सवाल की तहकीकात के लिए इतिहास में थोड़ा और घुस कर देखते हैं।

सबूतों के अभाव में इतिहास की किताबों ने अनारकली को एक वास्तविक किरदार के रूप में दर्ज नहीं किया है,  पर उनमें यह जरूर दर्ज है कि सलीम ने अकबर के खिलाफ सन 1600 में बगावत कर दी थी। सवाल है कि ऐसा उसने क्यों किया जबकि वह हमेशा से अकबर का सबसे प्रिय पुत्र और शाही तख्त का लगभग घोषित वारिस था? वह अकबर की मुरादों और शेख सलीम चिश्ती की दुआओं की संतान था। अकबर अजमेर की दरगाह पर अपनी आस्था ज्ञापित करने के लिए सलीम को आगरा से पैदल वहाँ तक लेकर गया था। और सलीम द्वारा की गई बगावत भी क्या थी — वह ऐसी बगावत थी जिसमें तख्तापलट के इरादे की तुलना में अपनी खुंदक दिखाने की जुर्रत ज्यादा थी। पूरा वाकया यों है कि सितंबर 1599 में अकबर 80 हजार सैनिकों के साथ दक्कन में युद्ध के लिए निकला। जाते हुए उसने सलीम को राजधानी आगरा का कार्यवाहक मुखिया घोषित कर दिया। लेकिन सलीम ने अकबर के जाते ही हर जगह अपने खास लोगों को नियुक्त कर दिया और दक्कन से आने वाले अकबर के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी। न सिर्फ इतना बल्कि उसने आगरा के बादशाही किले पर कब्जा करने की कोशिश भी की, पर किले की हिफाजत अकबर के बेहद खास सिपहसालारों की सैन्य टुकड़ियों के अधीन होने से वह इस पर कब्जा नहीं कर पाया। उधर दक्कन की लड़ाई जीत कर अकबर अप्रैल 1601 में वापस आगरा आया। यहाँ उसे पता चला कि सलीम शहर में तीस हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ सीनाजोरी पर उतरा हुआ है। ऐसे में उसने उसे एक कड़ा पत्र लिखा कि वह शहर छोड़ कर यहाँ से धुर पूरब की ओर चला जाए, जहाँ बंगाल और उड़ीसा की सुलतानी उसे मुकर्रर की जाती है। पत्र मिलने पर बिगड़ैल सलीम ने बंगाल जाने के प्रस्ताव को तो दरकिनार कर दिया, पर वह आगरा को उसके हाल पर छोड़ कर इलाहाबाद जरूर लौट गया। वहाँ भी अपनी खुंदक निकालने का काम उसने जारी रखा, और बादशाह के समांतर अपने नाम के सिक्के जारी करवा दिए। बाद में उसने अकबर की ओर से समझौते के लिए भेजे गए अबुल फजल की हत्या भी करा दी। इतिहासकारों ने सलीम की इन कारगुजारियों को सत्ता के लिए उसकी व्यग्रता करार दिया है। हालाँकि अगर वैसा था भी तो उसकी बगावत में कोई योजना दिखाई नहीं देती, और अंततः किसी मुहब्बत के लिए कुर्बान हो जाने का भाव ही इसमें ज्यादा दिखाई देता है। ऐसा हुआ भी। मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका जैसे रसूखवाले मनसबदारों ने जब जहाँगीर की कारगुजारियों से आजिज अकबर के सामने खुद जहाँगीर के बेटे खुसरू मिर्जा को ही उत्तराधिकारी के रूप में खड़ा करने की कोशिश की तो जहाँगीर ने दरबार में समर्पण किया और उसे दस दिन की कैद भुगतनी पड़ी। प्रश्न आखिर वही खड़ा होता है कि चार साल तक चले सलीम के इस ऊटपटाँग विद्रोह का सबब आखिर क्या था? कहीं यह अनारकली को दीवार में चिनवाने का बदला तो नहीं था?

अनारकली
अनारकली का जिक्र इतिहास में इसलिए नहीं है क्योंकि ‘आईने अकबरी’ में नहीं है। जाहिर है कि ‘आईने अकबरी’ में (अगर वह था तो) ऐसे वर्जित संबंध के जिक्र को शामिल नहीं किया जा सकता था। अलबत्ता अबुल फजल ने उसमें एक अन्य घटना का उल्लेख जरूर किया है। घटना के मुताबिक एक शाम अकबर के हरम में किसी पागल आदमी के घुस आने की खबर फैली, जिसे सलीम ने पकड़ लिया। लेकिन प्रहरियों ने सलीम को ही घुसपैठिया समझ कर पीट दिया। अबुल फजल के मुताबिक अकबर ने जैसे ही उस पागल समझे गए आदमी पर तलवार उठाई तब तभी वह घूमा तो सब ने देखा कि वह सलीम था। यकीनन इतिहास ‘आईने अकबरी’ के अलावा भी कुछ रहा होगा। जहाँगीर ने लाहौर में जिस अनारकली का मकबरा बनवाया वह आखिर कौन थी?  तथ्यों के मुताबिक वह डेनियल की माँ तो नहीं ही थी, क्योंकि उसकी मौत तो इस घटनाक्रम से चार साल पहले ही हो चुकी थी। लेकिन यह भी सही नहीं मालूम देता कि अकबर जैसा गहरी सूझबूझ वाला बादशाह अनारकली के मात्र कनीज होने की इतनी बड़ी सजा मुकर्रर करे जिससे भविष्य में इतना बड़ा वितंडा खड़ा होने की आशंका हो।

अनारकली के मिथक में एक पहलू उसे दीवार में चिनवाने का भी है। किसी जीते-जागते व्यक्ति को दीवार में चिनवा देना सजा देने का एक अनोखा तरीका ही कहा जा सकता है। सजा देने के ऐसे अनोखे तरीके अकबर को खूब सूझते थे। एक बार एक सैनिक को काम में लापरवाही की सजा में उसने मरे भैंसे के शरीर के खोखल पर बँधवा कर नदी में लटकवा दिया था। थपेड़ों से बेहाल हो गए सैनिक की चीख-पुकार पर उसे निकाल कर गुलाम के तौर पर उसकी नीलामी करवा दी गई। दूध के भाई अधम खाँ को किले की बुर्जी से दो बार नीचे फिंकवाने की बात तो अकबर की कार्यशैली का मशहूर तथ्य है ही। क्या इन उदाहरणों की रोशनी में अनारकली को दीवार में चिनवाने की बात निरी किंवदंती मानी जा सकती है?
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