आइए हिंदी का हिंदीकरण करें : भाषा : सूर्यनाथ सिंह

सूर्यनाथ सिंह
आइए हिंदी का हिंदीकरण करें

"दिल्ली मेट्रो में ‘लास्ट स्टेशन’ के लिए कुछ समय पहले तक ‘अंतिम गंतव्य’ लिखा होता था। उससे शायद किसी को श्मशान भूमि का बोध हुआ हो और शिकायत कर दी हो, इसलिए बदल कर ‘अंतिम स्थानक’ लिख दिया गया है। "

इन दिनों हिंदी में विचित्र स्थितियाँ हैं। इसे कारोबार की भाषा बनाने का प्रयास चल रहा है, संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलाने की कोशिशें हो रही हैं। दावा होता रहा है कि यह लगातार पसर रही है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे स्वीकृति मिल रही है। इसके समर्थन में हिंदी फिल्मों, साहित्य में अनुवाद के बाजार आदि का उदाहरण दिया जाता है। मगर हकीकत यह है कि हिंदी आज तक अपना स्वाभाविक स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाई है। इसके अलग-अलग इलाके बनते गए हैं। साहित्य का अलग, पत्रकारिता का अलग, सिनेमा और संचार का अलग, वाणिज्य-व्यापार का अलग, विद्यालयों-विश्वविद्यालयों का अलग, अनुवाद का अलग और सामान्य व्यवहार का अलग। और विचित्र है कि ये तमाम इलाके आपस में कई बार टकराते नजर आते हैं। लोक की बात तो साहित्य में बहुत होती है, पर शास्त्र के साथ कुर्सी बिछा कर लोक आज तक आमने-सामने कभी नहीं बैठ पाया।

इसके उलट दूसरी विदेशी भाषाओँ को देखें, खासकर अँग्रेजी को जिसकी नकल हिंदी करती आ रही है - तो स्थिति बिल्कुल उलट है। उन भाषाओं ने लोक से अपनी करीबी बनाई। अँग्रेजी ने अपने को बहुत पहले लैटिन से अलग कर लिया। वह एक स्वतंत्र भाषा बन गई। लैटिन पर निर्भर नहीं रही। यहाँ तक कि तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के स्तर पर भी उसने अपने शब्द गढ़े। मगर हिंदी अब भी संस्कृत की पिछलगुआ बनी हुई है। नतीजा यह हुआ है कि तकनीकी शब्दावली की दुरूहता की वजह से विज्ञान, गणित जैसे तकनीकी विषयों का हिंदी माध्यम से अध्ययन कठिन बना हुआ है। विद्यार्थी तकनीकी शब्दों को बस रट लेता है, उनका बोध उसे नहीं हो पाता। शायद यही वजह है कि हमारी पूरी शिक्षा-प्रणाली बोध के बजाय जानकारी यानी रटंत विद्या पर केंद्रित होती गई है।

इसके उलट गाँवों में लोगों ने तमाम अँग्रेजी तकनीकी शब्दों को देसी धज दे रखी है। वह जुगाड़ नहीं है, परंपरा से चले आ रहे तमाम तकनीकी अनुभवों और पारंपरिक शब्दावली का मेल है। हिंदी ने उन शब्दों की तरफ देखना भी कभी गवारा नहीं किया। वह तो इस विश्वास के साथ बार-बार संस्कृत के पास जाती रही कि वह सारे शब्दों की जननी है। किसी शब्द या उसकी भाषिक धारणा का धातु रूप पता करो और भरभरा कर शब्द गिरने शुरू हो जाएँगे। यही वजह है कि हमारे तमाम मंत्रालयों, विभागों, पदों वगैरह के हिंदी रूप संस्कृत में हैं। लोग उन्हें रट कर बोलते हैं, बोध हो न हो। अब आप किसी से पूछिए कि ‘भूतल परिवहन मंत्रालय’ या फिर ‘नागरिक उड्डयन मंत्रालय’ का शाब्दिक अर्थ क्या है, तो वह असमंजस में पड़ जाएगा। थोड़ा पढ़ा-लिखा है तो इनके अँग्रेजी नाम बता कर आप पर रौब गालिब करने का प्रयास करेगा, नहीं तो चुप। कहने की कुल मुराद यह कि जिन तकनीकी शब्दों का रोजमर्रा इस्तेमाल होता है, उन्हें दुरूह बनाने से हिंदी का कितना भला होता है? उलटे मजाक ही बनता है। बैंकों में जाइए तो पैसा निकालने की पर्ची पर अँग्रेजी में लिखा मिलेगा - ‘विड्रॉल स्लिप’, उसी के नीचे हिंदी में लिखा मिलेगा - ‘आहरण पर्ची’। कभी किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि जब कोई आदमी बैंक में जाता है तो वह पैसा निकालने की पर्ची माँगते समय क्या कहता है। क्या कभी किसी ने कहा कि ‘आहरण पर्ची दीजिए’? विचित्र बात यह कि हर बैंक में लिखा होता है कि ‘हमें हिंदी में काम करने पर गर्व है।’ सरकारी बाध्यता। मगर किसी अकलमंद को यह नहीं सूझा कि वह ‘आहरण पर्ची’ की जगह ‘पैसा निकालने की पर्ची’ लिखवा सके। यह तो एक छोटा उदाहरण है। तमाम अदालती कामकाज ऐसी जटिल हिंदी में चलते हैं कि गाँव के आदमी को शब्दकोश की मदद से भी समझ न आए। आजकल तमाम उपभोक्ता वस्तुओं, जैसे मोबाइल, कूलर आदि, के साथ उनके उपयोग और महत्व आदि को बतानी वाली एक पुस्तिका मिलती है। उसमें अँग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भी सूचनाएँ और जानकारियाँ दी होती हैं, मगर हिंदी में उन्हें ग्रहण कर पाना आसान नहीं होता। इसी तरह अगर आपने अपने कंप्यूटर को हिंदी भाषा में कर रखा है तो उसे संचालित करते समय परदे पर उभरने वाली लिखित जानकारियों को पढ़ कर कोफ्त होती है। उनका अर्थ ग्राह्य नहीं होता। बीमा संबंधी जानकारियाँ भला किसके पल्ले पड़ती हैं। 

ऐसे में हिंदी की अनुप्रयोगी स्थिति पर विचार करने की जरूरत है। ज्यादा नहीं, अगर तकनीकी शब्दावली के स्तर पर भाषा के विद्वान अपने आग्रहों से मुक्त हो कर व्यावहारिक हिंदी के स्वरूप को रचने की मेहनत करें तो बहुत कुछ हल हो सकता है। यह मुश्किल काम नहीं है। बस, उस शब्दावली का विश्लेषण करने की जरूरत है, जो तमाम स्थानीय या कहें लोक रूपों में चलित है। शास्त्रीय भाषा को लोक भाषा से जोड़ने की मशक्कत कर ली जाए तो विज्ञान में नई ग्राह्य तकनीकी शब्दावली विकसित हो सकती है और इस तरह विज्ञान पढ़ना ज्यादा आनंददायक हो सकता है। आखिर क्या है कि लोक में मोटरगाड़ी के ‘एक्सेल’ के लिए ‘धुर्रा’ शब्द चलन में है- यह परंपरा से चला आ रहा है, बैलगाड़ियों के जमाने से- पर विज्ञान ने इसे स्वीकार नहीं किया।

दिल्ली मेट्रो में ‘लास्ट स्टेशन’ के लिए कुछ समय पहले तक ‘अंतिम गंतव्य’ लिखा होता था। उससे शायद किसी को श्मशान भूमि का बोध हुआ हो और शिकायत कर दी हो, इसलिए बदल कर ‘अंतिम स्थानक’ लिख दिया गया है। यह समझ से परे है कि हर तकनीकी शब्द का हिंदी पर्याय बनाना जरूरी क्यों है। जो सहज चलन में है, उसके साथ छेड़छाड़ करना कहाँ की विद्वत्ता है। हर आदमी उसे ‘आखिरी स्टेशन’ कहता है, तो यही लिख देने में क्या हर्ज। हम ऐसा करना नहीं सीखते, तो  ‘हिंदी अनुवाद की भाषा होती जा रही है’ – इस पर चाहे जितना विलाप होता रहे, नतीजा सिफर ही रहने वाला है।
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