स्त्री की ना का मतलब : पिंक : फिल्म : नीरा जलक्षत्रि

नीरा जलक्षत्रि
स्त्री की ना का मतलब 

पिंक हिंदी सिनेमा की चंद बेहतरीन फिल्मों में से एक है जिस पर हिंदी सिनेमा गर्व कर सकता है। यह फिल्म अभी कुछ समय पहले आई ‘राँझना’ जैसी फिल्मों के उस मर्दाना रोमेंटिसिज्म को खारिज करती है जिसकी बदौलत पुरुष अपनी मर्जी  को लड़की पर थोपने और उसे ही ‘गिल्ट’ में डालने की कोशिश करता है और लड़की की मर्जी नेपथ्य में चली जाती है। जिस समाज में लड़की की ‘ना’ को ‘हाँ’ समझने की परवरिश दी  जाती हो, वहाँ पिंक का आना एक गहरा सुकून देता है। हिंदी सिनेमा ने ‘कब तक रूठेगी, चीखेगी, चिल्लाएगी, दिल कहता है एक दिन हसीना मान जाएगी’ से ‘ना एक पूरा वाक्य है’ तक की यात्रा तय की है।  

पिंक की खूबी यही है कि वह सिर्फ बात नहीं करती, बल्कि अपनी प्रस्तुति में देखने वालों पर एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डालती है। यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव  उन पुरुषों के भीतर एक गहरा अपराधबोध पैदा करता है जिन्होंने भारतीय सामाजिक परवरिश के चलते कभी स्त्री की इच्छा और सहमति को सम्मान देना नहीं सीखा। यह उन्हें भी ‘गिल्ट’ में डालने वाली फिल्म है, जो यह समझते हैं कि अगर स्त्री उनसे प्रेम करती है, तो सेक्स के लिए कभी ‘ना’ नहीं कह सकती। वे यह मान ही नहीं पाते कि स्त्री सबकुछ के बावजूद कभी ‘ना’ भी कर सकती है। दरअसल, कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे पितृसत्ता का चेहरा बेनकाब होता है और उस तथाकथित आधुनिक भारतीय मर्द के सामंती सोच की भी कलई  खुलती जाती है, जो बराबरी से हँसने–ड्रिंक करने और उन्मुक्त तरीके से जीने वाली लड़कियों को सहज उपलब्ध मानते हैं और सोचते हैं कि ‘ऐसी’ लड़कियाँ सेक्स के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। एक संवाद है फिल्म में – ‘हमारे यहाँ घड़ी की सुई लड़की का कैरेक्टर डिसाइड करती है,’ जब कि यही घड़ी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, लड़के को स्वतंत्र करती है! 

पिंक दरअसल  हिंदी सिनेमा की उन मसाला फिल्मों के लिए भी एक बड़ा सवाल बन कर उभरती है, जिन्होंने अब तक स्त्री चरित्रों को जबरन नायकों से प्रेम करते दिखाया है। इन फिल्मों की कई घिसी-पिटी परिपाटियों में से एक अनिवार्यतः यह रही है कि फिल्म का नायक नायिका के न चाहने के बावजूद उसके आगे-पीछे चक्कर काट कर और कई तरह के लटके-झटके अपना कर उसे हाँ कहने के लिए मजबूर कर देता है। वह कभी जान देने की धमकी देता है तो कभी जान लेने की। बस वह प्रेम में ‘ना’ सुन पाने की हिम्मत नहीं रखता। उम्मीद है, पिंक हिंदी मसाला फिल्मों के लेखकों और निर्देशकों को किशोर वय की कैद से बाहर निकलने के लिए मजबूर करेगी।

पिंक महज देखने वाली फिल्म बन कर नहीं रह जाती, वह भीतर लगातार घट रही होती है सीन-दर-सीन। दरअसल, एक सामान्य कहानी की बुनावट में कुछ ऐसा असाधारण है जो देखने वाले को लगातार झकझोरता रहता है। फिल्म के कई सीन कमाल के हैं। एक सीन है जब मीनल बेहद दर्द के साथ कहती है – ‘जब कोई आपकी इच्छा के बिना आपको छूता है, तब बहुत गन्दा लगता है।’ यह संवाद सिर्फ उस पुरुष के खिलाफ नहीं है जो अपरिचित है बल्कि उस पुरुष को भी संबोधित है जो प्रेमी भी है औरपति भी। इस संवाद के बाद कैमरा कोर्टरूम में हाजिर लोगों की तरफ घूमता है। कई महिलाओं के चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आती हैं, मानो बेडरूम के भीतर सिसकियों में दबे-छुपे दर्द पर से अचानक आवरण खींच लिया गया हो, मानो उस दर्द  से हर स्त्री कभी न कभी गुजरी है। और, यह  दर्द उसे ‘अपने’ कहे जाने वाले लोगों से भी मिले हैं। एक महिला पुलिसकर्मी की आँखों से बहते आँसू दर्शकों को भीतर तक हिला देते हैं। वहीँ फिल्म के आखिर में उसी पुलिसकर्मी का बलात्कृत लड़कियों की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले मि. सहगल से आँखों से शुक्रिया कहते हुए हाथ मिलाना कहीं भीतर तक भिगो देता है। एक और ऐसा ही सीन है जब मि. सहगल कहते हैं – अगर लड़की आपकी फ्रेंड है, गर्ल फ्रेंड है, पत्नी है या सेक्स वर्कर ही क्यों न हो, ‘ना’ का मतलब सिर्फ और सिर्फ ‘ना’ होता है, और कुछ नहीं। ‘ना’ अपने आपमें एक कम्प्लीट सेंटेंस है।
 
पिंक  देखने के पहले मैंने सिनेमा हॉल में किसी फिल्म के ख़त्म होने पर दर्शकों को फिल्म के सम्मान में खड़े हो कर एक साथ बहुत देर तक ताली बजाते नहीं देखा था। ‘पिंक’ को देखने के बाद यह एक नया अनुभव था।

फिल्म के लेखक रीतेश शाह, निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी और सुजीत सरकार तथा कलाकार तापसी, कीर्ति, ओर्नेडिया और अभिताभ बच्चन और पूरी टीम ही बधाई की पात्र है, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के दर्शकों को स्त्री सवालों पर गंभीरता से सोचने के लिए विवश किया।
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