वैष्णवों का कुआँ : परिकथा : त्रिभुवन

त्रिभुवन
वैष्णवों का कुआँ

"वैष्णवों के कुएँ पर अब एक इबारत सब की सहमति से लिखी गई : हर शासक शैतान होता है। "

एक बहुत बड़ा गाँव था - मोहनभागवत नगर। उसमें तीन संप्रदाय रहा करते थे -  शैव, शाक्त और वैष्णव। शैव बहुसंख्यक थे और शाक्त अल्पसंख्यक। वैष्णव अलग-थलग रहते थे। वे प्रतिभाशाली थे, लेकिन विनम्र थे। शैव और शाक्त अज्ञान का पर्याय थे और जैसे दुनिया का समस्त अहंकार उन्हीं में बसता था। वैष्णव सरल और सदाशयी थे। वे दोनों समुदायों की चरणधूलि अपने मस्तक पर लगाया करते थे।

शैव रुद्राक्ष पहनते और भस्म रमाते थे। वैष्णव चक्रांकित रहते थे। उनके ललाट पर चरणारविंद के समान तिलक और बीच में अंग्रेजी के ‘यू' वर्ण के आकार की एक बारीक पीली रेखा इठलाती थी, जिसे वे श्री कहते थे। वैष्णव सिर्फ नारायण को ही सब कुछ मानते थे, और किसी को कुछ नहीं। ये अपने धर्म के इतने कट्‌टर थे कि ये शिव लिंग का दर्शन तक नहीं करते थे।

शैव विद्वानों ने वैष्णवों को बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन वे भी वैष्णवों के इस निर्मल तर्क के सामने निरुत्तर हो गए कि वे अगर महादेव के लिंग का दर्शन करेंगे तो उनके मस्तक पर तिलक रूप में जो श्री विराजमान है, वह लज्जित हो जाएगी। वैष्णव भले शिव के भक्त नहीं थे, लेकिन शिव का भोलापन जैसे उन्हीं में विराजता था।

इस नगर में शैवों की सत्ता बहुत पुरानी थी और वे अपनी परंपराओं पर बहुत गर्व करते थे। शाक्तों को अपनी दैवी शक्ति का अभिमान था। वे भी अपने आप को किसी से कम नहीं समझते थे।
मोहनभागवतनगर अपने आप में एक सशक्त और आत्मनिर्भर नगर था। कोई भी दरिद्र नहीं था। लेकिन कुछ समय से हुआ यह कि नगर में कुछ खास किस्म के बाबाओं का उभार होने लगा और वातावरण में भी परिवर्तन दिखने लगा। इन बाबाओं में कोई खाखी कहलाता और कोई मुनि जी। कोई राख रमाता और कोई दम लगाता। कोई गाँजा-भाँग और चरस की सुल्फियाँ खींच कर नेत्र लाल करके रखता। कुछ 24 इनटू 7 वाले अंदाज में धूनी तापते, जटाओं को वर्षों बिना धोए रख कर बढ़ाते और डेडलॉक तैयार करते।

यह समय ऐसा था जब शैवों और शाक्तों में भयंकर संघर्ष शुरू हो गया था। इस द्वंद्व में मोहनभागवतनगर प्रतिक्षण क्षीण औरर जर्जर होता जा रहा था। द्वंद्व और अहंकार की परिणति विखंडन होती है। पूरा गाँव दो हिस्सों में बँट गया। एक शैवों का और दूसरा शाक्तों का। शैवों ने अपने नगर का नाम मोहननगर रखा और शाक्तों ने भागवतनगर।

वैष्णव सच्चे और सरल थे। गाँव की सारी संस्कृति को वैष्णवों से प्राण मिलते थे। लेकिन मोहनभागवतनगर खंडित हुआ तो वैष्णव न मोहननगर में गए और न भागवतनगर में। वे संशयग्रस्त थे।
शैवों ने मोहननगर का नया संविधान बनाया और उसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ गाँव घोषित कर दिया। वे मानते थे कि दुनिया का परम वैभव कहीं है तो यहीं है। अगर इस दुनिया में प्राचीन काल से ले कर आज तक वैभव की ज्योत्स्ना से आलोकित कोई भूभाग है तो वह मोहननगर ही है, कोई और नहीं। और, अगर दुनिया की समस्त वासनाओं की आग कहीं जल रही है और अगर कहीं नारकीय करुण रुदन हो रहा है तो वह सिर्फ और सिर्फ भागवतनगर है।

मोहननगर का बच्चा-बच्चा जानता था कि भागवतनगर के समस्तवासी निष्ठुर, हृदयहीन और आततायीनुमा हैं। ठीक ऐसा ही विचार और दर्शन भागवतनगर का भी था और वे मोहननगर को ठीक ऐसा ही मानते थे।

दोनों नगरवासी छोटी-छोटी बातों पर लड़ बैठते थे। संशयग्रस्त वैष्णव जिस स्वर्दापि गरीयसी भूमि पर रह रहे थे, वहाँ झीलें ही झीलें थीं। उनमें चार तो बहुत बड़ी थीं। हर झील में बेहद सुंदर और तरह-तरह के कमल खिले हुए थे। बस इसी खिले हुए सौंदर्य पर रक्तपात हो गया।

बात बस इतनी-सी थी कि झील में खिले कमल नीले थे, इसलिए उन्हें एक पक्ष ने नीलकमल कहना चाहा तो दूसरे पक्ष ने कहा : नहीं, नहीं। यह तो इंदीवर है। इंदीवर कहा तो इसी पक्ष के एक अन्य साधु ने कहा : सर, यह प्रतीत तो इंदीवर होता है, लेकिन है यह असितांबुज!

इस विवाद पर एक द्विपक्षीय शिष्टमंडल तैयार किया गया और उसने झीलों का दौरा किया। वे एक झील पर गए तो वहाँ लाल कमल खिले हुए थे। शिष्टमंडल के एक सदस्य बोले : देखिए, रक्तकमल कितने सुंदर हैं! इस पर एक पक्ष ने बात काटी और कहा : मिस्टर, ये रक्तकमल नहीं, स्वर्ण कमल हैं। पीछे से किसी ने उनकी लँगोट खींची और कान में फुसफुसाया : सर, स्वर्ण कमल नहीं, वेदों में इसे सुवर्ण कमल कहा गया है! इस साधु का तीसरा नेत्र  खुलते-खुलते रह गया।

शिष्टमंडल जब अगली झील पर पहुँचा तो सफेद कमल अपनी आभा फैला रहे थे। शिष्टमंडल के एक युवा सदस्य ने बड़ी सावधानी से कहा : क्या इसे ही श्वेत कमल नहीं कहते हैं? सामने एक समूह में खड़े मंत्री जी ने तीखे स्वर में कहा : श्रीमन, इसे पुंडरीक कहते हैं, पुंडरीक! आप सब लोग विदेशों में शिक्षित हैं और आप को कुछ भी पता नहीं है। मंत्री के पीछे खड़े पितृसंगठन के एक होलटाइमर ब्रह्मचारी ने संशोधन करवाया : मंत्री जी, आप भी न। इसे शरत पद्म कहते हैं।

झीलों में खिले कमल के नामों का यह विवाद मोहननगर और भागवतनगर के बीच तो बड़ा हो ही गया, इसे ले कर इन नगरों में अपनी सत्ता चला रहे संगठन के भीतर भी आंतरिक कलह का गंभीर कारण बन गया। अंतत: रक्तपात बढ़ता गया तो संस्कृत के विद्वानों और कमलपुष्पों के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक सर्वदलीय समिति बनाई गई, जिसने समस्त विवादों पर बिंदुवार निर्णय दिया। निर्णय इस प्रकार था : क. नीलकमल, इंदीवर, असितांबुज और नीलांबुज एक-दूसरे के पर्याय हैं। ख. रक्तकमल को कुमुद, स्वर्ण कमल और सुवर्ण कमल भी कहते हैं। ग. श्वेतकमल ही पुंडरीक, महापद्म और शरत पद्म है। अत: समस्त विवाद आधारहीन और नामसझी का परिणाम है।

कुआँ
लेकिन इस रिपोर्ट को हर पक्ष ने मानने से इनकार कर दिया और सभी अपने-अपने शब्दों पर दृढ़ रहे। हरेक ने घोषणा की कि उनका एक-एक शब्द उनके शब्दकोश का अखंड और अटूट भाग है तथा वे इसके लिए अपनी अस्मिता से समझौता नहीं कर सकते।

शैवों और शाक्तों में ऐसे विवाद और संघर्ष निरंतर बढ़ते ही जा रहे थे। दोनों ने अपनी-अपनी सरहदें तय कर ली थीं। सरहदों पर अपने गाँव के गरीब-किसान और मजदूरों के जवान लड़कों को लाठियाँ, भाले, बल्लम आदि दे कर लगा रखा था। आए दिन किसी न किसी की जान जाती थी। माँएँ कराह कर रह जातीं। बहनें आँसू बहातीं और चुप रह जातीं। उन्हें समझ ही नहीं आता था कि वे करें तो क्या करें। मोहननगर में भी यही हाल थे और भागवतनगर में भी।

दोनों ही गाँवों का प्रशासन कुछ खास लोगों के हाथ में था। गाँव में उनका अपना रुतबा था। गाँव की गली-गली तक उनके भेदिए और उनके लोग थे। गाँव का कोई नौजवान जब कभी सरहद पर मरता और उसका शव आता तो शासन करने वाले लोगों के गुर्गे घरों के पास पहुँचते और घोषणा करते कि इस गाँव की रक्षा के लिए प्राण देना ही जीवन है। गाँव की रक्षा के लिए मरण ही सार्थक है। इस गाँव की रक्षा ही इहलोक और परलोक है। इस गाँव के लिए जो भी जान देगा, उसके पुण्य जन्म-जन्मांतरों तक उसके साथ रहेंगे।

जिस किसी तरुण का रक्तरंजित शव उसके घर आता, ये लोग उसके सम्मान में रणभेरियाँ बजाते। उसकी विरुदावलियाँ गाते। ऐसी धुनें बजाते कि जिस परिवार का एक तरुण गया, उस परिवार के कई और बच्चे अपनी जान निछावर करने को तैयार हो जाते। ये लोग भक्त कम और भूत उतारने वाले मायावी भोपा ज्यादा थे।

दोनों तरफ यही हाल थे। संसार के सारे अनिष्ट, अनर्थ और छलकपट गाँव के ये प्रशासक करते और निर्धन भोले-भाले परिवारों के तरुणों की बलि लेते। एक समय ऐसा आया, जब इन दोनों ने वैष्णवों की भूमि पर अपना रक्तपात शुरू कर दिया।

वैष्णव संशयग्रस्त थे और आप जानते हैं कि गीता में कहा गया है कि संशयात्माविनश्यति। यानी जो संशयग्रस्त है, उसका विनाश सुनिश्चित है। तो वैष्णवों ने अपने आप को न स्वतंत्र गाँव घोषित किया, न वे मोहननगर में विलीन हुए और न ही भागवतनगर से उन्होंने कोई विलयपत्र हस्ताक्षरित किया।

कुछ समय बाद मोहननगर और भागवतनगर में अपूर्व जलसंकट पैदा हो गया। जल के लिए मीठा कुआँ गाँव में सिर्फ एक  ही था और वह रह गया था वैष्णवों के हिस्से में। वैष्णवों का यह कुआँ अब दोनों गाँवों की अस्मिता का प्रश्न बन गया था। यह वैष्णवों की समझ से परे था कि उनके अपने ही गाँव के दोनों ही भाईबंधु इस हृदयहीनता से उन्हें क्यों कुचल रहे हैं। आखिर उन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा है। लेकिन वैष्णवनगर अब एक नई युद्धभूमि बन चुका था। शैव इस कोशिश में थे कि वैष्णव भूमि उनके संप्रभु गाँव का हिस्सा हो और शाक्त इसे अपने गाँव में विलीन करने के लिए मरने-मिटने को सन्निद्ध थे।

दोनों गाँव वालों के यहाँ एक संस्कृति थी कि वहाँ जब भी कोई युवा रणांगन में शहीद होगा, तो उसकी स्मृति में एक दीप जलाया जाएगा। एक दिन ऐसा आया कि गाँव के चारों तरफ दीवार पर एक दीप धरने के लिए भी जगह नहीं बची, जहाँ अभी तो चार दीप और धरे जाने थे।

और एक दिन मोहननगर की एक ललना का जब चौथा बेटा, तीसरा भतीजा, दूसरा भाई और पहला पौत्र एक साथ सरहद पर भागवतनगर के आततायियों के हाथों मारे गए तो वह चीख पड़ी। अब तक ऐसी मौतों पर उसे भागवतनगर के सैनिकों के प्रति गुस्सा दिलाया जाता था, लेकिन आज उसके मस्तिष्क में कुछ और विचार कौंधा।

वह सीधे शासक के सिंहद्वार पर पहुँची और गरजी : अरे दुष्टो, तुम अपने बेटों को अपने शासन की वल्गा थमाने के लिए सुरक्षित महलों में रखते हो। विदेशों में पढ़ाते हो और हमारे बच्चों को संहार के लिए भेजते हो! अरे शैतानो, पहले अपनी संतानों को इस गाँव की रक्षा के लिए भेजो और फिर हमारे बच्चों को माँगो। यह आवाज एक हूक की तरह गूँजी और भागवतनगर में भी इसकी अनुगूँज सुनाई दी। वहाँ भी माँएँ ऐसे ही संदेश ले कर निकलीं और आवाजों की प्रतिध्वनियों ने एक नई संस्कृति रच दी।

दोनों ललनाओं ने दोनों गाँवों की खोखली प्रभुसत्ताओं के अहंकार के भीतर छुपे रक्तपात और हृदयहीनता का ऐसा वर्णन किया कि हर आँख से जैसे मेघ झर-झर कर बह रहे हों। आकाश खंडित हो गया हो और पूरी पृथिवी पर जलधारा फूट पड़ी हो।

गाँव की नई तरुणियाँ और तरुण खड़े हुए। उन्होंने दोनों गाँवों के युवाओं से मेल-मिलाप किया और वैष्णवों से वादा किया कि मोहननगर और भागवतनगर दोनों ही अब वैष्णवनगर की रक्षा करेंगे और उनके कुएँ का मीठा पानी सब मिल कर पिएँगे।

वैष्णवों के कुएँ पर अब एक इबारत सब की सहमति से लिखी गई : हर शासक शैतान होता है। वह आपके पुत्र की बलि माँगता है। उस बलि को वह राष्ट्रयज्ञ का नाम देता है और अपने पुत्र और परिजन के लिए वह सत्ता का केंद्रीय कक्ष आरक्षित रखता है! ऐसे शासकों से सावधान!

वैष्णवनगर की रक्षा अब मोहननगर और भागवतनगर मिल कर करते हैं और एक-दूसरे पर बंदूकें चलाने के बजाय सितार बजाते हैं। वे मिल कर अब दोनों नगरों की सीमा पर सुंदर पुष्पों की फुलवारियाँ खिलाते हैं और उन्होंने अपने समस्त सैनिक अड्‌डों को स्कूलों और अस्पतालों में बदल दिया है। अब वे दूसरे नगरों से संबंध तो रखते हैं, लेकिन हथियार नहीं, पुस्तकें, सितार, वायलिन, बाँसुरी और वीणा का आयात-निर्यात करते हैं। पहले जिस आकाश में विशाल तिमिर छाया रहता था, वहाँ अब शांति और सौहार्द का आलोक बरसता है। निस्तब्धता तो अब भी है, लेकिन सिर्फ शैतान शासकों के लोक में।
tribhuvan@gmail.com