आवरण पृष्ठ - अक्टूबर 2016

मोहे श्याम रंग देइ दे
त्वचा के रंग पर राजनीति

राजनीति अगर सत्ता संघर्ष को कहते हैं, तो त्वचा के रंग के साथ राजनीति तब से जारी है जब शासक वर्ग का सौंदर्य बोध पूरे समाज समाज द्वारा अपना लिया गया था। पहले आर्य, फिर अरब और मुगल, उसके बाद अँग्रेज। जिस देश के तीनों प्रमुख देवता राम, कृष्ण और शिव काले हैं और जहाँ के लोगों के मन पर साँवली द्रौपदी राज करती है, वहाँ गोरापन औद्योगिक अर्थशास्त्र का एक मिथक नहीं तो क्या है? सुघड़ कलाकार नंदिता दास पूछती हैं : क्या फेयर ही लवली है? त्वचा के रंग, सुंदरता की परिभाषा और स्त्री जीवन के लक्ष्य – सभी पहेलुओं को समेटती हुए आवरण कथा। पेश कर रही हैं सविता पाठक

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कश्मीर भारत का मस्तक है और भारत कश्मीर का दिल : अपनी बात : डॉ. सुभाष खंडेलवाल

डॉ. सुभाष खंडेलवाल
कश्मीर भारत का मस्तक है और भारत कश्मीर का दिल

कश्मीर की समस्या दिन प्रतिदिन गंभीर बनती जा रही है। भारत के 17 सैनिक पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमारी सीमा में घुस कर मार दिए। यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की विफलता है। मौजूदा केन्द्रीय सरकार अपने ही जाल में उलझ कर रह गई है। वह युद्ध का स्वाँग करती है और शांति की बात करती है। कभी शरीफ के समक्ष शपथ लेती है। आतंकवादियों द्वारा कश्मीर में हिंसा करने पर बयानों के बम बरसाती है, फिर वापस नवाज शरीफ के यहाँ चाय पर पहुँच जाती है। कश्मीर में पुन: हिंसा होती है, फिर बयानों के बम गिरने लगते हैं। यह सिलसिला लगातार जारी है। अंजाम समझ में नहीं आता।

हकीकत यह है कि दोनों  ही प्रधानमंत्री आतंकवाद के आगे बेबस हैं। फर्क इतना है कि भारत कभी भी आतंवाद को प्रश्रय नहीं देता और पाकिस्तान प्रश्रय देता है। उसकी अपनी धार्मिक कट्टरताएँ हैं, विवशताएँ हैं जिनके जाल में वह इस कदर उलझा है कि एक अंध-धार्मिक कठमुल्लावादी राष्ट्र की दिशा में चला गया है। हमारे देश के कुछ लोग अपनी तुलना उनसे, उनकी धर्मांधता से, उनकी कट्टरता से करते हैं। वे किसी के दुर्भाग्य को अपना सौभाग्य बनाना चाहते हैं। हम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में दुनिया में अपना परचम लहरा रहे हैं। याद रखें कि इस तरह की धार्मिक कट्टरताएँ आज कश्मीर को और कल देश को बाँटेंगी।

मैं सात वर्ष पूर्व कश्मीर गया था। वहाँ के जनजीवन को, उनके उद्योग- व्यापार को, उनकी संस्कृति को मैंने नजदीक से देखने-समझने का प्रयास किया था। तब समझ में आया था, हम कश्मीर को अपना मस्तक मानते हैं और कश्मीर भारत को अपना दिल मानता है। कश्मीर के कालीन से  ले कर शाल, किशमिश, केसर सब कुछ भारत पर निर्भर करता है। उनकी रोजी-रोटी पर्यटन है। पर्यटक उनके दिल की मुख्य आर्टरी है, इसलिए पर्यटक उनकी जिंदगी है। वह रुक गया तो वे खत्म हो जाएँगे। यही कश्मीर का मर्म है। उनके पेट की आग इन दंगों से बुझती नहीं, वरन बढ़ती है। शांति ही इसका एकमात्र हल है। दंगे और कत्ले-आम कुछ आतंकवादियों की फितरत है। वहाँ की जनता गुस्सा कर सकती है। लेकिन हिंसा उसकी हमेशा की फितरत नहीं हो सकती।

हम पाकिस्तान को 1965 और 1971 में हरा चुके हैं। हम तीसरी बार पुन: हरा सकते हैं। हमारा सैन्य बल मुस्तैद है, मजबूत है। लेकिन यह न भूलें कि अब युद्ध जमीन से ज्यादा आसमान पर होगा। दोनों ही देशों के पास अणु बम हैं। युद्ध से जो विनाश होगा उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। दुनिया के बड़े से बड़े युद्ध के बाद भी मरघट का सन्नाटा गूँजा है। महाभारत हो, अशोक का कलिंग हो, हिरोशिमा हो या नागासाकी हो, वियतनाम हो या अफगानिस्तान हो, चीन-भारत हो या भारत-पाकिस्तान हो, बाद में पश्चात्ताप ही हाथ लगा, शांति वार्ता करनी पड़ी। हमारे देश में पंजाब, असम में सन 1980-84 के बीच हिंसा का लावा बहाया गया था। 1989 से 1992 में, 2002 में सांप्रदायिकता का लहू बहाया गया था। जातीयता के नाम पर आरक्षण की आग ने समय-समय पर देश को जलाया है। लेकिन तमाम जटिलताओं, विषमताओं के बाद भी देश लौट कर मुख्‍यधारा में आता रहा है। आज सरकार में जो लोग हैं, वे कांग्रेस सरकार के समय भी बम बरसाने वाले बयान देते थे। वे आज क्या कर रहे हैं? यह प्रश्न इनसे पूछा जा रहा है, लेकिन जब काला धन चुनावी जुमला हो सकता है तो बीते हुए कल के बयानों को भी देशभक्ति का इनका जुमला माना जा सकता है।

अपनी पुलिस, अपने सैनिकों को, वह भी धोखे से शहीद होते देखना हर भारतवासी को बार-बार गुमराह कर रहा है। लोग चाहे जिस भाषा में युद्ध की बात कर रहे हों, यह लोगों का काम नहीं है। यह सिर्फ सेना का काम है। जनता से सरकार बनी है और सरकार को देश हित और विदेश नीति के अनुरूप निर्णय ले कर समस्या का समाधान करना चाहिए। आतंकवाद के नाम पर अपनी  ही जनता से लड़ना पड़े,  यह किसी भी देश का दुर्भाग्य होता है, देश तबाह होता है। चाहे वह समस्या कितनी ही बड़ी क्यों न हो। कश्‍मीर 84 लाख एकड़ था। आज हमारे पास 42 लाख एकड़ है। 42 लाख एकड़ पाकिस्तान और चीन के पास चला गया है। हम बचे हुए मूल को ले कर ही संकट में है। पुराना मूल कैसे लाएँगे? हमारी सरकार कहाँ पर विफल हो रही है? क्या उसका खुफिया तंत्र कमजोर है? क्या निर्णय लेने में अकर्मण्यता है? आतंकवादियों के ठिकानों पर, चाहे वे कश्‍मीर में हों या पाकिस्तान में, उनके ठिकानेदारों को ठिकाने क्यों नहीं लगा पा रहे हैं? प्रश्न सरल है, लेकिन उत्तर कठिन है, भविष्य के गर्भ में है।

हम एक चीज हमेशा याद रखें कि आजादी  के बाद से ही देश कश्‍मीर को और कश्मीर देश को अपने-अपने नजरिए से देखता रहा है। दोंनों ही एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन इनके बीच जब-जब जातीयता आ जाती है, कश्‍मीर सुलगता है।  पाकिस्तान में छुपी बैठी आतंकवादी ताकतें इसे और सुलगाती हैं। लेकिन इन नजरों में जब प्यार और विश्वास आता है,  खुशबू फैलती है, फूल मुसकराते हैं और कश्‍मीर खिल उठता है। हम यह न भूलें कि इसी जनता ने आतंकवादियों की चेतावनी के बावजूद 65 प्रतिशत से अधिक मतदान कर भारत के संविधान में भरोसा जता कर भाजपा की महबूब सरकार बनाई है।

कहे कबीर : डॉ. सुभाष खंडेलवाल

कहे कबीर

कहे कबीर जमाना खोटा, हगे गुदा और माँजे लौटा।’ नई पीढ़ी नहीं जानती, लेकिन पुरानी पीढ़ी जानती है कि पहले दिशा-पाखाना (लैट्रिन) जाने पर धोने के लिए पानी भरा लोटा साथ ले कर जाते थे। धोने के बाद हाथ कोहनी तक पीली मिट्टी से धोते थे और लोटे को न मालूम कितना रगड़-रगड़ कर माँजते, चमकाते थे। हमारी दशा और दिशा आज भी लौटा माँजने की है।

मित्रों के साथ चाय के ठीये पर बैठे थे। एक ब्राह्मण मित्र ने कहा, भैया,  कुत्ता कार के नीचे आ कर मर गया है। कुत्ता दोष लग गया है। पंडित जी से पूछा था। उन्होंने कहा है कि उज्जैन में चक्रतीर्थ पर जा कर प्रायश्चित हेतु दोष निवारण करना पड़ेगा। मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा कि ये पेट में जो बरसों से चिकन-मटन भर रहे हो, उसके दोष निवारण का क्या है? वे सोच में पड़ गए और बोले, आप कभी-कभी मच्छर आ जाए तो मार देते हैं, मैं नहीं मार सकता। पत्नी से कहता हूँ कि तू मार दे। एक और मित्र हैं, जैनी हैं। पर्युषण चल रहे हैं। दोस्तों की पार्टी में गए। खाने में वेज-नानवेज दोनों थे। कॉर्न बुलवाए। वे प्याज के थे। उन्होंने कहा कि पर्युषण में प्याज नहीं खाता। मुझे बगैर प्याज के बना कर ला दो। नॉनवेज की नॉन-स्टिक कड़ाही में उसी चम्मच से बन कर कॉर्न आ गए। उन्होंने आराम से खा भी लिए। एक मुस्लिम मित्र आए। उनका नॉनवेज खाने का होटल है। बोले, मंगलवार हो या नवरात्रि, बिक्री 20 प्रतिशत भी नहीं होती है। चौमासा है। घरवाली घर में प्याज-लहसुन लाने नहीं दे रही है। पति सब कुछ बाहर खा-पी कर आ रहे हैं। एक जैन हैं। वे चिकन खाते हैं, बगैर लहसुन-प्याज का।  पूछा तो बोले, पिताजी ने लहसुन-प्याज छुड़वा दिया था। हमारे देश में जाति, धर्म के आधार पर खानपान को ले कर लोगों के दिमाग में अलग-अलग तरह की मान्यताएँ हैं। उनके सद्प्रभाव गायब हैं और दुष्प्रभाव सामने हैं।
अखबार में खबर छपी है, प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर के पीछे गंदे नाले के पास प्रदूषित लड्डू जब्त किए। गणपति उत्सव मना रहे हैं। गणेश जी की मूर्ति बड़ी होती जा रही है और लड्डुओं में ही नहीं, जिन्दगी में भी मिलावट बढ़ती जा रही है। गाय के लिए धार्मिक उन्माद है और गाय की हालत सब से ज्यादा खराब है। गाय वाला ही उस पर हिंसा, उसका शोषण सब से पहले करता है। सजा न मालूम किनको-किनको  जाने-अनजाने में भुगतनी पड़ती है। कहावत है कि कुम्हार कुम्हारनी को कुछ कह नहीं पाता और बेचारी गधेड़नी के कान खींचता है। सभी धर्मों के जुलूस सड़कों पर निकलते हैं। जुलूस में गाड़ियों के साथ हाथी, घोड़े भी होते हैं। पहली सदी से ले कर इक्कीसवीं सदी तक का नजारा एक साथ देखने को मिलता है। जुलूस के मार्गों पर गोबर, पेशाब, फूल, पानी और रामरज कीचड़ बन कर गंदगी और प्रदूषण फैलाते हैं। इस बार पर्युषण पर इंदौर में श्वेताम्बर जैनियों ने भगवान की सवारी निकाली। 32 घोड़ों की जगह वे स्वयं रथ खींच रहे थे। दिगंबर जैनियों  ने अहिंसा रैली निकाली। दो वर्ष पूर्व इनके जुलूस में आधा घंटा फँस कर 38 वर्ष का एक नौजवान हार्ट अटैक आने पर अस्पताल नहीं पहुँच सका था और अस्पताल पहुँचते ही मर गया। इस बार पुन: घंटों ट्रैफिक जाम होता रहा। जनता परेशान होती रही। धर्म रास्ता दिखाने के लिए है, रास्ता रोकता रहा। धर्म का मर्म समझते तो यह देख पाते कि जुलूस कितनी अहिंसा करता है या हिंसा करता है।

केले कभी गोदाम में भट्टी बना कर गरम कर पकाए जाते थे। आज कार्बन के जहरीले पानी में तुरंत पकाए जाते हैं। इस तरह एक-एक चीज बताओ  तो पन्ने कम पड़ जाएँगे। बस इतना समझ  लीजिए कि खेतों में मिट्टी के अंदर तक कीटनाशक के नाम पर जहरीले रसायन घुस चुके हैं। आज हम कौन-सा खाद्य पदार्थ खाएँ जिससे स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके, इसी पर प्रश्नचिह्न हैं। सब्जी, फल, अनाज, दूध, तेल, घी, मक्खन, पनीर, मिठाई, नमकीन सब में गड़बड़ है। हवा जहरीली है। पानी प्रदूषित है। बरसात के बाद डॉक्टरों के यहाँ लम्बी कतारें हैं। हर घर में बीमार हैं। बुखार, मलेरिया, डेंगू, टायफायड, चिकनगुनिया, हैजा, टीबी तो क्या, किडनी, लीवर, हार्ट अटैक भी सामान्य बीमारी बन चुके हैं। कैंसर भी चारों ओर फैल रहा है। इन सब के लिए तकनीकी, दवा  विदेशों  से आ रही है। शराब और शराबी बढ़ते जा रहे हैं, गरीब शराबी की बीवी बच्चों के दूध-रोटी के लिए रो रही है और अमीर शराबी की बीवी अकेली सो रही है। शुगर पेशेंट शुगर खा रहे हैं, साथ में शुगर की गोली खा रहे हैं।

हम दोस्त लोग सपरिवार अमेरिका घूमने के लिए गए। हम 15 जोड़े थे, लेकिन हमारा खाना चार-पाँच तरह का था। पहला खाना बगैर लहसुन-प्याज का, दूसरा जैनी खाना जिसमें आलू आदि नहीं था। तीसरा एगेरियन मतलब अंडा होगा। चौथा नॉनवेज मतलब फिश, चिकन, मटन। पाँचवाँ विदेशी मतलब सभी तरह के नॉनवेज, केकड़े, साँप आदि। यूरोप-अमेरिका वाले एक ही शब्द जानते हैं, समझते हैं, नॉनवेज। उन्हें खाने के इतने प्रकार, इतने भेद नहीं मालूम हैं, लेकिन यह कड़वी हकीकत है कि उनका नॉनवेज शुद्ध है, और हमारा वेज अशुद्ध है। हमने सदियों से खाने में तो वेज-नॉनवेज, शुद्ध-अशुद्ध का भेद किया ही है, दलित-निचली जातियों के लोगों को  एक अदृश्य भारत बना कर, अपने से दूर रख कर इनके साथ जन्म से ले कर मरने तक भेदभाव भी किया है। उनका कुआँ-पानी ही नहीं, उनका मरघट भी अलग रखा है, जो आज भी गाँवों  की असलियत है, जिसे देख कर भी हम अनजान बनते हैं और कुतर्क करते हैं।  उसकी यह सजा मिली  है कि आज देश भर में गटर का मल-युक्त पानी पीने को मिलता है। कुएँ खत्म हो चुके हैं, नदियाँ नाला बन चुकी हैं। नल से पानी आता है। उसमें गटर या ड्रेनेज का मलयुक्त पानी मिला होता है। हम मैला उठाने वाले से नफरत करते रहे। आज मैला ही पानी में घुस कर हमसे प्यार कर रहा है।

नल से पानी आता है। उसमें गटर या ड्रेनेज का पानी मिला होता है। हम मैला उठाने वाले से नफरत करते रहे। आज मैला ही पानी में घुस कर हमसे प्यार कर रहा है।

युद्ध के लिए हाँ और नही के बीच : वितर्क : राजकिशोर

राजकिशोर
युद्ध के लिए हाँ और नही के बीच


"जिस तरह गंगा को गंगोत्री से ही साफ किया जा सकता है – बनारस से नहीं, उसी तरह कश्मीर को सुलझाने के लिए हमें 1948 तक लौटना पड़ सकता है। वरना कोई भी युद्ध मोदी को सुर्खरू बनाने का नुस्खा भर साबित होगा।"

जब लोग प्रधानमंत्री को उनके छप्पन इंच के सीने की याद दिलाते हैं या विदेश मंत्री को बतालाते हैं कि उन्होंने एक सिर के बदले कितने सिर लाने की बात कही थी, तो उनकी माँग यह नहीं होती है कि भारत तुरत पाकिस्तान के साथ युद्ध छेड़ दे। भारत की जनता इतनी जल्दबाज नहीं है, न ही वह युद्ध-पिपासु है। वह सिर्फ यह जानना चाहती है कि फिदायीन के माध्यम से भारत पर बार-बार हमला करने वाले पाकिस्तान पर हमारी सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती। देश के भीतर जब आदिवासी या दलित प्रदर्शन करते हैं या किसान-मजदूर अपने हकों के लिए लड़ते हैं, तब पुलिस को लाठी या गोली चलाने में देर नहीं लगती। श्रीनगर में जब कश्मीरी बूढ़े-जवान-बच्चे कोई प्रतिवाद जुलूस निकालते हैं, तब आशंका होती है कि सीआरपीएफ या फौज के छर्रे कभी भी छूट सकते हैं। लेकिन जब भारत के सैनिक ठिकाने या फौजी कैंप पर आतंकी हमला होता है, तब सरकार सबूत जमा करने लगती है कि इनके पीछे किसका हाथ हो सकता है।

यह सही है कि हमें पाकिस्तान जैसा युद्धक देश नहीं बनना है, पर ऐसा हिंदुस्तान भी नहीं बनना है जिसकी सीमाओं को लाँघ कर कोई भी चला आए और हमारे क्षेत्र में वारदात करके चला जाए। हमारी सेना ने उन चार आतंकवादियों को दस मिनट में ही ढेर कर दिया था जिन्होंने उड़ी के फौजी कैंप पर आक्रमण किया था। लेकिन क्या इतना प्रत्याक्रमण पर्याप्त है? चूँकि यह इस तरह की पहली घटना नहीं थी, इसलिए सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह  रोज-रोज ऐसी घटनाएँ नहीं होने देगी और कोई दीर्घकालीन हल निकालेगी। इतनी बड़ी सेना क्यों है? जो जो हथियार हम जमा कर रहे हैं और महँगे दामों पर खरीद रहे हैं, वे किस दिन के लिए हैं? या तो भारतीय फौज  को भंग कर दीजिए और मिसायल चलाने के बजाय वीणा बजाइए या धमाके के साथ बताइए कि पाकिस्तान जैसा पिद्दी देश हमें लगातार जोखिम में नहीं रख सकता।

कश्मीर निःसंदेह एक राजनीतिक समस्या है, लेकिन पाकिस्तान सैनिक समस्या है। भारत-पाकिस्तान का मामला इतना उलझा हुआ है और दोनों देशों के साथ इतने अंतरराष्ट्रीय पेच हैं कि हमें बाकी विश्व से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। विश्व शक्तियों की दिलचस्पी भारत-पाकिस्तान विवाद सुलझाने या पाकिस्तान के बरअक्स भारत को न्याय दिलाने में न है और न कभी होगी। वे दोनों हाथ लड्डू चाहते हैं। लेकिन यह मानने का कोई आधार नहीं  है कि अमेरिका या यूरोपीय संघ के कहने पर पाकिस्तान अपने आतंकवादी दस्तूरों का त्याग कर देगा। पाकिस्तान का जन्म ही अविभाजित भारत में आतंकवाद से हुआ था। तब डाइरेक्ट एक्शन था, अब इनडाइरेक्ट एक्शन है। आतंकवाद का स्वभाव जोंक की तरह होता है। आतंकवाद की गिरफ्त में पाकिस्तानी खून भी बह रहा है। लेकिन पाकिस्तान के लिए आतंकवाद का समर्थन उसके राजस्व का भी एक बड़ा स्रोत है - उन देशों से जो धर्म के आधार पर उसके साथ हैं और उन देशों से भी, जो आतंकवाद के खिलाफ एक नकली विश्व युद्ध छेड़े हुए हैं। अभी तक हम एक ऐसी दुनिया नहीं बना पाए हैं, जिसमें आतंकवाद सार्विक घृणा का विषय हो।

युद्ध का निर्णय एक कठिन निर्णय है। भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के पास परमाणु बम नहीं होता, तब भी। पाकिस्तानी भले हमें भाई-बहन न समझते हों, पर हम उन्हें अपना भाई-बहन मानते हैं। दोनों देशों में मुसलमानों की बड़ी आबादी है और भारत-पाकिस्तान तनाव बढ़ता है, तो हमारे देश में सांप्रदायिक स्थिति भी बिगड़ती है। लेकिन अस्सी के दशक से कश्मीर में जो अभूतपूर्व स्थिति बनी हुई है और आतंकवादी घटनाओं का जो सिलसिला जारी है, उसका भी एक जबरदस्त तनाव है, जिसे भारत के लोग झेल रहे हैं और अब ज्यादा दिनों तक नहीं झेल सकते। जिन्हें बातचीत की प्रक्रिया में असीम आस्था है, उनसे मेरी बिनती है कि वे किसी गुर्राते हुए भेड़िए से बातचीत शुरू करके दिखा दें। समस्याएँ बातचीत से ही सुलझती हैं, पर बातचीत की भी एक सीमा होती है। अगर हमारे पास नाखून और दाँत नहीं हैं, तो बातचीत का रास्ता क्रमिक आत्महत्या का पर्याय हो जाता है। हमारी समस्या यह है कि हमें जो सख्ती पाकिस्तान के साथ बरतनी चाहिए, वह हम कश्मीरियों के साथ दिखाते हैं।

पाकिस्तान को शांत करना हमारा राष्ट्र धर्म है – वह चाहे जैसे हो। लेकिन कश्मीर को शांत किए बिना हम इस दिशा में कुछ भी नहीं कर सकते। पाकिस्तान कश्मीर  में तभी तक सफल हो सकता है जब तक कश्मीर अशांत है। अगर कोई इस गलतफहमी में है कि कश्मीर की अशांति पाकिस्तान की वजह से है, तो न केवल उसकी आँखें बंद हैं, बल्कि कान भी सुन्न हैं। जिस दिन कश्मीर को हम अपना बनाने में सफल हो जाएँगे, उस दिन पाकिस्तान उलटे पाँव भाग चलेगा। उसे कश्मीर में खरीददार नहीं मिलेंगे।

दुर्भाग्य से, केंद्र में एक ऐसे दल का बहुमत है जो शुरू से ही भारत और कश्मीर को जोड़ने वाली धारा 370 को खत्म करने की माँग करता आया है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यह दल कश्मीर सरकार में भी साझीदार है। उसे कैसे समझाया जा सकता है कि भारत और कश्मीर को जोड़ने वाला एक और औजार वह विलय पत्र है जिसके आधार पर  कश्मीर भारत का अंग बना था, लेकिन अन्य रियासतों की तरह नहीं, बल्कि विशेष प्रावधानों के साथ। उस विलय पत्र का एक प्रावधान यह था कि स्थिति सामान्य होने पर उस संधि पर कश्मीर के लोगों की रायशुमारी की जाएगी। ये गड़े मुरदे नहीं हैं। जिस तरह गंगा को गंगोत्री से ही साफ किया जा सकता है – बनारस से नहीं, उसी तरह कश्मीर को सुलझाने के लिए हमें 1948 तक लौटना पड़ सकता है। वरना कोई भी युद्ध मोदी को सुर्खरू बनाने का नुस्खा भर साबित होगा।
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कौन चाहता है युद्ध : अभिमत : अनिल जैन

अनिल जैन
कौन चाहता है युद्ध

"आखिर भारत खुद ही पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित कर उसके साथ अपने राजनयिक और व्यापारिक रिश्तों को खत्म भले ही न करे, पर स्थगित तो कर ही सकता है। हमने उसे 'मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का जो दर्जा दे रखा है, उस दर्जे को और उसके साथ सिंधु नदी के पानी के बँटवारे की संधि को क्यों खत्म नहीं किया जाता? "

जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में भारतीय सेना के ठिकाने पर हुए भीषण आतंकवादी हमले से पूरा देश क्षुब्ध और उद्वेलित है। इस हमले में हमारे अठारह जवान मारे गए और इतने ही बुरी तरह जख्मी हुए हैं। शुरुआती जाँच में स्पष्ट हो गया है कि हमले में जैश-ए-मुहम्मद नामक कुख्यात आतंकवादी संगठन का हाथ है, जिसे पाकिस्तानी सेना और वहाँ की खुफिया एजेंसी आईएसआई से खाद-पानी मिलता है। जाहिर है कि कश्मीर घाटी में पिछले कुछ समय से जारी तनाव का पाकिस्तान ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहता है। एक तरफ वह संयुक्त राष्ट्र के मंच से कश्मीर मसले को उठा रहा है और खुले आम कह रहा हे कि कश्मीर मसले का हल हुए बगैर भारत-पाकिस्तान के बीच शांति और सामान्य रिश्तों की बहाली नहीं हो सकती, वहीं दूसरी ओर कश्मीर घाटी में आतंकवादियों की घुसपैठ करा कर तथा नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की उकसाने वाली कार्रवाई कर भारत पर दबाव बनाना चाहता है। उसकी इन हरकतों और इरादों से भारतीय जन-मन का दुखी और आक्रोशित होना स्वाभाविक है, लेकिन सरकार में जिम्मेदार पदों पर बैठे कुछ लोगों, सत्तारूढ़ दल के नेताओं और समर्थकों, निहित स्वार्थों से प्रेरित कुछ रिटायर सैन्य अफसरों और पूर्व नौकरशाहों तथा मीडिया के एक बड़े हिस्से की ओर से इस जनाक्रोश को युद्धोन्माद में बदलने की जो कोशिशें की जा रही हैं, वे मुद्दे से भटकाने वाली तो हैं ही, साथ ही हमारे देश के आर्थिक-सामाजिक तानेबाने के लिए भी कम नुकसानदेह नहीं हैं।

दोनों मुल्कों के बीच विवाद के मूल में कश्मीर का मसला है, जिसके बारे में देश-दुनिया की आम समझ है कि यह एक राजनीतिक मसला है और इसका समाधान राजनीतिक पहल से ही निकलेगा। हमारी जो सेना अभी तक कश्मीर को भारत से जोड़े रखने में अपनी भूमिका निभाती आ रही है, उसके आला अफसर भी अब यह स्पष्ट तौर पर मानने और कहने लगे हैं कि यह एक राजनीतिक मसला है। श्रीनगर स्थित सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट- जनरल डी एस हुड्डा ने भी पिछले दिनों कहा है कि कश्मीर का मसला कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक मसला है और इसका समाधान राजनीतिक पहलकदमी से ही होना है। एक अनुभवी और आला सैन्य अधिकारी की इस राय को न तो हमारा सत्तारूढ़ रूढ़ राजनीतिक नेतृत्व तवज्जो दे रहा है और न ही युद्ध-पिपासु मीडिया।

उड़ी के आतंकवादी हमले में हमारे जो जवान मारे गए हैं, वे कमोबेश सभी किसान-मजदूर-शिक्षक या ऐसे ही किसी अन्य गरीब या निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की उम्मीदों का सहारा रहे होंगे। उनके असमय, दर्दनाक तरीके से मारे जाने पर उनके परिवारजनों का दुख और गुस्सा जायज है और उसमें पूरे देश को शामिल होना ही चाहिए। लेकिन कारपोरेट घरानों से नियंत्रित हमारे टीआरपी-पिपासु टीवी चैनल उनके क्षोभ और शोक का निर्लज्जता के साथ  व्यापार कर रहे हैं। जिस दिन उड़ी में हमला हुआ, उस दिन से ले कर आज तक दिल्ली और मुंबई स्थित टीवी के समाचार चैनलों पर शाम की तीतर-बटेर छाप बहसों में शामिल रक्षा तथा विदेश मंत्रालय, सेना एवं खुफिया सेवाओं के पूर्व अफसर देश में युद्धोन्माद पैदा कर रहे हैं। टीवी चैनलों के मूर्ख एंकर भी वीर बालकों की मुद्रा में उनके सुर में सुर मिला रहे हैं।

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। दरअसल, ये 'रक्षा विशेषज्ञ’ किसी भी आतंकवादी हमले के बाद टीवी चैनलों के वातानुकूलित स्टूडियो में बैठ कर पाकिस्तान को युद्ध के जरिए सबक सिखाने का सुझाव देते हैं और साथ ही यह रुदन भी कर डालते हैं कि भारतीय सेना के पास संसाधनों का अभाव है। अपनी ऐसी बातों से यह लोग आम लोगों पर यही प्रभाव छोड़ने की कोशिश करते हैं कि वे बहुत बहादुर और देशभक्त हैं। लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। दरअसल, यह उच्च तकनीक वाले हथियारों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुडा मामला है। भारत दुनिया भर में हथियारों का सब से बड़ा खरीदार है, लिहाजा हथियार बनाने वाली कई विदेशी कंपनियों के हित भारत से जुड़े हैं। भारतीय सेना, सुरक्षा एजेंसियों, विदेश सेवा और रक्षा महकमे के कई पूर्व अफसर इन कंपनियों के परोक्ष मददगार होते हैं। यह कंपनियाँ ऐसे लोगों को उनके रिटायरमेंट के बाद अनौपचारिक तौर पर अपना सलाहकार नियुक्त कर लेती हैं। यह लोग इन कंपनियों के हथियारों की बिक्री के लिए तरह-तरह से माहौल बनाने का काम करते हैं। देश में युद्धोन्माद पैदा करना और सेना में संसाधनों का अभाव बताना भी इनके इसी उपक्रम का हिस्सा होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन लोगों को इस काम के लिए हथियार कंपनियों से अच्छा-खासा 'पारिश्रमिक’ मिलता है। तो देशभक्ति के नाम यह इनका अपना व्यापार है जो इन दिनों जोरों से चल रहा है।

युद्ध का माहौल बनाने के सिलसिले में कुछ टीवी चैनलों ने यह भी बता दिया है कि दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध होने की स्थिति में पाकिस्तान का नुकसान ज्यादा होगा, वह तबाह हो जाएगा, दक्षिण एशिया का भूगोल बदल जाएगा आदि-आदि। कुछ चैनल सुझा रहे हैं कि भारत युद्ध न भी करे तो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में घुस कर आतंकवादियों के शिविर नष्ट कर दे। ऐसा सुझाव देने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका भी आतंकवाद के सफाए का इरादा जताते हुए ही अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में घुसा था, लेकिन हुआ क्या? वह आतंकवाद का सफाया तो नहीं कर पाया, बल्कि उलटे खुद ही वहाँ ऐसी  बुरी तरह फँस गया है कि उससे निकलते नहीं बन रहा है। खुद को सीमित युद्ध में ही झोंकने से उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, सो अलग। जब अमेरिका की यह हालत है तो भारत क्या खा कर पाकिस्तान में आतंकवादियों के शिविरों पर हमला करके उनका सफाया कर आएगा? क्या पाकिस्तानी के कब्जे वाले कश्मीर में शिविर चलाने वाले आतंकवादियों ने अपना पता-ठिकाना सब को बता रखा है या अपने शिविरों के बाहर साइनबोर्ड या बैनर लगा रखे हैं? इस तरह के मूर्खतापूर्ण सुझाव देने वाले चैनलों की टीआरपी में कितना इजाफा हो रहा है, यह तो पता नहीं, लेकिन इससे यह जरूर पता चल रहा है कि देश के बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में कैसे-कैसे वज्र मूर्ख भरे हुए हैं।

भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान का यह मुगालता पुराना हे कि अमेरिका भारत का दोस्त है। इससे भी बड़ा मुगालता मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा उनके व्यक्तिगत दोस्त हैं। इसी मुगालते के चलते हमारी सरकार ने अमेरिका को अपना सामरिक साझेदार बनाते हुए उसकी सेना को अपने वायु सेना और नौ सेना अड्डों के उपयोग की अनुमति दे दी है। हमारे कारपोरेट घरानों, कारपोरेट पोषित मीडिया और देश के उच्च-मध्यम वर्ग के मन में भी अमेरिका के प्रति अगाध श्रद्धा है। ऐसे सभी लोगों के लिए क्या यह सूचना महत्वपूर्ण नहीं है कि अमेरिकी ने उड़ी पर हुए आतंकवादी हमले की निंदा तो की है, लेकिन इस हमले के संदर्भ में उसने अपने बयान में किसी भी रूप में पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया है। जाहिर है कि वह इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार नहीं मान रहा है और बड़ी चालाकी से पाकिस्तान की करतूतों पर परदा डाल रहा है। इसकी वजह यह है कि हथियार खरीदी के मामले में पाकिस्तान भी अमेरिका का कोई छोटा ग्राहक नहीं है। इसके अलावा अमेरिका ने अल कायदा से निपटने के नाम पर पाकिस्तान में अपना सैन्य अड्डा भी कायम कर रखा है और पाकिस्तानी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल भी वह करता रहता है। जहाँ तक चीन का सवाल है, उसके तो और भी ज्यादा हित पाकिस्तान के साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में कौन किसके साथ रहेगा!

यह सच है कि पाकिस्तान लगातार भारत को उकसाने वाली हरकतें कर रहा है। सीमा पर उसकी सैन्य हलचलों में तेजी आ गई है। जाहिर है कि वह भारत को युद्ध के लिए आमंत्रण दे रहा है। वह चाहता है कि युद्ध हो। इस समय उसकी आर्थिक हालत बेहद खस्ता हो रही है। उसे भरोसा है कि भारत के हमला करने की स्थिति में चीन और सऊदी अरब जैसे देश उस पर पैसों की बौछार कर देंगे। उसका भरोसा निराधार भी नहीं है। ये देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका और कुछ यूरोपीय देश भी पाकिस्तान को उसके हर संकट के समय आर्थिक मदद करते रहे हैं। एक तरह से इन देशों की मदद से ही पाकिस्तान का पालन-पोषण हो रहा है।

कुल मिला कर युद्ध हमारे लिए बुरी तरह घाटे का सौदा साबित होगा। पाकिस्तान भले ही हमारी तरह परमाणु शक्ति संपन्न है, लेकिन वह निहायत ही उद्दण्ड और गैरजिम्मेदार मुल्क भी है। आर्थिक तौर पर तो वह बर्बाद है ही। उसके पास अपने बेगुनाह अवाम के अलावा खोने को भी कुछ खास नहीं है। इसलिए उसके साथ युद्ध की स्थिति में जो भी कुछ बिगड़ना है वह भारत का ही बिगड़ना है। बड़ी-बड़ी मूँछों वाले हमारे तथाकथित रक्षा विशेषज्ञ चाहे जो भी डींग हाँकें, हमारी सेनाओं के शीर्ष अधिकारियों ने उड़ी पर हमले वाले दिन शाम को ही सरकार को आगाह कर दिया था कि कोई भी फैसला जल्दबाजी में न लिया जाए। समझा जा सकता है कि हमारा सैन्य नेतृत्व भी फिलहाल युद्ध के लिए व्यावहारिक तौर पर तैयार नहीं है।

जहाँ तक हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात है, वह प्रधानमंत्री बनने से पहले भले ही अपने 56 इंची सीने की दुहाई देते हुए पाकिस्तान को उसी की भाषा में सबक सिखाने की बात करते रहे हों, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी की खिल्ली उड़ाते रहे हों, लेकिन आज प्रधानमंत्री होने के नाते वह भी नहीं चाहते होंगे कि युद्ध हो। अगर वह पहले की तरह पाकिस्तान को सुर्ख आँखों से देखते होते तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को नहीं बुलाते। वह नवाज शरीफ के साथ शॉल और साड़ी वाली डिप्लोमेसी भी नहीं चलाते और अफगानिस्तान से लौटते वक्त अचानक पाकिस्तान जा कर शरीफ को जन्मदिन की मुबारकबाद भी नहीं देते। जाहिर है कि प्रधानमंत्री के रूप में वह भी युद्ध के दुष्परिणामों से बेखबर नहीं हैं। यही वजह है कि मीडिया और सेना के तमाम पूर्व अधिकारियों द्वारा युद्ध का माहौल बनाए जाने के बावजूद उड़ी हमले पर उनकी सरकार की ओर से बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया आई, जिसमें कहा गया कि भारत इस हमले का माकूल समय और स्थान पर माकूल जवाब देगा।

"हर आतंकवादी हमले के बाद इस मोर्चे पर हमारी कमजोरियाँ उजागर होती हैं और सरकार की ओर से इन कमजोरियों को दुरुस्त करने की बात भी होती है, लेकिन होता कुछ नहीं है। उड़ी पर हुए हमले में भी यह कमजोरी साफ तौर पर उभर कर सामने आई है ।"

सवाल उठाता है कि जब हर तरह से युद्ध हमारे लिए हानिकारक है तो फिर इसका विकल्प क्या है? पाकिस्तान की हरकतों और आतंकवाद से हम कैसे निपटें? सवाल महत्वपूर्ण है और इसका जवाब यह है कि हम पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका समेत दुनिया के दूसरे देशों से गुहार जरूर करें, लेकिन ऐसा करने के पहले हमें इस दिशा में खुद ही पहल करनी चाहिए। आखिर भारत खुद ही पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित कर उसके साथ अपने राजनयिक और व्यापारिक रिश्तों को खत्म भले ही न करे, पर स्थगित तो कर ही सकता है। हमने उसे 'मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का जो दर्जा दे रखा है, उस दर्जे को और उसके साथ सिंधु नदी के पानी के बँटवारे की संधि को क्यों खत्म नहीं किया जाता? आखिर यह सब करने से हमें कौन रोक सकता है? अगर भारत ऐसे कदम उठाता है, तो पाकिस्तान पर निश्चित रूप से कारगर दबाव बनेगा। अलबत्ता इन कदमों से अडानी, अंबानी और जिंदल जैसे हमारे यहाँ के कुछ उद्योग समूहों के हित जरूर प्रभावित हो सकते हैं जिनके कारोबारी रिश्ते गहरे तौर पर पाकिस्तान और वहाँ के सत्ता प्रतिष्ठान से ताल्लुक रखने वाले लोगों के साथ जुड़े हैं।

पाकिस्तान के खिलाफ अपने स्तर पर की जा सकने वाली इस तरह की राजनयिक और आर्थिक नाकेबंदी के साथ ही हमें अपनी सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को भी चाक-चौबंद करने के उपाय करने चाहिए। हर आतंकवादी हमले के बाद इस मोर्चे पर हमारी कमजोरियाँ उजागर होती हैं और सरकार की ओर से इन कमजोरियों को दुरुस्त करने की बात भी होती है, लेकिन होता कुछ नहीं है। उड़ी पर हुए हमले में भी यह कमजोरी साफ तौर पर उभर कर सामने आई है और इससे पहले पठानकोट एयरबेस पर हुआ आतंकवादी हमला भी हमारी इन्हीं कमजोरियों का परिणाम था। इन कमजोरियों को दूर किए बगैर इस मसले का कोई दीर्घकालिक हल नहीं निकल सकता।
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भारत ने कश्मीर का विश्वास खो दिया है : विश्लेषण : शरद यादव

शरद यादव
भारत ने कश्मीर का विश्वास खो दिया है

"केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि बंदूकों का जवाब बंदूकें नहीं हो सकतीं। अगर हो सकतीं तो अमेरिका की बंदूकों ने अफगानिस्तान, इराक, सीरिया समेत पूरी दुनिया को अब तक शांत कर लिया होता।"

कश्मीर पर बल द्वारा नहीं, केवल पुण्य द्वारा ही विजय पाई जा सकती है। यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं, न कि शस्त्रधारियों से।’ - बारहवीं शताब्दी के मध्य में प्रसिध्द कश्मीरी कवि और इतिहासकार कल्हण द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ 'राजतरंगिणी’ में कही गई यह बात आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत की आजादी और भारत संघ में कश्मीर के विलय के बाद से ही कश्मीर लगातार बल और छल का शिकार होता रहा है - कभी कम तो कभी ज्यादा। यही वजह है कि कश्मीरी अवाम भी हमेशा दिल्ली के शासकों को और यहाँ तक कि शेष भारत को भी शक की नजर से देखता रहा है, भले ही हम मौके-बेमौके यह दुहराते रहें कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। आज तो कश्मीरी अवाम इतना क्षुब्ध और बेचैन है कि वह भारत के साथ रहना ही नहीं चाहता।

कश्मीर को ताकत के जरिए वश में करने का प्रलाप करने वाले लोग हमारे देश में कम नहीं हैं। संघ परिवार से जुड़े लोगों के अलावा कुछ अन्य तबकों में भी इस तरह के लोग बड़ी संख्या में मिल जाएँगे। लेकिन यह सिवाय पागलपन के कुछ नहीं है। किसी भी राज्य या राज्य के भाग को बल प्रयोग से काबू में नहीं रखा जा सकता। अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों का वियतनाम और अफगानिस्तान में क्या हश्र हुआ, उसे याद रख कर उससे सीख लेनी चाहिए। किसी को अपना बनाने के दो ही रास्ते दुनिया में अपनाए गए हैं - या तो हिंसा का या प्रेम का रास्ता। हिंसा का रास्ता कभी सफल नहीं हुआ है। अत: प्रेम का रास्ता ही एकमात्र विकल्प है।

इस बात में कोई शक नहीं कि कश्मीर का मसला अपनी विकृति की चरम अवस्था में पहुँच गया है। श्रीनगर और नई दिल्ली की सरकारों और केंद्र में शासक दल के नेताओं के तेवरों को देखते हुए इस स्थिति का कोई तुरत-फुरत हल दिखाई नहीं देता। अलबत्ता केंद्र सरकार ने विपक्षी दलों के लगातार दबाव के चलते वहाँ सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की समझदारी जरूर दिखाई। लेकिन सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान भी सरकारी पक्ष अपनी इस जिद पर कायम रहा कि अलगाववादी नेताओं से कोई बात नहीं की जाएगी। मेरा मानना है कि सरकार का यह रुख उचित और विवेकसम्मत नहीं है। आखिर जिन लोगों से मतभेद है उनसे बात करे बगैर हम मसले का कोई सर्वमान्य हल कैसे निकाल सकते हैं? इससे पहले भी केंद्र में चाहे जिस दल या गठबंधन की सरकार रही हो, सभी ने हुर्रियत कांफ्रेंस के विभिन्न धड़ों से बातचीत की है - भले ही वह बातचीत बेनतीजा रही हो। श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने तो हुर्रियत के नेताओं से ही नहीं, बल्कि हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे उग्रवादी संगठन को भी संघर्ष विराम के लिए राजी कर उसके साथ बातचीत की थी और उस बातचीत में सरकार का प्रतिनिधित्व तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। कश्मीर ही क्यों, हमने मिजोरम में ललडेंगा, नगालैंड में इसहाक-मुइवा गुट और असम में बोडो उग्रवादियों से भी तो आखिर बातचीत के माध्यम से ही मसलों का हल निकाला और उन्हें हथियार त्यागने पर राजी किया।

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर गए सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल हम लोगों यानी जनता दल (यूनाइटेड) और वामपंथी दलों के प्रतिधिनियों ने सरकारी रुख को नजरअंदाज कर हुर्रियत के विभिन्न धड़ों के नेताओं से मुलाकात कर बातचीत करने का प्रयास किया। अधिकांश प्रचार माध्यमों ने हमारे इस प्रयास के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार करते हुए यह प्रचारित किया कि हुर्रियत के किसी भी नेता ने विपक्षी नेताओं से मिलने में दिलचस्पी नहीं दिखाई और एक तरह से उन्हें अपमानित किया। यह सरासर आधारहीन प्रचार किसी खास उद्देश्य से प्रेरित लगता है। हकीकत यह है कि पाँच में चार हुर्रियत नेता अब्दुल गनी बट्ट, यासिन मलिक, मौलवी उमर फारूक और शब्बीर शाह हम लोगों से न सिर्फ गर्मजोशी से मिले, बल्कि उन्होंने बातचीत के लिए भी सहमति जताई। अलबत्ता उन्होंने यह जरूर कहा कि चूँकि सरकार ने उन्हें बातचीत करने का निमंत्रण न दे कर उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की है, इसलिए वे यहाँ श्रीनगर में नहीं बल्कि दिल्ली आ कर बातचीत करना चाहेंगे। यह बात गौरतलब है कि इन चारों नेताओं में एक भी ऐसा नहीं है जो चाहता हो कि कश्मीर भारत से अलग हो कर पाकिस्तान में शामिल हो जाए। इनमें कोई कश्मीर के लिए ज्यादा स्वायत्तता चाहता है तो कोई कश्मीर की 'आजादी’ चाहता है। हुर्रियत नेताओं में सिर्फ पाकिस्तान समर्थक माने जाने वाले सैयद अली शाह गिलानी ही एकमात्र ऐसे रहे जो हमसे नहीं मिले। हालाँकि पहले तो उन्होंने भी हमसे मिलने के लिए सहमति जताई थी और माकपा नेता सीताराम येचुरी से बात कर मुलाकात का वक्त भी मुकर्रर किया था, लेकिन ऐन वक्त पर शायद पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के दबाव के चलते वे मिलने से मुकर गए।

गिलानी : बातचीत का निमंत्रण नहीं
सरकारी और गैरसरकारी प्रचार माध्यम सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर दौरे को असफल और फिजूल की कवायद करार देने में जुटे हुए थे और सरकारी पक्ष के कुछ जिम्मेदार लोग भी परोक्ष रूप से इस प्रचार को हवा दे रहे थे। लेकिन मेरा मानना है कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे से कश्मीरी अवाम में एक सकारात्मक संदेश गया है। हुर्रियत के चार प्रमुख नेताओं से मुलाकात के माध्यम से हम विपक्षी नेता कश्मीर अवाम को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि देश का बहुमत न सिर्फ कश्मीर को बल्कि कश्मीरी तहजीब को और कश्मीर घाटी के बाशिंदों को भी अपना अभिन्न अंग मानता है और उनके साथ संवाद करना चाहता है।

कोई कुछ भी कहे, यह बात निश्चित है कि कश्मीर की समस्या मूल रूप से हिंदू-मुस्लिम समस्या नहीं है। सांप्रदायिक तत्वों ने अपने निहित  स्वार्थों के लिए इसे हिंदू-मुस्लिम समस्या का रंग दे रखा है। कश्मीरी पंडितों का विस्थापन घाटी से तब हुआ जब इस समस्या को पूरी तरह सांप्रदायिक रंग दिया जा चुका था। स्वाधीनता प्राप्ति और भारत में कश्मीर के विलय के बाद चार दशक से अधिक समय तक कश्मीर घाटी में सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा। कश्मीरी पंडित भी कश्मीरी मुसलमान के साथ सुर में सुर मिला कर सूबे की स्वायत्तता और सुशासन के लिए नेशनल कांफ्रेंस के मंच से आवाज उठाते रहे। गैरसांप्रदायिक राजनीति की धारा वहाँ इतनी मजबूत रही कि वहाँ किसी भी किस्म के सांप्रदायिक संगठन को पैर जमाने की जगह नहीं मिली। अत: जरूरी है कि इस समस्या को हिंदू-मुस्लिम समस्या से अलग कर सूबे की राजनीतिक समस्या के रूप में देखा जाए।

जहाँ तक कश्मीर के मौजूदा हालात के कारणों की बात है, मेरा साफ तौर पर मानना है कि कश्मीर के लोगों को सूबे में साझा सरकार चला रही पीडीपी और भाजपा पर कतई भरोसा नहीं है। अलबत्ता मुफ्ती मोहम्मद सईद जरूर कुछ सकारात्मक प्रयास करना चाहते थे। उनके मुख्यमंत्री बनने और उनकी सरकार में भाजपा की साझेदारी से कई राजनीतिक समीक्षकों और केंद्र में सत्ताधारी दल के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि उनके नेतृत्व में यह गठजोड़ सूबे में बडी कामयाबी हासिल करेगा। यह मिथक भी गढ़ा गया कि जम्मू में असर रखने वाली भाजपा और कश्मीर घाटी में मजबूत जनाधार वाली पीडीपी की साझा सरकार बनने से कश्मीर में शांति बहाली और सांप्रदायिक सौहार्द कायम होगा, हालाँकि सत्ता की इस साझेदारी को आम कश्मीरी अवाम ने पसंद नहीं किया था। एक तरह से इस गठजोड़ का बनना और सत्ता सँभालना कश्मीरी अवाम के कटे पर नमक छिड़कने जैसा था।

यह सही है कि मुफ्ती ‘हीलिंग टच’ में यकीन रखते थे यानी आहत कश्मीरियों के जख्मों पर मरहम लगाना और राजनीतिक बंदियों को रिहा करना चाहते थे। वे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के रास्ते दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियाँ शुरू करने का इरादा रखते थे। कश्मीर मसले को हल करने के लिए वे सभी संबंधित पक्षों यहाँ तक कि पाकिस्तान से भी बात करने के पक्षधर थे। उनकी कोशिश थी कि सुरक्षा बल आम लोगों के साथ सह्रदयता से पेश आएँ और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) का दायरा सीमित हो। यह सारी बातें भाजपा और पीडीपी के न्यूनतम साझा कार्यक्रम कॉमन एजेंडा में भी शामिल थीं और आज भी हैं, लेकिन इनमें से किसी भी मुद्दे पर वे कोई पहल नहीं कर सके। इसकी मुख्य वजह यही रही कि उनकी पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन पूरी तरह बेमेल था। यही वजह रही कि नीतिगत मसलों पर उन्हें अपने हाथ ही नहीं बाँधे रखना पड़ा, बल्कि मुँह भी बंद रखना पड़ा। वे महज दस महीने सत्ता में रहे, लेकिन उनका यह कार्यकाल एक तरह से बिल्कुल निस्तेज रहा। दुखद परिस्थिति में मुख्यमंत्री रहते ही उनका निधन हो गया। मुफ्ती साहब की मौत के बाद लंबे समय तक दुविधा में रहने के बाद उनकी बेटी महबूबा साझा सरकार की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन वे भी मुख्यमंत्री के तौर बेअसर ही रहीं। उन्होंने भी पीडीपी-भाजपा के साझा एजेंडा पर आगे बढ़ने की इच्छा नहीं दिखाई। कश्मीरी अवाम को तो पहले से ही इस सरकार पर एतबार नहीं था, लिहाजा उसका असंतोष लगातार बढता गया।

महबूबा : घटती हुई साख
यह मानने वालों की कमी नहीं है कि कश्मीर के मौजूदा संकट के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। पिछले दिनों संसद में हुई बहस के दौरान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने और स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने भी कहा कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसके लिए पाकिस्तान जिम्मेदार है। केंद्र में सत्ताधारी दल और उसके सहोदर संगठनों की ओर से कहा जा रहा है कि पाकिस्तान को सबक सिखाए बगैर कश्मीर का मसला हल नहीं होगा। सबक से उनका आशय युद्ध से है। ऐसी बातें करने वाले यह भूल जाते हैं कि भारत की तरह पाकिस्तान भी परमाणु शक्ति-संपन्न देश है। इसलिए हवा में चाहे जितनी तलवारें भाँज ली जाएँ, दोनों मुल्कों के बीच औपचारिक युद्ध अब असंभव है। दोनों मुल्कों के हुक्मरान अगर इसके लिए तैयार भी हो जाएँ तो अमेरिका और चीन उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे। दोनों के अपने-अपने हित पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं। इसलिए वे दोनों देशों को न तो युद्ध की इजाजत देंगे और न ही कश्मीर मसले पर भारत के पक्ष में पलड़ा झुकने देंगे।

दरअसल, कश्मीर के मौजूदा संकट में पाकिस्तान की भूमिका उतनी ही है, जितनी हमेशा रहती है। कश्मीर के मौजूदा संकट की चर्चा करते समय हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि महज ढाई साल पहले हुए लोक सभा के चुनाव और डेढ़ साल पहले हुए विधान सभा के चुनाव में जम्मू-कश्मीर के लगभग   65 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। यानी घाटी के बहुमत से कहीं ज्यादा बाशिंदों ने आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों की चुनाव बहिष्कार की धमकी या अपील को सिरे से नजरअंदाज कर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी आस्था जताई थी। इन चुनावों से पहले सूबे में आम तौर पर शांति थी। पर्यटकों की आमद भी खासी हो रही थी। लेकिन  2016 आते-आते हालात एकदम बदल गए, खासकर पिछले दो-ढाई महीनों में पूरी घाटी में असंतोष और हिंसा की लपटें उठने लगीं। जाहिर है कि इसके लिए केंद्र और सूबे की सरकारें जिम्मेदार हैं। उन्होंने कश्मीरी अवाम की जिंदगी को बेहतर बनाने के जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं किए गए। लोगों में नाराजगी 2014 की प्रलयंकारी बाढ़ में हुए नुकसान की देरी से और अपर्याप्त भरपाई के कारण भी थी।

इस पूरी स्थिति का अलगाववादी और पाकिस्तान पोषित आतंकवादी गुटों ने भरपूर फायदा उठाया। कश्मीर में घरेलू आधार वाली आक्रामकता का चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। दिल्ली और श्रीनगर के सत्ता-संचालकों की गलतियों के चलते कश्मीरी अवाम में चरमपंथ को  पहले के मुकाबले ज्यादा समर्थन मिलता नजर आया। इस बदलाव की विश्वसनीय गवाही खुद सेना के शीर्षस्थ अधिकारी लेफ्टिनेंट-जनरल जी एस हूडा ने दी। उन्होंने साफ तौर पर स्वीकार किया कि सेना के प्रति आम जनता की सहानुभूति लगभग खत्म हो गई है, जिसके चलते कश्मीरी उग्रपंथियों के खिलाफ अभियान चलाना बेहद मुश्किल हो गया है। दरअसल, 1990-91 से साल 2014 के बीच उग्रवाद और अलगाववाद को कश्मीरी अवाम के बीच ऐसा व्यापक समर्थन कभी नहीं मिला, जैसा 2015-16 के दौरान दिखा। यह स्थिति भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए बेहद खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है।

इसके कुछ बुनियादी कारण हैं। पहला कारण है राजनीतिक संवाद का पूरी तरह बंद किया जाना। यह जानते हुए भी कि कश्मीर का मसला बुनियादी तौर पर राजनीतिक है (यह बात श्रीनगर स्थित सैन्य कमान के प्रमुख भी कह चुके हैं), केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने अचानक घाटी में राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया को पूरी तरह बंद कर दिया। यह स्थिति दोनों स्तरों, कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के स्तर पर और पड़ोसी पाकिस्तान के स्तर पर भी दिखी।

पाकिस्तान से राजनयिक वार्ताओं की शर्तें बार-बार बदली गईं। केंद्र का यह रणनीतिक सोच न केवल दिशाभ्रम का शिकार था, बल्कि इसमें अतीत की गलतियों से न सीखने की एक जिद भी दिखाई दे रही थी। मोदी सरकार के इस नजरिए को बदलने में मुख्यमंत्री के तौर पर मुफ्ती मोहम्मद सईद बिल्कुल असफल रहे। उनके इंतकाल के बाद मुख्यमंत्री बनी महबूबा मुफ्ती ने भी भाजपा-संघ के सोच से प्रभावित केंद्र सरकार की कश्मीर नीति के आगे आत्मसमर्पण कर दिया।
कश्मीर की वर्तमान 'अशांति’ सुरक्षा बलों के हाथों हिजबुल मुजाहिदीन के कथित कमांडर बुरहान वानी की मौत से उपजी है। बुरहान के मारे जाने से उठे बवंडर को महबूबा सरकार ने शुरू में बहुत कम करके आँका। उन्हें और उनके सलाहकारों को इस बात का अहसास ही नहीं था कि यह बवंडर घाटी में नई तरह के जनाक्रोश का रूप ले सकता है। एक दौर मे 'हीलिंग टच’ की नीति की पैरोकार रही महबूबा मुफ्ती ने इस जनाक्रोश को हिंसक ढंग से दबाने-कुचलने के केंद्र सरकार के सैन्यवादी नजरिए का हर स्तर पर साथ दिया। इससे कश्मीरी अवाम के बीच उनकी बची-खुची राजनीतिक विश्वसनीयता भी खत्म-सी हो गई। सूबे की मुख्यमंत्री के तौर पर वह राजनीतिक जोखिम ले कर कुछ बड़े कदम उठा सकती थीं, पर उन्होंने समय रहते ऐसा कुछ नहीं किया।

केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि बंदूकों का जवाब बंदूकें नहीं हो सकतीं। अगर हो सकतीं तो अमेरिका की बंदूकों ने अफगानिस्तान, इराक, सीरिया समेत पूरी दुनिया को अब तक शांत कर लिया होता। मिलिटेंसी और उग्रवाद से निपटने में सुरक्षात्मक कदम के साथ राजनीतिक पहल की सबसे बड़ी भूमिका होती है। ऐसी पहल कभी आमने-सामने के संवाद के जरिए होती है, तो कभी गोपनीय स्तर पर बंद दरवाजों के अंदर भी। औपचारिक समझौते और अनौपचारिक सहमतियाँ ऐसे संवादों का अहम हिस्सा होते हैं। कश्मीर को ले कर ऐसी राजनीतिक पहलकदमी काफी समय से 'नई दिल्ली’ के एजेंडे से नदारद है।

कुछ राजनीतिक विश्लेषक अभी तक यह मान कर चल रहे थे कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी प्रकार से जीत हासिल करने के लिए केंद्र की भाजपा नीत सरकार पाकिस्तान के साथ एक सीमित युध्द प्रायोजित कर सकती है, लेकिन अब तो कश्मीर में पिछले दो महीने से जो चल रहा है उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने कश्मीरी अवाम से युद्ध करने का इरादा बना लिया है। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पहली बार अर्धसैनिक बलों को सेना की अगुवाई में कश्मीर घाटी में व्यापक तलाशी एवं अन्य दमनकारी कार्यों में लगाया जा सकता है। अवाम के खिलाफ ऐसे युद्ध से भले कोई चुनाव जीत लिया जाए, लेकिन यह कदम कश्मीर को भारत से जुदा करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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आत्मसमर्पण और क्या होता है : राजनय : आशुतोष कुमार

आशुतोष कुमार
आत्मसमर्पण और क्या होता है

"भारत के नए अमेरिका प्रेम से ये सब उपलब्धियाँ ठीक उस वक्त  दाँव  पर लग गई हैं, जब उसने तेज विकास दर के नए दौर में प्रवेश किया है, और जब विश्व पटल पर उसके निर्णायक हस्तक्षेप की वास्तविक सम्भावना पैदा हुई है। "

लेमोआ ‘लाजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरांडा एग्रीमेंट’ का लघुनाम है। इसे हिंदी में ‘रसद विनिमय अनुबोधक समझौता’ कह सकते हैं। भारत और अमेरिका ने इस  समझौते पर इस साल 29 अगस्त को  दस्तखत किए। भारत सरकार इसे अपनी महत्वपूर्ण कूटनैतिक उपलब्धि बता रही है। लेकिन विपक्ष इसे अमेरिका के  सामने भारत के आत्मसमर्पण के रूप में देख रहा है।

समझौता दोनों देशों को यह अधिकार देता है कि वे अपने विमानों और समुद्री जंगी जहाजों की ईंधन-आपूर्ति, मरम्मत और दीगर रसद जरूरतों की पूर्ति  के लिए एक दूसरे की जमीन और सुविधाओं का उपयोग कर सकें। लगभग तीन  सौ देशों के साथ अमेरिका के इसी तरह के समझौते  हैं। अमेरिका दशकों से  भारत के साथ इस तरह के समझौते के लिए दबाव डालता रहा है। लेकिन वाजपेयी  सरकार समेत पिछली कोई भी सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई। खाड़ी युद्ध के  दिनों में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने चोरी-चुपके अमेरिकी युद्धक विमानों को  तेल आपूर्ति की लिए भारत में उतरने की इजाजत दे दी थी। पता चलने पर देश में हंगामा खड़ा हो गया। सरकार गिरने की नौबत आ गई।

राष्ट्रवाद का ढोल पीटने वाली सरकार इस समझौते से दबाव में है। उसे  विपक्ष के अलावा चीन जैसे पड़ोसी देशों को भी सफाई देनी पड़ रही है। सरकार  का कहना है कि वर्तमान समझौता अमेरिका और उसके मित्र देशों के बीच  होनेवाले आम रसद आपूर्ति समझौते (लॉजिस्टिक सप्लाई एग्रीमेंट यानी एल एस ए) जैसा नहीं है। इस  समझौते से अमेरिका को अपने युद्धों के लिए भारत की सैन्य सुविधाओं का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाएगा। यह  अधिकार  केवल  साझा सैन्य अभ्यासों, सागर-दस्यु- नियन्त्रण  और संयुक्त राष्ट्र द्वारा संस्तुत सैनिक अभियानों तक  सीमित  रहेगा। दूसरे, अमेरिका  को  भारत में अपने  स्थायी अड्डे बनाने की इजाजत नहीं मिलेगी। इन सफाइयों का मकसद यह  बताना है कि समझौते के बावजूद भारत ‘मित्र-देशों’ की तरह अमेरिकी गुट में  शामिल नहीं हो गया है। उसने न तो अपनी संप्रभुता के साथ समझौता किया है,  न गुट-निरपेक्षता की नीति का परित्याग किया  है।

आलोचकों की नजर में ये सफाइयाँ महज जुमलेबाजी  है। नौसेना के अफसर  रह चुके रक्षा विशेषज्ञ अभिजित सिंह का कहना है कि नए दौर में महाशक्तियाँ  विदेशों में नए स्थायी अड्डे बनाना भी नहीं चाहती  हैं। युद्ध का स्वरूप बदल  गया है। अब दुनिया भर के  युद्धों को घर बैठे कम्प्यूटर द्वारा संचालित किया जा  सकता  है। नए अड्डे बनाने के तामझाम उठाने से बेहतर है युद्धक विमानों और  जहाजों के लिए जगह-जगह ईंधन आपूर्ति और मरम्मत की सुविधाएँ सुनिश्चित  करना। नए अड्डे बनाने की बनिस्बत ऐसी सुविधाएँ जुटा लेना कम खर्चीला और  अधिक सुविधाजनक है। यही कारण है कि अब रसद समझौतों पर अधिक जोर  दिया जा रहा है। यह कहना भी बेमानी है कि अमेरिका अपने निजी युद्धों के लिए  इन सुविधाओं का उपयोग नहीं कर सकता। अमेरिका हमेशा अपने वैश्विक युद्धों  के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्तुति बड़ी आसानी से हासिल कर लेता है। समझौते  के बाद ऐन वक्त पर इन सुविधाओं से इंकार करना भारत के लिए कतई आसान  नहीं होगा। इसलिए व्यावहारिक रूप से अब भारत की स्थिति अमेरिका के युद्ध साझीदार जैसी हो गई है।

भारत-अमेरिका का संयुक्त युद्धाभ्यास
दुनिया जानती है कि अमेरिका अपने साझीदारों की संप्रभुता का कितना  सम्मान करता है। पाकिस्तान का उदाहरण सामने है। वहाँ कई बार पाकिस्तान की असैनिक आबादी अमेरिकी ड्रोन हमलों का शिकार हो जाती है। पाकिस्तानी  सरकार दबी जबान से विरोध भी जताती रही है, जिस पर ध्यान देना अमेरिका को  जरूरी नहीं लगता। पाकिस्तान ही नहीं, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे ताकतवर देश भी अमेरिका के सैन्य फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर पाते। यह बात सामने आ चुकी है  कि इराक पर हमले के लिए अमेरिका ने उसके पास जनसंहार के हथियार होने  का झूठा बहाना बनाया था। इस युद्ध के विनाशकारी परिणाम इराक़ की बर्बादी और आइएस जैसे आतंकी संगठनों के उदय के रूप में दुनिया झेल रही है। इस अनैतिक  युद्ध में भागीदार होने की भारी कीमत ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों को भी चुकानी पड़ रही है। अमेरिका का समूचा सैन्य इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा  है।

भारत नें गुट निरपेक्षता के सिद्धांत पर चलते हुए अब तक अपनी संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रख सका है। उसकी विदेश नीति और रक्षा नीति स्वतंत्र बनी रही  है। एक विकासशील देश के बतौर भारत की यह उपलब्धि साधारण नहीं थी। इसी  स्वतन्त्रता के कारण तीसरी दुनिया के देश अमीर देशों की भेदभाव भरी नीतियों  के खिलाफ़ संघर्ष में भारत से नेतृत्व की उम्मीद रखते आए हैं। आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरण सम्बन्धी मंचों पर वे भारत से अपने हितों का  प्रतिनिधित्व करने की आशा रखते आए हैं। भारत के पास विराट अर्थशक्ति नहीं  थी। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भी नहीं थी। फिर भी तीसरी दुनिया के नेता के रूप में वह एक विश्वशक्ति की तरह देखा जाता रहा है। अमेरिका का  युद्ध-साझीदार बनने से न केवल उसकी सम्प्रभुता संशयग्रस्त हो उठेगी, अंतरराष्ट्रीय  परिप्रेक्ष्य में उसका स्वतंत्र हस्तक्षेप भी संदिग्ध हो जाएगा। अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के कारण अमेरिका ने दुनिया भर में अपने खिलाफ़ ढेर सारी घृणा भी  बटोरी है। उसके साझीदार देश भी इस घृणा के निशाने पर आ जाते हैं। अपनी  स्वतंत्र नीति के कारण ही भारत घृणा के इस सैलाब से अछूता रहा है। भले ही पाकिस्तान समर्थित समूहों ने भारत को आतंकवाद का निशाना बनाया  हो, वह वैश्विक आतंकवाद का प्रमुख लक्ष्य कभी नहीं रहा। भारत अगर अमेरिका के पाले  में जाता हुआ दिखाई पड़ा तो आतंक-विरोधी संघर्ष के मोर्चे पर भी उसे जटिलतर  चुनैतियों का सामना करना पड़ सकता  है। यह आशंका भारत के इस फैसले से और गहरी हुई है कि गुटनिरपेक्ष देशों के इसी हफ्ते वेनेजुएला में हो रहे सत्रहवें  शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी करेंगे, प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी  नहीं।

कहा जा रहा है कि बदली हुई परिस्थितियों में गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत  अप्रासंगिक हो चुका है। दुनिया एकध्रुवीय हो गई है, इसलिए अब एक ही गुट रह  गया है। इस गुट से बाहर रहना नुकसानदेह हो सकता है। यह एक बचकाना तर्क  है। चीन अमेरिकी गुट में शामिल नहीं है, फिर भी आर्थिक महाशक्ति बन चुका  है। अमेरिकी दबाव से मुक्त होने के कारण वह अपने आर्थिक –राजनैतिक फैसले  करने के लिए स्वतंत्र है। उसकी आर्थिक तरक्की के पीछे यह प्रमुख कारण है। चीन में अमेरिकी पूँजी  का निवेश इस हद तक बढ़ चुका है कि अमेरिका उसे  अस्थिर करने की बात सोच भी नहीं सकता। उलटे चीन की बढती हुई चुनौती  के  कारण भारत को अपने पाले में करने की उसकी बेचैनी बढ़ गई है। पाकिस्तान  अमेरिकी संरक्षण स्वीकार कर चुका है। उसकी गत  हम देख ही रहे हैं। इराक में  अमेरिका समर्थक सरकार बनने के बाद उसका जो हश्र हुआ, वह भी सब के  सामने है। सचाई यह है कि बदली हुई दुनिया में अमेरिकी छत्रछाया से शक्ति नहीं  मिलती, समस्याएँ मिलती हैं। शक्ति  मिलती है आर्थिक मजबूती से। आर्थिक  मजबूती के लिए नीतिगत स्वतन्त्रता जरूरी है। शीतयुद्ध के जमाने में एक या  दूसरे गुट में शामिल होने के पीछे भय का तर्क हो सकता था। शीतयुद्धोत्तर युग  में गुटबन्दी में शरीक होने का कोई तर्क नहीं बचा है।

समानता पर आधारित बहुआयामी दुनिया बनाने का सपना जिंदा रखने के  लिए आज गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत अधिक प्रासंगिक हो उठा है। सन 2009 में  एकध्रुवीय दुनिया को बहुध्रुवीय बनाने के घोषित मकसद से रूस की पहल पर  चीन, भारत और ब्राजील ने ब्रिक्स समूह बनाया था। बाद में दक्षिण अफ्रीका भी  इसमें शामिल हो गया। इसी अक्टूबर में ब्रिक्स का आठवाँ  शिखर सम्मेलन भारत  में होने वाला है। गुटनिरपेक्षता की पताका बुलंद करते हुए ब्रिक्स सम्मेलन को  सफलता की नई  ऊँचाइयों तक ले जाने का यह एक सुनहला अवसर है। चीन ने  बार-बार संकेत दिए हैं कि सीमा विवाद को तूल न देते हुए वह भारत के साथ  आर्थिक–कूटनीतिक सहयोग बढ़ाना चाहता है। ब्रिक्स के लिए चीन का उत्साह और  ‘एक पट्टी एक सड़क योजना’ में भारत को शामिल करने की तमन्ना के इजहार  से यही संकेत मिलता है। पिछले महीने ही चीनी विदेश मंत्री  वांग ई ने भारत  आ कर हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद  दोनों देशों ने यह घोषणा की है कि वे एनएसजी में भारत की सदस्यता पर खुले  मन से संवाद करने को तैयार  हैं। वांग ई ने यह भी स्पष्ट किया कि यह धारणा  सही नहीं है कि एनएसजी में भारत का प्रवेश न होने देने के लिए चीन जिम्मेदार  था। चीन के बढ़ते  हुई दोस्ताना रवैए के पीछे आंतरिक कारण भी हैं, और  उसकी वैश्विक रणनीति भी। चीन इन दिनों अति उत्पादन और अतिरिक्त  पूँजी संग्रह के संकट का सामना कर रहा है। पिछले दिनों उसने बड़े पैमाने पर अफ्रीका और लातीनी अमेरिका में  पूँजी निवेश  किया है। यह अतिरिक्त पूँजी के संकट पर किसी हद तक काबू पाने का उसका तरीका भी है, और अमेरिका पर विश्व अर्थव्यवस्था की निर्भरता को कम करने का उपाय भी। लेकिन भारत जैसे पड़ोस के बड़े बाजार को जोड़े बिना यह उपाय अधिक असरदार नहीं हो सकता। भारत  में  चीनी  पूँजी को खपाने की क्षमता भी है और उसके उत्पादों को भी। चीनी  उत्पादों ने तो पहले ही भारतीय बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति बना ली है। लेकिन चीनी  पूँजी ने नहीं। कहना न होगा कि भारत में चीनी पूँजी का बड़े  पैमाने पर निवेश दोनों देशों के लिए गुणकारी होगा। उधर दक्षिण चीन सागर  विवाद के मद्देनजर भी चीन को भारत के सहयोग की जरूरत है। 

भारत-अमेरिकी रसद समझौते से स्थानीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जो  बदलाव आया है, उसका सब से चिंताजनक उदाहरण है कि रूस पाकिस्तान के  साथ अपने पहले युद्धाभ्यास की तैयारी कर रहा है। भारत को तय करना होगा कि अमेरिका की बढ़ी हुई दोस्ती से उसे ऐसा क्या हासिल होनेवाला है, जिसके लिए   रूस जैसे भरोसेमंद दोस्त को खो देने का खतरा मोल लेने और पड़ोस में भारत  से नाराज चीन-पाकिस्तान-रूस तिकड़ी को मजबूत होने देने की कीमत चुकाई जा  सके! रसद समझौते से तो भारत को कुछ हासिल होनेवाला नहीं, क्योंकि  पाकिस्तान और चीन भारत के निकटम पड़ोसी हैं, जिनके साथ युद्ध छिड़ने पर  भारत को रसद आपूर्ति के लिए किसी अमरीकी अड्डे की जरूरत नहीं पड़ने  वाली।  वैसे भी अमेरिका भारत को अपने पड़ोसियों के साथ ऐसे किसी युद्ध में पड़ने की इजाजत नहीं देने वाला। आखिर पाकिस्तान कथित ‘आतंक-विरोधी युद्ध‘ में उसका प्रमुख भागीदार है। उधर चीन में अमेरीकी पूँजी का भारी निवेश है।

सत्तर वर्षों से भारत गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत  और  समानता पर आधारित  बहुआयामी दुनिया के सपने का वैश्विक प्रवक्ता बना रहा। इस भूमिका की   बदौलत कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद उसने प्रभावशाली कूटनीतिक उपस्थिति  बनाई। भारत के नए अमेरिका प्रेम से ये सब उपलब्धियाँ ठीक उस वक्त  दाँव  पर लग गई हैं, जब उसने तेज विकास दर के नए दौर में प्रवेश किया है, और जब विश्व पटल पर उसके निर्णायक हस्तक्षेप की वास्तविक सम्भावना पैदा हुई है।

क्या यह जुआ कश्मीर में बढ़ते संकट के कारण खेला गया है? क्या भारत अमेरिका की धौंस दे कर कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को चुप करने की आशा  करता है? अगर किसी के दिमाग में यह आशा रही हो, तो वह पिछले दिनों  पाकिस्तान के लगातार आ रहे बढ़े-चढ़े बयानों के बाद बुझ चली होगी। अगर यह महज पिछले सत्तर सालों का सारा रंग-ढंग बदल डालने के  आवेग का परिणाम है तो याद रखना चाहिए कि  कूटनीति भावावेग से नहीं, विजन, व्यावहारिक सिद्धांत और कठोर गुणाभाग से संचालित होनी चाहिए। अन्यथा परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।
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वैश्वीकरण के 25 वर्ष : समीक्षा : रामू सिद्धार्थ

रामू सिद्धार्थ
वैश्वीकरण के 25 वर्ष

"इंडिया और भारत तो पहले से ही मौजूद थे। इन 25 वर्षों में हुआ यह है कि इंडिया का भारत से लगभग संपूर्ण सम्बन्ध विच्छेद हो गया है।"

पी वी नरसिंहराव ने नेतृत्व में मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और सी चिदंबरम तथा उनके सहयोगियों की टीम ने रुपए के अवमूल्यन के साथ नई आर्थिक नीति या आर्थिक सुधारों  की शुरुआत की। इसे बाद में जा कर उदारीकरण, प्राइवेटीकरण और वैश्वीकरण कहा गया। इसके मुख्य वास्तुकार विश्व बैंक के सलाहकार अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह थे। हाल के अपने एक साक्षात्कार में चिदंबरम ने कहा कि इन नीतियों की मजबूत नींव रखने वालों के सबसे पुरजोर समर्थक और अगुआ मनमोहन सिंह थे। मनमोहन सिंह, चिदम्बरम और मोंटेकसिंह आहलूवालिया तीनों राजनेता कम, पश्चिम में पढ़े-लिखे अर्थशास्त्री और टेक्नोक्रेट अधिक थे। आजादी के बाद पहली बार देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य वास्तुकार जननेता नहीं, एक अर्थशास्त्री बना, जो बाद में बिना कोई चुनाव जीते, चोर दरवाजे से (राज्यसभा के माध्यम से) संसद में प्रवेश कर, पहले देश का वित्त मंत्री, फिर लगातार दस वर्षों तक देश का प्रधानमंत्री रहा। इसकी अगुआई ने जिन नीतियों को शुरू किया गया, उन्हें ही उसके बाद आने वाली सभी सरकारों ने आगे बढ़ाया। इसमें कांग्रेसियों से लेकर धुर दक्षिणपंथी भाजपाई और जयप्रकाश लोहिया के शिष्य तथा अपने को संसदमार्गी वामपंथी कहने वाले सभी शामिल थे। देश की शायद ही कोई संसदमार्गी पार्टी रही हो, जिसने इन पच्चीस वर्षो में केंद्र में सत्तारूढ़ दलों का हिस्सा बन, इन नीतियों का समर्थन न किया हो। कुछेक बाहर से इन सरकारों का समर्थन करते रहे हैं। इन नीतियों के पुरजोर से पुरजोर समर्थक से ले कर धुर विरोधी तक एक बात पर पूर्ण सहमत थे कि ये नीतियां आजादी के बाद की  आर्थिक नीतियों से मात्रात्मक तौर पर नहीं, बल्कि गुणात्मक तौर पर भिन्न हैं और इन नीतियों के परिणाम के बारे में दो बिलकुल विपरीत संभावनाएं व्यक्त की गई थीं।
इन नीतियों के अगुआ लोगों और इनके समर्थकों ने यह सम्भावना व्यक्त की थी कि इन नीतियों के परिणामस्वरूप भारत एक विकसित देश में तब्दील हो जाएगा। भूख, गरीबी, बेरोजगारी तथा अशिक्षा का नामो-निशान नहीं रहेगा और सभी लोगों को बीमारी में इलाज की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी और यह देश दुनिया के शक्तिशाली देशों में शामिल हो जाएगा। हजारो वर्षों की तंगहाली से छुट्टी मिल जाएगी।

इन नीतियों के विरोधियों ने कहा कि इनके चलते देश अपनी संप्रभुता खो कर पश्चिमी देशों का एक और मातहत बन कर रह जाएगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन का खत्मा हो जाएगा। मेहनतकश लोगों का शोषण बेइंतहा बढ़ेगा, सुरक्षित, सम्मानजनक तथा सुनिश्चित रोजगारों का खत्मा हो जाएगा। सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर खर्च कम होता जाएगा। मुट्ठी भर अमीरों को तो फायदा होगा, लेकिन व्यापक मेहनतकश आबादी को कोई फायदा नहीं होगा। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि वैश्वीकरण के नाम पर देश के प्राकृतिक संसाधनों, मानवीय संसाधनों तथा आजादी के बाद खड़े किए गए सार्वजनिक क्षेत्र (सरकारी उद्यमों तथा संस्थाओं) को कौड़ी के मोल देशी - विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों को सौप दिया जाएगा और न केवल देश की अर्थव्यवस्था, बल्कि राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन भी उनके रहमो-करम पर निर्भर हो जाएगा। आज मुख्यधारा का मीडिया इन दो खेमो को विकास समर्थक और विकास विरोधी के रूप में बाँटने में कमोबेश सफल हो गया है।  दावों-प्रतिदावों के आकलन और  मूल्यांकन के लिए 25 वर्ष पर्याप्त होते हैं। दिलचस्प है कि पहले खेमे का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी पहले की सरकारों के सुधारों की गति को धीमा ठहरा कर जनता से मांग कर रहे हैं कि उन्हें सुधारों के लिए कम से कम बीस वर्ष का और समय दिया जाए, वे इस देश को स्वर्ग और दुनिया का सब से शक्तिशाली देश बना देंगे। इस देश की जनता का धेर्य अपार है। बीस वर्ष क्या होते है, स्वर्ग पाने के लिए वह हजारों वर्षों से 84 लाख योनियों में भटकने को तैयार है।       

आइए, देश के 25 वर्षों के इस सफर पर एक सरसरी निगाह डालें और देखें कि इस अवधि में देश ने क्या पाया क्या खोया, क्या पाया, कौन मालामाल हुआ, कौन कंगाल हुआ, कौन बसा कौन उजड़ा, किसके पास सब कुछ है और कौन दो वक्त की रोटी-दाल के लिए भी मोहताज है, कौन जश्न मना रहा है और किसके यहाँ मातम छाया हुआ है, होरियों-गोबरों का हाल क्या है, धनिया और सिलिया क्यों बिसूर रही हैँ।

इन नीतियों के वास्तुकार और पैरोकार जिन उपलब्धियों को गिना रहे हैं  उनमें यह तथ्यात्मक स्तर पर सही है कि 1991 की तुलना में देश के सकल घरेलू उत्पाद में छह गुना वृद्धि हुई है। 1991 के वित्तीय वर्ष में देश का सकल घरेलू उत्पाद 326.76 खरब डॉलर था, जो 2015-2016 में बढ़ कर 2075.8 खरब डॉलर हो गया है। अर्थात देश की  अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन डॉलर से बड़ी हो गई है और देश सकल घरेलू उत्पाद के मामले में दुनिया की दस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है। इसका मतलब यह है कि देश में बड़े पैमाने पर संपदा का सृजन हुआ है और हो रहा है। इसी से जुड़ी दूसरी उपलब्धि यह है कि क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर भारत दुनिया की तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है। अमेरिका और चीन के बाद, कभी भारत, तो कभी जापान तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था हो जाते हैँ। सकल घरेलू उत्पाद में इतने बड़े पैमाने पर वृद्धि के चलते प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय में भी कई गुना वृद्धि हुई है। प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 93 हजार 231 रु. हो गई है अर्थात भारत  के प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिमाह औसत आय लगभग 8 हजार रुपए के करीब है। यदि समान बँटवारा हो तो प्रत्येक भारतीय व्यक्ति (जन्मजात बच्चा  या जर्जर बूढ़ा) की प्रति माह आय 8 हजार रु. के लगभग है। दूसरी बड़ी उपलब्धि विकास दर का  1991 के बाद निरंतर औसत 6 प्रतिशत से ऊपर बने रहना है। एक और सबसे बड़ा दावा किया जा रहा है, जिस पर तरह-तरह  के विवाद और संदेह हैं, कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में बड़े पैमाने पर गिरावट आई है। 1993-1994 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत 45.3 था जो 2011-2012 में गिर कर 21.9 प्रतिशत हो गया है अर्थात लगभग 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट। इन नीतियों के पैरोकार जिस उपलब्धि को सब से ज्यादा गिनाते हैं वह है विदेशी मुद्रा भण्डार में भारी बढ़ोत्तरी। विदेशी मुद्रा की कमी को 1989-90 के आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह बताया जाता है। 1990-91 में विदेशी मुद्रा भंडार 1.12 बिलियन डॉलर था जो 17 जून 2016 को 339.57 बिलियन डॉलर हो गया है। साथ ही देश का चालू खाता घाटा (सकल आयत निर्यात तथा अन्य चीजों के बीच लेन-देन का अंतर ) 1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद का 2.96 प्रतिशत था, जो 2015-2016 में घट कर 1.06 प्रतिशत हो गया है। राजकोषीय घाटे में गिरावट को भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है जो 1990-91 में 7.61 प्रतिशत था और कम हो कर 2015-2016 में 3.92 प्रतिशत हो गया है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी में कमी को भी परम्परागत तौर पर अर्थव्यवस्था के विकास का सूचक माना जाता है। हमारे देश के संचालक-शासक भी इसे अपने 25 वर्षों की उपलब्धि के रूप में देखते हैं। 1990-91 में जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 29.02 प्रतिशत था जो घट कर 2015-2016 में 17.05 प्रतिशत हो गया है। निर्यात में भारी वृद्धि को भी उपलब्धि के तौर पर गिनाया जा रहा है। साक्षरों की संख्या 1991 की तुलना में 52.21 से बढ़ कर 74.04 हो गई है।

इससे कौन इनकार कर सकता है कि इन 25 वर्षों में सम्पत्ति- संपदा का भारी पैमाने पर सृजन हुआ है। प्रश्न यह उठता है कि इस विशाल सम्पत्ति सृजन में से किसको कितना मिला है और इस विकास की कीमत किसने चुकाई है। इस सिलसिले में सब से पहली बात यह है कि देश की कुल व्यक्तिगत सम्पत्ति के 49 प्रतिशत (2013) के मालिक उपर के 1 प्रतिशत लोग हैं अर्थात 99 प्रतिशत लोगों को आधी संपदा में बंटवारा करना है। अब इस बात को थोड़ा और आगे  बढ़ाते हैं : ऊपर के 10 प्रतिशत लोग कुल 76 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हो गए हैं अर्थात 90 प्रतिशत लोग के बीच बाँटने के लिए 34 प्रतिशत सम्पत्ति है। बात को थोड़ा और  आगे बढ़ाएं तो हम पाते हैं कि ऊपरी के 20 प्रतिशत लोग लगभग 85 से 90 प्रतिशत  सम्पत्ति के मालिक हैँ। दूसरे शब्दों में, 80 प्रतिशत यानी लगबग 95 करोड़ लोग (कुल आबादी 1 अरब 21 करोड़) 10-15 प्रतिशत सम्पत्ति में हिस्सेदारी के लिए विवश हैं। बात को प्रतिशत से व्यक्तियों या परिवारों तक ले जाएं तो पाते हैं कि भारत के 111 व्यक्ति बिलियनायर (डॉलर में) हो गए हैं। इन 111 लोगों की कुल सम्पत्ति 308 बिलियन डॉलर है, जो 1991 में भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद के लगभग बराबर हैं।  इनमें से चार व्यक्ति दुनिया के उन 62 लोगों में शामिल हैं जो विश्व की आधी संपदा के मालिक हैं। सब से शीर्ष पर मुकेश अम्बानी हैं। इनकी कुल व्यक्तिगत सम्पत्ति (बहुराष्ट्रीय निगमों की सम्पत्ति, जिनके वे मालिक हैं, इसमे शामिल नहीं है) 27 अरब डॉलर है अर्थात 1 लाख 56 हजार करोड़ रु. ।  यदि वे प्रतिदिन 1 करोड़ रुपया खर्च करें तो उनकी सम्पत्ति लगभग 427 वर्षों में खर्च होगी।

निरपेक्ष संपदा सृजन और विकास दर के साथ सम्पत्ति के बँटवारे  को जोड़ने पर हम पाते हैं कि इस पूरे विकास के फल का गूदा ऊपर के 10 प्रतिशत लोगो को मिला है, उसके नीचे के 10 प्रतिशत मध्यमवर्गीय लोग, जिनमें से कुछ की तनख्वाहें ढाई लाख तक हो गई हैं और जो कुछ अन्य तरीकों से कमा रहे हैं, छिलका चाट रहे हैं। शेष 80 प्रतिशत लोगों की तरफ गुठली फेंक दी गई है। इस 80 प्रतिशत में कई स्तर के लोग हैं। भारत सरकार केआँकड़ो के अनुसार ये 21.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं जिनके हिस्से खर्च करने के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 40 रुपया भी नहीं आता। अर्जुन सेन कमेटी ने विस्तृत अध्ययन के आधार पर बताया था कि भारत की 76 प्रतिशत आबादी औसत रूप में प्रतिदिन 22 रूपए से भी  कम पर जीवन निर्वाह करती है यानी 85 करोड़ से अधिक लोगों की औसत प्रति व्यक्ति मासिक आय 600 रु. के आस-पास है। इसी 22 रुपए में खाना, पहनना, रहना, पढ़ाई, दवाई, आना-जाना सब शामिल है। हाल की तेंदुलकर कमेटी का कहना है कि अब केवल 21.9 प्रतिशत अर्थात लगभग 30 करोड़ लोग ही ऐसे हैं जो 40 रुपए कम पर (प्रतिदिन) निर्वाह कर रहे हैं यानी शेष लोग 1200 रुपए से अधिक मासिक आय पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। सारे  तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि 90 करोड़ से अधिक आबादी के हिस्से गुठली चाटने के लिए हैं। छनन के सिद्धांत (ट्रिकल डाऊन थियरी) का अर्थ बताते हुए एक अर्थशास्त्री ने कहा है कि छनन का सिद्धांत यह है कि घोड़ा  दाना खाता है, लीद करता है, लीद में  कुछ खड़े, कुछ अधपके दाने चिड़िया चुग लेती है। भारत की जनता को भी दाना खाने वाले ऊपरी घोड़ों की लीद के कुछ अधपके दाने ही इन 25 वर्षों में नसीब हुएहैं। लीद से दाने निकाल कर खाने की विवशता का इतिहास भारत में काफी पुराना है। दवरी करते हुए बैल गेहूं के दाने भी खा लेते थे। फिर वे जो गोबर करते थे, उन्हें पानी में डाल कर दाने निकाल कर मेहनतकश दलित खाते थे। इसे गोबरहा कहा जाता था। जाति प्रथा ने दलितों को हजारों वर्षों तक गोबरहा खिलाया है। 

25 वर्षों के आर्थिक सुधारों के पैरोकार कर रहे हैं कि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी का घटना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब थोड़ा इस बात पर विचार किया जाए।

हमारे देश में 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष रूप में कृषि पर निर्भर है। इसमें 30 प्रतिशत लोग भूमिहीन लोग हैं। कार्यरत श्रमिकों का 55-56 प्रतिशत कृषि या इससे संबंधित रोजगार पर निर्भर है।  80 प्रतिशत लोग छोटे गरीब व सीमांत किसान हैं। सारे दावों के बावजूद कृषि की विकास दर 2 प्रतिशत के आस-पास ही रह रही है। कोई भी सहज ही अनुमान लगा सकता है कि 60 प्रतिशत अर्थात 75 करोड़ के आस-पास कृषि पर निर्भर आबादी का बहुलांश दरिद्रता, अभाव, कंगाली तथा कुपोषण के किन हालात में जीवन बिता रहा है जिसके हिस्से 17 प्रतिशत जीडीपी आती है और जिसमें विकास दर केवल 2 प्रतिशत है। मध्यम किसान की कमर भी 25 वर्षों में टूट गई है, इसका सब से भयावह परिणाम किसानों की आत्महत्या के रूप में आया है। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार केवल 1997 से 2007 यानी दस वर्षों के बीच में 1 लाख 82 हजार 936 किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो गए। हाल के आंकड़े बता रहे हैं कि यह संख्या 3 लाख के करीब पहुंच गई है। इतनी बड़ी संख्या में लोग किसी युद्ध या माहामारी में ही मारे जाते हैं। साफ है कि 3 लाख लोगों ने अपनी जान दे कर इस तथाकथित विकास की कीमत चुकाई है। ताजा स्थिति यह है, कि गाँवों में 5 प्रतिशत से भी कम ऐसे परिवार हैं जिनकी प्रति माह औसत आमदनी 5 हजार रु. या इससे ऊपर है। अब तो गाँवों में रहने वाले 75 करोड़ से ऊपर के लोगों की चर्चा ऐसे की जाती है जैसे ये कुछ बचे-खुचे लोग हों।

भोजन या खाद्यान प्राणी मात्र की आवश्कता है। दुनिया भर में विकास के साथ यह उम्मीद की जाती है कि प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता बढ़ेगी। भारत में इसका उलटा हुआ है 1961 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 468.7 ग्राम (399.7 ग्राम अनाज और 69 ग्राम दाल) खाद्यान्न उपलब्ध था, जो 1991 में बढ़ कर 510.1 ग्राम (463.5 अनाज और 35.5 दाल) हो गया था, 2011 में घट कर 437.1 ग्राम (401.7 अनाज और 35.5 दाल)) हो गया।  इसका निहितार्थ निकाला जाए तो  आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि देश के बहुलांश लोग कुपोषित हैं। 48 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 80 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ (एनीमिक) खून की कमी की शिकार हैं। असंगठित क्षेत्र (94 प्रतिशत) के बहुलांश श्रमिक कुपोषण के शिकार हैं। केवल प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता ही नहीं घटी है बल्कि उसका प्रति व्यक्ति उत्पादन भी घटा है, क्योंकि खाद्यान्न उत्पादन कमोबेश स्थिर बना हुआ है। भारतीयों के पोषण का स्तर यह है कि तपेदिक एक महामारी की तरह फैल रही है। तपेदिक से रोज  1000 लोगों की जान जाती है। अर्थात प्रति  मिनट पर एक व्यक्ति की मौत होती है। तपेदिक ( टीबी) अधिकांश मामलों में कुपोषण जनित बीमारी है।

विश्व भर में यह मान्यता है कि विकास दर बढ़ने के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ेगा। हमारे देश में 25 वर्षों में ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारत स्वास्थ्य पर सब से कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। सकल घरेलू उत्पाद के 1.9 प्रतिशत से भी कम स्वास्थ्य पर खर्च हो रहा है, जबकि दुनिया के अधिकांश देश 3 प्रतिशत से ऊपर खर्च करते हैं। यही हाल शिक्षा पर खर्च का है। आजादी के बाद से ही  शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च करने की बात हो रही है। 25 वर्षों की सारी आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद भी शिक्षा पर खर्च 3 प्रतिशत से भी कम बना हुआ है, जब कि नेपाल 4.6, चीन 4.15, ब्राजील 5.1, केन्या 7 प्रतिशत तथा क्यूबा 16 प्रतिशत खर्च करता है।

यह सच है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में दुनिया की दस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत शामिल है, क्रयशक्ति के आधार पर तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था है, विकास दर के मामले में पहले स्थान पर और कुछ वर्ष पहले चीन के बाद दूसरे स्थान पर था। लेकिन जब मानव विकास सूचकांक का प्रश्न आता है तो भारत 188 देशों में 130वें स्थान पर चला जाता है। भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका का स्थान 73वां  है, चीन का स्थान 90वां  है। यानी जहां तक जीवन जीने की बुनियादी जरूरतो का मामला है, भारत दुनिया के सब से पिछड़े देशो में एक बना हुआ है। इसकी दो स्पष्ट वजहें हैं। पहली तो यह कि जो भी संपदा सृजित हुई है उसका अधिकतम हिस्सा ऊपर के 20 प्रतिशत लोगों के पास गया है। 80 प्रतिशत के पास नहीं के बराबर आया है। दूसरी बात यह है कि भारत सरकार के पास इस विकास के परिणामस्वरूप कर तथा अन्य रूपों में जो धन आ रहा है, उसका न्यूनतम हिस्सा पोषण, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जा रहा है। दरअसल, कुल मिला कर जीडीपी का 10 प्रतिशत भी इन बुनियादी चीजों पर खर्च नहीं हो रहा है। जिस सरकार को निगमों के कारपोरेट  टैक्स में 2 लाख करोड़ रु. की कटौती करने में थोड़ी भी हिचकिचाहट नहीं हुई, उस सरकार को करोड़ों को जीवन निर्वाह का साधन उपलब्ध कराने के लिए लगभग 30 हजार करोड़ (मनरेगा) आवंटित करने में पसीने छूट रहे हैं। जो धन आवंटित किया गया, उसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद भी जारी करने में तमाम आना-कानी की गई। मोदी के वित्त मंत्री महामहिम जेटली ने शिक्षा के बजट आवंटन में 16 प्रतिशत और स्वास्थ्य के बजट आवंटन में 8 प्रतिशत की कटौती कर दी। नेशनल हेल्थ मिशन के बजट में भी कटौती कर दी गई। निष्कर्ष रूप में कहें तो सृजित संपदा का न के बराबर हिस्सा 80 प्रतिशत लोगों के हाथ आया न  सरकारों ने लोगो के कल्याण के लिए अधिक खर्च करने के प्रति संवेदना दिखाई।

निर्यात में वृद्धि को 25 वर्षों की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया जा रहा है। 1990-91 की तुलना में निर्यात 18.48 अरब डॉलर से बढ़ कर 2015-2016 में 266.37 अरब डॉलर हो गया है। लेकिन आज भी निर्यात का एक बड़ा हिस्सा कच्चा माल तथा उपभोग सामग्री (खाने-पीने की वस्तुएँ) हैं। निर्यात को डॉलर की तुलना में रुपए के अवमूल्यन के साथ जोड़ कर देखा जाए तो 1991 में एक डॉलर 21.24 रुपए के बराबर था। इस समय एक डॉलर लगभग 67 रुपए के बराबर है। अर्थात डॉलर की तुलना में रुपए के मूल्य में तीन गुने की गिरावट आई है, जिसका मतलब यह है कि 1990-91 में जितनी वस्तुएं निर्यात करके 1 डॉलर प्राप्त होता था उससे तीन गुना वस्तुओं का आज निर्यात करना पड रहा है।  कुल मिला कर निर्यात  का अर्थ यह रह गया है कि भारत के कच्चे माल तथा उपभोग की वस्तुओं को पश्चिमी देशों में सस्ते से सस्ती दर पर भेज देना। खाने-पीने की सब से अच्छी वस्तुएं पश्चिमी देशों को भेज दी जाती हैं, बचा-खुचा भारत के अमीर लोग खाते हैं और शेष भारत सब से खराब स्तर की चीजों का उपभोग करता है।

रही बात विदेशी मुद्रा भंडार की, जिसे दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रही है, तो उसके बारे में ज्यादातर गंभीर और जनपक्षधर अध्येताओं का कहना है.कि इसका एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो शेयर बाजारों में लगा हुआ है, जिसे विदेशी निवेशक कभी भी ले जा सकते हैं। दूसरे, देश की प्रकृतिक संपदा, सार्वजनिक संस्थाओं तथा श्रम को अत्यंत सस्ती दर पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंप कर यह खजाना भरा गया है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि आर्थिक मामले में देश में एक ऐसे पिरामिड का निर्माण हुआ है जिसकी शीर्षस्थ नोक पर 100 खरबपति हैं, उसके नीचे हजारों  अरबपति हैं, उसके नीचे 6.7 करोड़ रुपए से अधिक की हैसियत वाले 2.36 लाख लोग (2015) हैँ जिनकी कुल सम्पत्ति 1500 अरब डॉलर है।। इसके नीचे अन्य श्रेणी क्रम भी है - पिरामिड के सबसे निचले आधार में 73 प्रतिशत आबादी है जो 20  से 30 रुपए या ज्यादा से ज्यादा 40-42 रु. प्रतिदिन पर गुजारा करती है।

इंडिया और भारत तो पहले से ही मौजूद थे। इन 25 वर्षों में हुआ यह है कि इंडिया का भारत से लगभग संपूर्ण सम्बन्ध विच्छेद हो गया है। इंडिया  के लोगों के खाने-पीने, रहने, पढ़ने-लिखने, इलाज कराने, आने-जाने के साधन, मनोरंजन के साधन, सभी का कोई मेल भारत से नहीं रह गया है सिर्फ एक संबंध है, वह यह कि भारत के लोग इंडिया के लोगों के लिए सस्ते श्रम का स्रोत  हैं। भारत वाले इंडिया के लोगों के लिए उत्पादन करने तथा सेवा करने के लिए प्रस्तुत हैं। हाँ,  यह भी हुआ है कि भारत के लोगों के पास स्वाभिमान और आत्मगौरव से जीने के लिए जो थोड़े-बहुत अपने साधन थे उन्हें भी छीन लिया गया है। इसका सब से ज्यादा शिकार आदिवासी और 80 प्रतिशत छोटे किसान हुए हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर अब तक लगभग 7 करोड़ लोगों को बेदखल होना पड़ा है अर्थात उनसे उनके आर्थिक साधन (जमीन, जंगल, नदियां)  और उनका सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश छीन कर दर-दर भटकने को विवश कर दिया गया है। एक और महत्वपूर्ण बात यह हुई है कि इंडिया वालों के लिए भारत के लोग अदृश्य हो गए हैं। यह कुछ ऐसा ही हुआ है जैसे भारत के गाँवों में लगता था कि सिर्फ द्विज रहते हैं, बहुलांश शूद्रों की आबादी अदृश्य होती थी। 80 प्रतिशत दलितों - अति पिछड़ी जातियों का, लगता था, गाँवो में कोई अस्तित्व ही नहीं है। वे श्रम करने तथा सेवा करने के लिए ब्राह्मणों और ठाकुरों, लालाओं के टोलों में आते थे। फिर अपने टालों में सिमट और सिकुड़ जाते थे। गाँव की पहचान भी द्विजों से ही होती थी।

पचीस वर्षों के आर्थिक सुधारों, उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण ने 20 प्रतिशत (30 करोड़) इंडिया को अत्यंत शक्तिशाली बना दिया है। इंडिया दुनिया के 20 बड़े देशों (जी - 20) के शक्तिशाली समूह में शामिल हो गया है। दुनिया की कोई ताकत इंडिया को ‘इग्नोर’ नहीं कर सकती है।  इंडिया के लिए स्वर्ग का निर्माण हुआ है। दुनिया भर की उपभोग की वस्तुएँ इनके उपयोग के लिए उपलब्ध हैं। ये विलासिता और ऐयाशी में डूबे हुए हैं। कोई भी चीज पाना इनके लिए नामुमकिन नहीं है।

दूसरी ओर अदृश्य भारत है जो इंडिया को भौचक ललचाई नजरों से देख रहा है। शहरों की नारकीय स्लम बस्तियों से तिलचट्टे की तरह निकल कर फैक्ट्रियों-कारखानों में काम करता है, इंडिया वालों के लिए बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनाता है, बड़े-बड़े मॉल बनाता है, हवाई अड्डे बनाता है, फ्लाईओवर बनाता है, उसके घरों में नौकर-नौकरानी बन कर काम करता है, उनका ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड आदि-आदि बनता है, फिर अपने दड़बे में लौट आता है। चौबीस घंटे बरसों-बरस खटते-खटते ही बीत जाते हैं और इसके बदले में किसी तरह अपना तथा अपने बच्चों का पेट पाल पाता  है। कभी कभी इंडिया वालों के छूटन तथा जूठन को भी प्राप्त कर लेता है। इस भारत का एक बड़ा हिस्सा गाँवों में जी तोड़ खटने के बाद जैसे-तैसे जिन्दा है। यहीं से भाग-भाग कर शहरों की स्लम बस्तियों में आ रहा है। इंडिया के लोग अपनी उपलब्धियों से मदमस्त हैं। भारत के लोग उनके लिए कीड़े- मकोड़े से ज्यादा महत्त्व नहीं रखते हैं। 2014 में भारत के नए मसीहा  नरेंद्र मोदी ने इंडिया की ओर से भारत वालों को सपना दिखाया कि अगर वे लोग उन्हें वोट दे कर प्रधानमंत्री बना दें तो वें भारत को भी इंडिया बना देंगे। भारत के भी अच्छे दिन आ जाएंगे। भारत के लोग अपने अच्छे दिनों का फिलहाल  तो इंतजार ही कर रहे हैं. इंडिया के लोगसुख के सागर में गोते लगा रहे हैँ।
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खाली पड़े फ्लैट और बेघर लोग : आवास : सुभाष गाताडे

सुभाष गाताडे
खाली पड़े फ्लैट और बेघर लोग
भारत में आवास क्रांति की जरूरत

नौएडा सिटी सेन्टर से आगे की ऑटो की यात्रा कई मायनों में शिक्षाप्रद रही। नई बनती बहुमंजिला इमारतों, अधबनी बिल्डिगों या बड़ी-बड़ी कम्पनियों के ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए बने बोर्डों के बीच से रास्ता निकालते हुए ऑटो डाइवर ने कहा, ‘छह लाख मकान बन रहे हैं, मगर पता नहीं छह हजार लोग भी रहने आएँगे या नहीं।’ तब इस बात का गुमान मुझे कैसे हो सकता था कि उसका यह सूत्रीकरण रियल इस्टेट विश्लेषकों के निरीक्षणों के साथ बिल्कुल फिट बैठेगा।

ब्रिटेन स्थित रियल इस्टेट विश्लेषक एवं रिसर्चर ‘नाइट फ्रेंक’ कम्पनी ने अपनी हाल की एक रिपोर्ट में दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रियल इस्टेट बाजार की जो तस्वीर खिंची है, वह किसी भी मायने में उत्साहवर्धक नहीं है। ‘इंडिया : रियल इस्टेट’ नामक अपनी रिपोर्ट में वे बताते हैं कि इस इलाके में 2 लाख 398 अपार्टमेंट यूनिट्स बन कर पड़े हैं, जिनमें रहनेवाला कोई नहीं है। उनका अनुमान है, इन्हें बेचने में कम से कम चार साल लगेगा। ध्यान रहे कि कम्पनी ने इन आँकड़ों को बिल्डर्स से बात करके इकट्ठा किया है ।(http://news.myestatepoint.com /news/noida/over-2-lakh-apartments-unsold-in-delhi-ncr-may-take-4-years-to-be-picked-up-knight-frank-2/) अपनी अर्धवार्षिक रिपोर्ट में एजेंसी ने लिखा है कि विगत छह माह से पुराने फलैटों को भी ग्राहक नहीं मिल रहे हैं। उपर्युक्त संस्था के निदेशक के मुताबिक ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का, जो देश का सब से बड़ा आवासीय मार्केट है, यह दौर उसका सब से खराब दौर कहा जा सकता है।’

वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब देश में खाली पड़े नए मकानों की बात चली है। अभी पिछले साल की ही बात है जब समूचे देश को ले कर किए गए एक सर्वेक्षण के हवाले से एक लेख में बताया गया था कि ‘शहरी भारत में लगभग एक करोड़ बीस लाख मकान बन कर खाली पड़े हैं’। (http://www.firstpost.com/business/1-2-crore-vacant-homes-one-number-tells-us-wrong-indian-real-estate-2220612.html) सीबीआरई साउथ एशिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक के हवाले से बताया गया था कि भले ही शहरी भारत में मकानों की कमी हो, इतने मकान खाली पड़े हैं। लेख में विगत साल के आर्थिक सर्वेक्षण का भी जिक्र था, जिसके मुताबिक ‘शहरों में लगभग 1 करोड़ अठासी लाख मकानों की कमी है।’ आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात को भी स्पष्ट किया गया था कि इनमें से 95.6 फीसदी हिस्सा आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों या निम्न आय वर्ग के हिस्सों में से है।

यह विरोधाभास क्यों है कि खरीदार नहीं है, इसके बावजूद मकान बनते जा रहे हैं? दरअसल रियल इस्टेट कम्पनियाँ इतनी तेजी से उन लोगों के लिए मकान बनाती तथा बेचती जा रही हैं जो निवेश करने की स्थिति में हैं और सट्टेबाजी की उम्मीद में अपने निवेश में भारी रिटर्न की ताक में रहते हैं। दूसरे शब्दों में, ये मकान रहने के लिए नहीं, ऊँची कीमतों पर बेचने के लिए बन रहे हैं,  इनमें अच्छा खासा ब्लैक मनी लगी है। अगर हम उद्यमियों के संगठन ‘फिक्की’ के अध्ययन ‘ए स्टडी ऑन वाइडेनिंग ऑफ टैक्स बेस एण्ड टेकलिंग ब्लैक मनी’ देखें ( जो फरवरी  2015 में प्रकाशित हुई थी : संदर्भ वही) तो वह इसी बात की ताईद करते हुए बताती है कि ‘भारत में रियल इस्टेट का क्षेत्रा ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 11 फीसदी लगा है। वर्ष  2012-13 का अध्ययन बताता है कि रियल इस्टेट सेक्टर में ब्लैक मनी का सबसे अधिक हिस्सा लगा हुआ है।’

एक क्षेपक के तौर पर बताया जा सकता है कि आवास के बुलबुले के फूटने का नजारा महज भारत में ही नहीं सामने आ रहा है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के अन्त में मंदी की जो शुरुआत हुई थी, वह भी अमेरिका में इसी बुलबुले के फूटने के साथ सामने आई थी। दुनिया की सब से बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने को आतुर एवं तैयार चीन में इसी किस्म का सिलसिला सामने आया था, जब वहाँ की सरकार ने मंदी से निपटने के नाम पर नए शहरों को बसाने में एव रियल इस्टेट में खूब पैसा लगाया; मगर आज आलम यह है कि तमाम शहरों में अपार्टमेंट खाली पड़े हैं, क्योंकि खरीदार नहीं मिल रहा है। ऐसे शहरों को भुतहा शहर अर्थात घोस्ट सिटी भी कहा जाने लगा है।

एक तरफ खाली पड़े दो करोड़ से ज्यादा फ्लैट और दूसरी तरफ इतने  सारे बेघर या सस्ते मकान की तलाश में लगे लोग। यह पहेली कब और कैसे सुलझाई जा सकेगी?  ब्लैक मनी के खिलाफ आए दिन बयान देनेवाली सरकार उस पर अंकुश लगाने के लिए किस तरह की चेष्टा करेगी या वह खाली पड़े मकानों को किराए पर चढ़ाने के लिए किराएदारी के  बहुत पुराने अधिनियम में किस तरह के समायानुकूल संशोधन करेगी, ताकि मकानों के किराए पर चढ़ाने से हिचकने वाले लोग भी उन्हें किराए पर चढ़ा सकें,  यह बातें भविष्य के गर्भ में छिपी हैं। स्थितियाँ बद से बदतर होने वाली हैं, यह इस बात से भी जाहिर है कि अगर सस्ती दरों पर मकानों को उपलब्ध नहीं कराया गया तो संभावना यही बनती है कि हमारे शहर अधिकाधिक स्लमों में तब्दील होते रहेंगे, जैसा कि हाल का आर्थिक सर्वेक्षण रेखांकित करता है -  ‘मुल्क की आबादी का 30 फीसदी हिस्सा शहरों में रहता है और 2030 तक आते-आते यह आँकड़ा 50 फीसदी तक पहुँचनेवाला है।’ क्या इसका मतलब यह है कि इक्कीसवीं सदी में आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उद्यत भारत शहरों के विशाल स्लमीकरण की परिघटना का मूक दर्शक बना रहेगा?

दिलचस्प है कि अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘पर्याप्त आवास के अधिकार’ के लिए नियुक्त स्पेशल रेर्पोटियर सुश्री लैलानी फरहा ने भारत के अपने दौरे के बाद भारत में आवास की स्थिति में नजर आती गैरबराबरी एवं सरकारी असंपृक्तता की बात पर जोर दिया था, जिसमें उन्होंने बेघरों की वास्तविक स्थिति को कम करके पेश करने की उनकी कोशिशों को रेखांकित किया था। उनका कहना था कि इस मामले में न केन्द्र सरकार आँकड़े दे पाने की स्थिति में होती हैं न राज्य सरकारें। (http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/united-nations-india-right-to-adequate-housing-govt-housing-for-all-scheme2766389/) उन्होंने यह भी जोड़ा कि न केन्द्र सरकार और न ही कोई राज्य सरकार बेघरों की सही गिनती करती है और जो आँकड़े पेश किए जाते हैं, वे स्थिति की गंभीरता को कम करके आँकते हैं। जिस मुल्क में दुनिया के सबसे अधिक शहरी गरीब एवं भूमिहीन लोग रहते हैं, वहाँ जबरन उजाड़े जाने के सिलसिले पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अकसर ऐसी कार्रवाइयों को सरकार के आर्थिक विकास के एजेण्डा को न्यायोचित ठहराने के लिए अंजाम दिया जाता है। गौरतलब है कि बेघरपन को ले कर उनके त्रिआयामीय सुझाव इस बात की भी ताईद कर रहे थे कि उनके लिए भी यह मसला महज आवास तक सीमित नहीं है।

घर और मकान में क्या फरक है? इस सन्दर्भ में फरहा ‘उचित आवास के भौतिक पहलू और परिवार या सामाजिक सम्बन्ध कायम करने के लिए और सामुदायिक जीवन में साझेदारी करने के सुरक्षित स्थान के सामाजिक पहलू’ की बात करती हैं। वे व्यवस्थागत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार की भी बात करती हैं जिसके तहत किसी का बेघर होना उसे एक ऐसी सामाजिक पहचान प्रदान करता है जिसके साथ भेदभाव ‘स्वाभाविक’ लगता है। यह अकारण नहीं कि भारत में ऐसे कानून आज भी मौजूद हैं जो सड़क पर पाए जानेवाले व्यक्ति को रिमाण्ड होम में भेजने - जिसे भिखारियों की जेल भी कहा जाता है - के अधिकार से सरकार को लैस करते हैं। उनके मुताबिक, जब सरकार इस बात को स्वीकार करे कि बेघरों के मानवाधिकार होते हैं तो उस पर यह जिम्मेदारी भी आ जाती  है कि शेल्टर, आवास या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक इन दुर्भाग्यग्रस्त लोगों की पहुँच को सुगम बनाए और उनके साथ भेदभाव रोके।

दिल्ली के एक एनजीओ 'हजार्ड सेंटर' की तरफ से कुछ दिन पहलेएक पुस्तिका ‘दिल्ली किसकी है?’ जारी हुई थी। इसमें दिल्ली शहर के विकास के लिए  बने दो मास्टर प्लानों और उन्हें बनाने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर रौशनी डाली गई थी। पुस्तिका के अनुसार शहर में आवास और उद्योगों के समुचित विकास के लिए बने मास्टर प्लान में आवास के लिए 44,000 हेक्टेअर जमीन तथा उद्योगों के लिए 67 औद्योगिक क्षेत्रों की बात की गई थी। जमीनी यथार्थ यह है कि अभी तक आवास पर महज 11,000 हेक्टेअर जमीन खर्च हुई है, बाकी 33,000 हेक्टेअर जमीन कहाँ गई? दूसरी तरफ अब तक सिर्फ 23 औद्योगिक क्षेत्र चालू हो  सके, जिस वजह से अनधिकृत ढंग से उद्योग फैले।

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर बेघर शहरी गरीब के लिए सन 2022 तक मकान सुनिश्चित करने का वायदा किया था। प्रधानमंत्री आवास योजना  के तहत एलान किया गया था कि इस साल 30 लाख मकान बनाए जाएँगे, ताकि 2022 तक यह लक्ष्य पूरा हो जाए। अखबारों की कतरनों को पलटें तो पता चलता है कि बीते एक साल में महज 1623 मकान बनाए गए, जिनमें से 718 छत्तीसगढ़ में और 823 गुजरात में बनाए गए हैं। (जनसत्ता, 25 जून  2016) ये गिने-चुने मकान - भी जिनकी संख्या महज 1,623 है - अफोर्डेबल हाउसिंग की उपयोजना के तहत बनाए गए हैं। इस आवास योजना में डेढ़ लाख रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से सरकार की ओर से बिल्डर को सब्सिडी दी जाती है। इनमें झुग्गियों के पुनर्विकास की स्कीम का सब से बुरा हाल रहा। इस स्कीम के तहत एक भी मकान नहीं बना है। स्कीम यह हैकि बिल्डर् झुग्गियों के विकास का बेड़ा उठाएँगे और लोगों को बसाएँगे। इसके बाद जो जमीन बच जाएगी उस पर निर्माण कर वे उसे बाजार दर पर बेच सकेंगे।  मोदी सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना काफी हद तक प्राइवेट सेक्टर के उद्यम पर आश्रित है। इससे पहले यूपीए सरकार की राजीव गांधी आवास योजना में प्रोजेक्ट कॉस्ट की 50 से 75 फीसदी राशि सरकार वहन करती थी, बाकी हिस्सा राज्य सरकार और नाम मात्र की राशि लाभार्थी को देना होता था।

यह आलम तब है जब अपने कई फैसलों में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय यह मानता  दिखाई देता है कि लोगों को आवास का अधिकार है। संविधान की धारा  21, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देती है, एक तरह से आवास को भी बुनियादी अधिकार का हिस्सा मानती है। चमेली सिंह और शान्तिस्तर बिल्डर्स मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आवास के अधिकार को बुनियादी अधिकार माना था और यह कहा था कि आवास के अधिकार का अर्थ है रहने की पर्याप्त जगह, साफ वातावरण आदि। वर्ष 1997 में नवाब खान के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ-साफ कहा था कि ‘यह राज्य का कर्तव्य है कि वह उचित लागत पर मकानों का निर्माण करे और उन्हें गरीबों को उपलब्ध कराए।’ 1988 में भारत सरकार ने नेशनल हैबिटाट एण्ड हाउसिंग पॉलिसी बनाई थी, जिसमें चेतावनी दी गयी थी, ‘आजादी के पचास साल बाद हममें से अधिकतर लोग ऐसी परिस्थितियों में रहते हैं जिनमें पशु भी निवास नहीं कर सकते। यह परिस्थिति आवास क्रान्ति की जरूरत बताती है।’
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स्त्री उत्पीड़न का नया रूप : मध्य प्रदेश : अजय खरे

अजय खरे

स्त्री उत्पीड़न का नया रूप

मध्य प्रदेश के सतना जिले की आकांक्षा त्रिपाठी को अपनी मनपसंद शादी करने के चलते करीब चालीस दिनों तक भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। आकांक्षा अभी बीस साल की है। यानी वह दो साल पहले ही बालिग हो चुकी थी। अजयगढ़ निवासी उदय सिंह से उसने शादी कर ली,  तो उसके मायका पक्ष ने ससुराल वालों पर भारी दवाब बनाया। मायके द्वारा दाखिल आवेदन के आधार पर सतना की अनुविभागीय दंडाधिकारी द्वारा जारी सर्च वारंट पर आकांक्षा को उसकी ससुराल अजय गढ़ (जिला पन्ना) से 25 जुलाई 2016 को जबरन सतना लाया गया। आकांक्षा ने डिप्टी कलेक्टर सपना त्रिपाठी के न्यायालय में साफ-साफ कहा कि वह मायके जाना नहीं चाहती, उसे उसकी ससुराल भेज दिया जाए, फिर भी उसे सतना के नारी निकेतन में भेज दिया गया।

आकांक्षा बालिग ही नहीं, बल्कि एक शादीशुदा स्त्री भी है, इसके बावजूद प्रशासन की हठधर्मिता के चलते उसे अनावश्यक रूप से चालीस दिनों तक नारी निकेतन में रहना पड़ा। वहाँ उसकी स्थिति कैदी की तरह थी। उससे न कोई मिल सकता था न उसकी आवाज कहीं पहुँच सकती थी। 40 दिनों में आकांक्षा के ससुराल पक्ष के किसी भी सदस्य को एक बार भी नारी निकेतन जा कर उससे मुलाकात करने की अनुमति प्रदान नहीं की गई। आकांक्षा का नारी निकेतन का अनुभव काफी कड़वा रहा। आकांक्षा की सास वंदना सिंह ने डिप्टी कलेक्टर सपना त्रिपाठी के न्यायालय में अर्जी लगाई कि उसे नारी निकेतन से मुक्त  किया जाए। लेकिन उनकी अर्जी को अनदेखा किया जाता रहा। आकांक्षा के पक्ष में पेश किए गए आयु संबंधी प्रमाण पत्रों को भी अनदेखा किया गया। मूल दस्तावेज पेश करने के बाद भी उसकी रिहाई संभव नहीं हो पाई। वह अनावश्यक रूप से नारी निकेतन में कैद रखी गई थी। बहू आकांक्षा को मुक्त कराने के लिए वंदना सिंह उनकी पुत्री और सहयोगियों को काफी परेशान होना पड़ा। वंदना सिंह अपनी बहू को ले कर अपने घर अजयगढ़ वापस जाना चाहतीं थीं, लेकिन प्रशासन के अड़ियल रवैए के कारण उनका पूरा परिवार परेशान होता रहा।

आकांक्षा
जब लड़कियों के साथ अन्याय या अत्याचार होता है, पुलिस को कार्यवाही करने की जल्दी नहीं होती। बहुत मुश्किल से और बहुत देर में उसके पाँव उठते हैं, लेकिन अंतरजातीय विवाह के मामले में पूरा प्रशासन सक्रिय हो उठा। वह शादी को तुड़वाने पर उतारू था। पुलिस की कोशिश यह दिखाई पड़ती थी कि आकांक्षा किसी तरह मायके जाने के लिए तैयार हो जाए या फिर उसकी मानसिक स्थिति इतनी खराब कर दी जाए कि उसे नारी निकेतन या मानसिक चिकित्सालय में रखने का आधार बन जाए। आकांक्षा रोज कहती थी कि उसे नारी निकेतन में क्यों रखा जा रहा है – उसे उसकी ससुराल जाने दिया जाए, पर  नारी निकेतन की चारदीवारी में उसकी आवाज सिसक कर रह गई।
उदय

2 अगस्त 2016 को आकांक्षा को सतना जिला अस्पताल ले जाने की खबर मिलने पर उसकी सास वंदना सिंह ने उससे मुलाकात की। उन्हें आशंका थी कि प्रशासन उनकी बहू को मानसिक रोगी साबित करने का षड्यंत्र रच कर मामले को दूसरा मोड़ देना चाहता है।  10 अगस्त 2016 को आकांक्षा को उसके बयान के आधार पर मुक्त किया जाना था। इस मामले में आकांक्षा के पति के ममरे भाई रंगकर्मी हीरेन्द्र सिंह (रीवा) की मौजूदगी सतना कलेक्ट्रेट में आए कुछ  व्यक्तियों को बिल्कुल रास नहीं आ रही थी। टीआई ने कलेक्ट्रेट परिसर में हीरेन्द्र सिंह के साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें जबरिया सिटी कोतवाली ले जा कर लॉकअप में डाल दिया गया। हीरेन्द्र सिंह के थैले में एक कट्टा रख कर उन्हें फँसा देने की धमकी दी गई। कुछ कोरे कागजात पर दस्तखत करवाने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया। दूसरी ओर सुरक्षा के नाम पर आकांक्षा को फिर नारी निकेतन, सतना भेज दिया गया था। इस बात को ले कर रीवा जोन के आई जी आशुतोष राय को एक ज्ञापन सौंप कर विरोध दर्ज कराया गया।

आकांक्षा की इच्छा को जान कर अंततः 6 सितंबर 2016 को जबलपुर उच्च न्यायालय ने 6 सितम्बर 2016 को सुन कर उसे नारी निकेतन से मुक्त कर दिया। आकांक्षा अब अपनी ससुराल अजयगढ़ में है। लेकिन यह प्रश्न अपनी जगह बना हुआ है कि जिस प्रगतिशील कदम को प्रशासन  का सहयोग मिलना चाहिए, उसकी वजह से उसे इतनी यंत्रणा क्यों सहनी पड़ी? आकांक्षा अडिग न रहती और समाजवादी जन परिषद तथा नारी चेतना मंच ने साथ नहीं दिया होता, तो वह शायद आज भी, हजारों अन्य महिलाओं की तरह, नारी निकेतन में सड़ रही होती।
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बलात्कार का वर्ग चरित्र : कानून : रवींद्र गोयल

रवींद्र गोयल
बलात्कार का वर्ग चरित्र

अगस्त 2016 में दिल्ली की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 'पीपली लाइव' फिल्म के सह-निर्देशक, इतिहासकार और दास्तानगो महमूद फारूकी को बलात्कार के मामले में सात साल की सजा सुनाई (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार बनाम महमूद फारूकी)। फारूकी रोड्स स्कॉलर रहे हैं। उन्होंने दून स्कूल और सेंट स्टीफेंस से पढ़ाई की। उनकी किताब 'बिसीज्डः वायसेज फ्रॉम दिल्ली 1857' काफी चर्चित रही है। एक अमेरिकी स्त्री ने आरोप लगाया था कि जब वह  अपने शोध के सिलसिले में दिल्ली के सुखदेव विहार में महमूद फारूकी  के घर उनसे मिलने गई थी तब फारूकी ने उन्हें मुख मैथुन (ओरल सेक्स) के लिए बाध्य किया था, जो बलात्कार की श्रेणी में आता है। जज संजीव जैन ने फारूकी को धारा 376 के तहत दोषी पाया और उन्हें सात साल जेल की सजा सुनाई, जो इस धारा में न्यूनतम सजा है, और पचास हजार रु. का जुर्माना लगाया।

भारत के कानूनी इतिहास में यह पहला मामला है जब ओरल सेक्स को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है। यह कानून में निर्भया कांड के बाद किए गए संसोधनों का नतीजा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि इस केस में महिला की बात को अदालत ने सही माना है। तीसरे, इस फैसले से समाज में संदेश जाता है कि अभियुक्त कोई भी हो, उसे सजा दी जाएगी।

महमूद फारूकी को दी गई सजा ने धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और नारीवादी लेखकों और कार्यकर्ताओं के बीच एक बहुत ही तीखी बहस को जन्म दिया है। बहस के बिंदुओं पर चर्चा से पहले यह समझ लेना आवश्यक है कि समाज के मुखर तबकों में यह बहस आखिर आई कहाँ से है। इसे समझने के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि प्रबंध विज्ञान में सीमित समझदारी का सिद्धांत पढ़ाया जाता है, जिसके अनुसार व्यक्तियों की समझदारी उनके दिमाग की संज्ञानात्मक सीमाओं तक सीमित है। इस वजह से जब अपनों या अपने जैसों की गलतियों या आचरण के बारे में राय बनानी हो तो हमारा विवेक कुंद हो जाता है। महमूद फारूकी कोई साधारण आदमी नहीं है। वह समाज के संभ्रांत ऊपरी तबके का सदस्य है। उस या तरुन तेजपाल जैसे लोग किसी स्त्री के साथ जबरदस्ती यौन सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर सकते हैं, यह मानना इस तबके को परेशान करता है और उस पर सजा भी हो जाए तो एक नैतिक संकट खड़ा हो जाता है।

महमूद फारूकी
जो मित्र फारूकी केस के फैसले से परेशान हैं, उनकी तीन मुख्य शिकायतें हैं। सब से पहली शिकायत यह है कि यह फैसला दरशाता है कि  महिलाओं के हितों के नाम पर बनाए गए कठोर कानून कैसे पुरुष विरोधी हो जाते हैं। इसलिए बलात्कार विरोधी कानून को थोड़ा कम कठोर होना चाहिए। तर्क दिया जा रहा है कि सभी घटनाओं को बलात्कार कहना उचित नहीं है। एक जाने-माने वकील का कहना है कि अपने ड्राइंग रूम में किसी महिला के साथ जबरन ओरल सेक्स और एक जघन्य सामूहिक बलात्कार में फर्क किया जाना चाहिए। इस तर्क से कि सभी बलात्कार समान होते हैं, सब घटनाओं को बराबर मानना ठीक नहीं है। लेकिन इस चिंता का स्रोत शायद कानून की सख्ती नहीं है। अभी तो इस कानून के अन्तर्गत केवल एक आदमी को सजा हुई है। अतः यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि इस कानून के तहत पुरुषों को प्रताड़ित किया जा रहा है। शायद वाचाल वर्ग में इतनी चिंता तब नहीं होती यदि यही सजा किसी मामूली आदमी को दी गई होती। कानून की चपेट में आए व्यक्ति से उपजी हमदर्दी का कारण यह है कि वह अपने ही संभ्रांत समुदाय का सदस्य है।

इन मित्रों की दूसरी शिकायत यह है कि इस केस में सम्बंधित तथ्यों का उचित अध्ययन नहीं हुआ और फैसला जल्दी में सुनाया गया है। घटना 28 मार्च 2015 की है। जून 2015 में केस दायर किया गया। अगस्त 2015 में सुनवाई शुरू हुई और 30 जुलाई 2016 को फैसला सुनाया गया।   दोनों पक्षों के हितों की देखभाल काबिल वकील कर रहे थे और यह मानने का कोई आधार नहीं है कि उन्होंने अपने काम को जिम्मेवारी से नहीं पूरा किया होगा। ऐसे में यह दलील कि फैसला जल्दी में क्यों सुना दिया गया, एक खोखली दलील है। तार्किक माँग तो यह होनी चाहिए कि और मामलों में भी फैसले जल्दी सुनाए जाएँ।

कई मित्रों ने 'बन्दीवादी नारीवाद' (कारसेरल फेमिनिज्म) के खतरे की ओर संकेत किया है। यह ऐसा नारीवाद है जो आज के नवउदारपंथी दौर में महिलाओं पर पुरुष द्वारा हिंसा संबंधी शिकायतों का हल न्यायिक कठोरता में देखता है। यह एक गंभीर बहस है और यह सवाल वाजिब है कि जेल की सजा से कोई सुधरता नहीं है। लेकिन अजीब बात यह है कि यह तर्क निर्भया केस के आरोपियों को  कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की माँग के समय नहीं उठाया गया था, फिर इसका फारूकी केस से क्या सम्बन्ध हो सकता है? मूल बात यह है कि जब तक देश में कोई कानून है तब तक सभी वर्गों से आए हुए आरोपितों को उस कानून के हिसाब से सजा मिलनी चाहिए। सच तो यह है कि यह फैसला निर्भया हत्याकांड से उपजे आन्दोलन की उपलब्धि है और स्त्री की गरिमा की रक्षा करने में निर्णायक साबित हो सकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि भारतीय मध्य वर्ग की सीमित संवेदना का विस्तार होगा और वह ‘समरथ को नहिं दोष गोसाईं’ के वर्गवादी सोच से आगे बढ़ सकेगा।
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